वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३१८ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १७५-१७६ |
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एवं यहाँ कैसे आयी तथा रहती हो ?
उस समय पाञ्चालके अनुरोधपूर्वक पूछनेपर भी उस कन्याने उसका कुछ उत्तर नहीं दिया। कुछ समय बाद पाञ्चालने कहा—‘देखो, अब तुम यदि सच्ची बात नहीं कहोगी तो मैं अपने प्राणोंका त्याग कर दूँगा।’ उसके इस निश्चयको देख उस कन्याने अपने माता-पिता, भाई, देश, जाति और कुल सबका यथावत् परिचय देते हुए बतलाया कि ‘मेरे पिताके पाँच पुत्र और मैं—ये छः संतानें हुई थीं, जिनमें सबसे छोटी संतान मैं ही हूँ। विवाहके बाद मेरे पतिदेवका शीघ्र ही देहान्त हो गया। पाँचों भाइयोंमें जो सबसे छोटा था, वह धनकी तृष्णासे बचपनमें ही व्यापारियोंके साथ विदेश चला गया। उसके चले जानेपर मेरे माता-पिता मर गये। अतएव कुछ सहायकोंका साथ पाकर मैं इस तीर्थमें उनके अस्थिप्रवाहके लिये चली आयी। यहाँ कुछ गणिकाओंके कुचक्रमें पड़कर मेरी यह दशा हुई। मैंने कुलटा स्त्रियोंका धर्म अपनाकर अपने कुलको नष्ट कर दिया। यही नहीं, मातृ-पितृ और पति—इन तीनों कुलोंके इक्कीस पीढ़ियोंको घोर नरकमें गिरा दिया।’
इस प्रसङ्गको सुनकर पाञ्चालको तो मूर्च्छा आ गयी और वह भूमिपर गिर पड़ा। वहाँ उपस्थित स्त्रियाँ दीनवदना उस ब्राह्मणकुमारीको समझा-बुझाकर पाञ्चालके चारों ओर खड़ी हो गयीं और फिर अनेक प्रकारके उपायोंका प्रयोग कर उन सबोंने उसकी मूर्च्छाको दूर किया। जब उसके शरीरमें चेतना आयी तो उन्होंने उससे बेहोशीका कारण पूछा। इसपर उस ब्राह्मणकुमारने अपना सारा वृत्तान्त कह सुनाया। फिर इस पापसे उसके मनमें घोर चिन्ता व्याप्त हो गयी और वह प्रायश्चित्तकी बात सोचने लगा। उसने कहा—
‘मुनियोंने विचार करके यह आदेश दिया है कि यदि कोई द्विजाति ब्राह्मणकी हत्या कर दे अथवा मदिरा पी ले तो उसका प्रायश्चित्त शरीरका परित्याग ही है। माता, गुरुकी पत्नी, बहन, पुत्री, और पुत्रवधूसे अवैध सम्बन्ध रखनेवालेको जलती अग्निमें प्रवेश कर जाना चाहिये। इसके अतिरिक्त उसकी शुद्धिके लिये दूसरा कोई उपाय नहीं है।’
जब पाञ्चालीने अपने बड़े भाईके मुखसे ही मुनिकथित यह प्रायश्चित्त सुना तो उसने भी अपने सौभाग्यके सम्पूर्ण आभूषण, रत्न-वस्त्र, धन और धान्य आदि जो कुछ भी वस्तुएँ संचित कर रखी थीं, वह सब-का-सब ब्राह्मणोंमें बाँट दिया। साथ ही बताया कि ‘इस द्रव्यसे कालञ्जरका शृङ्गार तथा एक उद्यानका निर्माण कराया जाय।’ फिर उसने सोचा—‘अपनी आत्म-शुद्धिके लिये ‘कृष्णगङ्गोद्भवतीर्थ’में चलकर विधिपूर्वक चितारोहण करूँ।’
उधर पाञ्चाल भी सुमन्तुमुनिके पास पहुँच कर उन्हें प्रणामकर मृत्युके उपयोगी कर्मोंका सम्पादन कर मथुराके निवासी ब्राह्मणोंको बुलाकर उन्हें भलीभाँति दान देकर अपनी शेष सम्पूर्ण धनराशि सत्र खोलनेके लिये दे दी और विधिके अनुसार अपनी और्ध्वदैहिक संस्कारके लिये भी व्यवस्था कर ली। ‘कृष्णगङ्गा’में स्नानकर उसने इष्टदेवका दर्शनकर, उन्हें प्रणाम किया और सुमन्तुमुनिके चरणोंको पकड़कर प्रार्थना की—‘भगवन्! मैं अगम्या-गमनके दोषसे महान् पापी बन गया हूँ। मुझ कुलनाशकका स्वभगिनीके साथ ही दुर्योगसे अवैध सम्बन्ध हो गया। अब मैं अपने शरीरका त्याग करना चाहता हूँ। आप आज्ञा दें।’
इस प्रकार सुमन्तुमुनिको अपना पाप सुनाकर चितापर घृत छिड़क कर वह अग्निमें प्रवेश