भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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६ : विज्ञानभैरव होने से विषय का साक्षात्कार नहीं होता, परावस्था में तो ¹वेद्यवेदकभाव की सत्ता बनती ही नहीं। इस विश्लेषण के आधार पर 'भैरवी उवाच' और 'भैरव उवाच' जैसे शास्त्र में व्यवहृत वाक्यों का यह अर्थ होता है कि परमशिव विश्व का कल्याण करने की दृष्टि से स्वयं ही विमर्श रूप में बदल कर अनुग्राह्य की योग्यता के अनुसार पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी वाणी के माध्यम से प्रश्न करते हैं और प्रकाश स्वरूप में अवस्थित होकर इसी पद्धति से वे प्रश्नों का उत्तर भी देते हैं। 'उवाच' पद यहाँ लिट् लकार के उत्तम पुरुष के एक वचन में प्रयुक्त हुआ है। यद्यपि यहाँ 'वच्मि' इस वर्तमान काल की क्रिया का प्रयोग होना चाहिए, किन्तु शास्त्र तो सनातन हैं, अर्थात् इनको संप्रदाय परम्परा तीनों कालों में अविच्छिन्न रूप से चलती रहती है, अतः साधारणतः यहाँ भूत काल की क्रिया का ही प्रयोग होता है। शास्त्रों में ऐसा अनेक स्थलों में देखा गया है कि जो प्रकरण बाद में आने वाला है, उसके लिए भी भविष्य काल की क्रिया का प्रयोग न होकर भूत काल की क्रिया का प्रयोग होता है²। महास्वच्छन्दतन्त्र के निम्न वचन से इस बात की पुष्टि होती है— ³गुरुशिष्यपदे स्थित्वा स्वयं देवः सदाशिवः। प्रश्नोत्तरपरैर्वाक्यैस्तन्त्रं समवतारयत् ।। अर्थात् स्वयं सदाशिव देव शिव और शक्ति के रूप में गुरु और शिष्य बनकर प्रश्न और प्रतिवचन के रूप में तन्त्रों की अवतारणा करते हैं। ग्रन्थोपक्रम (तन्त्रावतार) प्रस्तुत ग्रन्थ में 'श्रुतं देव' से लेकर 'छिन्धि संशयम्' पर्यन्त प्रथम सात श्लोकों में देवी अपने संशय को उपस्थित करती है और 'साधु साधु'से 'शिवः प्रिये' पर्यन्त चौदह श्लोकों में

  1. अभी बताया गया है कि परावस्था में शब्द और अर्थ अभिन्न रूप से स्त्यानावस्था में रहते हैं। वाच्य और वाचक के भेद के अभाव में लोक-व्यवहार नहीं चल सकता। इसी बात को वाक्यपदीयकार ने कहा है—"न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते। अनुविद्धमिव ज्ञानं सर्वं शब्देन भासते ।।" (१।१२३)। अर्थात् बिना शब्द के किसी भी वस्तु का ज्ञान नहीं हो सकता। वस्तुमात्र का ज्ञान किसी न किसी शब्द से जुड़ा हुआ ही रहता है। इस तरह से परावस्था में जब वाच्यवाचकभाव की स्थिति नहीं बनती, तो उसके सहारे चलने वाले वेद्यवेदकभाव, यह वेद्य (जानने योग्य) है और यह वेदक (जानने वाला है) है, की भी स्थिति सुतरां नहीं बन सकती।
  2. "अत एव तन्त्रराज उत्तरपटलेषु वक्ष्यमाणोऽप्यर्थः पूर्वपटलेषु प्रोक्त इति भूतार्थकपदेनैव तत्र तत्र निर्दिश्यते" (नि० से० १।१३)।
  3. योगिनीहृदयदीपिका (पृ० २) में यह श्लोक उद्धृत है। मुद्रित स्वच्छन्दतन्त्र (८.३१-३२) में पाठभेद के साथ यह श्लोक मिलता है। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dvivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)