भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 160, कुल 256 में से

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विज्ञानभैरव : १०३ विषय को समझने के लिए विस्तार की अपेक्षा है। कुल प्रक्रिया का विवेचन करते समय इस विषय पर उपोद्घात में विचार किया जायगा। भट्ट आनन्द ने इस श्लोक की व्याख्या इस तरह से की है— अं और अः (बिन्दु और विसर्ग) से अकार को निकाल देने पर केवल बिन्दु (ं) और विसर्ग (:) ही बच रहेंगे। बिना आधार (अकार) के इनको समझ पाना कठिन है। योगी जब इनमें धारणा करते हुए अपने चित्त को भी इसी तरह से निराधार, निर्विषय बना लेता है, तो उसको परम निर्वृति (मोक्ष) प्राप्त हो जाती है। पहले श्लोक में बिन्दु और विसर्ग से रहित 'अकार' में धारणा का और इस श्लोक में अकार से रहित निराधार बिन्दु अथवा विसर्ग में धारणा का विधान है। यह इन दोनों धारणाओं में स्पष्ट भेद है ॥८९॥ [ धारणा-६७ ] व्योमाकारं स्वमात्मानं ध्यायेद् दिग्भिरनावृतम् । निराश्रया चितिः शक्तिः स्वरूपं दर्शयेत् तदा ॥९०॥ यदा व्योमाकारमित्यनाकृतिं न तु तुच्छम्, स्वमात्मानं दिग्भिर्नीलपीतादिभि- रुपाधिभिरनावृतं विवर्जितम्, विश्वव्यापिनमिति यावत्, कृत्वा ध्यायेत्, तदा चिति- शक्तिर्निराश्रया सती स्वं रूपं दर्शयेत् ॥९०॥ आकाश की कोई आकृति न रहने पर भी जैसे उसकी सत्ता मानी जाती है, उसी तरह से जिस व्योमाकार अर्थात् निराकार, शून्यस्वभाव स्वात्मस्वरूप में यहाँ धारणा को स्थिर करने का विधान है, वह भी अलीक, तुच्छ, मिथ्या न होकर केवल किसी भी प्रकार की आकृति से रहित ही माना जाता है। इस नील, पीत आदि उपाधियों से रहित, अर्थात् विश्व- व्यापी स्वात्मस्वरूप में धारणा को स्थिर कर देने पर चिति शक्ति बाह्य आलम्बनों से मुक्त होकर अपने सहज स्वरूप को दिखा देती है, अर्थात् साधक अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है। स्वच्छन्दतन्त्र में १"अहमेव परो हंसः परमात्मा परात्परः" (४।३९९) इत्यादि ग्रन्थ में इस स्थिति का वर्णन किया गया है ॥९०॥ [ धारणा-६८ ] किञ्चिदङ्गं विभिद्यादौ तीक्ष्णसूच्यादिना ततः । तत्रैव चेतनां१ युक्त्वा२ भैरवे३ निर्मला गतिः ॥९१॥ आदौ प्रथमं किञ्चिदङ्गम् अङ्गुल्यङ्गुष्ठादिकं तीक्ष्णसूच्यादिना निशितसूचीकण्ट- कादिना विभिद्य छित्त्वा ततस्तदनन्तरं तत्रैव चेतनां संविदं युक्त्वा संयोज्य भैरवे १. ०ना-ख० । २. ०क्ता-ख० । ३. ०वी-ख० ।

  1. यह पाठ भट्टानन्द की टीका में मिलता है (पृष्ठ ३७)। शिवोपाध्याय ने “अहमेव परो हंसः शिवः परमकारणम्" (पृ० १३०) ऐसा पाठ स्वीकार किया है। मुद्रित स्वच्छन्द- तन्त्र (भा० २, प० ४, पृ० २५३) में भी यही पाठ मिलता है।
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