भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय १७४ ] ब्राह्मण-प्रेत-संवाद, सङ्गम-महिमा तथा वामन-पूजाकी विधि [ ३१५

प्रेतोंने पूछा—‘जो मूर्खतावश सदा अधर्म तथा विरुद्ध कर्म करते हैं, ऐसे पापी व्यक्तियोंके प्रेतत्वमुक्तिके क्या उपाय हैं, आप यह बतानेकी कृपा करें।’

ब्राह्मणने कहा—‘महाभागो! बहुत पहले राजा मान्धाताके इसी प्रकार प्रश्न पूछनेपर वसिष्ठजीने उन्हें इसका उपदेश किया था। यह पुण्यमय प्रसङ्ग प्रेतोंको मुक्त कर उन्हें उत्तम गति प्रदान करता है। भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षमें श्रवण नक्षत्रसे युक्त द्वादशीमें किये गये दान, हवन और स्नान—ये सभी लाख गुना फल प्रदान करते हैं। उस दिन सरस्वती-सङ्गममें स्नानकर भगवान् वामनकी पूजाकर विधिपूर्वक कमण्डलुका दान करे। इस वामन-द्वादशीके व्रतसे मनुष्य प्रेत नहीं होता और मन्वन्तरपर्यन्त स्वर्गमें निवास करता है। तत्पश्चात् वह वेदपारगामी ‘जातिस्मर’ ब्राह्मण होता है और फिर निरन्तर ब्रह्मचिन्तन करनेसे वह मुक्त हो जाता है।’

‘‘उस दिन भगवान्के षोडशोपचार-पूजनकी विधि है। इसके लिये वह आवाहन करते हुए कहे—‘श्रीपते! आप अपने अंशसे सब जगह विराजमान रहते हैं। मुझपर कृपा करके यहाँ पधारिये और इस स्थानको सुशोभित कीजिये’। फिर—‘आप श्रवण नक्षत्रके रूपमें साक्षात् भगवान् ही हैं और आज द्वादशीको आकाशमें सुशोभित हैं। अपनी अभिलाषा-सिद्धिके लिये मैं आपको नमस्कार करता हूँ’ ऐसा कहकर श्रवण नक्षत्रका भी पूजन-वन्दन करे। फिर—‘केशव! आपकी नाभिसे कमल निकला है और यह विश्व आपपर ही अवलम्बित है, आपको मेरा प्रणाम है’—यह कहकर भगवान् वामनको स्नान कराये। ‘नारायण! आप निराकाररूपसे सर्वत्र विराजते हैं। जगद्योने! आप सर्वव्यापी, सर्वमय एवं अच्युत हैं। आपको नमस्कार’—यह कहकर चन्दनसे उनकी पूजा करे। ‘केशव! श्रवण नक्षत्र और द्वादशी तिथिसे युक्त इस पुण्यमय अवसरपर मेरी पूजा स्वीकार करनेकी कृपा कीजिये’—यह कहकर पुष्प चढ़ाये। ‘शङ्ख, चक्र एवं गदा धारण करनेवाले भगवन्! आप देवताओंके भी आराध्य हैं। यह धूप सेवामें समर्पित है’—यह कहकर धूप दे। दीपक-समर्पण करनेके लिये कहे—‘अच्युत, अनन्त, गोविन्द तथा वासुदेव आदि नामोंको अलङ्कृत करनेवाले प्रभो! आपके लिये नमस्कार है। आपकी कृपासे इस तेजद्वारा यह विस्तृत अखिल विश्व नष्ट न होकर सदा प्रकाश प्राप्त करता रहे।’ नैवेद्य-अर्पण करते हुए कहे—‘भक्तोंकी याचना पूर्ण करनेवाले भगवन्! आप तेजका रूप धारण करके सर्वत्र व्याप्त हैं। आपके लिये नमस्कार है। प्रभो! आप अदितिके गर्भमें आकर भूमण्डलपर पधार चुके हैं। आपने अपने तीन पगोंसे अखिल लोकको नाप लिया और बलिका शासन समाप्त किया था। आपको मेरा नमस्कार है।’ ‘भगवन्! आप अन्न, सूर्य, चन्द्रमा, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, यम और अग्नि आदिका रूप धारण करके सदा विराजते हैं’—यह कहकर कमण्डलु प्रदान करे। फिर ‘इस कपिला गौके अङ्गोंमें चौदह भुवन स्थित हैं। इसके दानसे मेरी मनःकामना पूर्ण हो’—यह कहकर कपिला दान करे। अन्तमें इस प्रकार कहकर विसर्जन करे—‘भगवन्! आपको देवगर्भ कहा जाता है। मैं भलीभाँति आपका पूजन कर