यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकामनाओं से जिनकी बुद्धि आक्रान्त है, ऐसे मूढ़बुद्धि ही परमात्मा के अतिरिक्त अन्य देवताओं की पूजा करते हैं। येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः। तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्।। ( गीता, ९/२३ ) देवताओं को पूजनेवाला मेरी ही पूजा करता है; किन्तु वह पूजन अविधिपूर्वक है, इसलिये नष्ट हो जाता है। शास्त्रविधि का त्याग- यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः। प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः।। ( गीता, १७/४ ) अर्जुन ! शास्त्रविधि को त्यागकर भजनेवाले सात्त्विकी श्रद्धावाले देवताओं को, राजस पुरुष यक्ष-राक्षसों को और तामस पुरुष भूत-प्रेतों को पूजते हैं; किन्तु- कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः। मां चैवान्तः शरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान्।। ( गीता, १७/६ ) वे शरीररूप से स्थित भूतसमुदाय और अन्तर्यामी रूप में स्थित मुझ परमात्मा को कृश करनेवाले हैं। उनको तू असुर जान। अर्थात् देवताओं को पूजनेवाले भी आसुरी वृत्ति के अन्तर्गत हैं। १७. अधम- तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान्। क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु।। ( गीता, १६/१९ ) जो यज्ञ की नियत विधि छोड़ कल्पित विधियों से यजन करते हैं वे ही क्रूरकर्मी, पापाचारी तथा मनुष्यों में अधम हैं। अन्य कोई अधम नहीं है। १८. नियत विधि क्या है?- ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्। यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्।। ( गीता, ८/१३ ) ॐ, जो अक्षय ब्रह्म का परिचायक है उसका जप तथा मुझ एक परमात्मा का स्मरण, तत्त्वदर्शी महापुरुष के संरक्षण में ध्यान।