भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 166

विनय-पत्रिका १५५ अब प्रभात प्रगट ग्यान-भानुके प्रकास वास- ना, सराग मोह-द्वेष निविड़ तम टरे ॥२॥ भागे मद-मान चोर-भोर जानि जातुधान । काम-कोह-लोभ-छोभ-निकर अपडरे । देखत रघुबर-प्रताप, बीते संताप-पाप, ताप त्रिविध प्रेम-आप दूर ही करे ॥३॥ श्रवन सुनि गिरा गँभीर, जागे अतिधीर बीर, बर विराग-तोष सकल संत आदरे । तुलसिदास प्रभु कृपालु, निरखि जीवजन विहालु, भंज्यो भव-जाल परम मंगलाचरे ॥४॥ शब्दार्थ—वदत = कहते हैं। कुहू = अमावास्या। विपुल = बहुत । आप = जल । गिरा = वाणी। विहालु = व्याकुल । भंज्यो = तोड़ दिया, नष्ट कर दिया । भावार्थ—बुद्धिमान् जीवोंको श्रीरामजीकी कृपा जगा देती है। तू जागकर और मूर्खताको त्यागकर परमात्माके साथ प्रीति कर। तू (सत-असतका) विचार करके (कामक्रोधादि) विकारोंको छोड़ दे, उदार श्रीरामजीका भजन कर; क्योंकि चारों वेद उन्हें कल्याण-सागर और दीनबन्धु कहते हैं ॥१॥ मोह- मयी अमावास्याकी रात्रिमें तू चिरकालतक खूब सोया। जो माया-स्वप्नमें पड़ जाता है, वह अनुपम आत्म-स्वरूपको खो बैठता है। अब सबेरा प्रकट हो गया है; ज्ञान-सूर्यका प्रकाश होते ही वासना तथा राग-सहित मोह और द्वेषरूपी सघनान्धकार टल गया है ॥२॥ भोर हुआ जानकर मद और मानरूपी चोर भाग गये हैं और काम, क्रोध, लोभ, क्षोभरूपी राक्षस-समूह स्वयं ही डर गये हैं। श्रीरामजीका प्रताप देखते ही पाप-सन्ताप समाप्त हो गये हैं और तीनों तापोंको प्रेम-रूपी जलने दूर कर दिया है ॥३॥ अपने कानसे यह गम्भीर वाणी सुनकर अत्यन्त धीर-वीर सन्त मोह-निद्रासे जाग उठे हैं और श्रेष्ठ वैराग्य, सन्तोष आदिका आदर करने लगे हैं। हे तुलसीदास ! कृपालु श्रीरामजीने सब प्राणियों- को व्याकुल देखकर संसार-रूपी जालको नष्ट कर दिया है और परमानन्द देने लगे हैं ॥४॥