विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८८ : विज्ञानभैरव निष्क्रियानन्दनाथ करंकिणी मुद्रा को करांकिणी कहते हैं। निम्न दो श्लोकों में उन्होंने इनका लक्षण और स्वरूप बताया है— करास्त्रयोदशाकाराः सर्वाक्षक्षोभवृत्तयः। अङ्कं तु निर्निकेतायाः संविदो देहविस्तरः ॥ एतत्कराङ्कमाख्यातं तस्य ग्रासादनावृतम्। निष्कराङ्कं समुद्दिष्टं निरालम्बं परं पदम् ॥ अर्थात् 'क' उन ^1तेरह आकारों को कहते हैं, जो कि सभी इन्द्रियों में क्षोभ उत्पन्न करते हैं। 'अंक' उस निर्निकेत (निराधार = निर्विषय) संवित् स्वरूपिणी भगवती के विस्तार को, विराट् स्वरूप को कहते हैं। अपने निर्विकल्प, निष्कल स्वरूप में जब यह संवित् स्वरूपिणी भगवती इस करांक को, अर्थात् प्रमाण-प्रमेय स्वरूप सारे जगत् को अपने सकल स्वरूप के साथ समेट लेती है, तो यह उसका निष्करांक स्वरूप कहलाता है। इस निष्करांक स्वरूप को न तो कोई छिपा सकता है और न कोई अपने स्वरूप के सिवाय इसका आश्रय ही बन सकता है। इसका यह निरावरण और निरालम्ब स्वरूप ही वास्तविक है। इस विषय को विस्तार से इस तरह समझा जा सकता है—परम आकाश रूपी समुद्र में, जो कि क्रमदर्शन में 'महाकौलार्णव' नाम से प्रसिद्ध है, अकुल स्वरूपिणी शक्ति की लहरें उठती हैं। इसकी प्रथम अवस्था को 'पर' नाम से जाना जाता है। यही शक्ति जब सूक्ष्म रूप में अवतरित होती है, तो उसके अकुल स्वरूप में से क्रमशः कुलपंचक की सृष्टि होने की प्रक्रिया तो आरम्भ हो जाती है, किन्तु वह सूक्ष्म रूप में, आश्यान दशा (घनावस्था) में एका- कार बनी रहती है। शक्ति की यह अवस्था व्योमेश्वरी कहलाती है। यह यद्यपि निष्कल है, तो भी यह आद्या शक्ति सकल स्वरूप में रमण करती हुई वृन्दचक्र पर्यन्त त्रिभुवन में भासित होती रहती है। कितना भी विश्लेषण किया जाय, उसका स्वरूप नहीं बदलता, वह एकाकार ही रहती है। इसी का जब विकास होने लगता है, तो उस समय परम आकाश रूपी समुद्र में अव्यक्त रूप से खेचरी आदि स्वरूपों की प्रतिष्ठा उसी तरह से होने लगती है, जैसे कि मयूर के अंडे के रस में मयूर के शरीर के रूप में भविष्य में अभिव्यक्त होने वाले सभी वर्ण अव्यक्त अवस्था में विद्यमान रहते हैं। उस परम आकाश रूपी समुद्र की यह स्पन्दात्मक पहली लहर वामेश्वरी कहलाती है। यही इसका पहला परिणाम है। दिव्यौघ के पाँच चक्रों को विकसित करने वाली वृन्दचक्र की नायिका यह वामेश्वरी ही 'सभी पदार्थ सर्वात्मक हैं'^2 इस तान्त्रिक सिद्धान्त के अनुसार वृन्दचक्र में अपने को डालकर पाँच रूपों में अभिव्यक्त होती
- "करणं त्रयोदशविधं" (३२) सांख्यकारिका के इस श्लोक में पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय और तीन अन्तःकरण इन सबको मिलाकर तेरह करण प्रतिपादित हैं। यह त्रयोदशविध करण ही क्षोभ के कारण हैं।
- इस सिद्धान्त का संक्षिप्त प्रतिपादन पहले पृ० ६१ की टिप्पणी में किया जा चुका है। इसके लिये श्लोक १०३ की व्याख्या भी देखनी चाहिये।