१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
मन्त्र ८१ २१९ सर्वप्रथम बन्ध एवं मुद्रा का अभ्यास करना चाहिए। नासाग्र एवं अपने दोनों नेत्रों में 'अ' कार अग्नि, हृदय में 'उ' कार अग्नि और भृकुटियों के मध्य में 'म' कार अग्नि प्रतिष्ठित कही गयी है। इनमें प्राणशक्ति को संयुक्त करे। ब्रह्मग्रन्थि ॐकार (नासाग्र एवं नेत्र) में और विष्णुग्रन्थि हृदय में स्थित कही गयी है ॥६९-७०॥ रुद्रग्रन्थिर्भ्रुवोर्मध्ये भिद्यतेऽक्षरवायुना। अकारे संस्थितो ब्रह्मा उकारे विष्णुरास्थितः ॥७१॥ मकारे संस्थितो रुद्रस्ततोऽस्यान्तः परात्परः। कण्ठं संकुच्य नाड्यादौ स्तम्भिते येन शक्तितः॥ रसना पीड्यमानेयं षोडशी वोर्ध्वगामिनी। त्रिकूटं त्रिविधा चैव गोलाखं निखरं तथा ॥७३॥ त्रिशङ्खवज्रमोङ्कारमूर्ध्वनालं भ्रुवोर्मुखम्। कुण्डलीं चालयन्प्राणान्भेदयन्शशिमण्डलम् ॥७४॥ रुद्र ग्रन्थि भृकुटियों के मध्य में स्थित है। यह (तीनों) ग्रन्थि अक्षर वायु (हंस ज्ञान) से भेदन की जाती है। 'अ' कार में ब्रह्मा का, 'उकार' में विष्णु का तथा 'म' कार में रुद्र का स्थान बताया गया है, उसके अन्त में परात्पर ब्रह्म है। कण्ठ का संकोचन (जालन्धरबन्ध) करके आदि शक्ति (कुण्डलिनी शक्ति) को स्तम्भित करे,तत्पश्चात् जिह्वा को दबाकर सोलह आधार वाली, ऊर्ध्वगामिनी, त्रिकूट (इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना तीनों के मिलन स्थल) वाली, तीन प्रकार वाली, ब्रह्मरन्ध्र को जानने वाली अति सूक्ष्म सुषुम्ना नाड़ी को एवं त्रिशंख (सुख, दुःख, सुख-दुःख तीनों को खाने वाले), वज्र (अयोगी द्वारा दुर्भेद्य), ओंकार युक्त, ऊर्ध्वनाल, भृकुटियों की ओर गमन करने वाली कुण्डली शक्ति तथा प्राणों को चालित करके शशि मण्डल का भेदन करे ॥७४॥ साधयन्वज्रकुम्भानि नव द्वाराणि बन्धयेत्। सुमनः पवनारूढः सरागो निर्गुणस्तथा ॥ ७५ ॥ नव द्वारों को बन्द करके वज्र कुम्भक (उज्जायी, शीतली आदि प्राणायाम) का साधन करना चाहिए। मन को प्रसन्न रखकर, सहज स्थिति में निर्गुण होकर पवन पर आरूढ़ (प्राणायाम परायण) होना चाहिए ॥७५॥ ब्रह्मस्थाने तु नादः स्याच्छंखिन्यमृतवर्षिणी। षट्चक्रमण्डलोद्धारं ज्ञानदीपं प्रकाशयेत् ॥ ७६ ॥ इस (ध्यान) से ब्रह्मस्थान में नाद सुनाई पड़ने लगता है तथा शंखिनी नाड़ी से अमृत की वर्षा होने लगती है और षट्चक्र मण्डल का भेदन होने से ज्ञानरूपी दीपक प्रकाश से युक्त हो जाता है ॥ ७६ ॥ सर्वभूतस्थितं देवं सर्वेशं नित्यमर्चयेत्। आत्मरूपं तमालोक्य ज्ञानरूपं निरामयम् ॥ ७७ ॥ समस्त भूत-प्राणियों में प्रतिष्ठित परम देव का सदा ही पूजन करना चाहिए। वे आत्मस्वरूप, ज्ञानस्वरूप तथा व्याधि से रहित हैं ॥ ७७ ॥ दृश्यन्तं दिव्यरूपेण सर्वव्यापी निरञ्जनः । हंस हंस वदेद्वाक्यं प्राणिनां देहमाश्रितः । स प्राणापानयोर्ग्रन्थिर्जपत्यभिधीयते ॥ ७८ ॥ सहस्रमेकं द्वययुतं षट्शतं चैव सर्वदा । उच्चरन्थितो हंसः सोऽहमित्यभिधीयते ॥ ७९ ॥ उन सर्वव्यापी निरञ्जन के दिव्य रूप का दर्शन करके हंस-हंस का निरन्तर जप करते रहना चाहिए। प्राणियों की देह (शरीर) में स्थित प्राण और अपान की ग्रन्थि को अजपा जप कहा जाता है, इससे नित्य प्रति इक्कीस हजार छः सौ बार जप करता हुआ हंस 'सोऽहम्' के रूप में परिणत हो जाता है ॥ ७८-७९ ॥ पूर्वभागे ह्यधोलिङ्गं शिखिन्यां चैव पश्चिमम्। ज्योतिर्लिङ्गं भ्रुवोर्मध्ये नित्यं ध्यायेत्सदा यतिः ॥ साधक को सदा ही कुण्डलिनी के पूर्व में अधोलिङ्ग का, शिखा स्थान में पश्चिमलिङ्ग का, भृकुटियों के मध्य में ज्योतिर्लिङ्ग का ध्यान करना चाहिए ॥ ८० ॥ अच्युतोऽहमचिन्त्योऽहमतर्क्योऽहमजोऽस्म्यहम्। अव्रणोऽहमकायोऽहमनङ्गोऽस्म्यभयोऽस्म्यहम् ॥ मैं अच्युत हूँ, मैं अचिन्त्य अर्थात् चिन्तन से परे हूँ, मैं तर्क की सीमा से बाहर हूँ, मैं अजन्मा हूँ, मैं
२२० ब्रह्मविद्योपनिषद् व्रणरहित (स्वस्थ) हूँ, मैं काया से विहीन हूँ, मैं अनङ्ग (अंगरहित) एवं भय से रहित हूँ॥ ८१ ॥ अशब्दोऽहमरूपोऽहमस्पर्शोऽस्म्यहमद्वयः। अरसोऽहमगन्धोऽहमनादिरमृतोऽस्म्यहम् ॥८२॥ मैं शब्दरहित हूँ, रूप रहित (आकाररहित), स्पर्श से परे एवं अद्वय हूँ। मैं रस से विहीन (रसरहित) हूँ, गन्ध से रहित तथा अनादि अमृत का रूप हूँ॥ ८२ ॥ अक्षयोऽहमलिङ्गोऽहमजरोऽस्म्यकलोऽस्म्यहम्। अप्राणोऽहममूकोऽहमचिन्त्योऽस्म्यकृतोऽस्म्यहम् ॥ ८३ ॥ मैं अक्षय (क्षयरहित) हूँ, लिङ्गरहित हूँ, अजर एवं निष्कल अर्थात् कलारहित हूँ। मैं अमूक (वाक् शक्तियुक्त) एवं प्राणरहित हूँ, अचिन्त्य (चिन्तन से परे) तथा मैं ही क्रियारहित हूँ॥ ८३ ॥ अन्तर्याम्यहमग्राह्योऽनिर्देश्योऽहमलक्षणः। अगोत्रोऽहमगात्रोऽहमचक्षुष्कोऽस्म्यवागहम् ॥ ८४ ॥ मैं अन्तर्यामी हूँ, अग्राह्य अर्थात् पकड़ने में न आने वाला हूँ, मैं निर्देशरहित एवं लक्षणरहित हूँ। मैं कुल, गोत्र एवं शरीररहित हूँ, मैं नेत्रेन्द्रिय रहित हूँ तथा वागिन्द्रिय रहित भी हूँ॥ ८४ ॥ अदृश्योऽहमवर्णोऽहमखण्डोऽस्म्यहमद्भुतः। अश्रुतोऽहमदृष्टोऽहमन्वेष्योऽमरोऽस्म्यहम्॥८५॥ मैं अदृश्य हूँ, अवर्ण हूँ, अखण्ड एवं अद्भुत हूँ। मैं अश्रुत हूँ, अदृष्ट हूँ, अन्वेषण योग्य एवं अमर हूँ॥ अवायुरप्यनाकाशोऽतेजस्कोऽव्यभिचार्यहम्। अमतोऽहमजातोऽहमतिसूक्ष्मोऽविकार्यहम् ॥८६ मैं वायुरहित, आकाश तत्त्व से रहित, तेजो विहीन, व्यभिचार (नियमोल्लंघन) से रहित, अज्ञेय, अजन्मा (जन्मरहित), सूक्ष्मातिसूक्ष्म एवं अविकारी (विकार रहित) हूँ॥ ८६ ॥ अरजस्कोऽतमस्कोऽहमसत्त्वोऽस्म्यगुणोऽस्म्यहम्। अमायोऽनुभवात्माहमन्योऽविषयोऽस्म्यहम् ॥ ८७॥ मैं सत्त्वगुण, रजोगुण एवं तमोगुण से रहित हूँ। गुणों से अतीत हूँ, मायारहित, अनुभव स्वरूप हूँ, अनन्य तथा अविषय अर्थात् विषयरहित हूँ॥ ८७ ॥ अद्वैतोऽहमपूर्णोऽहमबाह्योऽहमनन्तरः। अश्रोत्रोऽहमदीर्घोऽहमव्यक्तोऽहमनामयः ॥८८॥ मैं अद्वैत हूँ, पूर्ण हूँ। मैं न बाहर हूँ और न ही भीतर हूँ, मैं श्रोत्ररहित हूँ, अदीर्घ हूँ, अव्यक्त हूँ और मैं व्याधिरहित भी हूँ ॥ ८८ ॥ अद्वयानन्दविज्ञानघनोऽस्म्यहमविक्रियः। अनिच्छोऽहमलेपोऽहमकर्तास्म्यहमद्वयः ॥८९॥ मैं अद्वय, आनन्दरूप, विज्ञानघन एवं अविकारी अर्थात् विकार रहित हूँ। मैं इच्छा रहित हूँ, अलेप (लिप्त न रहने वाला) हूँ। मैं ही अकर्ता तथा अद्वैत भी मैं ही हूँ॥ ८९ ॥ अविद्याकार्यहीनोऽहमवाङ्मनसगोचरः। अनल्पोऽहमशोकोऽहमविकल्पोऽस्म्यविज्वलन् ॥ ९० मैं अविद्यायुक्त कार्य से रहित हूँ, मैं मन एवं वाणी से अगोचर अर्थात् परे हूँ। मैं अनल्प (अल्परहित) हूँ, शोकरहित हूँ, विकल्परहित एवं विशिष्ट अग्नि से रहित हूँ॥ ९० ॥ आदिमध्यान्तहीनोऽहमाकाशसदृशोऽस्म्यहम्। आत्मचैतन्यरूपोऽहमहमानन्दचिद्धनः ॥ ९१ ॥ मैं आदि, मध्य एवं अन्त से विहीन हूँ। मैं आकाश के समान हूँ। मैं आत्म चैतन्य रूप हूँ तथा आनन्द चेतन घन के सदृश हूँ॥ ९१ ॥ आनन्दामृतरूपोऽहमात्मसंस्थोऽहमान्तरः। आत्मकामोऽहमकाशात्परमात्मेश्वरोऽस्म्यहम् ॥ ९२ ॥
मन्त्र १०३ २२१ मैं आनन्द रूप, अमृत स्वरूप हूँ, मैं आत्म-संस्थित हूँ, अन्तर (सभी की अन्तरात्मा) भी मैं ही हूँ। (मैं) आत्मकाम हूँ तथा आकाश से (अधिक व्यापक) परमात्मा स्वरूप परमेश्वर मैं ही हूँ ॥ ९२ ॥ ईशानोऽस्म्यहमीड्योऽहमहमुत्तमपूरुषः। उत्कृष्टोऽहमुपद्रष्टाऽहमुत्तरतरोऽस्म्यहम् ॥ ९३ ॥ मैं ईशान हूँ, पूजनीय हूँ, उत्तम पुरुष हूँ। मैं उत्कृष्ट हूँ, उपद्रष्टा (साक्षीरूप) हूँ तथा परे से परे हूँ॥ ९३ ॥ केवलोऽहं कविः कर्माध्यक्षोऽहं करणाधिपः। गुहाशयोऽहं गोप्ताहं चक्षुषश्चक्षुरस्म्यहम्॥ ९४ ॥ मैं केवल हूँ, कवि हूँ, कर्माध्यक्ष हूँ। मैं ही कारणों का कारण अर्थात् अधिपति हूँ, मैं गुप्त आशय हूँ, गुप्त रखने वाला हूँ एवं मैं ही नेत्रों का भी नेत्र हूँ॥ ९५ ॥ चिदानन्दोऽस्म्यहं चेता चिद्घनश्चिन्मयोऽस्म्यहम्। ज्योतिर्मयोऽस्म्यहं ज्यायाञ्ज्योतिषां ज्योतिरस्म्यहम् ॥ ९५ ॥ मैं चिदानन्द हूँ, चेतना प्रदान करने वाला हूँ, चिद्घन एवं चिन्मय स्वरूप हूँ। मैं ज्योतिर्मय हूँ और ज्योतियों में सर्वश्रेष्ठ ज्योतिरूप मैं ही हूँ॥ ९५ ॥ तमसः साक्ष्यहं तुर्यतुर्योऽहं तमसः परः। दिव्यो देवोऽस्मि दुर्दर्शो दृष्टाध्यायो ध्रुवोऽस्म्यहम् ॥९६ मैं अन्धकार में साक्ष्य स्वरूप हूँ, तुर्य का भी तुर्य हूँ, अन्धकार से परे हूँ, मैं दिव्य देवस्वरूप हूँ, दुर्दर्श और दृष्टि का आधार ध्रुव (शाश्वत) हूँ॥ ९६ ॥ नित्योऽहं निरवद्योऽहं निष्क्रियोऽस्मि निरञ्जनः। निर्मलो निर्विकल्पोऽहं निराख्यातोऽस्मि निश्चलः ॥ ९७ ॥ मैं नित्य हूँ, निर्दोष हूँ, क्रियारहित तथा निरञ्जन हूँ। मैं निर्मल, निर्विकल्प, निराख्यात और निश्चल हूँ॥ निर्विकारो नित्यपूतो निर्गुणो निस्पृहोऽस्म्यहम्। निरिन्द्रियो नियन्ताहं निरपेक्षोऽस्मि निष्कलः ॥ मैं निर्विकार (विकार रहित), नित्यपूत (सदैव पवित्र), निर्गुण, निस्पृह हूँ। मैं इन्द्रियों से रहित, नियन्ता, निरपेक्ष एवं निष्कल (कलारहित) हूँ॥ ९८ ॥ पुरुषः परमात्माहं पुराणः परमोऽस्म्यहम्। परावरोऽस्म्यहं प्राज्ञः प्रपञ्चोपशमोऽस्म्यहम् ॥ ९९ ॥ मैं परमात्म पुरुष हूँ, परम पुराण हूँ। मैं परावर (ज्ञानसमुद्र) हूँ, प्राज्ञ-प्रपञ्च का शमन करने वाला भी हूँ॥ परामृतोऽस्म्यहं पूर्णः प्रभुरस्मि पुरातनः। पूर्णानन्दैकबोधोऽहं प्रत्यगेकरसोऽस्म्यहम् ॥ १०० ॥ मैं परामृत तथा पुरातन पूर्ण प्रभु हूँ। मैं पूर्णानन्द, एक बोध रूप हूँ तथा प्रत्यग् (अन्तरात्मा) एवं एक - रस (सर्वदा एक रूप) भी मैं ही हूँ॥ १०० ॥ प्रज्ञातोऽहं प्रशान्तोऽहं प्रकाशः परमेश्वरः । एकदा चिन्त्यमानोऽहं द्वैताद्वैतविलक्षणः ॥ १०१ ॥ मैं प्रज्ञाता (विशेष ज्ञाता) हूँ, मैं प्रशान्त हूँ तथा (मैं ही) प्रकाश स्वरूप परमेश्वर हूँ। द्वैत एवं अद्वैत के लक्षणों से भिन्न मैं ही एक चिन्तन-मनन करने योग्य हूँ ॥ १०१ ॥ बुद्धोऽहं भूतपालोऽहं भारूपो भगवानहम्। महादेवो महानस्मि महाज्ञेयो महेश्वरः ॥ १०२ ॥ मैं बुद्धि हूँ, मैं ही भूतपाल अर्थात् समस्त प्राणियों का पालन करने वाला हूँ, प्रकाश स्वरूप भगवान् भी मैं हूँ। महादेव, महाज्ञेय एवं महान् महेश्वर भी मैं ही हूँ॥ १०२ ॥ विमुक्तोऽहं विभुरहं वरेण्यो व्यापकोऽस्म्यहम्। वैश्वानरो वासुदेवो विश्वतश्चक्षुरस्म्यहम् ॥ १०३ ॥ मैं विमुक्त हूँ, विभु हूँ, वरण करने योग्य हूँ तथा मैं ही व्यापक हूँ। मैं श्रेष्ठ वैश्वानर एवं वासुदेव हूँ तथा सम्पूर्ण विश्व का चक्षु रूप भी मैं ही हूँ॥ १०३ ॥
२२२ ब्रह्मविद्योपनिषद् विश्वाधिकोऽहं विशदो विष्णुर्विश्वकृदस्म्यहम्। शुद्धोऽस्मि शुक्लः शान्तोऽस्मि शाश्वतोऽस्मि शिवोऽस्म्यहम् ॥१०४॥ मैं विश्व से अधिक हूँ, मैं विश्व का कर्त्ता विशद विष्णु हूँ, मैं शुद्ध, शुक्ल, शान्त स्वरूप हूँ, शाश्वत तथा शिव भी मैं हूँ॥१०४॥ सर्वभूतान्तरात्माहमहमस्मि सनातनः। अहं सकृद्विभातोऽस्मि स्वे महिम्नि सदा स्थितः ॥१०५॥ मैं समस्त भूत-प्राणियों का अन्तरात्मा हूँ, मैं नित्य एवं सनातन हूँ। मैं अपनी महिमा में स्थित रहकर सदैव प्रकाशित होता रहता हूँ॥१०५॥ सर्वान्तरः स्वयंज्योतिः सर्वाधिपतिरस्म्यहम्। सर्वभूताधिवासोऽहं सर्वव्यापी स्वराडहम् ॥१०६ मैं सभी के अन्तःकरण में स्वयं ज्योति रूप में स्थित एवं समस्त प्राणियों का अधिपति हूँ। सभी भूत- प्राणी मुझमें ही निवास करते हैं, मैं सर्वत्र व्याप्त हूँ तथा सभी का सम्राट् हूँ॥१०६॥ समस्तसाक्षी सर्वात्मा सर्वभूतगुहाशयः। सर्वेन्द्रियगुणाभासः सर्वेन्द्रियविवर्जितः ॥१०७॥ मैं सभी का साक्षी, सर्वात्मा, सब भूतों का गुह्य आशय हूँ, मैं सब इन्द्रियों के गुणों का प्रकाशक हूँ तथा समस्त इन्द्रियों से रहित भी हूँ॥१०७॥ स्थानत्रयव्यतीतोऽहं सर्वानुग्राहकोऽस्म्यहम्। सच्चिदानन्दपूर्णात्मा सर्वप्रेमास्पदोऽस्म्यहम् ॥१०८ मैं तीन स्थान (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) से अतीत (परे) हूँ, सभी पर अनुग्रह-अनुकम्पा करने वाला हूँ। मैं सच्चिदानन्द पूर्णात्मा हूँ तथा सभी का प्रेमास्पद हूँ॥१०८॥ सच्चिदानन्दमात्रोऽहं स्वप्रकाशोऽस्मि चिद्घनः। सत्त्वस्वरूपसन्मात्रसिद्धसर्वात्मकोऽस्म्यहम् ॥ मैं सच्चिदानन्द मात्र हूँ एवं स्वयं प्रकाशमान चेतन घनस्वरूप हूँ। मैं सत्य स्वरूप, सन्मात्र (सत्यस्वरूप), सिद्ध तथा सभी की आत्मा हूँ॥१०९॥ सर्वाधिष्ठानसन्मात्रः सर्वबन्धहरोऽस्म्यहम्। सर्वग्रासोऽस्म्यहं सर्वद्रष्टा सर्वानुभूरहम् ॥११०॥ एवं यो वेद तत्त्वेन स वै पुरुष उच्यते इत्युपनिषत् ॥ समस्त (प्राणियों का) आधार स्वरूप, सत्य स्वरूप, सभी के बन्धन को हरने (काटने) वाला, सबको अपना ग्रास बनाने वाला, सभी को देखने वाला और सभी का अनुभव रूप मैं ही हूँ। जो इस प्रकार तत्त्व का ज्ञाता है, वही पुरुष कहा जाता है, इस प्रकार की यह उपनिषद् (रहस्य) विद्या है॥११०॥ ॐ सह नाववतु .........................इति शान्तिः ॥ ॥ इति ब्रह्मविद्योपनिषत्समाप्ता ॥
२२४ ब्रह्मोपनिषद् हृदय में सभी देवगण स्थित हैं, प्राण भी हृदय में निवास करता है और हृदय में ही प्राण तथा ज्योति भी प्रतिष्ठित है। इस तरह से हृदय में तीन स्वरूपों में परम ब्रह्म का निवास है। (इस तथ्य को प्रकट करने के लिए) तीन सूत्रों (धागों) से युक्त 'यज्ञ सूत्र' अर्थात् जनेऊ (यज्ञोपवीत) है, ऐसा उसके रहस्य को समझने वाले मानते हैं। वह अविनाशी परमब्रह्म चेतना के रूप में हृदय में प्रतिष्ठित है ॥ ४ ॥ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात् । आयुष्यमग्रयं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः ॥ ५ ॥ (यह) परम पवित्र यज्ञोपवीत सर्वप्रथम प्रजापति (ब्रह्माजी) के साथ ही सहज (देहेन्द्रिय की तरह) प्रादुर्भूत हुआ। वह दीर्घायुष्य प्रदान करने वाला है। (हे मनुष्य !) ऐसा जान करके तुम उत्तम और शुभ्र यज्ञोपवीत धारण करो। यह यज्ञोपवीत तुम्हारे लिए बल एवं तेज प्रदान करने वाला (सिद्ध) हो ॥ ५ ॥ सशिखं वपनं कृत्वा बहिःसूत्रं त्यजेद्बुधः । यदक्षरं परं ब्रह्म तत्सूत्रमिति धारयेत् ॥ ६ ॥ शिखा के सहित मुण्डन करने के पश्चात् (संन्यास धर्म को ग्रहण करके) ज्ञानी जनों को ब्रह्मसूत्र अर्थात् यज्ञोपवीत का परित्याग कर देना चाहिए। जिस अविनाशी तत्त्व को परब्रह्म कहा गया है, वही इस सूत्र के रूप में प्रतिष्ठित है। ऐसा जान करके उसी श्रेष्ठ यज्ञोपवीत को हृदय में प्रतिष्ठित करना चाहिए ॥ ६ ॥ सूचनात्सूत्रमित्याहुः सूत्रं नाम परं पदम् । तत्सूत्रं विदितं येन स विप्रो वेदपारगः ॥ ७ ॥ यज्ञोपवीत यह सूचित करता है (कि अविनाशी शाश्वत परब्रह्म हृदय में ही स्थित है), इस कारण से उसे 'सूत्र' के नाम से जाना जाता है। यह 'सूत्र' ही परम पद है। इस परम पद रूपी सूत्र को जिस मनुष्य ने जान लिया, वही ब्राह्मण वेद को जानने में समर्थ अर्थात् पारगामी होता है ॥ ७ ॥ येन सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव । तत्सूत्रं धारयेद्योगी योगवित्तत्त्वदर्शिवान् ॥ ८ ॥ जिस प्रकार सूत्र रूपी धागों में माला के रूप में मणियों के दाने पिरोये जाते हैं, उसी तरह अविनाशी ब्रह्म में यह सम्पूर्ण जगत् गुँथा हुआ है, इसलिए इसे सूत्र कहा गया है। तत्त्वज्ञानी एवं योग में निष्णात मनुष्यों को इस सूत्र रूप ब्रह्म को हृदय में प्रतिष्ठित करना चाहिए ॥ ८ ॥ बहिःसूत्रं त्यजेद्विद्वानयोगमुत्तममास्थितः । ब्रह्मभावमिदं सूत्रं धारयेद्यः स चेतनः । धारणात्तस्य सूत्रस्य नोच्छिष्टो नाशुचिर्भवेत् ॥ ९ ॥ इस श्रेष्ठ योग रूपी ब्रह्मसूत्र को धारण करने वाला विद्वान् मनुष्य ब्रह्मसूत्र का परित्याग कर दे। ब्रह्म स्वरूप को जानना ही 'सूत्र' समझना चाहिए। इस 'ब्रह्मसूत्र' को जो भी मनुष्य धारण करता है, वह चैतन्य स्वरूप है। इस ब्रह्मरूपी सूत्र को धारण करने से व्यक्ति न उच्छिष्ट होता है और न ही अशुद्ध होता है ॥ ९ ॥ सूत्रमन्तर्गतं येषां ज्ञानयज्ञोपवीतिनाम् । ते वै सूत्रविदो लोके ते च यज्ञोपवीतिनः ॥ १० ॥ इस शाश्वत ज्ञान रूपी यज्ञोपवीत को ग्रहण करने वाले मनुष्यों के हृदय में ब्रह्मरूपी सूत्र स्थित रहता है। इस प्रकार के ही मनुष्य ब्रह्मरूपी सूत्र के वास्तविक स्वरूप को जानने वाले होते हैं तथा वे ही व्यक्ति वास्तव में सच्चे यज्ञोपवीतधारी हैं ॥ १० ॥ ज्ञानशिखिनो ज्ञाननिष्ठा ज्ञानयज्ञोपवीतिनः । ज्ञानमेव परं तेषां पवित्रं ज्ञानमुच्यते ॥ ११ ॥ जो मनुष्य ज्ञानरूप शिखा वाले, ज्ञान में ही निष्ठा रखने वाले और ज्ञानरूपी यज्ञोपवीत को धारण करने वाले हैं, ऐसे उन श्रेष्ठ व्यक्तियों को ज्ञान ही परम पवित्र बना देता है ॥ ११ ॥
॥ ब्रह्मोपानिषद् ॥ यह कृष्णयजुर्वेदीय उपनिषद् है। इसमें कुल २३ मन्त्र हैं, जिसमें ब्रह्म का स्वरूप और उसकी प्राप्ति का उपाय वर्णित होने से इसका नाम 'ब्रह्मोपनिषद्' पड़ा है। सर्वप्रथम इसमें चतुष्पाद् ब्रह्म का स्वरूप बताया गया है, तत्पश्चात् परब्रह्म की अक्षरता, ब्रह्म और निर्वाण की एकरूपता, त्रिवृत्सूत्र (ब्रह्म का तीन रूप-देवगण, प्राण और ज्योति-हृदय में विद्यमान) यज्ञोपवीत का तात्त्विक स्वरूप, शिखा-यज्ञोपवीत आदि का ज्ञान स्वरूप होना ब्राह्मणत्व के लिए आवश्यक है, इत्यादि विषय बड़े अच्छे ढंग से प्रतिपादित हैं। अन्त में 'ब्रह्म' की प्राप्ति का उपाय-सत्य एवं तप को बताते हुए सिद्ध किया गया है कि यह 'आत्मा' ही ब्रह्म है, जैसे दूध में घृत विद्यमान रहता है, उसी तरह सर्वत्र ब्रह्म की सत्ता विद्यमान है। ऐसा अनुभव करने वाला साधक ब्रह्म स्वरूप हो जाता है। ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ सह नाववतु ...........इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य-अवधूतोपनिषद् ) अथास्य पुरुषस्य चत्वारि स्थानानि भवन्ति। नाभिर्हृदयं कण्ठं मूर्धेति। तत्र चतुष्पादं ब्रह्म विभाति। जागरितं स्वप्नं सुषुप्तं तुरीयमिति। जागरिते ब्रह्मा स्वप्ने विष्णुः सुषुप्तौ रुद्रस्तुरीय- मक्षरम्। स आदित्यो विष्णुश्चेश्वरश्च स्वयममनस्कमश्रोत्रमपाणिपादं ज्योतिर्विदितम्॥ १॥ इस विराट् पुरुष के शरीर में आत्मा के चार विशेष स्थान-नाभि, हृदय, कण्ठ एवं ब्रह्मरन्ध्र बताये गये हैं। वहाँ इन चारों क्षेत्रों में चतुर्थ चरण से युक्त ब्रह्म प्रकाशित होता है। ऐसे ही आत्मा की चार अवस्थाएँ-जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति तथा तुरीय कही गयी हैं। इन अवस्थाओं में से जाग्रत् अवस्था में ब्रह्मा, स्वप्नावस्था में विष्णु, सुषुप्तावस्था में रुद्र तथा चतुर्थ तुरीयावस्था में अक्षर रूप परमात्मा प्रकाशित होता रहता है। यह आत्म तत्त्व स्वयं मन एवं हाथ-पैर आदि इन्द्रियों से रहित होते हुए भी प्रकाश युक्त कहा गया है॥ १॥ यत्र लोका न लोका देवा न देवा वेदा न वेदा यज्ञा न यज्ञा माता न माता पिता न पिता स्नुषा न स्नुषा चाण्डालो न चाण्डालः पौल्कसो न पौल्कसः श्रमणो न श्रमणः तापसो न तापस इत्येकमेव परं ब्रह्म विभाति निर्वाणम्॥ २॥ यहाँ (आत्मा अर्थात् ब्रह्म में) लोक-लोक के रूप में नहीं है, देव-देवरूप में नहीं है, वेद-वेदरूप में नहीं है, यज्ञ-यज्ञरूप में नहीं है, माता-माता के रूप में नहीं है, पिता-पितारूप में नहीं है, स्नुषा (पुत्रवधू)-स्नुषा रूप में नहीं है, चाण्डाल-चाण्डालरूप में नहीं है, पौल्कस (भील)-पौल्कस रूप में नहीं है, श्रमण (संन्यासी)- श्रमण के रूप में नहीं है, और तपस्वी-तपस्वी के रूप में नहीं है; किन्तु वह ब्रह्म सदैव एक निर्वाण स्वरूप एवं प्रकाश स्वरूप है॥ २॥ न तत्र देवा ऋषयः पितर ईशते प्रतिबुद्धः सर्वविद्येति ॥ ३ ॥ वहाँ (इस ब्रह्म पर) देवगण, ऋषिगण और पितृगण भी शासन करने में समर्थ नहीं हैं। उस अविनाशी ब्रह्म को ज्ञान के द्वारा ही जाना जा सकता है, वह सर्वविद्या के स्वरूप वाला है॥ ३॥ हृदिस्था देवताः सर्वा हृदि प्राणाः प्रतिष्ठिताः। हृदि प्राणश्च ज्योतिश्च त्रिवृत्सूत्रं च तद्विदुः। हृदि चैतन्ये तिष्ठति ॥ ४॥
मन्त्र १९ २२५ अग्नेरिव शिखा नान्या यस्य ज्ञानमयी शिखा। स शिखीत्युच्यते विद्वान्नेतरे केशधारिणः ॥१२ जिस मनुष्य के अग्नि की शिखा की भाँति ज्ञान की शिखा होती है, उनके लिए और दूसरी अन्य शिखा होती ही नहीं है और वे ही सच्चे अर्थों में शिखा को धारण करने वाले तथा विशेष ज्ञानी कहे जाते हैं। इनके अतिरिक्त जो अन्य मनुष्य बाह्य केशों की चोटी रखते हैं, वे व्यक्ति शिखा को धारण करने वाले नहीं कहे जा सकते॥ १२॥ कर्मण्यधिकृता ये तु वैदिके ब्राह्मणादयः। तैः संधार्यमिदं सूत्रं क्रियाङ्गं तद्वि वै स्मृतम् ॥ १३ ॥ ब्राह्मण आदि जो (वर्ण) वैदिक कर्म के अधिकारी हैं, उन्हीं (मनुष्यों) को ही यह ब्रह्मसूत्र धारण करना चाहिए, क्योंकि यही इसकी कार्य पद्धति का अनिवार्य अङ्ग कहा गया है॥ १३॥ शिखा ज्ञानमयी यस्य उपवीतं च तन्मयम्। ब्राह्मण्यं सकलं तस्य इति ब्रह्मविदो विदुः ॥ १४ ॥ जिस (ब्राह्मण) की शिखा एवं यज्ञोपवीत दोनों ही ज्ञानस्वरूप हैं, ऐसे उन (ब्राह्मणों) का ब्राह्मणत्व ही पूर्ण सफल है, ऐसा ब्रह्मपरायण विद्वज्जन कहते हैं॥ १४॥ इदं यज्ञोपवीतं तु पवित्रं यत्परायणम्। स विद्वान्यज्ञोपवीती स्यात्स यज्ञः तं यज्वानं विदुः ॥ १५ ॥ यह (ज्ञान ही) यज्ञोपवीत है, यही परम पवित्र और परायण अर्थात् कल्याणकारी है। अतः ज्ञानवान् मनुष्य ही वास्तव में (सच्चे) यज्ञोपवीत धारण करने वाले हैं, स्वयं यज्ञरूप हैं और उन्हीं श्रेष्ठ पुरुषों को 'यज्वा' कहते है॥ १५ ॥ एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा। कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च ॥ १६ ॥ एक ही परमात्मा समस्त भूत-प्राणियों में विद्यमान (छिपा हुआ) है, (वह) सर्वव्यापी है। समस्त भूतों का अन्तरात्मा है, सभी के कर्मों को नियन्त्रित रखने वाला है, सभी भूतों का अधिवास है, साक्षीरूप, चैतन्य स्वरूप, पवित्र एवं निर्गुण (त्रिगुणातीत) है॥ १६ ॥ एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति। तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां शांतिः शाश्वती नेतरेषाम् ॥१७॥ वह (परमात्मा) एक होते हुए भी सभी को वश में रखने वाला है, सभी प्राणियों का अन्तरात्मा है तथा अपने एक ही रूप को विभिन्न रूपों में प्रकट करता है। इस परम तत्त्व को जो बुद्धिमान् व्यक्ति अपने में प्रतिष्ठित देखते हैं, उन्हें शाश्वत शान्ति की प्राप्ति होती है, दूसरों को इसकी प्राप्ति नहीं हो सकती ॥ १७॥ आत्मानमरणिं कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणिम्। ध्याननिर्मथनाभ्यासाद्देवं पश्येन्निगूढवत् ॥ १८ ॥ आत्मा को नीचे की अरणि और प्रणव को ऊर्ध्व की अरणि बनाकर ध्यान रूपी मंथन के अभ्यास द्वारा इस अप्रकट आत्मा का साक्षात्कार मनुष्य को करना चाहिए॥ १८॥ तिलेषु तैलं दधनीव सर्पिरापः स्रोतः स्वरणीषु चाग्निः। एवमात्मात्मनि गृह्यतेऽसौ सत्येनैनं तपसा योऽनुपश्यति ॥ १९ ॥
२२६ ब्रह्मोपनिषद् जिस प्रकार तिल में तैल, दही में घृत, स्रोत के प्रवाह में जल, काष्ठ में अग्नि अप्रत्यक्ष रूप से विद्यमान रहती है, उसी प्रकार से आत्मा भी हमारे अन्तःकरण में विद्यमान है। वह आत्मा सत्य एवं तप के द्वारा देखा जा सकता है ॥ १९ ॥ ऊर्णनाभिर्यथा तन्तून्सृजते संहरत्यपि। जाग्रत्स्वप्ने तथा जीवो गच्छत्यागच्छते पुनः ॥ २० ॥ जिस प्रकार ऊर्णनाभि (मकड़ी) तन्तु (सूत्र) का सृजन एवं संहार अर्थात् सूत्र का निर्माण करती और पुनः खींच (निगल) लेती है, उसी प्रकार जीवात्मा भी जाग्रत् एवं स्वप्नावस्था में पुनः-पुनः गमनागमन करता रहता है ॥ २० ॥ नेत्रस्थं जागरितं विद्यात्कण्ठे स्वप्नं समाविशेत्। सुषुप्तं हृदयस्थं तु तुरीयं मूर्ध्नि संस्थितम् ॥ २१ ॥ जाग्रत् अवस्था का वैश्वानर नाम से युक्त आत्मा चक्षु में प्रतिष्ठित रहता है, स्वप्नावस्था का तैजस नामक आत्मा कण्ठ में निवास करता है, सुषुप्तावस्था का प्राज्ञ नामक आत्मा हृदय में स्थित रहता है और तुरीय अर्थात् तीनों अवस्थाओं से परे इस तुर्या नामक चौथी अवस्था का आत्मा ब्रह्मरन्ध्र में निवास करता है, इस प्रकार से बुद्धिमान् मनुष्य को जानना चाहिए ॥ २१ ॥ यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह। आनन्दमेतज्जीवस्य यं ज्ञात्वा मुच्यते बुधः ॥२२ ॥ जहाँ मनुष्य की वाक्शक्ति एवं एकादश इन्द्रिय मन नहीं पहुँच सकते, वहाँ पर उस आत्मा के आनन्द को जान करके बुद्धिमान् मनुष्य मुक्त हो जाते हैं ॥ २२ ॥ सर्वव्यापिनमात्मानं क्षीरे सर्पिरिवान्वितम्। आत्मविद्यातपोमूलं तद्ब्रह्मोपनिषत्पदं तद्ब्रह्मोपनिषत्पदमिति ॥ २३ ॥ दुग्ध में घृत के सदृश सर्वत्र विद्यमान आत्म तत्त्व, आत्म-विद्या एवं तप के द्वारा ही प्राप्त होता है। यह आत्मा ही स्वयं ब्रह्म है और यही उपनिषदों का परम पद (परब्रह्म) है॥ २३॥ सह नाववतु .........................इति शान्तिः ॥ ॥ इति ब्रह्मोपनिषत्समाप्ता ॥
॥ भिक्षुकोपनिषद् ॥ यह शुक्ल यजुर्वेदीय उपनिषद् है। इसमें आत्मकल्याण एवं लोक कल्याण हेतु भिक्षाचर्या द्वारा जीवनयापन करने वाले संन्यास धर्म का संक्षिप्त किन्तु प्रभावपूर्ण वर्णन किया गया है। सर्वप्रथम कुटीचक, बहूदक, हंस एवं परमहंस नामक संन्यासियों के उदाहरण देकर उनके आहार-विहार, शिखा-सूत्र, वस्त्रादि का उल्लेख किया गया है। अन्त में परमहंस संन्यास के विषय में अपेक्षाकृत विस्तृत वर्णन किया गया है, जिसके द्वारा परमहंस संन्यास की महनीय महिमा एवं उसके कठोर अनुशासन का पता चलता है। कलेवर की दृष्टि से यह उपनिषद् कुल पाँच मन्त्रों की अति लघुकाय स्वरूप वाली है, परन्तु महत्त्व की दृष्टि से अत्यधिक श्रेष्ठ मानी जाती है। ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ पूर्णमदः..................... इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य-अध्यात्मोपनिषद्) ॐ अथ भिक्षूणां मोक्षार्थिनां कुटीचकबहूदकहंसपरमहंसाश्चेति चत्वारः ॥ १ ॥ मोक्षार्थी भिक्षुओं की चार श्रेणियाँ होती हैं-कुटीचक, बहूदक, हंस और परमहंस ॥ १ ॥ [ यहाँ मोक्षार्थी भिक्षुओं के बारे में अनुशासन में बताये जा रहे हैं। भोगार्थी-स्वार्थी भिक्षु वे, जो अपनी असमर्थता के कारण भिक्षा माँगते हैं। मोक्षार्थी समर्थ होते हुए भी लौकिक बन्धनों से ऊपर उठने के क्रम में भिक्षाजीवी बनते हैं। ] कुटीचका नाम गौतमभरद्वाजयाज्ञवल्क्यवसिष्ठप्रभृतयोऽष्टौ ग्रासांश्चरन्तो योगमार्गे मोक्षमेव प्रार्थयन्ते ॥ २ ॥ कुटीचक-भिक्षु गौतम, भरद्वाज, याज्ञवल्क्य और वसिष्ठ आदि के समान अष्टग्रास भोजन लेकर योगमार्ग में (योग के माध्यम से) मोक्ष के लिए प्रयत्न करते हैं ॥ २ ॥ [ मात्र शरीर रक्षा के लिए न्यूनतम भोजन का एक प्रमाण अष्टग्रास माना गया है। एक ग्रास उतना अंश माना जा सकता है, जिसे एक साथ मुख में रखकर चबाया जा सके। ऐसे आठ ग्रास खाकर शरीर रक्षा की जा सकती है, ऐसा अनुभव करके यह नियम बनाया गया प्रतीत होता है। ] अथ बहूदका नाम त्रिदण्डकमण्डलुशिखायज्ञोपवीतकाषायवस्त्रधारिणो ब्रह्मर्षिगृहे मधुमांसं वर्जयित्वाऽष्टौ ग्रासान्भैक्षाचरणं कृत्वा योगमार्गे मोक्षमेव प्रार्थयन्ते ॥ ३ ॥ बहूदक-भिक्षु त्रिदण्ड, कमण्डलु, शिखा, यज्ञोपवीत और काषाय वस्त्र धारण करते हैं तथा मधु-मांस को छोड़कर ब्रह्मर्षि (किसी सदाचारी नैष्ठिक) के घर में भिक्षाचरण द्वारा आठ ग्रास भोजन ग्रहण करते हुए योगमार्ग द्वारा मोक्षानुसंधान करते हैं ॥ ३ ॥ अथ हंसा नाम ग्राम एकरात्रं नगरे पञ्चरात्रं क्षेत्रे सप्तरात्रं तदुपरि न वसेयुः। गोमूत्रगोमयाहारिणो नित्यं चान्द्रायणपरायणा योगमार्गे मोक्षमेव प्रार्थयन्ते ॥ ४ ॥ हंस नामक-भिक्षु किसी गाँव में एक रात्रि, नगर में पंचरात्रि तथा (तीर्थ) क्षेत्र में सात रात्रि से अधिक निवास नहीं करते। वे गोमूत्र और गोमय (गोबर) का आहार ग्रहण करते हुए नित्य चान्द्रायण व्रत परायण होकर योग मार्ग से मोक्ष की खोज करते हैं ॥ ४ ॥
[Page Header] २२८ भिक्षुकोपनिषद्
[ यहाँ गोमूत्र और गोमय को अन्तःकरण शोधन के उद्देश्य से आहार रूप में-पंचगव्य आदि के रूप में ग्रहण करने का विधान प्रस्तुत किया गया है।] अथ परमहंसा नाम संवर्तकारुणिश्वेतकेतुजडभरतदत्तात्रेयशुकवामदेवहारीतक- प्रभृतयोऽष्टौ ग्रासांश्चरन्तो योगमार्गे मोक्षमेव प्रार्थयन्ते। वृक्षमूले शून्यगृहे श्मशानवासिनो वा साम्बरा वा दिगम्बरा वा। न तेषां धर्माधर्मौ लाभालाभौ शुद्धाशुद्धौ द्वैतवर्जिता समलोष्टाश्म- काञ्चनाः सर्ववर्णेषु भैक्षाचरणं कृत्वा सर्वत्रात्मैवेति पश्यन्ति। अथ जातरूपधरा निर्द्वन्द्वा निष्परिग्रहाः शुक्लध्यानपरायणा आत्मनिष्ठाः प्राणसंधारणार्थं यथोक्तकाले भैक्षमाचरन्तः शून्यागारदेवगृहतृणकूट वल्मीकवृक्षमूलकुलालशालाग्निहोत्रशालानदीपुलिनगिरिकन्दर- कुहरकोटरनिर्झरस्थण्डिले तत्र ब्रह्ममार्गे सम्यक्संपन्नाः शुद्धमानसाः परमहंसाचरणेन संन्यासेन देहत्यागं कुर्वन्ति ते परमहंसा नामेत्युपनिषत् ॥ ५॥ परमहंस नामक भिक्षु संवर्तक, आरुणि, श्वेतकेतु, जड़भरत, दत्तात्रेय, शुकदेव, वामदेव और हारीतक आदि की तरह अष्टग्रास भोजन ग्रहण करके योगमार्ग में विचरण करते हुए मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। परमहंसों का निवास स्थान वृक्षमूल, शून्यगृह अथवा श्मशान होता है। वे वस्त्रयुक्त (साम्बर) अथवा दिगम्बर होते हैं। उनके लिए धर्म-अधर्म, लाभ-अलाभ कुछ नहीं होता। वे शुद्ध और अशुद्ध द्वैत के सन्दर्भ में कोई अभिमत नहीं रखते। वे मिट्टी, पत्थर और सोने में कोई भेद नहीं करते अर्थात् उनके लिए ये सभी समान हैं। सभी वर्गों में वे भिक्षाचरण करते हैं एवं सर्वत्र अपनी आत्मा का ही दर्शन करते हैं। वे जातरूप धर (पैदा हुए बालक की तरह निर्लिप्त, निर्विकार, शुचि-अशुचि भाव से परे) होते हैं। वे (परमहंस) निर्द्वन्द्व, परिग्रहरहित, शुक्ल-ध्यान परायण, आत्मनिष्ठ, जीवन धारण करने की इच्छा से यथोक्त काल में भिक्षाटन करने वाले, एकान्त घर, देवस्थल, झोपड़ी, वल्मीक(बाँबी), वृक्षमूल, कुलालशाला (कुम्भकार गृह), यज्ञशाला, नदीतट, पर्वत स्थित गुहा, टीला, गढ्ढा, झरना आदि किसी भी स्थल पर निवास करते हैं। वहाँ निवास करते हुए वे भली प्रकार (आत्मिक विभूतियों से) सम्पन्न होकर शुद्ध मन से परमहंस वृत्ति का पालन करते हुए संन्यास द्वारा शरीर त्याग करते हैं। वे (ऐसा करने वाले) परमहंस (कहलाते) हैं-ऐसा इस उपनिषद् का अभिमत है ॥ ५ ॥
ॐ पूर्णमदः ...................... इति शान्तिः ॥ ॥ इति भिक्षुकोपनिषत्समाप्ता ॥
॥ मण्डलब्राह्मणोपनिषद् ॥
॥ मण्डलब्राह्मणोपनिषद् ॥ यह उपनिषद् शुक्ल यजुर्वेद से सम्बद्ध है। इसमें कुल पाँच ब्राह्मण हैं, जिसमें महर्षि याज्ञवल्क्य एवं भगवान् सूर्य नारायण के प्रश्नोत्तर रूप में 'आत्मतत्त्व' का विशद विवेचन हुआ है। प्रथम ब्राह्मण में सर्वप्रथम तत्त्वज्ञान की प्राप्ति के लिए अष्टांग योग की आवश्यकता और पुनः चार यम, नौ नियम, आसन, प्राणायामादि षडंग योग, देह के पंच दोष, तारक दर्शन, लक्ष्यत्रय दर्शन, तारक और अमनस्क रूप योग के दो भेद, आत्मनिष्ठ की ब्रह्मरूपता आदि का विस्तृत वर्णन किया गया है। द्वितीय ब्राह्मण में सर्वाधाररूप ज्योति का आत्मतत्त्व के रूप में वर्णन किया गया है, साथ ही ज्योति रूप आत्मा के ज्ञान का फल, शाम्भवी मुद्रा, पूर्णिमा दृष्टि, मुद्रा की सिद्धि और उसके लक्षण, प्रणवरूप आत्म प्रकाश का अनुभव, षण्मुखी मुद्रा से प्रणव की सिद्धि, प्रणवविद् पर कर्म का अप्रभाव, उन्मनी अवस्था से अमनस्क स्थिति की प्राप्ति, ब्रह्मानुसन्धान से कैवल्य की प्राप्ति, ब्रह्मविद् का स्वरूप, सुषुप्ति और समाधि में भेद, ब्रह्म का ब्रह्म रूप होना, जाग्रत् आदि पंच-अवस्था, संसार से पार होने का मार्ग, मन ही बन्ध-मोक्ष का कारण, निर्विकल्पक समाधि के अभ्यास से श्रेष्ठ ब्रह्मविद् होना और ब्रह्मानन्द की प्राप्ति आदि का विशद विवेचन है। तृतीय ब्राह्मण में परमात्मज्ञान एवं लक्ष्य दर्शन से अमनस्कता की प्राप्ति और उससे संसार बन्धन से निवृत्ति, तारक मार्ग से मनोनाश की प्राप्ति, उन्मनी सिद्ध योगी का ब्रह्मरूप होना आदि वर्णित है। चतुर्थ ब्राह्मण में व्योम पंचक का ज्ञान और उसका प्रतिफल तथा राजयोग का सारांश विवेचित है। पंचम ब्राह्मण में, परमात्मा में मन को लीन करने का अभ्यास, अमनस्क अवस्था के अभ्यास से ब्रह्म स्थिति की प्राप्ति, अमनस्कसिद्ध पुरुष की महिमा आदि का वर्णन है। ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ पूर्णमदः ............ इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य-अध्यात्मोपनिषद् ) ॥ प्रथमं ब्राह्मणम् ॥ ॥ प्रथमः खण्डः ॥ याज्ञवल्क्यो ह वै महामुनिरादित्यलोकं जगाम । तमादित्यं नत्वा भो भगवन्नादित्यात्मतत्त्वमनुब्रूहीति ॥ १ ॥ महामुनि याज्ञवल्क्य (एकबार) आदित्यलोक में गये और वहाँ भगवान् आदित्य को प्रणाम करके कहा-हे भगवन् आदित्य ! आप हमें आत्म तत्त्व का उपदेश प्रदान करें ॥ १ ॥ स होवाच नारायणः । ज्ञानयुक्तयमाद्यष्टाङ्गयोग उच्यते ॥ २ ॥ तब सूर्यनारायण ने कहा- तत्त्वज्ञान सहित यम-नियम आदि को अष्टाङ्ग योग कहा जाता है ॥ २ ॥ शीतोष्णाहारनिद्राविजयः सर्वदा शान्तिर्निश्चलत्वं विषयेन्द्रियनिग्रहश्चैते यमाः ॥ ३ ॥ सर्दी-गर्मी, आहार एवं निद्रा पर विजय प्राप्त करना, सर्वदा शान्त रहना और निश्चल होकर इन्द्रियों पर नियन्त्रण रखना, ये सभी यम हैं ॥ ३ ॥ गुरुभक्तिः सत्यमार्गानुरक्तिः सुखागतवस्त्वनुभवश्च तद्वस्त्वनुभवेन । तुष्टिर्निःसङ्गता एकान्तवासो मनोनिवृत्तिः फलानभिलाषो वैराग्यभावश्च नियमाः ॥ ४ ॥
२३० मण्डलब्राह्मणोपनिषद्
२३० मण्डलब्राह्मणोपनिषद् गुरु भक्ति, सत्य मार्ग में अनुरक्ति, यथालाभ-सन्तोष, एकान्त निवास, अनासक्ति, मनोनिवृत्ति, फल की इच्छा न करना और वैराग्य भाव-ये सभी नियम हैं ॥ ४ ॥ सुखासनवृत्तिश्चिरवासश्चैवमासननियमो भवति ॥ ५ ॥ सुखासन वृत्ति (सुखपूर्वक एक वृत्ति में दीर्घकाल तक स्थित रहना) और चिरनिवास (बिना प्रयास के चिरकाल तक एक स्थिति में रहना) - ये आसन के नियम हैं ॥ ५ ॥ पूरककुम्भकरेचकैः षोडशचतुःषष्टिद्वात्रिंशत्संख्यया यथाक्रमं प्राणायामः ॥ ६ ॥ षोडश मात्राओं द्वारा पूरक, चौंसठ मात्राओं द्वारा कुम्भक और बत्तीस मात्राओं द्वारा रेचक करने को प्राणायाम कहते हैं ॥ ६ ॥ विषयेभ्य इन्द्रियार्थेभ्यो मनोनिरोधनं प्रत्याहारः ॥ ७ ॥ इन्द्रियों के विषयों से मन का निरोध करना प्रत्याहार कहलाता है ॥ ७ ॥ विषयव्यावर्तनपूर्वकं चैतन्ये चेतःस्थापनं धारणं भवति ॥ ८ ॥ विषयों से निरोधित मन को चैतन्य सत्ता में स्थित करना धारणा है ॥ ८ ॥ सर्वशरीरेषु चैतन्यैकतानता ध्यानम् ॥ ९ ॥ ध्यानविस्मृतिः समाधिः ॥ १० ॥ सभी शरीरों में एक ही चैतन्य तत्त्व विद्यमान है, इसी एकतानता (निरन्तर चिन्तन) को ध्यान कहा गया है और ध्यान को भी विस्मृत कर देना (भूल जाना) समाधि है ॥ ९-१० ॥ एवं सूक्ष्माङ्गानि । य एवं वेद स मुक्तिभागभवति ॥ ११ ॥ इस प्रकार ये सभी सूक्ष्म अङ्ग हैं, जो इन्हें इस प्रकार जानता है, वह मुक्ति का अधिकारी होता है ॥११ ॥ ॥ द्वितीयः खण्डः ॥ देहस्य पञ्च दोषा भवन्ति कामक्रोधनिःश्वासभयनिद्राः ॥ १ ॥ इस शरीर के काम, क्रोध, निःश्वास (श्वासावरोध), भय और निद्रा (अज्ञान-निद्रा) - ये पाँच दोष होते हैं ॥१ तन्निरासस्तु निःसंकल्पक्षमाल्पाहाराप्रमादतातत्त्वसेवनम् ॥ २ ॥ संकल्परहित होना, क्षमाशील होना, अल्पाहार करना, निर्भय होना और तत्त्व चिन्तन करना, ये उपर्युक्त (शरीर के ) दोषों को दूर करने के साधन हैं ॥ २ ॥ निद्राभयसरीसृपं हिंसादितरङ्गं तृष्णावर्तं दारपङ्कं संसारवार्धिं तरीतुं सूक्ष्ममार्गमवलम्ब्य सत्त्वादिगुणानतिक्रम्य तारकमवलोकयेत् ॥ ३ ॥ निद्रा (अज्ञान-निद्रा) और भय सर्प हैं, हिंसा आदि तरंगें हैं, तृष्णा भँवर है, स्त्री पङ्क है (स्त्री के प्रति भोग्याभाव कीचड़ है) - ऐसे संसार रूपी सागर से पार जाने के लिए सूक्ष्म मार्ग का अवलम्बन लेकर सत्त्व आदि गुणों से परे (ऊपर) होकर तारक ब्रह्म का दर्शन करना चाहिए (उसका ध्यान करना चाहिए) ॥ ३ ॥ भ्रूमध्ये सच्चिदानन्दतेजःकूटरूपं तारकं ब्रह्म ॥ ४ ॥ दोनों भौंहों के मध्य में सच्चिदानन्द स्वरूप, तेजः-सम्पन्न, कूट रूप तारक ब्रह्म का निवास है ॥ ४ ॥ तदुपायं लक्ष्यत्रयावलोकनम् ॥ ५ ॥ उस (तारक ब्रह्म) की प्राप्ति के उपायों में लक्ष्यत्रय का अवलोकन करना चाहिए ॥ ५ ॥
ब्राह्मण १ खण्ड २ मन्त्र १४ २३१
ब्राह्मण १ खण्ड २ मन्त्र १४ २३१ मूलाधारादारभ्य ब्रह्मरन्ध्रपर्यन्तं सुषुम्ना सूर्याभा। तन्मध्ये तडित्कोटिसमा मृणालतन्तु- सूक्ष्मा कुण्डलिनी। तत्र तमोनिवृत्तिः। तद्दर्शनात्सर्वपापनिवृत्तिः॥ ६॥ मूलाधार से ब्रह्मरन्ध्र पर्यन्त सूर्य के समान आभा वाली सुषुम्ना नामक नाड़ी है। उसके बीच में उससे कोटिगुनी मृणाल तन्तु जितनी सूक्ष्म कुण्डलिनी है। वहाँ (उसके ज्ञान से) तमोगुण की निवृत्ति होती है। उसके दर्शन से समस्त पाप विनष्ट होते हैं॥ ६॥ तर्जन्यग्रोन्मीलितकर्णरन्ध्रद्वये फूत्कारशब्दो जायते। तत्र स्थिते मनसि चक्षुर्मध्यनीलज्योतिः पश्यति। एवं हृदयेऽपि॥ ७॥ तर्जनी अँगुली के अग्रभाग से दोनों कानों को बन्द करने पर उस (साधक) के कर्णछिद्रों से फूत्कार शब्द होता है। जब उस शब्द में मन को स्थिर किया जाता है, तब नेत्रों के मध्य में नीलवर्ण ज्योति का दर्शन होता है। इसी प्रकार हृदय में भी (वही ज्योति) दिखाई पड़ती है॥ ७॥ बहिर्लक्ष्यं तु नासाग्रे चतुःषडष्टदशद्वादशाङ्गुलीभिः क्रमान्नीलद्युतिश्यामत्वसद्रक्त- भङ्गीस्फुरत्पीतवर्णद्वयोपेतं व्योमत्वं पश्यति स तु योगी॥ ८॥ बाह्य लक्ष्य यह है कि (जिसे) नासिका के अग्रभाग से चार, छः, आठ, दस और बारह अंगुल की दूरी पर क्रम से नीलवर्ण, श्यामवर्ण, रक्तवर्ण, पीतवर्ण और दो रंगों के मिश्रित रंग युक्त आकाश दिखाई पड़ता है, वह योगी हो जाता है॥ ८॥ चलनदृष्ट्या व्योमभागवीक्षितुः पुरुषस्य दृष्ट्यग्रे ज्योतिर्मयूखा वर्तन्ते। तद्दृष्टिः स्थिरा भवति॥९ चल दृष्टि (चञ्चल दृष्टि) से व्योम भाग को देखते हुए पुरुष की दृष्टि के अग्रभाग में ज्योति युक्त किरणें दिखाई पड़ती हैं, उससे दृष्टि में स्थिरत्व आ जाता है॥ ९॥ शीर्षोपरि द्वादशाङ्गुलिमानं ज्योतिः पश्यति तदाऽमृतत्वमेति॥ १०॥ शीर्ष (मस्तिष्क) के ऊपर द्वादशाङ्गुल की दूरी पर ज्योति दिखाई पड़ती है। उसे देखने वाले को अमरत्व प्राप्त हो जाता है॥ १०॥ मध्यलक्ष्यं तु प्रातश्चित्रादिवर्णसूर्यचन्द्रवह्निज्वाला वलीवत्तद्विहीनान्तरिक्षवत्पश्यति॥ ११॥ तदाकाराकारी भवति॥ १२॥ मध्य लक्ष्य इस प्रकार है कि प्रातःकालीन वेला में सूर्य, चन्द्र और अग्नि ज्वालवत् और उससे विहीन अन्तरिक्षवत् दिखाई देता है। उसके आकार की तरह ही आकार वाला हो जाता है॥ ११-१२॥ अभ्यासान्निर्विकारं गुणरहिताकाशं भवति। विस्फुरत्तारकाकारगाढतमोपमं पराकाशं भवति। कालानलसमं द्योतमानं महाकाशं भवति। सर्वोत्कृष्टपरमाद्वितीयप्रद्योतमानं तत्त्वाकाशं भवति। कोटिसूर्यप्रकाशसंकाशं सूर्याकाशं भवति॥ १३॥ अभ्यास के द्वारा वह विकाररहित, त्रिगुणातीत आकाश रूप होता है। अत्यंत प्रगाढ़ प्रकाशयुक्त तारों के समान पराकाश होता है। कालाग्नि के समान प्रकाशमान महाकाश होता है। सर्वोत्कृष्ट परम अद्वितीय और विशिष्ट रूप से द्योतमान प्रकाश तत्त्वाकाश होता है। करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाशमान सूर्याकाश होता है॥ एवमभ्यासात्तन्मयो भवति य एवं वेद॥ १४॥ जो इस तथ्य को इस प्रकार जानता है, वह अभ्यासपूर्वक तन्मय हो जाता है॥ १४॥
२३२ मण्डलब्राह्मणोपनिषद्
२३२ मण्डलब्राह्मणोपनिषद् ॥ तृतीयः खण्डः ॥ तद्योगं च द्विधा विद्धि पूर्वोत्तरविभागतः । पूर्वं तु तारकं विद्यादमनस्कं तदुत्तरमिति। तारकं द्विविधम् मूर्त्तितारकममूर्त्तितारकमिति। यदिन्द्रियान्तं तन्मूर्त्तितारकम्। यद्भ्रूयुगातीतं तदमूर्त्तितारकमिति ॥ १ ॥ उस योग के दो विभाग हैं। एक पूर्व तथा दूसरा उत्तर। पूर्व विभाग को तारक ब्रह्म कहते हैं और उत्तर विभाग को अमनस्क कहते हैं। तारक ब्रह्म के भी दो प्रकार हैं-एक मूर्त्तितारक और दूसरा अमूर्ति तारक। जो इन्द्रियों तक सीमित है, वह मूर्त्तितारक है, जो दोनों भौंहों से परे- आगे है, वह अमूर्त्तितारक है ॥ १ ॥ उभयमपि मनोयुक्तमभ्यसेत् । मनोयुक्तान्तरदृष्टिस्तारकप्रकाशाय भवति ॥ २ ॥ इन दोनों (मूर्त्तितारक और अमूर्त्तितारक) का मनयुक्त (मनोयोग पूर्वक) होकर अभ्यास करना चाहिए; क्योंकि मनयुक्त अन्तर्दृष्टि तारक ब्रह्म को प्रकट करने में सक्षम होती है ॥ २ ॥ भ्रूयुगमध्यबिले तेजस आविर्भावः। एतत्पूर्वतारकम् ॥ ३ ॥ इसके बाद भ्रूयुगल के मध्य स्थित छिद्र में तेज आविर्भूत होता है। यह पूर्व तारक ब्रह्म है ॥ ३ ॥ उत्तरं त्वमनस्कम्। तालुमूलोर्ध्वभागे महज्ज्योतिर्विद्यते । तद्दर्शनादणिमादिसिद्धिः ॥ ४ ॥ उत्तर विभाग तो अमनस्क (मनरहित) होता है। तालुमूल के ऊर्ध्व भाग में महाज्योति का निवास होता है। उसके दर्शन से अणिमा आदि सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं ॥ ४ ॥ लक्ष्येऽन्तर्बाह्यायां दृष्टौ निमेषोन्मेषवर्जितायां चेयं शाम्भवी मुद्रा भवति। सर्वतन्त्रेषु गोप्यमहाविद्या भवति । तज्ज्ञानेन संसारनिवृत्तिः। तत्पूजनं मोक्षफलदम् ॥ ५ ॥ जब लक्ष्य में अन्तः-बाह्य दृष्टि निर्निमेष (स्थिर) हो जाती है, तो यह शाम्भवी मुद्रा होती है। समस्त तन्त्रों में गोपनीय यह ब्रह्म विद्या है। उसके ज्ञान से संसार से निवृत्ति हो जाती है, उसका पूजन मोक्षरूपी फल प्रदान करता है ॥ ५ ॥ अन्तर्लक्ष्यं जलज्ज्योतिःस्वरूपं भवति । महर्षिवेद्यं अन्तर्बाह्येन्द्रियैरदृश्यम् ॥ ६ ॥ अन्तर्लक्ष्य दीप्तिमान् ज्योति के समान है, इसे महर्षिगण ही जान सकते हैं। यह बाह्य और आन्तरिक इन्द्रियों (नेत्रों-मन आदि) के द्वारा अगोचर है ॥ ६ ॥ ॥ चतुर्थः खण्डः ॥ सहस्रारे जलज्ज्योतिरन्तर्लक्ष्यम्। बुद्धिगुहायां सर्वाङ्गसुन्दरं पुरुषरूपमन्तर्लक्ष्यमित्यपरे । शीर्षान्तर्गतमण्डलमध्यगं पञ्चवक्त्रमुमासहायं नीलकण्ठं प्रशान्तमन्तर्लक्ष्यमिति केचित् । अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तर्लक्ष्यमित्येके ॥ १ ॥ सहस्रार दल में दीप्तिमान् ज्योति के समान अन्तर्लक्ष्य है। कुछ अन्य लोग ऐसा मानते हैं कि बुद्धि रूपी गुहा में सर्वाङ्ग सुन्दर पुरुष का रूप अन्तर्लक्ष्य है। कितने ही ऐसा मानते हैं कि शीर्ष के अन्तर्गत स्थित मण्डल के मध्य पाँच मुख वाले और उमा सहित नीलकण्ठ भगवान् शंकर का प्रशान्त रूप भी अन्तर्लक्ष्य है। अङ्गुष्ठ मात्र पुरुष ही अन्तर्लक्ष्य है, ऐसा भी कितने ही विद्वान् मानते हैं ॥ १ ॥
ब्राह्मण २ खण्ड १ मन्त्र ५ [Right-aligned: २३३]
ब्राह्मण २ खण्ड १ मन्त्र ५ [Right-aligned: २३३] उक्तविकल्पं सर्वमात्मैव। तल्लक्ष्यं शुद्धात्मदृष्ट्या वा यः पश्यति स एव ब्रह्मनिष्ठो भवति॥ २॥ उपर्युक्त सभी विकल्प (विभेद) आत्मा के ही हैं। उस लक्ष्य (अन्तर्लक्ष्य) को जो शुद्ध आत्म-दृष्टि से देखता है, वह ब्रह्मनिष्ठ हो जाता है॥२॥ जीवः पञ्चविंशकः स्वकल्पितचतुर्विंशतितत्त्वं परित्यज्य षड्विंशः परमात्माहमिति निश्चयाज्जीवन्मुक्तो भवति ॥ ३॥ जीव पच्चीसवाँ तत्त्व है। स्वकल्पित चौबीस तत्त्वों को त्यागकर छब्बीसवाँ मैं स्वयं परमात्मा हूँ, जब वह ऐसा निश्चय करता है, तो इस निश्चय से वह जीवन्मुक्त हो जाता है ॥ ३ ॥ एवमन्तर्लक्ष्यदर्शनेन जीवन्मुक्तिदशायां स्वयमन्तर्लक्ष्यो भूत्वा परमाकाशाखण्ड- मण्डलो भवति ॥ ४॥ इस प्रकार अन्तर्लक्ष्य का दर्शन प्राप्त कर लेने से वह (जीव) जीवन्मुक्त की ओर अग्रसर होते हुए स्वयं अन्तर्लक्ष्य होकर परम आकाशस्वरूप अखण्ड मण्डल हो जाता है ॥ ४ ॥ ॥ द्वितीयं ब्राह्मणम्॥ ॥ प्रथमः खण्डः॥ अथ ह याज्ञवल्क्य आदित्यमण्डलपुरुषं पप्रच्छ। भगवन्नन्तर्लक्ष्यादिकं बहुधोक्तम्। मया तन्न ज्ञातम्। तद्ब्रूहि मह्यम्॥ १॥ इसके पश्चात् ऋषि याज्ञवल्क्य ने आदित्य मण्डल में स्थित पुरुष से प्रश्न किया-भगवन् ! अन्तर्लक्ष्य आदि के विषय में बहुत कुछ कहा गया। उसे मैं नहीं समझ सका। उसे अब आप स्वयं ही मुझे समझाएँ ॥१॥ तदु होवाच पञ्चभूतकारणं तडित्कूटाभं तद्वच्चतुःपीठम्। तन्मध्ये तत्त्वप्रकाशो भवति। सोऽतिगूढ अव्यक्तश्च ॥ २॥ (यह सुनकर) सूर्यनारायण ने कहा-पञ्चभूतों का आदिकारण विद्युत् पुंज के समान है, उसमें एक चतुःपीठ है, जिसके बीच में तत्त्व का प्रकाश होता है, वह प्रकाश अतिगूढ़ और अव्यक्त है ॥ २ ॥ तज्ज्ञानप्लवाधिरूढेन ज्ञेयम्। तद्वाह्याभ्यन्तरंलक्ष्यम्॥ ३॥ वह (अव्यक्त प्रकाश) ज्ञानरूपी प्लव (नौका) में आरूढ़ व्यक्ति के लिए जानने योग्य है। वह बाह्य और आभ्यन्तर लक्ष्य है॥ ३॥ तन्मध्ये जगल्लीनम्। तन्नादबिन्दुकलातीतमखण्डमण्डलम्। तत्सगुणनिर्गुणस्वरूपम्। तद्वेत्ता विमुक्तः ॥ ४॥ उसी के मध्य जगत् लीन हो जाता है। वह नाद, बिन्दु और कला से परे अखण्ड मण्डल है। वह सगुण और निर्गुण स्वरूप है। उसको जानने वाला विमुक्त हो जाता है॥ ४॥ आदावग्निमण्डलम्। तदुपरि सूर्यमण्डलम्। तन्मध्ये सुधाचन्द्रमण्डलम्। तन्मध्येऽखण्ड- ब्रह्मतेजो मण्डलम्। तद्विद्युल्लेखावच्छुक्लभास्वरम्। तदेव शाम्भवीलक्षणम् ॥ ५॥
२३४ मण्डलब्राह्मणोपनिषद्
२३४ मण्डलब्राह्मणोपनिषद् सर्वप्रथम अग्नि मण्डल है। उसके ऊपर सूर्य मण्डल है। उसके बीच में सुधा स्वरूप चन्द्र मण्डल है। उसके बीच में अखण्ड ब्रह्म का तेजोमण्डल है। वह विद्युत् रेखावत् श्वेत और प्रकाशमान है। वही शाम्भवी मुद्रा का लक्षण है॥ ५॥ तद्दर्शने तिस्रो दृष्टयः अमा प्रतिपत् पूर्णिमा चेति। निमीलितदर्शनममादृष्टिः। अर्धोन्मीलितं प्रतिपत्। सर्वोन्मीलनं पूर्णिमा भवति। तासु पूर्णिमाभ्यासः कर्तव्यः ॥ ६॥ उसका दर्शन करने से तीन स्वरूप दृष्टि में आते हैं। ये रूप-अमावस्या, प्रतिपदा और पूर्णिमा रूप हैं। निमीलित (पलक बन्द होने की स्थिति) दृष्टि अमावस्या स्वरूप है, अर्धनिमीलित दृष्टि प्रतिपदा स्वरूप है और पूरी तरह खुली हुई दृष्टि पूर्णिमा स्वरूप है। इसलिए पूर्णिमा रूप दृष्टि का ही अभ्यास करना चाहिए॥ ६॥ तल्लक्ष्यं नासाग्रम्। यदा तालुमूले गाढतमो दृश्यते। तदभ्यासादखण्डमण्डलाकार- ज्योतिर्दृश्यते। तदेव सच्चिदानन्दं ब्रह्म भवति॥ ७॥ उस (पूर्णिमारूप दृष्टि) का लक्ष्य नासिकाग्र है। जिस समय तालुमूल में प्रगाढ़ अन्धकार के दर्शन होते हैं, उस समय अभ्यास के द्वारा अखण्ड मण्डलाकार ज्योति दिखाई देती है। वही सच्चिदानन्द ब्रह्म है॥ ७॥ एवं सहजानन्दे यदा मनो लीयते तदा शाम्भवी भवति। तामेव खेचरीमाहुः॥ ८॥ इस प्रकार जब सहजानन्द में मन लीन हो जाता है, तब शाम्भवी मुद्रा (सिद्ध) होती है और उसे ही खेचरी मुद्रा कहते हैं॥ ८॥ तदभ्यासान्मनःस्थैर्यम्। ततो बुद्धिस्थैर्यम्॥ ९॥ उसके अभ्यास से मन स्थिर हो जाता है, तत्पश्चात् बुद्धि स्थिर होती है॥ ९॥ तच्चिह्नानि आदौ तारकवद्दृश्यते। ततो वज्रदर्पणम्। तत उपरि पूर्णचन्द्रमण्डलम्। ततो नवरत्न प्रभामण्डलम्। ततो मध्याह्नार्कमण्डलम्। ततो वह्निशिखामण्डलं क्रमाद्दृश्यते॥ उसके चिह्न इस प्रकार हैं- सर्वप्रथम तारा के समान दिखाई देता है, तत्पश्चात् वज्र दर्पण (अर्थात् हीरे का दर्पण) जैसा दिखाई देता है, इसके पश्चात् पूर्ण चन्द्र मण्डल दिखाई देता है, इसके बाद नवरत्न प्रभा का मण्डल दृश्यमान होता है, इसके बाद मध्याह्न का सूर्य मण्डल परिलक्षित होता है, तत्पश्चात् क्रमशः अग्निशिखा मण्डल दिखाई देता है॥ १०॥ ॥ द्वितीयः खण्डः॥ तदा पश्चिमाभिमुखप्रकाशः स्फटिकधूम्रबिन्दुनादकलानक्षत्रखद्योतदीपनेत्रसुवर्ण- नवरत्नादिप्रभा दृश्यन्ते। तदेव प्रणवस्वरूपम्॥ १॥ उस समय वह पश्चिमाभिमुख (आन्तरिक) प्रकाश दृष्टिगोचर होता है, जिसकी आभा धूम्र वर्णिक स्फटिकमणि तुल्य, बिन्दु (मनस्तत्त्व), नाद (बुद्धि तत्त्व), कला (महत्तत्त्व), नक्षत्र, खद्योत (जुगनू), दीप, नेत्र, सुवर्ण और नवरत्न आदि जैसी होती है। वही प्रणव (ॐ) का स्वरूप है॥ १॥ प्राणापानयोरैक्यं कृत्वा धृतकुम्भको नासाग्रदर्शनदृढभावनया द्विकराङ्गुलिभिः षण्मु- खीकरणेन प्रणवध्वनिं निशम्य मनस्तत्र लीनं भवति॥ २॥
ब्राह्मण २ खण्ड ३ मन्त्र २ २३५
ब्राह्मण २ खण्ड ३ मन्त्र २ २३५ प्राण और अपान वायु को एक करके कुम्भक धारण करे, तत्पश्चात् नासिकाग्र पर दृष्टि को एकाग्र करके दृढ़ भावना से करद्वय (दोनों हाथों) की अँगुलियों से षण्मुखी मुद्रा धारण करके ‘प्रणव’ (ॐ) नाद का श्रवण करे, इसमें मन लीन हो जाता है ॥ २ ॥ तस्य न कर्मलेपः। रवेरुदयास्तमयोः किल कर्म कर्तव्यम्। एवंविधश्चिदादित्यस्यो- दयास्तमयाभावात्सर्वकर्माभावः ॥ ३ ॥ ऐसा अभ्यास करने वाले को कर्म लिप्त नहीं करते। रवि के उदय और अस्त के समय (प्रातः-सायं) कर्म (धर्मकृत्य) सम्पन्न किये जाते हैं, किन्तु चिदादित्य (चैतन्य स्वरूप आदित्य) का तो उदय-अस्त होता ही नहीं, इसलिए उसे जानने (अथवा दर्शन करने) वाले के लिए कोई कर्म शेष नहीं रहते ॥ ३॥ शब्दकाललयेन दिवारात्र्यतीतो भूत्वा सर्वपरिपूर्णज्ञानेनोन्मन्यवस्थावशेन ब्रह्मैक्यं भवति। उन्मन्या अमनस्कं भवति ॥ ४ ॥ शब्द और काल के लय हो जाने से मनुष्य दिवा और रात्रि से अतीत होकर सभी का परिपूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लेता है, जिसके द्वारा उन्मनी अवस्था प्राप्त होती है और ब्रह्म के साथ एकत्व हो जाता है। उन्मनी अवस्था से व्यक्ति अमनस्क हो जाता है ॥ ४॥ तस्य निश्चिन्ता ध्यानम्। सर्वकर्मनिराकरणमावाहनम्। निश्चयज्ञानमासनम्। उन्मनीभावः पाद्यम्। सदाऽमनस्कमर्घ्यम्। सदादीप्तिरपारामृतवृत्तिः स्नानम्। सर्वत्र भावना गन्धः। दृक्स्वरूपावस्थानमक्षताः। चिदाप्तिः पुष्पम्। चिदग्निस্বরূপं धूपः। चिदादित्यस्वरूपं दीपः। परिपूर्णचन्द्रामृतरसस्यैकीकरणं नैवेद्यम्। निश्चलत्वं प्रदक्षिणम्। सोऽहंभावो नमस्कारः। मौनं स्तुतिः। सर्वसंतोषो विसर्जनमिति य एवं वेद ॥ ५ ॥ निश्चिन्त अवस्था ही उसका ध्यान है। समस्त कर्मों का निराकरण (दूर करना) ही उसका आवाहन है। निश्चय ज्ञान ही उसका आसन है। उन्मन भाव (मनरहित होना) ही उसका पाद्य है। सदैव अमनस्क भाव ही अर्घ्य है। सतत दीप्ति और अपार अमृतवृत्ति ही उसका स्नान है। सर्वत्र ब्रह्म भावना ही गन्ध है। दर्शन के स्वरूप का अवस्थान ही अक्षत है। चैतन्य की प्राप्ति ही पुष्प है। चैतन्य अग्नि का स्वरूप ही धूप है। चैतन्य आदित्य का स्वरूप ही दीप है। परिपूर्ण चन्द्र के अमृत का एकीकरण ही नैवेद्य है। निश्चलत्व ही प्रदक्षिणा है। 'सोऽहम्' भाव ही नमस्कार है। मौन ही स्तुति है। सभी प्रकार का सन्तोष ही उसका विसर्जन है। जो इस प्रकार जानता है (वह ब्रह्म स्वरूप हो जाता है) ॥ ५ ॥ ॥ तृतीयः खण्डः ॥ एवं त्रिपुट्यां निरस्तायां निस्तरङ्गसमुद्रवन्निवातस्थितदीपवदचलसंपूर्णभावाभाव- विहीनकैवल्यज्योतिर्भवति ॥ १ ॥ इस प्रकार जब (ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय स्वरूप) त्रिपुटी निरस्त (दूर) हो जाती है, तब तरंगहीन सागर के समान, वायुरहित स्थान में स्थित दीपक की तरह अचल, सम्पूर्ण भाव और अभाव से विहीन कैवल्य-ज्योति प्रकट होती है, अर्थात् मात्र कैवल्यज्योति शेष रहती है ॥ १ ॥ जाग्रन्निद्रान्तःपरिज्ञानेन ब्रह्मविद्भवति ॥ २ ॥
२३६ मण्डलब्राह्मणोपनिषद्
२३६ मण्डलब्राह्मणोपनिषद् जिसे जाग्रदवस्था और निद्रावस्था में भी अन्तर्ज्ञान बना रहता है, वह ब्रह्मविद् होता है ॥ २ ॥ सुषुप्तिसमाध्योर्मनोलयाविशेषेऽपि महदस्त्युभयोर्भेदस्तमसि लीनत्वान्मुक्तिहेतुत्वा- भावाच्च ॥ ३ ॥ सुषुप्ति और समाधि की स्थिति में मनोलय समान होने पर भी दोनों में महान् भेद है। सुषुप्ति में मन अज्ञान में लय हो जाता है, जिससे मुक्ति की स्थिति नहीं बनती ॥ ३ ॥ समाधौ मृदिततमोविकारस्य तदाकाराकारिताखण्डाकारवृत्त्यात्मकसाक्षिचैतन्ये प्रपञ्चलयः संपद्यते प्रपञ्चस्य मनःकल्पितत्वात् ॥ ४ ॥ समाधि अवस्था में तमोविकार विनष्ट हो जाता है, जिसके कारण तदाकार और अखण्डाकार बने हुए वृत्ति रूप साक्षिचैतन्य में प्रपञ्च का विलय हो जाता है; क्योंकि प्रपञ्च मनःकल्पित होता है ॥ ४ ॥ ततो भेदाभावात् कदाचिद्बहिर्गतेऽपि मिथ्यात्वभानात्। सकृद्विभातसदानन्दानुभवै- कगोचरो ब्रह्मवित्तदैव भवति ॥ ५ ॥ तत्पश्चात् भेद के अभाव में समाधि से बाहर आने पर भी प्रपञ्च के मिथ्यात्व का बोध बना रहता है। एक बार सदानन्द का अनुभव हो जाने से वही प्रमुख विषय हो जाता है। इस प्रकार ब्रह्म को जानने वाला (ब्रह्मविद्) ब्रह्म ही हो जाता है ॥ ५ ॥ यस्य संकल्पनाशः स्यात्तस्य मुक्तिः करे स्थिता। तस्माद्भावाभावौ परित्यज्य परमात्मध्यानेन मुक्तो भवति ॥ ६ ॥ जिसके संकल्प विनष्ट हो गये हैं, उसी के हाथ में मुक्ति है। इसलिए (वह साधक) भाव और अभाव का परित्याग करके परमात्मा का ध्यान करने से मुक्त हो जाता है ॥ ६ ॥ पुनःपुनः सर्वावस्थासु ज्ञानज्ञेयौ ध्यानध्येयौ लक्ष्यालक्ष्ये दृश्यादृश्ये चोहापोहादि परित्यज्य जीवन्मुक्तो भवेत्। य एवं वेद ॥ ७॥ इस प्रकार समस्त अवस्थाओं में बारम्बार ज्ञान और ज्ञेय, ध्यान और ध्येय, लक्ष्य और अलक्ष्य, दृश्य और अदृश्य तथा ऊहापोह आदि का परित्याग करके मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है। जो इस प्रकार जानता है (वह ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है) ॥ ७ ॥ ॥ चतुर्थः खण्डः ॥ पञ्चावस्थाः जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तितुरीयतूरीयातीताः ॥ १ ॥ पाँच अवस्थाएँ होती हैं—जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीय और तुरीयातीत ॥ १ ॥ जाग्रति प्रवृत्तो जीवः प्रवृत्तिमार्गासक्तः। पापफलनरकादि मास्तु शुभकर्मफलस्वर्गमस्त्विति काङ्क्षते ॥ २ ॥ इन पाँच अवस्थाओं में से जाग्रदवस्था में जीव प्रवृत्ति मार्ग में प्रवृत्त होता है, जिससे वह यह आकांक्षा करता है कि पाप का फल नरक मुझे न प्राप्त हो और शुभ कर्मों का फल स्वर्ग मुझे अवश्य प्राप्त हो ॥ २ ॥ एवं स एव स्वीकृतवैराग्यात्कर्मफलजन्माऽलं । संसारबन्धनमलमिति विमुक्त्यभिमुखो निवृत्तिमार्गप्रवृत्तो भवति ॥ ३ ॥
ब्राह्मण २ खण्ड ५ मन्त्र १ २३७
ब्राह्मण २ खण्ड ५ मन्त्र १ २३७ इस प्रकार वही जीव जब वैराग्य को स्वीकार कर लेता है, तब कर्मफल स्वरूप जन्म और संसार रूप बन्धन से मुक्ति प्राप्त करने का आकांक्षी होकर मुक्ति की ओर अग्रसर होता है और निवृत्ति पथगामी होता है ॥३ स. एव संसारतारणाय गुरुमाश्रित्य कामादि त्यक्त्वा विहितकर्माचरणसाधनचतु- ष्टयसंपन्नो हृदयकमलमध्ये भगवत्सत्तामात्रान्तर्लक्ष्यरूपमासाद्य सुषुप्त्यवस्थाया मुक्तब्रह्मा- नन्दस्मृतिं लब्ध्वा एक एवाहमद्वितीयः कंचित्कालमज्ञानवृत्त्या विस्मृतजाग्रद्वासनानुफलेन तैजसोऽस्मीति तदुभयनिवृत्त्या प्राज्ञ इदानीमस्मीत्यहमेक एव स्थानभेदादवस्थाभेदस्य परंतु नहि मदन्यदिति जातविवेकः शुद्धाद्वैतब्रह्माहमिति भिदागन्धं निरस्य स्वान्तर्विजृम्भितभानु- मण्डलध्यानतदाकाराकारितपरंब्रह्माकारितमुक्तिमार्गामारूढः परिपक्को भवति ॥ ४ ॥ (तत्पश्चात्) वही जीव संसार सागर से पार होने हेतु गुरु का आश्रय लेकर, कामादि (विकारों का) परित्याग करके विहित (वेदोक्त) कर्म का आचरण करता हुआ साधन चतुष्टय (विवेक, वैराग्य, षट्सम्पत्ति और मुमुक्षुत्व) से सम्पन्न होता है और हृदय कमल के मध्य एकमात्र भगवत्सत्ता को अन्तर्लक्ष्य करके एक उसी के रूप का आश्रय लेकर सुषुप्ति अवस्था से मुक्त ब्रह्मानन्द की स्मृति पाकर ऐसा विचारता है (अनुभव करता है) कि मैं एक और अद्वितीय ही हूँ; किन्तु कुछ काल पूर्व अज्ञान ग्रसित होकर आत्म स्वरूप को भूल गया था और जाग्रदवस्था में स्थित वासना के फलस्वरूप स्वप्न में मेरा यह मानना था कि 'मैं तैजस हूँ।' उसी प्रकार जाग्रत् और स्वप्न इन दोनों अवस्थाओं से निवृत्ति हो जाने पर (सुषुप्तावस्था में) 'मैं प्राज्ञ हूँ' ऐसा मानता था; किन्तु अब 'मैं एक ही हूँ' ऐसा अनुभव होता है। स्थान भेद के कारण वे अलग-अलग अवस्थाएँ थीं; किन्तु मुझसे अतिरिक्त कुछ भी नहीं था, ऐसा विवेक होने से 'मैं शुद्ध अद्वैत ब्रह्म हूँ' यह अनुभव होता है, जिसके कारण भेदभाव की समस्त वासनाएँ (आरोपित वृत्तियाँ) दूर हो जाती हैं। साधक अपने भीतर प्रकाशित तेजोमण्डल का ध्यान करने से तदाकार बनकर परब्रह्म के स्वरूप को पाकर मुक्तिपथारूढ़ होता है और परिपक्व हो जाता है ॥ ४ ॥ संकल्पादिकं मनो बन्धहेतुः। तद्वियुक्तं मनो मोक्षाय भवति ॥ ५ ॥ संकल्प आदि से युक्त मन बन्धन का और उससे रहित मन मोक्ष का कारण होता है ॥ ५ ॥ तद्वांश्चक्षुरादिबाह्यप्रपञ्चोपरतो विगतप्रपञ्चगन्धः सर्वजगदात्मत्वेन पश्यंस्त्यक्ताहंकारो ब्रह्माहमस्मीति चिन्तयन्निदं सर्वं यदयमात्मेति भावयन्कृतकृत्यो भवति ॥ ६ ॥ उससे सम्पन्न (जीवित अवस्था में ही मोक्ष प्राप्त कर लेने वाला) साधक चक्षु आदि बाह्य प्रपञ्चों से उपरत हो जाता है। उसमें प्रपञ्चों की गन्ध तक शेष नहीं रहती। वह सम्पूर्ण जगत् को आत्म स्वरूप में देखता है और त्यक्त अहंकार होकर 'मैं ब्रह्म हूँ' ऐसा चिन्तन करता हुआ 'यह सब कुछ आत्मा ही है, ऐसी भावना करता हुआ कृतकृत्य हो जाता है ॥ ६ ॥ ॥ पञ्चमः खण्डः ॥ सर्वपरिपूर्णतुरीयातीतब्रह्मभूतो योगी भवति।तं ब्रह्मेति स्तुवन्ति ॥ १ ॥ सब प्रकार से परिपूर्ण होकर वह तुरीयातीत योगी ब्रह्म स्वरूप हो जाता है। 'यह ब्रह्म है,' लोग इस प्रकार उसकी स्तुति करते हैं ॥ १ ॥
२३८ मण्डलब्राह्मणोपनिषद्
२३८ मण्डलब्राह्मणोपनिषद् सर्वलोकस्तुतिपात्रः सर्वदेशसंचारशीलः परमात्मगगने बिन्दुं निक्षिप्य शुद्धाद्वैताजाड्य- सहजामनस्कयोगनिद्राखण्डानन्दपदानुवृत्त्या जीवन्मुक्तो भवति ॥ २ ॥ वह समस्त लोकों की स्तुति का पात्र बनता है, समस्त लोकों में संचार करने वाला होता है और परमात्मा रूप गगन में बिन्दु स्थापित करके (चिदाकाश में मन को विलीन करके) शुद्ध, अद्वैत, जड़तारहित, सहज और अमनस्क स्थिति रूपी योगनिद्रा में अखण्डानन्द का अनुसरण करके जीवन्मुक्त हो जाता है ॥ २ ॥ तच्चानन्दसमुद्रमग्ना योगिनो भवन्ति ॥ ३ ॥ उस आनन्द के समुद्र में मग्न रहने वाले (सिद्ध) योगी कहे जाते हैं ॥३॥ तदपेक्षया इन्द्रादयः स्वल्पानन्दाः । एवं प्राप्तमानन्दः परमयोगी भवतीत्युपनिषत् ॥ ४ ॥ उन योगियों की अपेक्षा इंद्रादि देवगण भी स्वल्प आनन्द प्राप्त करने वाले होते हैं। इस प्रकार परमानन्द प्राप्त करने वाला परम योगी होता है, यह (अद्भुत) रहस्य है ॥ ४ ॥ ॥ तृतीयं ब्राह्मणम् ॥ ॥ प्रथमः खण्डः ॥ याज्ञवल्क्यो महामुनिर्मण्डलपुरुषं पप्रच्छ स्वामिन्नमनस्कलक्षणमुक्तमपि विस्मृतं पुनस्तल्लक्षणं ब्रूहीति ॥ १ ॥ महामुनि याज्ञवल्क्य ने सूर्य मण्डल स्थित पुरुष से कहा- "हे स्वामी ! आपने अमनस्क स्थिति के लक्षणों के विषय में मुझे उपदेश दिया, अब वह मुझे विस्मृत हो गया है, अतः कृपा करके पुनः उसके लक्षणों को मुझे बताएँ" ॥ १ ॥ तथेति मण्डलपुरुषोऽब्रवीत् । इदममनस्कमतिरहस्यम् । यज्ज्ञानेन कृतार्थो भवति तन्नित्यं शांभवीमुद्रान्वितम् ॥ २ ॥ वह मण्डल पुरुष बोला-बहुत अच्छा, "यह अमनस्क स्थिति अतिरहस्यमय है। इसके ज्ञान से मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है और वह नित्य ही शाम्भवी मुद्रा से समन्वित होता है" ॥ २ ॥ परमात्मदृष्ट्या तत्प्रत्ययलक्ष्याणि दृष्ट्वा तदनु सर्वेशमप्रमेयमजं शिवं परमाकाशं निरालम्ब- मद्वयं ब्रह्मविष्णुरुद्रादीनामेकलक्ष्यं सर्वकारणं परंब्रह्मात्मन्येव पश्यमानो गुहाविहरणमेव निश्चयेन ज्ञात्वा भावाभावादिद्वन्द्वातीतः संविदितमनोन्मन्यनुभवस्तदनन्तरमखिलेन्द्रियक्षयवशा- दमनस्कसुखब्रह्मानन्दसमुद्रे मनः प्रवाहयोगरूपनिवातस्थितदीपवदचलं परंब्रह्म प्राप्नोति ॥ ३ ॥ परमात्म दृष्टि से उसका अनुभव कराने वाले लक्ष्यों को देखकर सबके ईश्वर, अप्रमेय, अज, शिव (कल्याणकारी), परम आकाश, निरालम्ब, अद्वितीय, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि के एकमात्र लक्ष्यरूप सभी के कारण परम ब्रह्म को आत्मरूप में देखने वाला पुरुष हृदयगुहा में ही विहार करता हुआ निश्चय पूर्वक जानकर, भाव-अभाव आदि द्वन्द्वों से अतीत होकर, मन की उन्मनी अवस्था का अनुभव करता है। तत्पश्चात् समस्त इन्द्रियों के (इन्द्रिय जन्य प्रवृत्ति के) क्षय होने पर, अमनस्क सुख रूप ब्रह्मानन्द सागर में उसका मनः-प्रवाह बहता है, जिसके योग से वह वायुशून्य स्थल में स्थित दीपक के समान अचल परब्रह्म को प्राप्त करता है ॥ ३ ॥