यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 377, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्तरार्ध तैंतीसवां अध्याय द्युतद्यामा नियुतः पत्यमानः कविः कविमियक्षसि प्रयज्यो.. (५५) हे पुरोहित! आप वैभवशाली, कवि व रथवान हैं. हम श्रेष्ठ बुद्धि से आप की उपासना करते हैं. आप श्रेष्ठ बुद्धि से यज्ञ करने में अपने को लगाइए. आप वायु की श्रेष्ठ बुद्धि से उपासना कीजिए. (५५) इन्द्रवायू इमे सुता उप प्रयोभिरा गतं. इन्दवो वामुशन्ति हि.. (५६) हे इंद्र देव! हे वायु! आप के इन पुत्रों ने आप के लिए सोमरस निचोड़ कर तैयार किया है. आप सोमरस को ग्रहण करने के लिए पधारिए. इंद्र देव और वायु देव हमें शांति प्रदान करने की कृपा करें. (५६) मित्र धँ हुवे पूतदक्षं वरुणं च रिशादसम्. धियं घृताची धँ साधन्ता.. (५७) मित्र देव और वरुण देव पवित्रतादायी, दक्ष और पाप धोने वाले हैं. हम घी से सींची हुई, साधी हुई बुद्धि से उन की आराधना करते हैं. (५७) दस्रा युवाकवः सुता नासत्या वृक्तबर्हिषः. आ यात धँ रुद्रवर्तनी. तं प्रत्नथायं वेनः.. (५८) हे अश्विनीकुमारो! आप युवा व सुंदर हैं. आप आइए और कुश वाले आसन पर विराजिए. आप रुद्र जैसी वृत्ति वाले हैं, आप आइए. हम ने आप के लिए प्रयत्नपूर्वक सोमरस तैयार किया है. आप उसे ग्रहण करने की कृपा कीजिए. (५८) विद्यदी सरमा रुग्णमद्रेर्महि पाथः पूर्व्य धँ सध्र्यक्कः. अग्रं नयत्सुपद्यक्षराणामच्छा रवं प्रथमा जानती गात्.. (५९) अग्रगण्य श्रेष्ठ अक्षर वाले मंत्रों से यजमान देवों की उपासना करते हैं. पत्थरों से कूटकूट कर सोमरस निचोड़ा गया है. विद्वान् इस सोमरस का सेवन करते हैं. (५९) नहि स्पशमविन्दन्नन्यमस्माद्वैश्वानरात्पुर ऽ एतारमग्नेः. एमेनमवृधन्नमृता ऽ अमर्त्यं वैश्वानरं क्षेत्रजित्याय देवाः.. (६०) हे अग्नि! यजमानों ने वैश्वानर के बिना और किसी को अग्रणी नहीं जाना. यजमानों ने आप को अमर जाना. मनुष्यों ने विभिन्न क्षेत्रों में जीत पाने के लिए वैश्वानर की बढ़ोत्तरी की (६०) उग्रा विघनिना मृध ऽ इन्द्राग्नी हवामहे. ता नो मृडात ऽ ईदृशे.. (६१) हे इंद्र देव! हे अग्नि! आप उग्र व विघ्न नाशक हैं. हम आप दोनों देवों का आह्वान करते हैं. आप इस तरह की स्थितियों में हमें सुख प्रदान करने की कृपा कीजिए. (६१) यजुर्वेद - ३७७