विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका १५७ अर्थात् मेरे आयुर्बलरूप हाथीको अपनी सेवामें खपाकर श्वान (कुत्ता) रूपी स्त्री- पुत्रादि नश्वर पदार्थ देनेवाले हैं। हे श्रीरामजी ! दीनोंकी पीड़ाका ध्यान तुम्हारे समान किसीको भी नहीं है ॥२॥ यदि मेरी यह बात झूठी हो तो हे दिव्यदेव ! आप अपने आगे ही मेरे इस शरीरकी कठिनसे कठिन वही दुर्दशा कीजिये, जो दुर्दशा सर्पोंकी सभामें सावर मंत्र झूठा साबित होनेपर सँपेरेकी हुआ करती है; किन्तु यदि मैं सच्चा साबित हो जाऊँ, तो मुझे पंचोंके बीचमें प्रतिज्ञाके प्रमाण- स्वरूप पानका बीड़ा मिलना चाहिये-ताकि भक्तमंडली समझ सके कि तुलसी- रूपी चातकको केवल रामरूपी श्याम-मेघकी ही आशा है ॥३॥ विशेष १—इस पदमें ग्रंथकारने अपनी अनन्य भक्तिका पुष्टीकरण किया है। अनन्य भक्तिका लक्षण गुसाईंजीने इस प्रकार कथन किया है:— सो अनन्य जाके असि, मति न टरै हनुमंत । मैं सेवक सचराचर, रूप-स्वामि भगवन्त ॥ -रामचरितमानस ७६ ) राम को गुलाम, नाम 'रामबोला' राख्यो राम, काम इहै, नाम द्वै हौं कबहुँ कहत हौं। रोटी-लूगा नीके राखे, आगे हू की वेद भाखे, भलो है है तेरो, ताते आनँद लहत हौं ॥१॥ बाँध्यो हौं करम जड़ गरब गूढ़ निगड़, सुनत दुसह हौं तौ साँसति सहत हौं। आरत-अनाथ-नाथ, कौसलपाल, कृपाल, लीन्हों छीन दीन देख्यो दुरित दहत हौं ॥२॥ बूझ्यो ज्यों, कह्यो, मैं हूँ चेरो है रावरोजू, मेरो कोऊ कहूँ नाहिं चरन गहत हौं। मींजो गुरु पीठ, अपनाइ गहि बाँह, बोलि सेवक-सुखद, सदा विरद वहत हौं ॥३॥