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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

विनय-पत्रिका १५७ अर्थात् मेरे आयुर्बलरूप हाथीको अपनी सेवामें खपाकर श्वान (कुत्ता) रूपी स्त्री- पुत्रादि नश्वर पदार्थ देनेवाले हैं। हे श्रीरामजी ! दीनोंकी पीड़ाका ध्यान तुम्हारे समान किसीको भी नहीं है ॥२॥ यदि मेरी यह बात झूठी हो तो हे दिव्यदेव ! आप अपने आगे ही मेरे इस शरीरकी कठिनसे कठिन वही दुर्दशा कीजिये, जो दुर्दशा सर्पोंकी सभामें सावर मंत्र झूठा साबित होनेपर सँपेरेकी हुआ करती है; किन्तु यदि मैं सच्चा साबित हो जाऊँ, तो मुझे पंचोंके बीचमें प्रतिज्ञाके प्रमाण- स्वरूप पानका बीड़ा मिलना चाहिये-ताकि भक्तमंडली समझ सके कि तुलसी- रूपी चातकको केवल रामरूपी श्याम-मेघकी ही आशा है ॥३॥ विशेष १—इस पदमें ग्रंथकारने अपनी अनन्य भक्तिका पुष्टीकरण किया है। अनन्य भक्तिका लक्षण गुसाईंजीने इस प्रकार कथन किया है:— सो अनन्य जाके असि, मति न टरै हनुमंत । मैं सेवक सचराचर, रूप-स्वामि भगवन्त ॥ -रामचरितमानस ७६ ) राम को गुलाम, नाम 'रामबोला' राख्यो राम, काम इहै, नाम द्वै हौं कबहुँ कहत हौं। रोटी-लूगा नीके राखे, आगे हू की वेद भाखे, भलो है है तेरो, ताते आनँद लहत हौं ॥१॥ बाँध्यो हौं करम जड़ गरब गूढ़ निगड़, सुनत दुसह हौं तौ साँसति सहत हौं। आरत-अनाथ-नाथ, कौसलपाल, कृपाल, लीन्हों छीन दीन देख्यो दुरित दहत हौं ॥२॥ बूझ्यो ज्यों, कह्यो, मैं हूँ चेरो है रावरोजू, मेरो कोऊ कहूँ नाहिं चरन गहत हौं। मींजो गुरु पीठ, अपनाइ गहि बाँह, बोलि सेवक-सुखद, सदा विरद वहत हौं ॥३॥

१५८ विनय-पत्रिका लोग कहैं पोचु, सो न सोच न सँकोच मेरे ब्याह न बरेखी, जाति-पाँति न चहत हौं। तुलसी अकाज-काज राम ही के रीझे-खीझे, प्रीति की प्रतीति मन मुदित रहत हौं ॥४॥ शब्दार्थ—लूगा = धोती, वस्त्र। निगड़=बेड़ी। दुरित = पाप। मींजो = हाथ रख दिया, ठोंक दिया। विरद = बाना। अकाज-काज = नफा-नुकसान। भावार्थ—मैं श्रीरामजीका गुलाम हूँ। रामजीने मेरा नाम 'रामबोला' रखा है। मेरा काम यही है कि दो अक्षरका राम-नाम कभी-कभी कह लेता हूँ। इससे रामजीने मुझे अन्न-वस्त्रसे खुशहाल रखा है, और आगे (परलोक) के लिए भी वेदोंका कथन है कि तेरा भला होगा। इससे मैं सदा प्रसन्न रहता हूँ ॥१॥ रामजीका गुलाम होनेके पहले मैं जड़ कर्मोंकी अभिमानरूपी पुष्ट बेड़ियोंसे बँधा हुआ था, यह सुनते ही कि मैं तो असह्य कष्ट सह रहा हूँ, आत्तों और अनाथोंके स्वामी कृपालु श्रीरघुनाथजीने देखा कि मैं दीन हूँ और पापोंसे जल रहा हूँ, अतः उन्होंने मुझे कर्मबन्धनसे छुड़ा लिया ॥२॥ उन्होंने ज्यों ही मुझसे पूछा, त्यों ही मैंने भी कहा कि मैं भी आपका दास होना चाहता हूँ, मेरा कोई कहीं नहीं है, मैं आपके चरणोंको पकड़ता हूँ। इसपर गुरुरूप श्रीरामजीने मेरी पीठ ठोंक दी और बुलाकर मेरी बाँह पकड़ ली; तभीसे मैं भक्तों- को सुख पहुँचानेवाला (भगवान्का वैष्णवी) बाना धारण किये रहता हूँ ॥३॥ इससे लोग मुझे नीच कहते हैं; किन्तु इसका न तो मुझे सोच है और न मेरे दिलमें किसी तरह का संकोच ही हो रहा है। क्योंकि न तो मुझे ब्याह-बरेखी (सगाई) करनेकी ही जरूरत है और न मैं जाति-पाँतिका ही कायल हूँ। तुलसीदासका नफा-नुकसान श्रीरामजीके ही रीझने और खीझनेपर निर्भर है; किन्तु मुझे उनके प्रेमपर विश्वास है, इसीसे मैं मन ही मन प्रसन्न रहा करता हूँ ॥ विशेष १—'रामबोला'—कुछ लोग जो यह कहते हैं कि गोसाईंजीका पूर्व नाम रामबोला था, वह इसीके आधारपर जान पड़ता है। काशी नागरीप्रचारिणी

विनय-पत्रिका १५९ सभाके पाँच सदस्यों द्वारा सम्पादित रामचरितमानसमें लिखा है कि “इससे हमारा यह भी अनुमान होता है कि इनका विवाह नहीं हुआ था। माता- पिताको छोड़ देना तथा बचपनसे गुरुके साथ घूमना रामायण आदिसे भी प्रमाणित होता है और उसकी दृढ़ता इस पदसे भी होती है।” २—'रोटी लूगा'—के स्थानपर श्रीरामेश्वर भट्टने तो 'रोटी लूँगा' अर्थ किया ही है, वियोगी हरिजीने भी टीकाके प्रथम संस्करणमें 'सिर्फ रोटी लूँगा' (और कुछ नहीं चाहिये), अर्थ लिखा है। उक्त टीकाकारोंने यह नहीं सोचा कि 'लेना' क्रियाका 'लूगा' रूप हो सकता है या नहीं। इसीसे ऐसी भद्दी भूल हुई है। ( ७७ ) जानकी-जीवन, जग जीवन, जगत हित, जगदीस, रघुनाथ, राजीवलोचन राम। सरद-बिधु-वदन, सुखसील, श्रीसदन, सहज सुंदर तनु, सोभा अगनित काम ॥१॥ जग-सुपिता, सुमातु, सुगुरु, सुहित, सुमीत, सबको दाहिनो, दीनबन्धु, काहू को न बाम। आरतिहरन, सरनद, अतुलित दानि, प्रनतपाल, कृपालु, पतित-पावन नाम ॥२॥ सकल विस्व बंदित, सकल सुर-सेवित, आगम-निगम कहैं रावरेई गुनग्राम। इहै जानिकै तुलसी तिहारो जन भयो, न्यारो कै गनिबो जहाँ गने गरीब गुलाम ॥३॥ शब्दार्थ—बिधु = चन्द्रमा। श्रीसदन = लक्ष्मीका निवासस्थान। दाहिनो = अनु- कूल। आगम = वेद। निगम = शास्त्र। कै = या, अथवा। सरनद = शरण देनेवाले। भावार्थ—हे रामजी ! आप जानकीजीके, और संसारके जीवन, जगत्के हितकारी, जगदीश, रघुकुलके स्वामी तथा कमलके समान नेत्रवाले हैं। आपका मुख शारदीय पूर्णिमाके समान है। आप सुख प्रदान करनेवाले हैं और लक्ष्मीजी-

१६० विनय-पत्रिका के निवासस्थान हैं। सहज (बिना बनावट-सजावटके) ही आपके सुन्दर शरीर- की शोभा अगणित कामदेवोंके समान है ॥१॥ आप जगत्‌के पिता, माता, गुरु, हितू, मित्र, सबपर अनुकूल रहनेवाले, दीनबन्धु तथा किसीके भी प्रतिकूल न रहनेवाले हैं। आप दुःखोंके हरनेवाले, (शरणागतोंको) शरण देनेवाले, अमित- दानी, भक्तोंका पालन करनेवाले और कृपालु हैं। आपका नाम पापियोंको पवित्र करनेवाला है ॥२॥ विश्व-ब्रह्माण्ड आपकी वन्दना करता है, समस्त देवता आपकी सेवा करते हैं तथा वेद और शास्त्र आपकी ही गुणावली गाते हैं ! यही सब जानकर तुलसीदास आपका सेवक हुआ है; आप इसे (तुलसीदासको) अलग गिनेंगे या गरीब गुलामोंमें गिनेंगे ? ॥३॥ राग तोड़ी ( ७८ ) देव— दीन को दयालु दानि दूसरो न कोऊ । जाहि दीनता कहौं हौं देखौं दीन सोऊ ॥१॥ सुर, नर, मुनि, असुर, नाग साहिब तौ घनेरे । पै तौ लों जौ लों रावरे न नेकु नयन फेरे ॥२॥ त्रिभुवन, तिहुँकाल विदित, वेद वदति चारी । आदि-अंत-मध्य राम ! साहिबी तिहारी ॥३॥ तोहि माँगि माँगनौ न माँगनो कहायो । सुनि सुभाव-सील-सुजसु जाचन जन आयो ॥४॥ पाहन-पसु, विटप-विहँग अपने करि लीन्हे । महाराज दसरथ के ! रंक राय कीन्हे ॥५॥ तू गरीब को निवाज, हौं गरीब तेरो । बारक कहिये कृपालु ! तुलसिदास मेरो ॥६॥ शब्दार्थ—हौं = मै । घनेरे = बहुतेरे । लौ = तक । कहति = कहते हैं । पाहन = पत्थर, यहाँ यह शब्द अहिल्याके अर्थमें है । विटप = पेड़, (यमलार्जुन) । विहँग = पक्षी (गीध जटायु और काकभुशुंडि) । रंक = भिखारी । राय = राजा । बारक = एक बार ।

विनय-पत्रिका १६१ भावार्थ—हे श्रीरामजी ! दीनोंके लिए दयालु दानी (आपके सिवा) दूसरा कोई नहीं है। मैं जिसे अपनी दीनता सुनाता हूँ, वह (स्वयं ही) दीन नजर आता है ॥१॥ यों तो देवता, मनुष्य, मुनि, दैत्य, नाग आदि बहुत-से मालिक हैं, पर ये सब तभीतक हैं, जबतक आपकी दृष्टि जरा भी टेढ़ी नहीं होती ॥२॥ तीनों लोक और तीनों कालमें यही प्रसिद्ध है तथा चारों वेद भी कह रहे हैं कि हे राम ! आदि, अन्त और मध्यमें (केवल) आपकी ही साहबी है ॥३॥ आपसे माँगनेके बाद कोई भी भिक्षुक फिर मंगन नहीं रह गया। आपका यही स्वभाव, शील और सुयश सुनकर यह दास माँगने आया है ॥४॥ आपने पाषाण (अहल्या), पशु (वानर-भालू), वृक्ष (यमलार्जुन) और पक्षी (जटायु, काक- भुशुंडि आदि) तकको अपना लिया है। हे महाराज दशरथके पुत्र ! आपने दरिद्रोंको राजा बना दिया है ॥५॥ आप गरीबोंको निहाल करनेवाले हैं, और मैं आपका गरीब दास हूँ। हे कृपालु ! एक बार कह दीजिये कि तुलसीदास मेरा है ॥६॥ विशेष १—'विटप'—एक बार कुबेरके पुत्र नलकुबर और मणिग्रीवके मजाक उड़ानेपर नारदजीने उन्हें वृक्ष हो जानेके लिए शाप दे दिया था। अन्तमें उनके प्रार्थना करनेपर नारदजीने कह दिया था कि भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंके स्पर्शसे तुम्हारा उद्धार हो जायगा। वे दोनों भाई नारदके शापसे गोकुलमें अर्जुन वृक्ष बन गये। एक दिन यशोदाजीने किसी अपराधके कारण बालक श्रीकृष्णको ऊखलमें बाँध दिया। भगवान् धीरे-धीरे उन जुड़े हुए पेड़ोंके पास पहुँचे और ऊखलको दोनों वृक्षोंके बीचमें फँसाकर ऐसा झटका दिया कि दोनों पेड़ गिर पड़े। इस प्रकार वे दोनों वृक्ष-योनि छोड़कर यक्ष हो गये और भगवान्‌की स्तुति करने लगे। परमात्माने उन्हें मुक्त कर दिया। २—विहंग—(जटायु) ४३ वें पदके विशेषमें देखिये। ( ७९ ) देव— तू दयालु, दीन हों, तू दानि, हों भिखारी। हों प्रसिद्ध पातकी, तू पाप-पुंज-हारी ॥१॥ १०

१६२ विनय-पत्रिका नाथ तू अनाथ को, अनाथ कौन मोसों ? मो समान आरत नहिं, आरतिहर तोसों ॥२॥ ब्रह्म तू, हौं जीव, तू है ठाकुर, हौं चेरो । तात-मातु, गुरु-सखा तू सब बिधि हितु मेरो ॥३॥ तोहिं मोहिं नाते अनेक, मानिये जो भावै । ज्यों त्यों तुलसी कृपालु ! चरन-सरन पावै ॥४॥ शब्दार्थ—पातकी = पापी । आरत = दुखी । आरतिहर = पीड़ाको हरनेवाला । ठाकुर = स्वामी । चेरो = दास, सेवक । तात = पिता । नाते = सम्बन्ध । भावार्थ—हे प्रभो ! तुम दयालु हो, और मैं दीन हूँ । तुम दानी हो और मैं भिखारी हूँ । मैं प्रसिद्ध पापी हूँ, और तुम पाप-समूहका नाश करनेवाले हो ॥१॥ तुम अनाथोंके नाथ हो, और मेरे जैसा अनाथ कोई भी नहीं है । न तो मेरे समान कोई दुखिया है, और न तुम्हारे जैसा कोई दुःखका हरनेवाला ही है ॥२॥ तुम साक्षात् ब्रह्म हो, और मैं जीव हूँ । तुम स्वामी हो, मैं सेवक हूँ । तुम्हीं मेरे पिता, माता, गुरु, सखा तथा सब प्रकारसे हितकारी हो ॥३॥ तुम्हारे और मेरे बीच बहुत-से नाते हैं, उनमें जो रुचे उसे मान लो । हे कृपालु ! किसी तरह भी हो, तुलसीदासको तुम्हारे चरणोंकी शरण मिलनी चाहिये ॥४॥ विशेष १—'तोहि मोहि नाते अनेक'—कविने ऊपर कई नाते गिना दिये हैं; जैसे—तुम दयालु हो और मैं दीन हूँ; अर्थात् दयालुको दीनोंकी ही आवश्यकता रहा करती है । यदि दीन ही न हों तो आप दयालुता किसपर दिखायेंगे ? इसी प्रकार दीनको भी दयालुकी आवश्यकता रहती है । [ ८० ] दंद— और काहि माँगिये, को माँगिवो निवारै । अभिमतदातार कौन, दुख दरिद्र दारै ॥१॥ धरमधाम राम काम-कोटि-रूप रूरो । साहब सब बिधि सुजान, दान-खड्ग-सूरो ॥२॥

विनय-पत्रिका १६३ सुसमय दिन द्वै निसान सबके द्वार बाजै। कुसमय दसरथ के ! दानि तैं गरीब निवाजै ॥३॥ सेवा बिनु गुनविहीन दीनता सुनाये। जे जे तैं निहाल किये फूले फिरत पाये ॥४॥ तुलसिदास जाचक-रुचि जानि दान दीजै। रामचन्द्र चन्द्र तू, चकोर मोहिं कीजै ॥५॥ शब्दार्थ—निवारै = निवारण करने या छुड़ानेवाला। अभिमतदातार = मनोवांछित या इच्छित फल देनेवाला। दारै = दूर करता है। रूरो = सुन्दर। निसान = नगाड़ा। भावार्थ—हे देव ! और किससे माँगूँ ? कौन मेरा माँगना (सदाके लिए) छुड़ानेवाला है ? कौन मनोवांछित फल देनेवाला है जो मेरे दुःख-दरिद्रको दूर कर दे ? ॥१॥ हे धर्मके स्थान श्रीरामजी ! आप करोड़ों कामदेवोंके सौन्दर्यसे भी अधिक सुन्दर हैं। आप सब प्रकारसे बुद्धिमान्, मालिक और दान-रूपी तलवारके चलानेमें बहादुर हैं ॥२॥ अच्छे दिनमें तो दो दिन सबके दरवाजेपर नगाड़े बजते हैं (सब लोग चार पैसा खैरात करते हैं); पर हे दशरथ-नन्दन ! आप ऐसे दानी हैं कि बुरे समयमें भी (वनवासके समयमें भी जटायु, सुग्रीव, विभीषण आदि) गरीबोंको निहाल कर देते हैं ॥३॥ बिना सेवाके ही (अहल्या, शबरी) जिन-जिन गुणहीनोंको (बन्दर, भालू आदिको) दीनता सुनानेपर आपने निहाल किया है वे पैर फुलाये फिरते हैं ॥४॥ अब भिखारी तुलसीदासकी रुचि जानकर उसे भी दान दीजिये। हे श्रीरामचन्द्रजी ! आप चन्द्रमा हैं, अतः मुझे चकोर बना दीजिये—बस यही दान मुझे दीजिये ॥५॥ [ ८१ ] दीनबन्धु, सुखसिन्धु, कृपाकर, कारुनीक रघुराई। सुनहु नाथ ! मन जरत त्रिबिध जुर, करत फिरत बौराई ॥१॥ कबहूँ जोग रत, भोग-निरत सठ हठ वियोग बस होई। कवहूँ मोह-बस द्रोह-करत बहु, कबहूँ दया अति सोई ॥२॥ कवहूँ दीन, मतिहीन, रंकतर, कवहूँ भूप अभिमानी। कवहूँ मूढ़, पंडित विडंबरत, कवहूँ धर्मरत ग्यानी ॥३॥

१६४ विनय-पत्रिका कवहूँ देव ! जग धनमय रिपुमय, कवहूँ नारिमय भासै । संसृति-सन्निपात दारुन दुख, बिनु हरि-कृपा न नासै ॥४॥ संजम, जप, तप, नेम, धरम, व्रत, बहु भेषज-समुदाई । तुलसिदास भव-रोग , रामपद-प्रेम-हीन नहिं जाई ॥५॥ शब्दार्थ—जुर = ज्वर । सठ = दुष्ट । बिडंबरत = दम्भ या पाखंडमें रत । संसृति = संसार । भेषज = दवा । भावार्थ—हे दीनबन्धु, आनन्दके समुद्र, कृपाकी खानि और कारुणिक रामजी ! हे नाथ ! सुनिये, मेरा मन तीनों तापोंसे जल रहा है, इसीसे वह पागलपन करता फिर रहा है (ज्वरमें मनुष्य अचेत होकर बकता है) ॥१॥ (उसका पागलपन यही है कि) कभी तो वह योगाभ्यास करता है, कभी भोग- विलासमें फँस जाता है, कभी वह दुष्ट हठपूर्वक वियोगके वशमें हो जाता है, कभी मोहवश होकर अनेक तरहकी शत्रुता करता है और कभी वह बड़ा दया- वान् बन जाता है ॥२॥ कभी दीन, बुद्धिहीन और बड़ा ही कंगाल बन जाता है, कभी घमंडी राजा बन जाता है, कभी मूढ़, पंडित और ढोंगी बन जाता है एवं कभी धर्मरत ज्ञानी बन जाता है ॥३॥ हे देव ! कभी उसे यह संसार धनमय दीखता है, कभी शत्रुमय और स्त्री-मय दीखता है (अर्थात् कभी तो वह लोभमें, कभी क्रोधमें और कभी काममें फँसा रहता है) । इस संसाररूपी सन्नि- पात ज्वरका दारुण दुःख बिना ईश्वर-कृपाके नष्ट नहीं होता ॥४॥ यद्यपि संयम, जप, तप, नेम, धर्म, व्रत आदि बहुत-सी औषधियाँ हैं, पर तुलसीदास कहते हैं कि यह संसाररूपी रोग श्रीरामजीके चरणोंमें प्रेम हुए विना दूर नहीं हो सकता ॥५॥ विशेष १—इस पदमें मनकी विभिन्न दशाओंका वर्णन किया गया है । [ ८२ ] मोहजनित मल लाग विविध विधि कोटिहु जतन न जाई । जनम जनम अभ्यास-निरत चित, अधिक अधिक लपटाई ॥१॥

विनय-पत्रिका १६५ नयन मलिन परनारि निरखि, मन मलिन विषय सँग लागे । हृदय मलिन वासना-मान-मद, जीव सहज सुख त्यागे ॥२॥ परनिन्दा सुनि श्रवन मलिन भे, वचन दोष पर गाये । सब प्रकार मलभार लाग निज, नाथ-चरन बिसराये ॥३॥ तुलसिदास व्रत-दान, ग्यान-तप, सुद्धि हेतु श्रुति गावै । राम-चरन-अनुराग-नीर बिनु मल अति नास न पावै ॥४॥ शब्दार्थ—मल = पाप । नयन = नेत्र । श्रवन = कान । नीर = जल । भावार्थ—मोह-जनित अनेक प्रकारके लगे हुए पाप करोड़ों यत्न करनेपर भी नहीं छूटते। जन्म-जन्मान्तरसे अभ्यास-रत चित्त (पापमें) अधिकाधिक लिपटता जाता है ॥१॥ परायी स्त्रियोंको देखनेसे नेत्र मलिन हो गये हैं, और मन विषयोंके साथ लगा रहनेसे मलिन हो गया है। मान-मदादिक वासनाओंसे हृदय मलिन हो गया है, इसलिए जीवन अपने स्वाभाविक आनन्द-(आत्मानन्द) को त्याग बैठा है ॥२॥ दूसरोंकी निन्दा सुननेसे कान अपवित्र हो गये हैं तथा दूसरोंके दोष कहते-कहते वाणी भी मलिन हो गयी है। अपने स्वामी (श्रीरामजी) के चरणोंको भूल जानेसे ही यह मलका भार सब तरहसे मेरे पीछे लग गया है ॥३॥ ऐ तुलसीदास, वेदका कथन है कि व्रत, दान, ज्ञान और तप आदि शुद्धिके कारण अवश्य हैं, पर श्रीरामजीके चरणोंके प्रेम-जलके बिना पापोंका समूल नाश नहीं हुआ करता ॥४॥ राग जैतश्री [ ८३ ] कछु ह्वै न आइ गयो जनम जाय ।१ अति दुरलभ तनु पाइ कपट तजि, भजे न राम मन-बचन-काय ॥१॥ १. ऐसा ही भाव महात्मा सूरदासने भी व्यक्त किया है— दो मैं एकौ तौ न भई । ना हरि भजे न गृह सुख पाये, वृथा विहाइ गई ॥ ठानी हुती और कछु मनमें, औरै आनि ठई । अविगत गति कछु समुझि परति नहिं, जो कछु करत दई ॥

१६६ विनय-पत्रिका लरिकाई बीती अचेत चित, चंचलता चौगुने चाय । जोवन-जुर जुवती कुपथ्य करि, भयो त्रिदोष भरि मदन वाय ॥२॥ मध्य बयस धन हेतु गँवाई, कृषी वनिज नाना उपाय । राम-विमुख सुख लह्यो न सपनेहुँ, निसि बासर तयौ तिहूँ ताय ॥३॥ सेये नहिं सीतापति-सेवक, साधु सुमति भलि भगति भाय । सुने न पुलकि तनु, कहे न मुदित मन, किये जे चरित रघुबंसराय ॥४॥ अब सोचत मनि बिनु भुजंग ज्यों, विकल अंग दले जरा धाय । सिर धुनि-धुनि पछितात्त मींजि कर, कोउ न मीत हित दुसह दाय ॥५॥ जिन्ह लागि निज परलोक बिगाऱ्यौ, ते लजात होत ठाढ़े ठाँय । तुलसी अजहुँ सुमिरि रघुनाथहिं, तन्यो गयंद जाके एक नाँय ॥६॥ शब्दार्थ-जाय = व्यर्थ ही। काय = कर्म । चाय = चाव, इच्छा। मदनबाय = कामोन्माद । ताय = ताप । भाय = भाव । जरा = बुढ़ापा, वृद्धावस्था । दाय = दावानल । ठाँय = ठाँव, निकट । नाँय = नाम । भावार्थ-व्यर्थ ही जन्म बीत चला, कुछ भी न बन पड़ा ! अत्यन्त दुर्लभ शरीर पाकर निष्कपट भावसे मन, वचन और कर्मसे राम भजन नहीं किया ॥१॥ लड़कपन तो अज्ञानमें बीत गया, उस समय चित्तमें चंचलताकी चौगुनी चाव थी। जवानीका ज्वर चढ़नेपर स्त्री (प्रसंग) का कुपथ्य करनेके कारण त्रिदोष (सन्निपात) हो गया और (समूचे शरीरमें) कामदेवरूपी वायु भर गयी ॥२॥ उसके बाद बीचकी अवस्था मैंने खेती, व्यापार आदि अनेक उपायोंसे धन पैदा करनेमें खो दी । किन्तु श्रीरामजीसे विमुख होनेके कारण स्वप्नमें भी सुख नहीं मिला, रात-दिन तीनों तापोंसे तपता ही रहा ॥३॥ न तो श्रीरामजीके भक्तों, एवं ज्ञानी संतोंकी भक्ति-भावसे भली-भाँति सेवा ही की और न श्रीरघुनाथजीके सुत सनेह तिय सकल कुटुम मिलि, निसि दिन होत खई । पद-नख चन्द्र-चकोर-विमुख मन, खात अँगार मई ॥ विषम विकार-दवानल उपजी, मोह बयार बई । भ्रमत भ्रमत बहुतक दुख पायो, अजहुँ न टेव गई ॥ कहा होत अबके पछताने, होनी सिर बितई । सूरदास सेये न कृपानिधि, जो सुख सकल मई ॥

विनय-पत्रिका १६७ किये हुए चरित्रको रोमांच होकर प्रसन्न मनसे सुना और कहा ही ॥४॥ अब जब कि बुढ़ापेने दौड़कर अंग-प्रत्यंगको व्याकुल करके पीस डाला है, तब मणिहीन सर्पकी भाँति सोचा करता हूँ, सिर पीटकर तथा हाथ मींजकर पछताता हूँ, पर इस असह्य दावानलको बुझानेवाला कोई भी मित्र या हितू नहीं ! ॥५॥ जिनके लिए अपना परलोक बिगाड़ दिया, वे भी निकट खड़े होनेमें शर्माते हैं। तुलसीदास कहते हैं कि अब भी उस श्रीरामजीका स्मरण कर, जिनका एक बार नाम लेनेसे गजेन्द्र तर गया था ॥६॥ विशेष १—‘तह्यो गयंद’—एक बार तालाबमें जल-क्रीड़ा करते समय एक हाथी- का पैर एक मगरने पकड़ लिया था। जब सारी शक्ति लगानेपर भी हाथी अपना पैर न छुड़ा सका, तब उसने निराश होकर भगवान्‌को पुकारा। भगवान्‌ने ग्राहको मारकर उस हाथीको मुक्त कर दिया। [ ८४ ] तौ तू पछितैहै मन मींजि हाथ भयो है सुगम तोको अमर-अगम तन, समुझि धौं कत खोवत अकाथ॥१॥ सुख-साधन हरि-विमुख वृथा जैसे श्रम-फल घृत हित मथे पाथ। यह विचारि, तजि कुपथ-कुसंगति, चलि सुपंथ मिलि भले साथ ॥२॥ देखु राम-सेवक, सुनि कीरति, रटहि नाम करि गान गाथ। हृदय आनु धनु बान-पानि प्रभु, लसे मुनिपट, कटि कसे भाथ ॥३॥ तुलसिदास परिहरि प्रपंच सब, नाउ रामपद-कमल माथ। जनि डरपहि तोसे अनेक खल, अपनाये जानकीनाथ ॥४॥ शब्दार्थ—तौ = तब, तो। मींजि = मलकर। अमर = देवता। अगम = दुर्लभ। धौँ = न-जानें। कत = क्यों। अकाथ = व्यर्थ। पाथ = जल। भाथ = तरकस। भावार्थ—रे मन ! तब (पीछे) तू हाथ मलकर पछतायेगा। तुझे देवताओं- के लिए दुर्लभ (मनुष्य) शरीर सुगमतासे मिल गया है, यह समझकर भी न-जानें क्यों तू उसे व्यर्थ खो रहा है ॥१॥ परमात्मासे विमुख रहकर सुखका साधन करना उसी प्रकार व्यर्थ है, जैसे घी निकालनेके लिए पानी मँथनेपर केवल परि-

१६८ विनय-पत्रिका श्रमरुपी फल हाथ लगता है। यह सोचकर तू कुमार्ग और कुसंगको छोड़कर सज्जनोंके साथ मिलकर सुमार्गपर चल एवं ॥२॥ राम-भक्तोंके दर्शन कर और उनके मुखसे भगवान्‌की कीर्त्ति सुनकर नामको रट—रामकी गुण-गाथाओंका गान कर। हाथमें धनुष-बाण लिये मुनियोंके वस्त्र धारण किये तथा कमरमें तरकस कसे हुए प्रभुका अपने हृदयमें ध्यान कर ॥३॥ हे तुलसीदास ! तू सब प्रपंचोंको छोड़कर श्रीरामजीके चरणारविन्दोंपर मस्तक झुका। तू डर न, तेरे जैसे बहुत-से खलोंको जानकी-वल्लभ श्री रघुनाथजी अपना चुके हैं ॥४॥ राग-धनाश्री [ ८५ ] मन ! माधव को नेकु निहारहि । सुनु सठ, सदा रंक के धन ज्यों, छिन छिन प्रभुहि सँभारहि ॥१॥ सोभा-सील-ग्यान-गुन-मंदिर, सुंदर परम उदारहि । रंजन संत, अखिल अघ-गंजन, भंजन विषय-विकारहि ॥२॥ जो बिनु जोग-जग्ग-ब्रत-संजम गयो चहै भव पारहि । तौ जनि तुलसिदास निसि-बासर हरि-पद-कमल बिसारहि ॥३॥ शब्दार्थ—नेकु = जरा, तनिक। रंजन = प्रसन्न करनेवाले। अघ = पाप। गंजन = नाशकर्ता। भावार्थ—रे मन ! भगवान् माधवकी ओर तनिक देख। रे शठ ! सुन, जैसे कंगाल सदैव अपने धनकी सँभाल किया करता है, उसी प्रकार तू प्रतिक्षण परमात्माको सँभालनेमें लगा रह ॥१॥ (किस परमात्माको सँभालनेमें यह मन लगा रहे ?) परम सुन्दर और उदार (दानी) परमात्माको। वह परमात्मा शोभा, शील, ज्ञान और गुणोंके घर हैं। वह संत-जनोंको प्रसन्न करनेवाले, सम्पूर्ण पापोंको नाश करनेवाले तथा विषय-विकारको दूर करनेवाले हैं ॥२॥ यदि तू बिना योग, यज्ञ, व्रत और संयमके ही संसार-सागरसे पार होना चाहता है, तो ऐ तुलसीदास ! रातदिन भगवान्‌के चरणारविन्दोंको न भूल, अर्थात् रात- दिन उनके चरणारविन्दोंका स्मरण किया कर ॥३॥

विनय-पत्रिका १६९ विशेष १ 'सुंदर परम उदारहिं'—में 'परम' शब्द 'देहरी दीपक' है। जो शब्द ड्योढ़ीके दीपककी भाँति अपनेसे पूर्व और पर दोनों शब्दोंके साथ लगता है उसे 'देहरी दीपक' कहते हैं। जैसे ड्योढ़ीका दीपक भीतर और बाहर दोनों ओर प्रकाश करता है, उसी प्रकार यह शब्द दोनों ओर लगता है। [ ८६ ] इहै कह्यो सुत ! वेद चहूँ । श्रीरघुवीर-चरन-चिंतन तजि नाहिंन ठौर कहूँ ॥१॥ जाके चरन विरंचि सेइ सिधि पाई संकर हूँ । सुक-सनकादि मुकुत बिचरत तेउ भजन करत अजहूँ ॥२॥ जद्यपि परम चपल श्री संतत, थिर न रहति कतहूँ । हरि-पद-पंकज पाइ अचल भइ, करम-वचन-मन हूँ ॥३॥ करुनासिंधु, भगत—चिंतामनि, सोभा सेवत हूँ । और सकल सुर, असुर-ईस सब खाये उरग छहूँ ॥४॥ सुरुचि कह्यो सोइ सत्य तात अति परुष वचन जवहूँ । तुलसिदास रघुनाथ-विमुख नहिं मिटइ विपति कवहूँ ॥५॥ शब्दार्थ—विरंचि = ब्रह्मा । श्री = लक्ष्मी । संतत = सदा । सुर = देवता । उरग = (उर+ग) छातीके बल गमन करनेवाला, सर्प । तात = पुत्र । परुष = कठोर । प्रसंग—महाराज उत्तानपादकी दो रानियाँ थीं—सुनीति और सुरुचि । सुनीतिके पुत्र ध्रुव थे और सुरुचिके उत्तम । राजाका स्नेह छोटी रानीपर अधिक था । एक दिन राजा अपने पुत्र उत्तमको गोदमें लिये बैठे थे, उसी समय ध्रुव वहाँ आकर उनकी गोदमें बैठने लगे । विमाताने उनसे कड़े शब्दोंमें कहा, पहले तप करके राजाकी गोदमें बैठनेके अधिकारी बनो, पीछे गोदमें बैठनेका साहस करना । यह सुनकर ध्रुव रोते हुए अपनी माता सुनीतिके पास लौट आये । सारा हाल सुननेके बाद ध्रुवकी माता सुनीतिने उन्हें जो उपदेश दिया, उसीके प्रसंगमें यह पद बनाया गया है । भावार्थ—हे पुत्र (ध्रुव) ! चारों वेदोंने यही कहा है कि श्रीरामजीके चरणों-

१७० विनय-पत्रिका का ध्यान किये बिना कहीं भी ठौर नहीं है ॥१॥ जिनके चरणोंकी सेवा करके ब्रह्मा और शिवने भी सिद्धि प्राप्त की है, शुक-सनकादि जीवन्मुक्त होकर विचरण कर रहे हैं और अब भी वे उनका भजन करते जा रहे हैं ॥२॥ यद्यपि लक्ष्मीजी सदासे परम चंचला हैं, कहीं भी स्थिर नहीं रहतीं, तथापि वह भगवच्चरणार- विन्दको पाकर मन-वचन-कर्मसे अचल हो गयीं ॥३॥ (दासता बुरी चीज है, पर) करुणा-सागर, भक्त-चिन्तामणि भगवान् रामचन्द्रजीकी सेवा करनेमें भी शोभा है और जितने देवता तथा दैत्योंके स्वामी हैं, सबको षट् ऊर्मी शोक, मोह, क्षुधा, पिपासा, जरा, मरण इन छ साँपोंने डँस लिया है ॥४॥ हे पुत्र ! (तुम्हारी विमाता) सुरुचिने जो तुमसे कहा है (कि पहले तप करो), वह यद्यपि अत्यन्त कठोर वचन है फिर भी सत्य है। अतः हे तुलसीदास ! श्रीरघुनाथजीसे विमुख रहनेपर विपत्तियोंका नाश कभी नहीं होता ॥५॥ ८७ सुनु मन मूढ़ सिखावन मेरो। हरि-पद-विमुख लह्यो न काहु सुख, सठ ! यह समुझ सबेरो ॥१॥ बिछुरे ससि-रवि मन-नैननि तें, पावत दुख बहुतेरो। भ्रमत भ्रमित निसि-दिवस गगन महँ, तहँ रिपु राहु बड़ेरो ॥२॥ जद्यपि अति पुनीत सुरसरिता, तिहुँ पुर सुजस घनेरो। तजे चरन अजहूँ न मिटत नित, बहियो ताहू केरो ॥३॥ छुटै न विपति भजे बिनु रघुपति, श्रुति संदेह निबेरो। तुलसिदास अब आस छाँड़ि करि, होहु राम को चेरो ॥४॥ शब्दार्थ—सवेरो = शीघ्र, समय रहते । सुरसरिता = गंगा । घनेरो = बहुतसे । निबेरो = दूर कर दिया है। भावार्थ—रे मूढ़ मन ! मेरी शिक्षा सुन । भगवान्के चरणोंसे विमुख रहकर किसीको सुख नहीं प्राप्त हुआ । रे दुष्ट ! इस बातको समय रहते ही समझ ले ॥१॥ भगवान्के मनसे चन्द्रमा और नेत्रोंसे सूर्य अलग होनेके कारण ही (चन्द्रमा और सूर्य) भारी दुःख पा रहे हैं। वे रात-दिन आकाशमें थके हुए घूमते रहते हैं और वहाँ उनका बड़ा शत्रु राहु मौजूद है ॥२॥

विनय-पत्रिका १७१ यद्यपि गंगाजी अत्यन्त पवित्र हैं, तीनों लोकोंमें उनकी कीर्त्ति छा रही है, पर भगवान्के चरणोंसे अलग होनेके कारण अबतक उनका भी नितका बहना बन्द नहीं हुआ ॥३॥ वेदोंने यह सन्देह दूर कर दिया है कि श्रीरामजीका भजन किये बिना विपत्तियाँ नहीं छूट सकतीं । हे तुलसीदास ! अब सारी आशाओंको छोड़- कर तू श्रीरामजीका दास हो जा ॥४॥ विशेष १- 'ससि-रवि मन-नैननि तें'- चन्द्रमाकी उत्पत्ति भगवान्के मनसे हुई है और सूर्यकी उत्पत्ति उनके नेत्रोंसे । पुरुषसूक्तमें लिखा भी है:- 'चन्द्रमा मनसो जातः चक्षोः सूर्यो अजायत' । २- 'रिपु राहु' - समुद्र-मन्थनके बाद जब देवता और दैत्य अमृतके लिए आपसमें लड़ने लगे, तब भगवान्ने मोहिनीरूप धारण करके अमृतका घड़ा अपने हाथमें लेकर एक पंक्तिमें देवताओं और दूसरी पंक्तिमें दैत्योंको बिठाकर देवताओंकी पंक्तिसे उसे बाँटना शुरू किया । उस समय दैत्य उनके रूपपर मोहित हो गये थे । राहु नामक दैत्य भगवान्‌का कपट समझकर सूर्य और चन्द्रमाके बीचमें जा बैठा और धोखेसे उसे भी अमृत दिया गया । पश्चात् जब भगवान्‌को यह बात सूर्य और चन्द्रमाके इशारा करनेपर मालूम हुई, तब उन्होंने चक्रसे उसका सिर काट दिया । किन्तु वह अमृत पान कर चुका था, अतः मरा नहीं और मुण्डका राहु हो गया और धड़का केतु । बस राहु उसी वैरसे ग्रहणके समय सूर्य और चन्द्रमाको दुःख देता है । ( ८८ ) कबहुँ मन विश्राम न मान्यो । निसिदिन भ्रमत बिसारि सहज सुख, जहँ तहँ इंद्रिन तान्यो ॥१॥ जदपि विषय-सँग सह्यो दुसह दुख, विषम जाल अरुझान्यो । तदपि न तजत मूढ़, ममताबस जानत हूँ नहिं जान्यो ॥२॥ जनम अनेक किये नाना बिधि, करम-कीच चित सान्यो । होइ न विमल विवेक-नीर-बिनु, वेद पुरान बखान्यो ॥३॥

१७२ विनय-पत्रिका निज हित नाथ पिता गुरु हरिसों हरषि हृदै नहिं आन्यो। तुलसिदास कव तृषा जाय सर खनतहि जनम सिरान्यो ॥४॥ शब्दार्थ—सहज सुख = आत्मानन्द । सान्यो = सान रखा है। आन्यो = लाना, धारण नहीं किया। तृषा = प्यास । सिरान्यो = बीत गया। भावार्थ—रे मन ! तूने कभी विश्राम न माना। (तू) आत्मानन्दको भूल- कर रातदिन घूमता रहता है और (तुझे) इन्द्रियाँ इधर-उधर खींचकर ले जाती हैं ॥१॥ यद्यपि विषयोंके साथ तूने दुःसह दुःख सहन किये हैं और कठिन जालमें फँसा हुआ है, तथापि रे मूढ़ ! तू उसे नहीं छोड़ रहा है और ममताके कारण जान लेनेपर भी उसे नहीं जाना ॥२॥ अनेक जन्मोंमें नाना प्रकारके कर्म करके तू ने उन्हीं (कर्मों)के कीचड़में चित्तको सान रखा है। किन्तु विवेक-रूपी जलके बिना तू निर्मल नहीं हो सकता, ऐसा वेदों और पुराणोंने कहा है ॥३॥ अपनी भलाई स्वामी रूप, पितारूप और गुरुरूप प्रभुजीसे है, किन्तु तूने हर्षित होकर अपने हृदयमें उन्हें धारण नहीं किया । तुलसीदास कहते हैं कि जिस तालाबको खोदनेमें ही जीवन बीत गया, उस तालाबसे भला प्यास कब बुझ सकती है ॥६॥ विशेष १—'निज हित……आन्यो'—का अर्थ वियोगी हरिजीने लिखा है, “जैसा प्रेम अपने मित्र, स्वामी, पिता और गुरुके साथ किया जाता है, वैसा तूने प्रसन्न होकर कभी हृदयसे भगवान्‌के साथ नहीं किया।” किन्तु गोस्वामी- जी के शब्दोंसे यह अर्थ नहीं निकलता । [ ८९ ] मेरो मन हरि जू ! हठ न तजै। निसि-दिन नाथ देउँ सिख बहु-विधि, करत सुभाउ निजै ॥१॥ ज्यों जुवती अनुभवति प्रसव अति दारुन दुख उपजै । ह्वै अनुकूल बिसारि सूल सठ पुनि खल पतिहिं भजै ॥२॥ लोलुप भ्रमत गृहपसु ज्यों जहँ तहँ सिर पदत्रान बजै । तदपि अधम बिचरत तेहि मारग कबहुँ न मूढ़ लजै ॥३॥

हौं हारयो करि जतन विविध बिधि अतिसै प्रवल अजै। तुलसिदास वस होइ तवहिं, जब प्रेरक प्रभु वरजै ॥४॥ शब्दार्थ—निजै = अपने ही। अनुभवति = अनुभव करती है। अनुकूल = प्रसन्न। गृहपसु = कुत्ता। पदत्रान = जूता। बरजै = मना करें, रोकें। भावार्थ—हे प्रभो ! मेरा मन हठ नहीं छोड़ता। हे नाथ ! मैं उसे रातदिन अनेक प्रकारसे शिक्षा देता हूँ, पर यह अपने ही स्वभावानुसार काम करता है ॥१॥ जैसे युवती स्त्री संतान जननेके समय अत्यन्त असह्य कष्टका अनुभव करती है, पर अनुकूल (प्रसव-वेदनासे छुटकारा पाते ही प्रसन्न) होकर वह मूर्खा सारे दुःखोंको भूलकर फिर दुष्ट पतिको भजने लगती है ॥२॥ जैसे लालची कुत्ता घूमता हुआ जहाँ जाता है, वहीं उसके सिरपर जूते पड़ते हैं, फिर भी वह नीच उसी मार्गपर विचरण करता है, इसमें वह मूढ़ कभी भी लज्जित नहीं होता ॥३॥ मैं अनेक प्रकारके यत्न करके हार गया, (पर यह मन) अत्यन्त प्रबल और अजेय है। तुलसीदास कहते हैं कि यह मन तभी वशमें हो सकता है, जब जगत्‌के प्रेरक भगवान् इसे रोकें ॥४॥ विशेष १—'अतिसै प्रबल अजै'—गीतामें अर्जुनने भगवान्‌से कहा है— चंचलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् । तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥ भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनकी बातका समर्थन इस प्रकार किया है— असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् । ९० ] ऐसी मूढ़ता या मनकी।¹ परिहरि राम-भगति-सुरसरिता, आस करत ओसकन की ॥१॥ १. महामहोपाध्याय पं० सुधाकरजी द्विवेदीका रचा हुआ संस्कृत अनुवाद इस प्रकार है— एतादृशी मूढ़ता मनसः । रामभक्तिसुरसरितं हित्वा, वांछति कणं कुपयसः ॥

१७४ विनय-पत्रिका धूम-समूह निरखि चातक ज्यों, तृषित जानि मति घन की । नहिं तहँ सीतलता न बारि, पुनि हानि होति लोचन की ॥२॥ ज्यों गच-काँच बिलोकि सेन जड़ छाँह आपने तन की । टूटत अति आतुर अहार बस, छति बिसारि आनन की ॥३॥ कहँ लौं कहौं कुचाल कृपानिधि ! जानत हौ गति जन की । तुलसिदास प्रभु हरहु दुसह दुख, करहु लाज निज पन की ॥४॥ शब्दार्थ—गच = भूमि, दीवार, फर्श । सेन = बाजपक्षी; 'सेन' शब्द 'श्येन' का अपभ्रंश है । आनन = मुख । पन = प्रतिज्ञा । भावार्थ—इस मनकी ऐसी मूढ़ता है कि यह श्रीराम-भक्ति-रूपी देवनदी- (गंगा) को त्यागकर ओस-कणकी आशा करता है ॥१॥ जैसे प्यासा पपीहा धुएँके समूहको देखकर उसे मेघ समझ लेता है, किन्तु निकट जानेपर न तो उसे शीतलता मिलती है और न जल ही, उलटा उसे नेत्रोंसे हाथ धो बैठना पड़ता है ॥२॥ जैसे बाज पक्षी शीशेकी दीवारमें अपने शरीरकी निर्जीव छाया देखकर आहारके लिए विशेष आतुर होनेके कारण अपने मुँहकी दशा भूलकर उसपर टूट पड़ता है, परिणाम यह होता है कि उसीका मुँह घायल हो जाता है ॥३॥ हे कृपानिधान ! मैं इस मनकी कुचाल कहाँतक कहूँ, आप तो इस दासकी दशा जानते ही हैं। हे प्रभो ! तुलसीदासका असह्य दुःख दूर करके अपने प्रणकी लाज रखिये ॥४॥ [ ९१ ] नाचत ही निसि-दिवस मरयो । तबही तें न भयो हरि थिर जब तें जिव नाम धरयो ॥१॥ धूमपटलमवलोक्य चातको, बुध्वा यथाभ्रमलसः । लभते तत्र न शीतलम्मभो, दृग्वैरिणं च वयसः ॥ श्येनः कांचकुट्टिमे दृष्ट्वा, तं विम्बमतिरभसः । पतित तत्र परपतन्निरूपे, हानिमुपैति च वचसः ॥ मनसः किं वर्णये जडत्वं, करुणानिधे कुशशयः । कृत्वाऽत्म पणत्रपां जनस्यापहर दुःखमतितपसः ॥

विनय-पत्रिका ७५ बहु वासना विविध कंचुकि भूषन लोभादि भरथ्यो। चर अरु अचर गगन-जल-थल महँ, कौन न स्वाँग करथ्यो ॥२॥ देव-दनुज, मनि, नाग, मनुज नहिं जाँचत कोउ उबरथ्यो । मेरो दुसह दरिद्र, दोष, दुख काहू तौ न हरथ्यो ॥३॥ थके नयन, पद, पानि, सुमति, बल, संग सकल बिछुरथ्यो । अब रघुनाथ सरन आयो जन, भव-भय बिकल डरथ्यो ॥४॥ जेहि गुन तें वस होहु रीझि करि, सो मोहिं सब विसरथ्यो । तुलसिदास निज भवन-द्वार प्रभु, दीजै रहन परथ्यो ॥५॥ शब्दार्थ—कंचुकि = वस्त्र । चर = चलनेवाले,चैतन्य । अचर = जड़ । गगन = आकाश । स्वाँग = तमाशा । भावार्थ—रातदिन नाचते ही नाचते मरा । हे हरि ! जबसे आपने जीव नाम रख दिया, तभीसे स्थिरता जाती रही ॥१॥ नाना प्रकारके वासनारूपी वस्त्र तथा लोभादि आभूषण धारणकर चर और अचर एवं आकाश, जल और पृथिवीमें ऐसा कौन-सा स्वाँग है जो न किया हो ॥२॥ देवता, दैत्य, मुनि, नाग, मनुष्य आदिमें ऐसा कोई भी नहीं बचा है जिससे मैंने याचना न की हो । किन्तु मेरे दुःसह दारिद्र्य, दोष और दुःखका किसीने भी तो हरण नहीं किया ॥३॥ नेत्र, पैर, हाथ, बुद्धि और बल सब थक गये और सबने मेरा साथ भी छोड़ दिया । अतः हे रघुनाथजी ! अब संसार-भयसे डरकर विकल हुआ यह दास आपकी शरणमें आया है ॥४॥ जिन गुणोंपर आप रीझकर वशमें हुआ करते हैं, उन सबको मैं भूल गया हूँ । हे प्रभो ! अब तुलसीदासको अपने गृहके द्वारपर पड़ा रहने दीजिये—हटाइये नहीं ॥५॥ विशेष १—'जब तँ जिव नाम धर्यो'—यों तो वेदान्तशास्त्रने 'जीव' संज्ञा पड़नेके कई कारण बतलाये हैं, पर उन सबमें अद्वैतवेदान्तका ही मत ग्राह्य है। किन्तु अद्वैतवादमें भी इस विषयमें कई मत हैं—जैसे अवच्छेदवाद, आभास- वाद, प्रतिबिम्बवाद, एक-जीववाद और अनेक जीववाद आदि । प्रत्येक 'वाद' के अनुसार 'जीव'की परिभाषा १३६ वें पदकी टिप्पणीमें दी गयी है। यहाँ

१७८ विनय-पत्रिका तो केवल इतना ही लिखना विवक्षित है कि जब अविद्या, प्रतिबिम्बरूप चिदा- भास और उसका अधिष्ठान कूटस्थ इन तीनोंका मेल होता है, तब 'जीव' नाम पड़ता है।—यह सिद्धान्त आभासवादका है। [ ९२ ] माधव जू, मोसम मंद न कोऊ । जद्यपि मीन-पतंग हीन मति, मोहिं नहिं पूजैं ओऊ ॥१॥ रुचिर रूप-आहार-वस्य उन्ह, पावक लोह न जान्यो । देखत विपति विषय न तजत हौं, तातें अधिक अयान्यो ॥२॥ महा मोह-सरिता अपार महँ, संतत फिरत बह्यो । श्रीहरि-चरन-कमल-नौका तजि, फिरि फिरि फेन गह्यो ॥३॥ ‘अस्थि पुरातन छुधित स्वान अति, ज्यों भरि मुख पकरै । निज तालूगत रुधिर पान करि, मन संतोष धरै ॥४॥ परम कठिन भव व्याल ग्रसित हौं, त्रसित भयो अति भारी । चाहत अभय भेक सरनागत, खगपति-नाथ विसारी ॥५॥ जलचर-वृंद जाल-अंतरगत होत सिमिटि इक पासा । एकहि एक खात लालच-वस नहिं देखत निज नासा ॥६॥ मेरे अघ सारद अनेक जुग, गनत पार नहिं पावैं । तुलसीदास पतित-पावन प्रभु, यह भरोस जिय आवै ॥७॥ शब्दार्थ—मीन = मछली। पूजैं = पूरा होना, बराबरी करना। वस्य = अधीन। पावक = अग्नि, दीपक। लोह = लोहेकी कँटिया। अयान्यो = मूर्ख। अस्थि = हड्डी। भेक = मेढक। खगपति = गरुड़। सारद = सरस्वती। भावार्थ—हे माधवजी! मुझ-सा मूर्ख कोई नहीं है। यद्यपि मछली और पतंग बुद्धिहीन हैं, पर वे भी मेरी बराबरी नहीं कर सकते ॥१॥ पतंगने तो सुन्दर रूपके वशमें होकर (दीपकको) आग नहीं समझा और मछलीने आहारके वशमें होकर लोहेके काँटेको काँटा नहीं जाना; किन्तु मैं विपत्तियोंको देखता हुआ भी विषयोंको नहीं छोड़ रहा हूँ, इससे मैं (मछली और पतंगसे) अधिक मूर्ख हूँ॥२॥ महामोह-रूपी अपार नदीमें सदा बहता फिरा, भगवान्‌के चरण-कमलरूपी नौका-