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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages
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१३० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता कर्म- ये दोनों ही परमश्रेय को दिलानेवाले हैं; परन्तु इन दोनों मार्गों से संन्यास अथवा ज्ञानदृष्टि से किये जानेवाले कर्म की अपेक्षा निष्काम कर्मयोग श्रेष्ठ है। प्रश्न स्वाभाविक है कि श्रेष्ठ क्यों है? ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति। निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते॥३॥ महाबाहु अर्जुन! जो न किसी से द्वेष करता है, न किसी की आकांक्षा करता है वह सदैव संन्यासी ही समझने योग्य है। चाहे वह ज्ञानमार्ग से या निष्काम कर्ममार्ग से ही क्यों न हो। राग, द्वेषादि द्वन्द्वों से रहित वह पुरुष सुखपूर्वक भवबन्धन से मुक्त हो जाता है। साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः। एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्॥४॥ निष्काम कर्मयोग तथा ज्ञानयोग इन दोनों को वही अलग-अलग बताते हैं जिनकी समझ इस पथ में अभी बहुत हल्की है, न कि पूर्णज्ञाता पण्डित लोग; क्योंकि दोनों में से एक में भी अच्छी प्रकार स्थित हुआ पुरुष दोनों के फलरूप परमात्मा को प्राप्त होता है। दोनों का फल एक है, इसलिये दोनों एक ही समान हैं। यत्साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते। एकं साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ॥५॥ जहाँ सांख्य-दृष्टि से कर्म करनेवाला पहुँचता है, वहीं निष्काम-माध्यम से कर्म करनेवाला भी पहुँचता है। इसलिये जो दोनों को फल की दृष्टि से एक देखता है, वही यथार्थ जाननेवाला है। जब दोनों एक ही स्थान पर पहुँचते हैं तो निष्काम कर्मयोग विशेष क्यों? श्रीकृष्ण बताते हैं- संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः। योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति॥६॥ अर्जुन! निष्काम कर्मयोग का आचरण किये बिना ‘संन्यासः’- अर्थात् सर्वस्व का न्यास प्राप्त होना दुःखप्रद है। जब योग का आचरण प्रारम्भ ही नहीं किया तो असम्भव-सा है। इसलिये भगवत्स्वरूप का मनन करनेवाला मुनि,

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पञ्चम अध्याय १३१ जिसकी मनसहित इन्द्रियाँ मौन हैं, निष्काम कर्मयोग का आचरण करके परब्रह्म परमात्मा को शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है। स्पष्ट है कि ज्ञानयोग में निष्काम कर्मयोग का ही आचरण करना पड़ेगा; क्योंकि क्रिया दोनों में एक ही है- वही यज्ञ की क्रिया, जिसका शुद्ध अर्थ है ‘आराधना’। दोनों मार्गों में अन्तर केवल कर्त्ता के दृष्टिकोण का है। एक अपनी शक्ति को समझकर हानि-लाभ देखते हुए इसी कर्म में प्रवृत्त होता है और दूसरा निष्काम कर्मयोगी इष्ट पर निर्भर होकर इसी क्रिया में प्रवृत्त होता है। उदाहरणार्थ, एक प्राइवेट पढ़ता है दूसरा नॉमिनेट। दोनों का पाठ्यक्रम एक है, परीक्षा एक है, परीक्षक-निरीक्षक दोनों में एक ही हैं। ठीक इसी प्रकार दोनों के सद्गुरु तत्त्वदर्शी हैं और डिग्री एक ही है। केवल दोनों के पढ़ने का दृष्टिकोण भिन्न है। हाँ, संस्थागत छात्र को सुविधाएँ अधिक रहती हैं। पीछे श्रीकृष्ण ने कहा कि काम और क्रोध दुर्जय शत्रु हैं, अर्जुन! इन्हें तू मार। अर्जुन को लगा कि यह तो बड़ा कठिन है; किन्तु श्रीकृष्ण ने कहा- नहीं, शरीर से परे इन्द्रियाँ हैं, इन्द्रियों से परे मन है, मन से परे बुद्धि है, बुद्धि से परे तुम्हारा स्वरूप है। तुम वहाँ से प्रेरित हो। इस प्रकार अपनी हस्ती समझकर, अपनी शक्ति को सामने रखकर, स्वावलम्बी होकर कर्म में प्रवृत्त होना 'ज्ञानयोग' है। श्रीकृष्ण ने कहा है- चित्त को ध्यानस्थ करते हुए, कर्मों को मुझमें समर्पण करके आशा, ममता और सन्तापरहित होकर युद्ध कर। समर्पण के साथ इष्ट पर निर्भर होकर उसी कर्म में प्रवृत्त होना निष्काम कर्मयोग है। दोनों की क्रिया एक है और परिणाम भी एक है। इसी पर बल देकर योगेश्वर श्रीकृष्ण यहाँ कहते हैं कि योग का आचरण किये बिना संन्यास अर्थात् शुभाशुभ कर्मों के अन्त की स्थिति का प्राप्त होना असम्भव है। श्रीकृष्ण के अनुसार ऐसा कोई योग नहीं है कि हाथ- पर-हाथ रखकर बैठे-बैठे कहें कि- “मैं परमात्मा हूँ, शुद्ध हूँ, बुद्ध हूँ, मेरे लिये न तो कर्म है न बन्धन। मैं भला-बुरा कुछ करता दिखायी पड़ता भी हूँ तो इन्द्रियाँ अपने अर्थों में बरत रही हैं।” ऐसा पाखण्ड श्रीकृष्ण के शब्दों में कदापि नहीं है। साक्षात् योगेश्वर भी अपने अनन्य सखा अर्जुन को बिना कर्म के यह स्थिति नहीं दे सके। यदि ऐसा वे कर सकते तो गीता की आवश्यकता

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१३२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता ही क्या थी? कर्म तो करना ही पड़ेगा। कर्म करके ही संन्यास की स्थिति को पाया जा सकता है और योगयुक्त पुरुष शीघ्र ही परमात्मा को प्राप्त हो जाता है। योगयुक्त पुरुष के लक्षण क्या हैं? इस पर कहते हैं- योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः। सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते॥७॥ ‘विजितात्मा’- विशेष रूप से जीता हुआ है शरीर जिसका, ‘जितेन्द्रियः’- जीती हुई हैं इन्द्रियाँ जिसकी और ‘विशुद्धात्मा’- विशेष रूप से शुद्ध है अन्तःकरण जिसका, ऐसा पुरुष ‘सर्वभूतात्मभूतात्मा’- सम्पूर्ण भूतप्राणियों के आत्मा के मूल उद्गम परमात्मा से एकीभाव हुआ योग से युक्त है। वह कर्म करता हुआ भी उससे लिप्त नहीं होता। तो करता क्यों है? पीछेवालों में परमकल्याणकारी बीज का संग्रह करने के लिये। लिप्त क्यों नहीं होता? क्योंकि सम्पूर्ण प्राणियों का जो मूल उद्गम है, जिसका नाम परमतत्त्व है उस तत्त्व में वह स्थित हो गया। आगे कोई वस्तु नहीं जिसकी शोध करे। पीछेवाली वस्तुएँ छोटी पड़ गयीं तो भला आसक्ति किसमें करे? इसलिये वह कर्मों से आवृत्त नहीं होता। यह योगयुक्त की पराकाष्ठा का चित्रण है। पुनः योगयुक्त पुरुष की रहनी स्पष्ट करते हैं कि वह करते हुए भी उससे लिप्त क्यों नहीं होता?- नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्। पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन्॥८॥ प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्॥९॥ परमतत्त्व परमात्मा को साक्षात्कारसहित जाननेवाले योगयुक्त पुरुष की यह मनःस्थिति अर्थात् अनुभूति है कि मैं किंचित् मात्र भी कुछ नहीं करता हूँ। यह उसकी कल्पना नहीं, बल्कि यह स्थिति उसने कर्म करके पायी है। यथा ‘युक्तो मन्येत’- अब प्राप्ति के पश्चात् वह सब कुछ देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता, सूँघता, भोजन करता, गमन करता, सोता, श्वास लेता, बोलता, त्याग करता, ग्रहण करता, आँखों को खोलता और मींचता हुआ भी ‘इन्द्रियाँ अपने अर्थों में बरतती हैं’- ऐसी धारणावाला होता है। परमात्मा से बढ़कर कुछ है ही नहीं और जब उसमें वह स्थित ही है तो उससे बढ़कर किस

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पञ्चम अध्याय १३३ सुख की कामना से वह किसका दर्शन, स्पर्श इत्यादि करेगा? यदि कोई श्रेष्ठ वस्तु आगे होती तो आसक्ति अवश्य रहती। किन्तु प्राप्ति के बाद अब और आगे जायेगा कहाँ और पीछे त्यागेगा क्या? इसलिये योगयुक्त पुरुष लिप्त नहीं होता। इसी को एक उदाहरण के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं- ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः। लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा।।१०।। कमल कीचड़ में होता है। उसका पत्ता पानी के ऊपर तैरता है। लहरें रात-दिन उसके ऊपर से गुजरती हैं; किन्तु आप पत्ते को देखें, सूखा मिलेगा। जल की एक बूँद भी उस पर टिक नहीं पाती। कीचड़ और जल में रहते हुए भी वह उनसे लिप्त नहीं होता। ठीक इसी प्रकार, जो पुरुष सब कर्मों को परमात्मा में विलय करके (साक्षात्कार के साथ ही कर्मों का विलय होता है, इससे पूर्व नहीं), आसक्ति को त्याग करके (अब आगे कोई वस्तु नहीं अतः आसक्ति नहीं रहती, इसलिये आसक्ति त्यागकर) कर्म करता है, वह भी इसी प्रकार लिप्त नहीं होता। फिर वह करता क्यों है? आपलोगों के लिये, समाज के कल्याण- साधन के लिये, पीछेवालों के मार्गदर्शन के लिये। इसी पर बल देते हैं- कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि। योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये ।।११।। योगीजन केवल इन्द्रिय, मन, बुद्धि और शरीर द्वारा भी आसक्ति त्यागकर आत्मशुद्धि के लिए कर्म करते हैं। जब कर्म ब्रह्म में विलीन हो चुके तो क्या अब भी आत्मा अशुद्ध ही है? नहीं, वे 'सर्वभूतात्मभूतात्मा' हो चुके हैं। सम्पूर्ण प्राणियों में वे अपनी ही आत्मा का प्रसार पाते हैं। उन समस्त आत्माओं की शुद्धि के लिये, आप सबका मार्गदर्शन करने के लिये वे कर्म में बरतते हैं। शरीर, मन, बुद्धि तथा केवल इन्द्रियों से वह कर्म करता है, स्वरूप से वह कुछ भी नहीं करता, स्थिर है। बाहर से वह सक्रिय दिखायी देता है; किन्तु भीतर उसमें असीम शान्ति है। रस्सी जल चुकी, मात्र ऐंठन (आकार) शेष है, जिससे बँध नहीं सकता। युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्। अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते ।।१२।।

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१३४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता 'योगयुक्त' अर्थात् योग के परिणाम को प्राप्त पुरुष, जो सब प्राणियों के आत्मा के मूल परमात्मा में स्थित है, ऐसा योगी कर्म के फल को त्यागकर (कर्मों का फल परमात्मा उससे भिन्न नहीं है, इसलिये अब कर्मफल को त्यागकर) 'नैष्ठिकीम् शान्तिम् आप्नोति'– शान्ति की अन्तिम अवस्था को प्राप्त होता है, जिसके आगे कोई शान्ति शेष नहीं है, जिसके पश्चात् वह कभी अशान्त नहीं होगा। किन्तु अयुक्त पुरुष, जो योग के परिणाम से युक्त नहीं है, अभी रास्ते में है ऐसा पुरुष फल में आसक्त हुआ (फल है परमात्मा, उसमें उसका आसक्त होना आवश्यक है। इसलिये फल में आसक्त होने पर भी) 'कामकारेण निबध्यते'–कामना करके बँध जाता है अर्थात् पूर्तिपर्यन्त कामनाएँ जागृत होती हैं, अतः साधक को पूर्तिपर्यन्त सावधान रहना चाहिये। 'महाराज जी' कहा करें– “हो ! तनिकौ हम अलग, भगवान अलग हैं तो माया कामयाब हो सकती है।” कल ही प्राप्ति होनी हो किन्तु आज तो वह अज्ञानी ही है। अतः पूर्तिपर्यन्त साधक को असावधान नहीं होना चाहिये। इसी पर आगे देखें– सर्वकर्माणि मनसा सन्न्यस्यास्ते सुखं वशी। नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्।।१३।। जो सम्पूर्ण रूप से स्ववश है, जो शरीर, मन, बुद्धि और प्रकृति से परे स्वयं में स्थित है, ऐसा वशी पुरुष निःसन्देह न कुछ करता है न कराता है। पीछेवालों से कराना भी उसकी आन्तरिक शान्ति का स्पर्श नहीं कर पाता। ऐसा स्वरूपस्थ पुरुष शब्दादि विषयों को उपलब्ध करानेवाले नौ द्वारों (दो कान, दो नेत्र, दो नासिका छिद्र, एक मुख, उपस्थ एवं पायु) वाले शरीररूपी घर में सब कर्मों को मन से त्यागकर स्वरूपानन्द में ही स्थित रहता है। यथार्थतः वह न कुछ करता है और न कराता है। इसी को पुनः श्रीकृष्ण दूसरे शब्दों में कहते हैं कि वह प्रभु न करता है, न कराता है। सद्गुरु, भगवान, प्रभु, स्वरूपस्थ महापुरुष, युक्त इत्यादि एक– दूसरे के पर्याय हैं। अलग से कोई भगवान कुछ करने नहीं आता। वह जब करता है तो इन्हीं स्वरूपस्थ इष्ट के माध्यम से कराता है। महापुरुष के लिये शरीर एक मकान मात्र है। अतः परमात्मा का करना और महापुरुष का करना एक ही बात है; क्योंकि वह उनके द्वारा है। वस्तुतः वह पुरुष करते हुए भी

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पञ्चम अध्याय १३५ कुछ नहीं करता। इसी पर अगला श्लोक देखें- न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः। न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते॥१४॥ वह प्रभु न तो भूतप्राणियों के कर्त्तापन को, न कर्मों को और न कर्मफलों का संयोग ही बैठाता है, बल्कि स्वभाव में स्थित प्रकृति के दबाव के अनुसार ही सभी बरतते हैं। जैसी जिसकी प्रकृति- सात्त्विकी, राजसी अथवा तामसी है, उसी स्तर से वह बरतता है। प्रकृति तो लम्बी-चौड़ी है, लेकिन आपके ऊपर उतना ही प्रभाव डाल पाती है जितना आपका स्वभाव विकृत अथवा विकसित है। प्रायः लोग कहते हैं कि करने-करानेवाले तो भगवान हैं, हम तो यन्त्रमात्र हैं। हमसे वे भला करावें अथवा बुरा। किन्तु योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं कि न वह प्रभु स्वयं करता है, न कराता है और न वह जुगाड़ ही बैठाता है। लोग अपने स्वभाव में स्थित प्रकृति के अनुरूप बरतते हैं। स्वतः कार्य करते हैं। वे अपने आदत से मजबूर होकर करते हैं, भगवान नहीं करते। तब लोग कहते क्यों हैं कि भगवान करते हैं? इस पर योगेश्वर बताते हैं- नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः। अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः॥१५॥ जिसे अभी प्रभु कहा, उसी को यहाँ विभु कहा गया है; क्योंकि वह सम्पूर्ण वैभव से संयुक्त है। प्रभुता एवं वैभव से संयुक्त वह परमात्मा न किसी के पापकर्म को और न किसी के पुण्यकर्मों को ही ग्रहण करता है; फिर भी लोग कहते क्यों हैं? इसलिये कि अज्ञान द्वारा ज्ञान ढँका हुआ है। उन्हें अभी साक्षात्कारसहित ज्ञान तो हुआ नहीं, वे अभी जन्तु हैं। मोहवश वे कुछ भी कह सकते हैं। ज्ञान से क्या होता है? इसे स्पष्ट करते हैं- ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः। तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्॥१६॥ जिसके अन्तःकरण का वह अज्ञान (जिसने ज्ञान को ढँक रखा था) आत्मसाक्षात्कार द्वारा नष्ट हो गया है और इस प्रकार जिसने ज्ञान प्राप्त कर

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१३६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता लिया है, उसका वह ज्ञान सूर्य के सदृश उस परमतत्त्व परमात्मा को प्रकाशित करता है। तो क्या परमात्मा किसी अन्धकार का नाम है? नहीं, वह तो ‘परम प्रकास रूप दिन राती।’ ( रामचरितमानस, ७/११९/३ )– परम प्रकाशरूप है। है तो, किन्तु हमारे उपभोग के लिये तो नहीं है, दिखायी तो नहीं देता? जब ज्ञान द्वारा अज्ञान का आवरण हट जाता है तो उसका वह ज्ञान सूर्य के सदृश परमात्मा को अपने में प्रवाहित कर लेता है। फिर उस पुरुष के लिये कहीं अन्धकार नहीं रह जाता। उस ज्ञान का स्वरूप क्या है?- तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः। गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः।।१७।। जब उस परमतत्त्व परमात्मा के अनुरूप बुद्धि हो, तत्त्व के अनुरूप प्रवाहित मन हो, परमतत्त्व परमात्मा में एकीभाव से उसकी रहनी हो और उसी के परायण हो, इसी का नाम ज्ञान है। ज्ञान कोई बकवास या बहस नहीं है। इस ज्ञान द्वारा पापरहित हुआ पुरुष पुनरागमनरहित परमगति को प्राप्त होता है। परमगति को प्राप्त, पूर्ण जानकारी से युक्त पुरुष ही पण्डित कहलाते हैं। आगे देखें- विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि। शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः।।१८।। ज्ञान के द्वारा जिनका पाप शमन हो चुका है, जो ‘अपुनरावर्ती परमगति’ को प्राप्त हैं, ऐसे ज्ञानीजन विद्या-विनययुक्त ब्राह्मण तथा चाण्डाल में, गाय और कुत्ते में तथा हाथी में समान दृष्टिवाले होते हैं। उनकी दृष्टि में विद्या- विनययुक्त ब्राह्मण न तो कोई विशेषता रखता है और न चाण्डाल कोई हीनता रखता है। न गाय धर्म है, न कुत्ता अधर्म और न हाथी विशालता ही रखता है। ऐसे पण्डित, ज्ञाताजन समदर्शी और समवर्ती होते हैं। उनकी दृष्टि चमड़ी पर नहीं रहती, बल्कि आत्मा पर पड़ती है। अन्तर केवल इतना है, विद्या- विनयसम्पन्न स्वरूप के समीप है और शेष कुछ पीछे हैं। कोई एक मंजिल आगे है, तो कोई पिछले पड़ाव पर। शरीर तो वस्त्र है। उनकी दृष्टि वस्त्र को महत्त्व नहीं देती अपितु उनके हृदय में स्थित आत्मा पर पड़ती है, इसलिये वे कोई भेद नहीं रखते।

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पञ्चम अध्याय १३७ श्रीकृष्ण ने पर्याप्त गो-सेवा की थी। उन्हें गाय के प्रति गौरवपूर्ण शब्द कहना चाहिये था; किन्तु उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं कहा। श्रीकृष्ण ने गाय को धर्म में कोई स्थान नहीं दिया। उन्होंने केवल इतना माना कि अन्य जीवात्माओं की तरह उसमें भी आत्मा है। गाय का आर्थिक महत्त्व जो भी हो, उसका धार्मिक वैशिष्ट्य परवर्ती लोगों की देन है। श्रीकृष्ण ने पीछे बताया कि अविवेकियों की बुद्धि अनन्त शाखाओंवाली होती है, इसलिये वे अनन्त क्रियाओं का विस्तार कर लेते हैं। दिखावटी शोभायुक्त वाणी में वे उसे व्यक्त भी करते हैं। उनकी वाणी की छाप जिनके चित्त पर पड़ती है, उनकी भी बुद्धि नष्ट हो जाती है। वे कुछ पाते नहीं, नष्ट हो जाते हैं। जबकि निष्काम कर्मयोग में अर्जुन ! निर्धारित क्रिया एक ही है- यज्ञ की प्रक्रिया 'आराधना'। गाय, कुत्ता, हाथी, पीपल, नदी का धार्मिक महत्त्व इन अनन्त शाखावालों की देन है। यदि इनका कोई धार्मिक महत्त्व होता तो श्रीकृष्ण अवश्य कहते। हाँ, मन्दिर, मस्जिद इत्यादि पूजा के स्थल आरम्भिक काल में अवश्य हैं। वहाँ प्रेरणादायक सामूहिक उपदेश हैं तो उनकी उपयोगिता अवश्य है, वे धर्मोपदेश केन्द्र हैं। प्रस्तुत श्लोक में दो पण्डितों की चर्चा है। एक पण्डित तो वह है जो पूर्णज्ञाता है और दूसरा वह जो विद्या-विनयसम्पन्न है। वे दो कैसे? वस्तुतः प्रत्येक श्रेणी की दो सीमाएँ होती हैं- एक तो अधिकतम सीमा पराकाष्ठा और दूसरी प्रवेशिका अथवा निम्नतम सीमा। उदाहरण के लिये भक्ति की निम्नतम सीमा वह है जहाँ से भक्ति आरम्भ की जाती है; विवेक, वैराग्य और लगन के साथ जब आराधना करते हैं और अधिकतम सीमा वह है जहाँ भक्ति अपना परिणाम देने की स्थिति में होती है। ठीक इसी प्रकार ब्राह्मण-श्रेणी है। जब ब्रह्म में प्रवेश दिलानेवाली क्षमताएँ आती हैं, उस समय विद्या होती है, विनय होता है। मन का शमन, इन्द्रियों का दमन, अनुभवी सूत्रपात का संचार, धारावाही चिन्तन, ध्यान और समाधि इत्यादि ब्रह्म में प्रवेश दिलानेवाली सारी योग्यताएँ उसके अन्तराल में स्वाभाविक कार्यरत रहती हैं। यह ब्राह्मणत्व की निम्नतम सीमा है। उच्चतम सीमा तब आती है, जब क्रमशः उन्नत होते-होते वह ब्रह्म का दिग्दर्शन करके उसमें विलय पा जाता है। जिसे जानना था, जान लिया। वह पूर्णज्ञाता है। अपुनरावृत्तिवाला ऐसा महापुरुष उस विद्या-विनयसम्पन्न

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१३८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता ब्राह्मण, चाण्डाल, कुत्ता, हाथी और गाय सब पर समान दृष्टिवाला होता है; क्योंकि उसकी दृष्टि हृदयस्थित आत्म-स्वरूप पर पड़ती है। ऐसे महापुरुष को परमगति में क्या मिला है और कैसे? इस पर प्रकाश डालते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण बताते हैं- इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः। निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः॥१९॥ उन पुरुषों द्वारा जीवित अवस्था में ही सम्पूर्ण संसार जीत लिया गया, जिनका मन समत्व में स्थित है। मन के समत्व का संसार जीतने से क्या सम्बन्ध? संसार मिट ही गया, तो वह पुरुष रहा कहाँ? श्रीकृष्ण कहते हैं, 'निर्दोषं हि समं ब्रह्म'- वह ब्रह्म निर्दोष और सम है, इधर उसका मन भी निर्दोष और सम स्थितिवाला हो गया। 'तस्मात् ब्रह्मणि ते स्थिताः'- इसलिये वह ब्रह्म में स्थित हो जाता है। इसी का नाम अपुनरावर्ती परमगति है। यह कब मिलती है? जब संसाररूपी शत्रु जीतने में आ जाय। संसार कब जीतने में आता है? जब मन का निरोध हो जाय, समत्व में प्रवेश पा जाय (क्योंकि मन का प्रसार ही जगत् है)। जब वह ब्रह्म में स्थित हो जाता है तब ब्रह्मविद् का लक्षण क्या है? उसकी रहनी स्पष्ट करते हैं- न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्। स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः॥२०॥ उसका कोई प्रिय-अप्रिय होता नहीं। इसलिये जिसे लोग प्रिय समझते हैं, उसे पाकर वह हर्षित नहीं होता और जिसे लोग अप्रिय समझते हैं (जैसा धर्मावलम्बी चिह्न लगाते हैं), उसे पाकर वह उद्वेगवान् नहीं होता है। ऐसा स्थिरबुद्धि, 'असम्मूढः'- संशयरहित, 'ब्रह्मवित्'- ब्रह्म से संयुक्त ब्रह्मवेत्ता 'ब्रह्मणि स्थितः'- परात्पर ब्रह्म में सदैव स्थित है। बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्। स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते॥२१॥ बाहर संसार के विषय-भोगों में अनासक्त पुरुष अन्तरात्मा में स्थित जो सुख है, उस सुख को प्राप्त होता है। वह पुरुष 'ब्रह्मयोगयुक्तात्मा'- परब्रह्म

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पञ्चम अध्याय १३९ परमात्मा के साथ मिलन से युक्त आत्मावाला है इसलिये अक्षय आनन्द का अनुभव करता है, जिस आनन्द का कभी क्षय नहीं होता। इस आनन्द का उपभोग कौन कर सकता है? जो बाहर के विषय-भोगों में अनासक्त है। तो क्या भोग बाधक हैं? भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते। आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः॥२२॥ केवल त्वचा ही नहीं, सभी इन्द्रियाँ स्पर्श करती हैं। देखना आँख का स्पर्श है, सुनना कान का स्पर्श है। इसी प्रकार इन्द्रियों और विषयों के संयोग से उत्पन्न होनेवाले सभी भोग यद्यपि भोगने में प्रिय प्रतीत होते हैं; किन्तु निःसन्देह वे सब ‘दुःखयोनयः’- दुःखद योनियों के ही कारण हैं। वे भोग ही योनियों के कारण हैं। इतना ही नहीं, वे भोग पैदा होने और मिटनेवाले हैं, नाशवान् हैं। इसलिये कौन्तेय! विवेकी पुरुष उनमें नहीं फँसते। इन्द्रियों के इन स्पर्शों में रहता क्या है? काम और क्रोध, राग और द्वेष। इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं- शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात्। कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः॥२३॥ इसलिये जो मनुष्य शरीर के नाश होने से पहले ही काम और क्रोध से उत्पन्न हुए वेग को सहन करने में (मिटा देने में) सक्षम है, वह नर (न रमन करनेवाला) है। वही इस लोक में योग से युक्त है और वही सुखी है। जिसके पीछे दुःख नहीं है, उस सुख में अर्थात् परमात्मा में स्थितिवाला है। जीते-जी ही इसकी प्राप्ति का विधान है, मरने पर नहीं। सन्त कबीर ने इसी को स्पष्ट किया- ‘अवधू! जीवत में कर आसा।’ तो क्या मरने के बाद मुक्ति नहीं होती? वे कहते हैं- ‘मुए मुक्ति गुरु कहे स्वार्थी, झूठा दे विश्वासा।’ यही योगेश्वर श्रीकृष्ण का कथन है कि शरीर रहते, मरने से पहले ही जो काम- क्रोध के वेग को मिटा देने में सक्षम हो गया, वही पुरुष इस लोक में योगी है, वही सुखी है। काम, क्रोध, बाह्य स्पर्श ही शत्रु हैं। इन्हें आप जीतें। इसी पुरुष के लक्षण पुनः बता रहे हैं- योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः। स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति॥२४॥

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१४० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता जो अन्तरात्मा में ही सुखवाला, ‘अन्तरारामः’- अन्तरात्मा में ही आरामवाला तथा जो अन्तरात्मा में ही प्रकाशवाला (साक्षात्कारवाला) है, वही योगी ‘ब्रह्मभूतः’- ब्रह्म के साथ एक होकर ‘ब्रह्मनिर्वाणम्’- वाणी से परे ब्रह्म, शाश्वत ब्रह्म को प्राप्त होता है। अर्थात् पहले विकारों (काम-क्रोध) का अन्त, फिर दर्शन, फिर प्रवेश। आगे देखें- लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः। छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः।।२५।। परमात्मा का साक्षात्कार करके जिनका पाप नष्ट हो गया है, जिनकी दुविधाएँ नष्ट हो गयी हैं, सम्पूर्ण प्राणियों के हित में जो लगे हुए हैं (प्राप्तिवाले ही ऐसा कर सकते हैं। जो स्वयं गड्ढे में पड़ा है, वह दूसरों को क्या बाहर निकालेगा? इसीलिये करुणा महापुरुष का स्वाभाविक गुण हो जाता है) तथा ‘यतात्मानः’- जितेन्द्रिय ब्रह्मवेत्ता पुरुष शान्त परब्रह्म को प्राप्त होते हैं। उसी महापुरुष की स्थिति पर पुनः प्रकाश डालते हैं- कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम्। अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्।।२६।। काम और क्रोध से रहित, जीते हुए चित्तवाले, परमात्मा का साक्षात्कार किये हुए ज्ञानी पुरुषों के लिये सब ओर से शान्त परब्रह्म ही प्राप्त है। बार-बार योगेश्वर श्रीकृष्ण उस पुरुष की रहनी पर बल दे रहे हैं, जिससे प्रेरणा मिले। प्रश्न लगभग पूर्ण हुआ। अब वे पुनः बल देते हैं कि इस स्थिति को प्राप्त करने का आवश्यक अंग ‘श्वास-प्रश्वास का चिन्तन’ है। यज्ञ की प्रक्रिया में प्राण में अपान का हवन, अपान में प्राण का हवन, प्राण और अपान दोनों की गति का निरोध उन्होंने बताया है, उसी को समझा रहे हैं- स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः। प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ।।२७।। यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः । विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः।।२८।। अर्जुन! बाहर के विषयों, दृश्यों का चिन्तन न करते हुए, उन्हें त्यागकर, नेत्रों की दृष्टि को भृकुटी के बीच में स्थिर करके, ‘भ्रुवोः अन्तरे’ का ऐसा अर्थ

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पञ्चम अध्याय १४१ नहीं कि आँखों के बीच या भौंह के बीच कहीं देखने की भावना से दृष्टि लगायें। भृकुटी के बीच का शुद्ध अर्थ इतना ही है कि सीधे बैठने पर दृष्टि भृकुटी के ठीक मध्य से सीधे आगे पड़े। दाहिने-बायें, इधर-उधर चकपक न देखें। नाक की डाँड़ी पर सीधी दृष्टि रखते हुए (कहीं नाक ही न देखने लगें) नासिका के अन्दर विचरण करनेवाले प्राण और अपान वायु को सम करके अर्थात् दृष्टि तो वहाँ स्थिर करें और सुरत को श्वास में लगा दें कि कब श्वास भीतर गयी? कितना रुकी? (लगभग आधा सेकण्ड रुकती है, प्रयास करके न रोकें।) कब श्वास बाहर निकली? कितनी देर तक बाहर रही? कहने की आवश्यकता नहीं कि श्वास में उठनेवाली नामध्वनि सुनायी पड़ती रहेगी। इस प्रकार श्वास-प्रश्वास पर जब सुरत टिक जायेगी तो धीरे-धीरे श्वास अचल, स्थिर ठहर जायेगी, सम हो जायेगी। न भीतर से संकल्प उठेंगे और न बाह्य संकल्प अन्दर टकराव कर पायेंगे। बाहर के भोगों का चिन्तन तो बाहर ही त्याग दिया गया था, भीतर भी संकल्प नहीं जाग्रत होंगे। सुरत एकदम खड़ी हो जाती है तैलधारावत्। तेल की धारा पानी की तरह टप-टप नहीं गिरती, जब तक गिरेगी धारा ही गिरेगी। इसी प्रकार प्राण और अपान की गति एकदम सम, स्थिर करके इन्द्रियों, मन और बुद्धि को जिसने जीत लिया है; इच्छा, भय और क्रोध से रहित, मननशीलता की चरम सीमा पर पहुँचा हुआ मोक्षपरायण मुनि सदा ‘मुक्त’ ही है। मुक्त होकर वह कहाँ जाता है? क्या पाता है? इस पर कहते हैं- भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्। सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति।।२९।। वह मुक्त पुरुष मुझे यज्ञ और तपों का भोगनेवाला, सम्पूर्ण लोकों के ईश्वरों का भी ईश्वर, सम्पूर्ण प्राणियों का स्वार्थरहित हितैषी, ऐसा साक्षात् जानकर शान्ति को प्राप्त होता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि- उस पुरुष के श्वास- प्रश्वास के यज्ञ और तप का भोक्ता मैं हूँ। यज्ञ और तप अन्त में जिसमें विलय होते हैं, वह मैं हूँ। वह मुझे प्राप्त होता है। यज्ञ के अन्त में जिसका नाम शान्ति है, वह मेरा ही स्वरूप है। वह मुक्त पुरुष मुझे जानता है और जानते ही मुझे प्राप्त हो जाता है। इसी का नाम शान्ति है। जैसे मैं ईश्वरों का भी ईश्वर हूँ, वैसे ही वह भी है।

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१४२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता निष्कर्ष- इस अध्याय के आरम्भ में अर्जुन ने प्रश्न किया कि कभी तो आप निष्काम कर्मयोग की प्रशंसा करते हैं और कभी आप संन्यास-मार्ग से कर्म करने की प्रशंसा करते हैं, अतः दोनों में एक को, जो आपका सुनिश्चित किया हो, परमकल्याणकारी हो, उसे कहिये। श्रीकृष्ण ने बताया- अर्जुन ! परमकल्याण तो दोनों में है। दोनों में वही निर्धारित यज्ञ की क्रिया ही की जाती है, फिर भी निष्काम कर्मयोग विशेष है। बिना इसे किये संन्यास (शुभाशुभ कर्मों का अन्त) नहीं होता। संन्यास मार्ग नहीं, मंजिल का नाम है। योगयुक्त ही संन्यासी है। योगयुक्त के लक्षण बताये कि वही प्रभु है। वह न करता है, न कुछ कराता है; बल्कि स्वभाव में प्रकृति के दबाव के अनुरूप लोग व्यस्त हैं। जो साक्षात् मुझे जान लेता है वही ज्ञाता है, वही पण्डित है। यज्ञ के परिणाम में लोग मुझे जानते हैं। श्वास-प्रश्वास का जप और यज्ञ-तप जिसमें विलय होते हैं, मैं ही हूँ। यज्ञ के परिणामस्वरूप मेरे को जानकर वे जिस शान्ति को प्राप्त होते हैं, वह भी मैं ही हूँ अर्थात् श्रीकृष्ण-जैसा, महापुरुष-जैसा स्वरूप उस प्राप्तिवाले को भी मिलता है। वह भी ईश्वरों का ईश्वर, आत्मा का भी आत्मस्वरूपमय हो जाता है, उस परमात्मा के साथ एकीभाव पा लेता है (एक होने में जन्म चाहे जितने लगें।)। इस अध्याय में स्पष्ट किया कि यज्ञ-तपों का भोक्ता, महापुरुषों के भी अन्दर रहनेवाली शक्ति महेश्वर है, अतः- ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसम्वादे 'यज्ञभोक्तामहापुरुषस्थमहेश्वरः' नाम पञ्चमोऽध्यायः ।।५।। इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के सम्वाद में 'यज्ञभोक्ता महापुरुषस्थ महेश्वर' नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण होता है। इति श्रीमत्परमहंसपरमानन्दस्य शिष्य स्वामीअड़गड़ानन्दकृते श्रीमद्भगवद्गीतायाः 'यथार्थगीता' भाष्ये 'यज्ञभोक्तामहापुरुषस्थमहेश्वरः' नाम पञ्चमोऽध्यायः ।।५।। इस प्रकार श्रीमत् परमहंस परमानन्दजी के शिष्य स्वामी अड़गड़ानन्दकृत 'श्रीमद्भगवद्गीता' के भाष्य 'यथार्थ गीता' में 'यज्ञभोक्ता महापुरुषस्थ महेश्वर' नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण होता है। ।। हरिः ॐ तत्सत् ।।

षष्ठोऽध्यायः अभ्यासयोग

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।। ॐ श्री परमात्मने नमः ।। ।। अथ षष्ठोऽध्यायः ।। संसार में धर्म के नाम पर रीति-रिवाज, पूजा-पद्धतियाँ, सम्प्रदायों का बाहुल्य होने पर कुरीतियों का शमन करके एक ईश्वर की स्थापना एवं उसकी प्राप्ति की प्रक्रिया को प्रशस्त करने के लिये किसी महापुरुष का आविर्भाव होता है। क्रियाओं को छोड़कर बैठ जाने और ज्ञानी कहलाने की रूढ़ि कृष्णकाल में अत्यन्त व्यापक थी। इसलिये इस अध्याय के प्रारम्भ में ही योगेश्वर श्रीकृष्ण ने इस प्रश्न को चौथी बार स्वयं उठाया कि ज्ञानयोग तथा निष्काम कर्मयोग दोनों के अनुसार कर्म करना ही होगा। अध्याय दो में उन्होंने कहा- अर्जुन ! क्षत्रिय के लिये युद्ध से बढ़कर कल्याणकारी कोई रास्ता नहीं है। इस युद्ध में हारोगे तो भी देवत्व है और जीतने पर महामहिम स्थिति है ही- ऐसा समझकर युद्ध कर। अर्जुन ! यह बुद्धि तेरे लिये ज्ञानयोग के विषय में कही गयी। कौन-सी बुद्धि? यही कि युद्ध कर। ज्ञानयोग में ऐसा नहीं है कि हाथ-पर-हाथ रखकर बैठे रहें। ज्ञानयोग में केवल अपने हानि-लाभ का स्वयं निश्चय करके, अपनी शक्ति समझकर कर्म में प्रवृत्त होना है, जबकि प्रेरक महापुरुष ही हैं। ज्ञानयोग में युद्ध करना अनिवार्य है। अध्याय तीन में अर्जुन ने प्रश्न किया- भगवन् ! निष्काम कर्मयोग की अपेक्षा ज्ञान आपको श्रेष्ठ मान्य है, तो मुझे घोर कर्मों में क्यों लगाते हैं? अर्जुन को निष्काम कर्मयोग कठिन प्रतीत हुआ। इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा कि दोनों निष्ठाएँ मेरे द्वारा कही गयी हैं; किन्तु किसी भी पथ के अनुसार कर्म को त्यागकर चलने का विधान नहीं है। न तो ऐसा ही है कि कर्म को न आरम्भ करने से कोई परम नैष्कर्म्य की सिद्धि पा ले और न आरम्भ की हुई क्रिया को त्याग देने से कोई उस परमसिद्धि को पाता है। दोनों मार्गों में नियत कर्म यज्ञ की प्रक्रिया को करना ही होगा।

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१४४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता अब अर्जुन ने भली प्रकार समझ लिया कि ज्ञानमार्ग अच्छा लगे अथवा निष्काम कर्मयोग, दोनों दृष्टियों में कर्म करना ही है; फिर भी पाँचवें अध्याय में उसने प्रश्न किया कि फल की दृष्टि से कौन श्रेष्ठ है? कौन सुविधाजनक है? श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन! दोनों ही परमश्रेय को देनेवाले हैं। एक ही स्थान पर दोनों पहुँचाते हैं, फिर भी सांख्य की अपेक्षा निष्काम कर्मयोग श्रेष्ठ है; क्योंकि निष्काम कर्म का आचरण किये बिना कोई संन्यासी नहीं हो सकता। दोनों में कर्म एक ही है। अतः स्पष्ट है कि वह निर्धारित कर्म किये बिना कोई संन्यासी नहीं हो सकता और न कोई योगी ही हो सकता है। केवल इस पर चलनेवाले पथिकों की दो दृष्टियाँ हैं, जो पीछे बतायी गयी हैं। श्रीभगवानुवाच अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः। स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः।।१।। श्रीकृष्ण महाराज बोले- अर्जुन! कर्मफल के आश्रय से रहित होकर अर्थात् कर्म करते समय किसी प्रकार की कामना न रखते हुए जो ‘कार्यम् कर्म’- करने योग्य प्रक्रिया-विशेष को करता है वही संन्यासी है, वही योगी है। केवल अग्नि को त्यागनेवाला तथा केवल क्रिया को त्यागनेवाला न संन्यासी है न योगी। क्रियाएँ बहुत-सी हैं। उनमें से ‘कार्यम् कर्म’- करने योग्य क्रिया, ‘नियत कर्म’- निर्धारित की हुई कोई क्रिया-विशेष है। वह है यज्ञ की प्रक्रिया। जिसका शुद्ध अर्थ है आराधना, जो आराध्य देव में प्रवेश दिला देनेवाली विधि-विशेष है। उसको कार्यरूप देना कर्म है। जो उसे करता है वही संन्यासी है, वही योगी होता है। केवल अग्नि को त्यागनेवाला कि ‘हम अग्नि नहीं छूते’ या कर्म त्यागनेवाला कि ‘मेरे लिए कर्म है ही नहीं, मैं तो आत्मज्ञानी हूँ।'- केवल ऐसा कहे और कर्म आरम्भ ही न करे, करने योग्य क्रिया-विशेष न करे तो वह न संन्यासी है न योगी। इस पर और देखें- यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव। न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन।।२।। अर्जुन! जिसे ‘संन्यास’ ऐसा कहते हैं, उसी को तू योग जान; क्योंकि संकल्पों का त्याग किये बिना कोई भी पुरुष न योगी होता है और न ही

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षष्ठम अध्याय १४५ संन्यासी होता है अर्थात् कामनाओं का त्याग दोनों ही मार्गियों के लिये आवश्यक है। तब तो सरल है कि कह दें कि हम संकल्प नहीं करते और हो गये योगी- संन्यासी। श्रीकृष्ण कहते हैं, ऐसा कदापि नहीं है- आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते। योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते।।३।। योग पर आरूढ़ होने की इच्छावाले मननशील पुरुष के लिये योग की प्राप्ति में कर्म करना ही कारण है और योग का अनुष्ठान करते-करते जब वह परिणाम देने की अवस्था में आ जाय, उस योगारूढ़ता में ‘शमः कारणम् उच्यते’- सम्पूर्ण संकल्पों का अभाव कारण है। इससे पहले संकल्प पिण्ड नहीं छोड़ते। और- यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते। सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते।।४।। जिस काल में पुरुष न तो इन्द्रियों के भोगों में आसक्त होता है और न कर्मों में ही आसक्त है (योग की परिपक्वावस्था में पहुँच जाने पर आगे कर्म करके ढूँढ़े किसे? अतः नियत कर्म आराधना की आवश्यकता नहीं रह जाती। इसीलिये वह कर्मों में भी आसक्त नहीं है), उस काल में ‘सर्वसङ्कल्पसंन्यासी’- सर्वसंकल्पों का अभाव है। वही संन्यास है, वही योगारूढ़ता है। रास्ते में संन्यास नाम की कोई वस्तु नहीं है। इस योगारूढ़ता से लाभ क्या है?- उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।।५।। अर्जुन! मनुष्य को चाहिये कि अपने द्वारा अपना उद्धार करे, अपने आत्मा को अधोगति में न पहुँचावे; क्योंकि यह जीवात्मा स्वयं ही अपना मित्र है और यही अपना शत्रु भी है। कब यह शत्रु होता है और कब मित्र? इस पर कहते हैं- बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः। अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्।।६।।

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१४६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता जिस पुरुष द्वारा मन और इन्द्रियोंसहित शरीर जीता हुआ है, उसके लिये उसी का आत्मा मित्र है और जिसके द्वारा मन और इन्द्रियोंसहित शरीर नहीं जीता गया है, उसके लिये वह स्वयं शत्रुता में बरतता है। इन दो श्लोकों में श्रीकृष्ण एक ही बात कहते हैं कि अपने द्वारा अपने आत्मा का उद्धार करें, उसे अधोगति में न पहुँचावें; क्योंकि आत्मा ही मित्र है। सृष्टि में न दूसरा कोई शत्रु है, न मित्र। किस प्रकार? जिसके द्वारा मनसहित इन्द्रियाँ जीती हुई हैं, उसके लिये उसी का आत्मा मित्र बनकर मित्रता में बरतता है, परमकल्याण करनेवाला होता है और जिसके द्वारा मनसहित इन्द्रियाँ नहीं जीती गयी हैं, उसके लिये उसी का आत्मा शत्रु बनकर शत्रुता में बरतता है, अनन्त योनियों और यातनाओं की ओर ले जाता है। प्रायः लोग कहते हैं- ‘मैं तो आत्मा हूँ’। गीता में लिखा है, “न इसे शस्त्र काट सकता है, न अग्नि जला सकती है, न वायु सुखा सकता है। यह नित्य है, अमृतस्वरूप है, न बदलनेवाला है, शाश्वत है और वह आत्मा मुझमें है ही।” वे गीता की इन पंक्तियों पर ध्यान नहीं देते कि आत्मा अधोगति में भी जाता है। आत्मा का उद्धार भी होता है, जिसके लिये ‘कार्यम् कर्म’- करने योग्य प्रक्रिया-विशेष करके ही उपलब्धि बतायी गयी है। अब अनुकूल आत्मा के लक्षण देखें- जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः। शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः।।७।। सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख और मान-अपमान में जिसके अन्तःकरण की वृत्तियाँ भली प्रकार शान्त हैं, ऐसे स्वाधीन आत्मावाले पुरुष में परमात्मा सदैव स्थित है, कभी विलग नहीं होता। ‘जितात्मा’ अर्थात् जिसने मनसहित इन्द्रियों को जीत लिया है, वृत्ति परमशान्ति में प्रवाहित हो गयी है, (यही आत्मा के उद्धार की अवस्था है) आगे कहते हैं- ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः। युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः।।८।। जिसका अन्तःकरण ज्ञान-विज्ञान से तृप्त है, जिसकी स्थिति अचल, स्थिर और विकाररहित है, जिसने इन्द्रियों को विशेष रूप से जीत लिया है,

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षष्ठम अध्याय १४७ जिसकी दृष्टि में मिट्टी, पत्थर और सुवर्ण एक समान हैं- ऐसा योगी 'युक्त' कहा जाता है। 'युक्त' का अर्थ है योग से संयुक्त। यह योग की पराकाष्ठा है, जिसे योगेश्वर पाँचवें अध्याय में श्लोक सात से बारह तक चित्रित कर आये हैं। परमतत्त्व परमात्मा का साक्षात्कार और उसके साथ होनेवाली जानकारी ज्ञान है। एक इञ्च भी इष्ट से दूरी है, जानने की इच्छा बनी है, तब तक वह अज्ञानी है। वह प्रेरक कैसे सर्वव्याप्त है? कैसे प्रेरणा देता है? कैसे अनेक आत्माओं का एक साथ पथ-प्रदर्शन करता है? कैसे वह भूत, भविष्य और वर्तमान का ज्ञाता है? उस प्रेरक इष्ट की इस कार्य-प्रणाली का ज्ञान ही 'विज्ञान' है। जिस दिन से हृदय में इष्ट का आविर्भाव होता है, उसी दिन से वह निर्देश देने लगता है; किन्तु प्रारम्भ में साधक समझ नहीं पाता। पराकाष्ठाकाल में ही योगी उसकी आन्तरिक कार्य-प्रणाली को पूर्णतः समझ पाता है। यही समझ विज्ञान है। योगारूढ़ अथवा युक्तपुरुष का अन्तःकरण ज्ञान-विज्ञान से तृप्त रहता है। इसी प्रकार योगयुक्त पुरुष की स्थिति का निरूपण करते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण पुनः कहते हैं- सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु । साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥९॥ प्राप्ति के पश्चात् महापुरुष समदर्शी और समवर्ती होता है। जैसे पिछले अध्याय (५/१८) में उन्होंने बताया कि जो पूर्णज्ञाता या पण्डित है, वह विद्या- विनयसम्पन्न ब्राह्मण में, चाण्डाल में, गाय-कुत्ता-हाथी में समान दृष्टिवाला होता है- उसी का पूरक यह श्लोक है। वह हृदय से सहायता करनेवाले सुहृदय, मित्र, बैरी, उदासीन, द्वेषी, बन्धुगणों, धर्मात्मा तथा पापियों में भी समान दृष्टिवाला योगयुक्त पुरुष अतिश्रेष्ठ है। वह उनके कार्यों पर दृष्टि नहीं डालता बल्कि उनके भीतर आत्मा के संचार पर ही उसकी दृष्टि पड़ती है। इन सबमें वह केवल इतना ही अन्तर देखता है कि कोई कुछ नीचे की सीढ़ी पर खड़ा है, तो कोई निर्मलता के समीप; किन्तु वह क्षमता सबमें है। यहाँ योगयुक्त के लक्षण पुनः दोहराये गये। कोई योगयुक्त कैसे बनता है? वह कैसे यज्ञ करता है? यज्ञस्थली कैसी हो? आसन कैसा हो? उस समय कैसे बैठा जाय? कर्त्ता के द्वारा पालन किये

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१४८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता जानेवाले नियम, आहार-विहार, सोने-जागने का संयम तथा कर्म पर कैसी चेष्टा हो?- इत्यादि बिन्दुओं पर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अगले पाँच श्लोकों में प्रकाश डाला है, जिससे आप भी उस यज्ञ को सम्पन्न कर सकें। अध्याय तीन में उन्होंने यज्ञ का नाम लिया और बताया कि यज्ञ की प्रक्रिया ही वह नियत कर्म है। अध्याय चार में उन्होंने यज्ञ का स्वरूप विस्तार से बताया, जिसमें प्राण में अपान का हवन, अपान में प्राण का हवन, प्राण- अपान की गति रोककर मन का निरोध इत्यादि किया जाता है। सब मिलाकर यज्ञ का शुद्ध अर्थ है आराधना तथा उस आराध्य देव तक की दूरी तय करानेवाली प्रक्रिया, जिस पर पाँचवें अध्याय में भी कहा। किन्तु उसके लिये आसन, भूमि, करने की विधि इत्यादि का चित्रण शेष था, उसी पर योगेश्वर श्रीकृष्ण यहाँ प्रकाश डालते हैं- योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः। एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः॥१०॥ चित्त को जीतने में लगा हुआ योगी मन, इन्द्रियों और शरीर को वश में रखकर, वासना और संग्रहरहित होकर एकान्त स्थान में अकेला ही चित्त को (आत्मोपलब्धि करानेवाली) योग-क्रिया में लगावे। उसके लिये स्थान कैसा हो? आसन कैसा रहे?- शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः। नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्॥११॥ शुद्ध भूमि में कुश, मृगछाल अथवा इससे भी उत्तरोत्तर (रेशमी, ऊनी वस्त्र, तख्त इत्यादि कुछ भी) बिछाकर अपने आसन को न अति ऊँचा, न नीचा, स्थिर स्थापित करे। शुद्ध भूमि का तात्पर्य उसे झाड़ने-बुहारने, सफाई करने से है। जमीन पर कुछ बिछा लेना चाहिये- चाहे मृगछाल हो या चटाई अथवा कोई भी वस्त्र, तख्त जो भी उपलब्ध हो। आसन हिलने-डुलनेवाला न हो। न जमीन से बहुत ऊँचा हो और न एकदम नीचा। 'पूज्य महाराज जी' लगभग पाँच इञ्च ऊँचे आसन पर बैठते थे। एक बार भाविकों ने लगभग एक फीट ऊँचा संगमरमर का एक तख्त मँगा दिया। महाराज जी एक दिन तो बैठे,

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षष्ठम अध्याय १४९ फिर बोले- "नहीं हो! बहुत ऊँचा हो गया। ऊँचे नहीं बैठे के चाही साधू को, अभिमान होइ जावा करत है। नीचेहू न बैठे के चाही, हीनता आवत है, अपने से घृणा आवत है।" बस, उसको उठवाया और जंगल में एक बगीचा था, वहाँ रखवा दिया। वहाँ न कभी महाराज जाते थे और न अब ही कोई जाता है। यह था उन महापुरुष का क्रियात्मक शिक्षण। इसी प्रकार साधक के लिये भी बहुत ऊँचा आसन नहीं होना चाहिये, नहीं तो भजनपूर्ति बाद में होगी, अहंकार पहले चढ़ बैठेगा। इसके पश्चात्- तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः। उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये।।१२।। उस आसन पर बैठकर (बैठकर ही ध्यान करने का विधान है) मन को एकाग्र करके, चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में रखते हुए अन्तःकरण की शुद्धि के लिये योगाभ्यास करे। अब बैठने का तरीका बताते हैं- समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः। सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्।।१३।। शरीर, गर्दन और सिर को सीधा, अचल-स्थिर करके (जैसे कोई पटरी खड़ी कर दी गयी हो, इस प्रकार सीधा) दृढ़ होकर बैठ जाय और अपनी नासिका के अग्रभाग को देखकर (नासिका की नोंक देखते रहने का निर्देश नहीं है बल्कि सीधे बैठने पर नाक के सामने जहाँ दृष्टि पड़ती है, वहाँ दृष्टि रहे। दाहिने-बायें देखते रहने की चंचलता न रहे) अन्य दिशाओं को न देखता हुआ स्थिर होकर बैठे और- प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः। मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः।।१४।। ब्रह्मचर्य व्रत में स्थित होकर (प्रायः लोग कहते हैं कि जननेन्द्रिय का संयम ब्रह्मचर्य है; किन्तु महापुरुषों की अनुभूति है कि मन से विषयों का स्मरण करके, आँखों से वैसे दृश्य देखकर, त्वचा से स्पर्श कर, कानों से विषयोत्तेजक शब्द सुनकर जननेन्द्रिय-संयम सम्भव नहीं है। ब्रह्मचारी का वास्तविक अर्थ है- 'ब्रह्म आचरति स ब्रह्मचारी'। ब्रह्म का आचरण है