वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३२ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय १८३-१८४
भगवान् वराह कहते हैं— वसुंधरे! मेरी ताम्रकी सुन्दर एवं चमकीली अर्चाका निर्माण कराकर समुचित उपचारपूर्वक मन्दिरमें ले आये और उत्तराभिमुख रखे। फिर चित्रा नक्षत्रमें उसका अन्नाधिवासनकर अनेक प्रकारके गन्धों एवं पञ्चगव्यसे मिश्रित जलसे मेरी प्रतिमाको स्नान कराये। स्नान करानेके मन्त्रका भाव यह है—‘भगवन्! जो जगत्के एकमात्र तत्त्व तथा उसके आश्रय हैं, वे आप ही हैं। आप मेरी प्रार्थना स्वीकार करके यहाँ पधारिये और पाँच भूतोंके साथ इस तामे (ताम्र)-की प्रतिमामें प्रतिष्ठित होकर मुझे दर्शन दीजिये।’ यशस्विनि! इस प्रकार प्रार्थनापूर्वक प्रतिमा स्थापित कर पूर्वोक्त विधिके क्रमसे अधिवासनसमापक पूजा सम्पन्न करे। दूसरे दिन सूर्योदय होनेपर वेदकी ऋचासे शुद्धि करके मन्त्रपूर्वक मूर्तिको स्नान कराये। उपस्थित ब्राह्मणमण्डली वेदध्वनि करे और माङ्गलिक वस्तुएँ मण्डपमें रखी जायँ। पूजा करनेवाला व्यक्ति सुगन्धित द्रव्यसे युक्त जल लेकर इस भावके मन्त्रको पढ़ता हुआ मेरी प्रतिमाको स्नान कराये। भाव यह है—‘ॐकारस्वरूप प्रभो! जो सर्वोपरि विराजमान हैं, सर्वसमर्थ हैं, जिनकी शक्ति पाकर माया बलवती हुई है तथा जो यौगिक शक्तिके शिरोमणि हैं, वे पुरुष आप ही तो हैं। प्रभो! मेरे कल्याणके लिये यथाशीघ्र यहाँ पधारिये और इस ताम्रमयी प्रतिमामें विराजनेकी कृपा कीजिये। ॐकारस्वरूप भगवन्! आप परम पुरुष हैं। सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, वायु, श्वास एवं प्रश्वास—ये सब स्वयं आप ही तो हैं।’ इसी प्रकार गन्ध, पुष्प एवं दीपकसे अर्चना करनी चाहिये। स्थापनाके मन्त्रका भाव यह है— तीनों लोकोंके प्रतिपालक पुरुषोत्तम! ‘आप प्रकाशके भी प्रकाशक, विज्ञानमय, आनन्दमय एवं संसारके प्रकाशक हैं। भगवन्! यहाँ आइये और इस प्रतिमामें सदाके लिये विराजिये और कृपाकर मेरी रक्षा कीजिये।’ वैष्णव शास्त्रोंमें जो नियम बतलाये गये हैं, उसके अनुसार इस मन्त्रको पढ़कर स्थापना करनी चाहिये। फिर हाथमें निर्मल श्वेत वस्त्र लेकर कहे—‘सम्पूर्ण विश्वपर शासन करनेवाले प्रभो! आप ॐकारस्वरूप परम पुरुष परमात्मा जगत्में एकमात्र तत्त्व एवं शुद्धस्वरूप हैं। ऐसे आप पुरुषोत्तमको मेरा नमस्कार है। मैं आपको ये सुन्दर वस्त्र अर्पित करता हूँ, आप इन्हें स्वीकार करनेकी कृपा कीजिये।
पृथ्वि! मेरे कर्ममें परायण रहनेवाला मानव प्रतिमाको वस्त्रोंसे आच्छादितकर फिर विधिपूर्वक मेरी अर्चा करे। गन्ध एवं धूप आदिसे पूजा करनेके उपरान्त नैवेद्य अर्पण करे। तत्पश्चात् शान्ति-पाठ कराया जाय। शान्ति-मन्त्रका भाव है—‘देवताओं और ब्राह्मणोंके लिये उत्तम शान्ति सुलभ हो। राजा, राष्ट्र, वैश्य, बालक, धान्य, व्यापार एवं गर्भिणी स्त्रियाँ—सबमें सदा शान्ति बनी रहे। देवेश! आपकी कृपासे मैं कभी अशान्त न होऊँ।’
शान्ति-पाठके पश्चात् ब्राह्मणोंकी पूजाकर भोजन, वस्त्र एवं अलंकारोंके द्वारा गुरुकी पूजा करनी चाहिये। जिसने गुरुकी पूजा की, उसने मेरी ही पूजा की। जिसके व्यवहारसे गुरु संतुष्ट न हुए, उससे मैं भी बहुत दूर रहता हूँ। जो मनुष्य इस विधानसे मेरी स्थापना करता है, उसके इस कार्यसे छत्तीस पीढ़ी तर जाती है। भद्रे! ताँबेकी प्रतिमामें मेरे स्थापनकी यह विधि है, जिसे तुम्हें बतला दिया। इसी भाँति सभी प्रतिमाओंकी पूजाका प्रकार मैं तुम्हें बता दूँगा। पृथ्वि! मुझे