विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविज्ञानभैरव : १९ एवंविधे परे तत्त्वे कः पूज्यः कश्च तृप्यति ॥१६॥ एवंविधे निष्कले परे तत्त्वेऽहमात्मनि परभैरवस्वरूपे सति कः पूज्यः कश्च तृप्यति ? कस्यचनान्यस्य पूज्यस्य तर्पणीयस्य चाभावात् पूज्यपूजकपूजानां तर्पकादीनां च चिदानन्दैकघनपरमार्थत्वात् सर्वमपि क्रियाडम्बरं व्यर्थमेवेति भावः ॥१६॥ इस प्रकार निष्कल परस्वरूप का विवेचन करने के उपरान्त पूर्व प्रतिपादित कर्म- काण्ड के आडम्बरों की व्यर्थता का यहाँ भैरव पुनः समर्थन करते हैं कि अहमात्मक परभैरव स्वरूप की इस निष्कलावस्था में कौन पूज्य होगा और उस पूजा से कौन तृप्त होने वाला है ? अर्थात् साधक के अपने स्वात्मस्वरूप से अतिरिक्त कोई पूजनीय और तर्पणीय तत्त्व नहीं है, क्योंकि पूज्य, पूजक और पूजा तथा तर्पक, तर्पणीय, तर्पण प्रभृति सभी स्वरूप परमार्थतः चिदानन्दघन परम तत्त्व की ही विभिन्न अवस्थाएँ हैं । इस स्थिति में कर्मकाण्ड का यह सारा आडम्बर व्यर्थ है ॥१६॥ एवंविधा भैरवस्य याऽवस्था परिगीयते । सा परा पररूपेण परा देवी प्रकीर्तिता ॥१७॥ एवंविधा उपरि वर्णितप्रकारा भैरवस्य या निष्कलस्वरूपा अवस्था परिगीयते शास्त्रेषु, सैषा पररूपेण परा प्रकृष्टा सती परा देवीति प्रकीर्तिता कथिता ॥१७॥ परा भट्टारिका संबन्धी संशय की पूर्णतः निवृत्ति के लिये भैरव अब उसके स्वरूप का स्पष्ट निरूपण करते हुए कहते हैं कि ऊपर वर्णित भैरव की जिस निष्कल अवस्था का शास्त्रों में गुणगान किया गया है, वस्तुतः वह भैरव से भिन्न नहीं है। यद्यपि कभी-कभी इनके स्वरूप का विश्लेषण करते समय इनमें परस्पर भेद का निरूपण भी किया जाता है, किन्तु यह वास्तविकता नहीं है । अतः बोध-भैरव के इस उत्कृष्ट निष्कल परस्वरूप से अभिन्न स्वरूप वाली यह परा देवी केवल नाम से ही परा नहीं है, किन्तु अपनी प्रकृष्टता के आधार पर भी परा कहलाती है ॥१७॥ १शक्तिशक्तिमतोर्यद्वदभेदः सर्वदा२ स्थितः । अतस्तद्धर्मधर्मित्वात् परा शक्तिः परात्मनः ॥१८॥ भैरवस्य इयमवस्था तस्य स्वरूपमेव । शक्तिस्वरूपा इयमवस्था शक्तिमतो भैरवादभिन्नैव । शक्तिः सामर्थ्यं विश्वनिर्माणकारि, तद् भैरवस्वरूपमेव । यतो हि शक्तिशक्तिमतोः सदा अभेदः स्वीक्रियते, अतः शक्तिमतो भैरवस्य संबन्धिनिः सर्वज्ञता- सर्वकर्तृ ता-सर्वात्मतादिभिर्धर्मैर्धर्मिणी परस्य चिदानन्दैकघनस्यात्मन इयं शक्तिः परेति प्रकीर्त्यते ॥१८॥ १. ॰स्मा॰-ख० ने० । २. संयवस्थितः-ने० ।
- यह श्लोक नेत्रतन्त्र (भा० २, पृ० ४४ और २७३) की उद्योत टीका में क्षेमराज द्वारा उद्धृत है ।