विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१७० : विज्ञानभैरव मन्त्र का विमर्श करने से पूर्णाहन्ता का बोध कैसे हो सकता है ? इस प्रश्न का उत्तर महेश्वरा- नन्द ने निम्न श्लोक में दिया है— यदि निजहृदयोल्लासं निर्णोतुं नित्यनिष्कलमिच्छा । मध्यत्रुटिस्त्रुटिव्याप्त्यास्तंगतयोः सोमसूर्ययोस्तर्हि ॥ (५६ श्लो०) इसका अभिप्राय यह है—सोम शब्द से यहाँ अपान हकार अभिप्रेत है, क्योंकि वह सारे वेद्य पदार्थों का पोषक है और सूर्य शब्द में प्राण सकार, जो कि सभी वेद्य पदार्थों को जानने वाला है । उक्त प्रक्रिया से हंकार और सःकार के अर्थात् सोम और सूर्य के अस्त हो जाने पर इनके अस्तगमन के काल के मध्य के क्षण का उसी तरह से उद्धार करना चाहिये, जैसे कि माणिक्य की मलिनता को दूर कर दिया जाता है । माणिक्य के मैल को साफ कर देने पर जैसे उसमें चमक पैदा हो जाती है, उसी तरह से मध्यक्षण का उद्धार करने पर 'हंसः' इस अजपा मन्त्र का विमर्श जाग उठता है । सकार जब अपने हृदयस्थानीय विसर्ग में और हकार अनुस्वार में विश्राम ले लेता है, तो इन दोनों अवस्थाओं को अलग करने वाला जो काल-क्षण है, उसका उद्धार करना चाहिये, उसको पकड़ना चाहिये । ऐसा करने में 'अहं सः' इस तरह का विमर्श उत्पन्न होता है। हंस मन्त्र से जुड़ा हुआ 'अहं सः, सोऽहम्' इस आकार का यह विमर्श महामन्त्र कहलाता है । इसी का विमर्श करना चाहिये, क्योंकि संवित् का यह स्वरूप ही अपनी प्रत्यभिज्ञा का, अर्थात् 'मै वही शिव हूँ' इस पहचान का उपाय है । इस प्रकार संवित्क्रम में 'अहं सः' अथवा 'सोऽहम्' यह अजपा मन्त्र का स्वरूप बनता है । जयरथ ने सकार और हकार के उच्चारण से उत्पन्न जप को सहज अर्थात् अकृत्रिम (स्वाभाविक) बताया है— सहौ क्षपादिनामानामधरोत्तरचारिणौ । परस्परद्वेषरतो मत्तो नागहुडोपमौ ॥ कस्तो रोधयितुं शक्तो वीर्यं मुक्त्वाऽस्वरं महत् । (तन्त्रा० वि० ३।१७०) यहाँ क्षपा और दिन से क्रमशः अपान और प्राण का निर्देश किया गया है। वीरावली कुल में भी क्षपा और दिन शब्द से इन्हीं का ग्रहण किया गया है । जैसे कि— सितासितौ दीर्घह्रस्वौ धर्माधर्मौ दिनक्षपे । क्षीयेते यदि तद्दीक्षा व्याप्त्या ध्यानेन योगतः ॥ (तन्त्रा० ६।७४) सित और असित शब्द से यहाँ पर शुक्ल दिन और कृष्ण रात्रि का ग्रहण किया गया है । प्रकाश का विकास होने से दिन को दीर्घ और प्रकाश का संकोच होने से रात्रि को ह्रस्व अर्थात् छोटी माना गया है । वेदोक्त विधियों का विस्तार दिन में ही होता है, अतः दिन को धर्म तथा रात्रि में वेदोक्त विधियों को करने का अधिकार न रहने से रात्रि को अधर्म कहा गया है । सूर्य को ही त्रयी (वेद) का शरीर माना गया है, चन्द्र को नहीं । इस प्रकार प्राण और अपान स्थानीय ये दिन और रात जब कुम्भक अवस्था में शान्त हो जाते हैं, निर्विकल्पा- त्मक परा संवित् के रूप में भासित होने लगते हैं, तभी ज्ञान, योग और क्रियात्मक दीक्षा से Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)