भारतकोश
वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Venisamhara Nataka of Bhatta Narayana with Commentary

भट्ट नारायण द्वारा

DevanagariHindipublished355 पृष्ठ

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१२ कथा-सार प्रियं नामक राक्षस और उसकी वसागन्धा नामकी पत्नी यथेच्छ रुधिर, मांस, वसा और मज्जा से तृप्त होकर उस विकट संग्रामके सौ बरस तक अनवरत चलनेकी कामना कर रही थी और उधर द्रौपदीकी वेणीको पकड़कर घसींटनेवाले दुष्ट दुःशासनका वध करनेको दृढ़प्रतिज्ञ प्रचण्ड गदाधारी भीम दुःशासनका रुधिरपान करनेके लिये रणस्थलीमे इतस्ततः गरज रहे थे । पर उस दिन उनकी गदाशक्ति क्षीण हो रही थी, क्योंकि परशुरामके प्रधान शिष्य, समस्त लोकके आचार्य, धनुर्धारियोंमे श्रेष्ठ, कौरव-पाण्डव उभय पक्षके गुरु, ब्राह्मणश्रेष्ठ महामहा पराक्रमी द्रोणाचार्य दुःशासनकी रक्षामें तत्पर होकर कौरवोंके सेनानायक बनकर सृष्टिसंहार कालीन झंझावातसे क्षुब्ध पुष्करावर्तक मेघोंकी भीषण गड़गड़ाहटकी प्रतिध्वनिका अनुसरण करनेवाले अपने तीखे वाणोंसे पाण्डवोंकी सेनाको तितर-वितर कर रहे थे । उनके दिव्य शस्त्रोंकी ज्वालासे गाण्डीवधारी अर्जुन, सात्यकि और भीम भी तिलमिलाकर रणस्थलसे भाग जाना चाहते थे । समस्त पाण्डव-सेनामें त्राहि-त्राहि की प्रतिध्वनि गूंज रही थी । अन्तमें श्रीकृष्णकी मंत्रणासे द्रोणा- चार्य के पुत्र महारथी अश्वत्थामाके संग्राममें मर जानेकी झूठी अफवाह उड़ा दी गयी जिसे सुनकर द्रोणाचार्य स्तब्ध हो गये और धर्मराज युधिष्ठिरके मुखसे भी 'अश्वत्थामा हतः' (पृ. ११०) इतना अर्धोक्तपद सुनते ही विश्वसित होकर उन्होंने शस्त्रत्याग कर दिया । फिर क्या था, तत्क्षण ही धृष्टद्युम्नने लपककर आचार्यकी शिखाको पकड़कर उनकी 'गर्दन काट डाली और भीमकी गदा दुःशासनकी तरफ टूट पड़ी । समस्त कौरवसेना त्रस्त होकर रणस्थलीसे भाग गयी । आचार्यका सारथी भी शस्त्र-घातसे व्याकुल होकर रणस्थलके लिए प्रस्तुत शस्त्रसज्ज अश्वत्थामाके चरणोंपर जाकर गिर पड़ा और आचार्यकी दुःखद मृत्युका समाचार सुना दिया । विश्वविश्रुत पराक्रमी पूज्य पिताके अतर्कित मृत्युसमाचारसे अश्वत्थामा व्याकुल हो उठे । मृत्युका कारण मिथ्या प्रसारित पुत्रवियोग अश्वत्थामाको अधिक सता रहा था । रह-रहकर वे अजातशत्रु धर्मराजको कोस रहे थे । उनको विश्वास था कि मेरे पिता अजेय हैं; रणमें उनके दिव्य शस्त्रोंके सामने देवता भी टिक नहीं सकते । इसी बीच अश्वत्थामाके मामा कृपाचार्य भी रणसे पराङ्मुख होकर वहाँ उपस्थित हो गये और दीर्घ श्वास लेते हुये कहने लगे- 'समी