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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

५४ कठोपनिषद् जो त्रिणाचिकेत विद्या के ज्ञाता इस अग्नि के इन तीनों स्वरूपों को जानकर नाचिकेत अग्नि का चयन करते हैं, वे शरीर त्याग से पूर्व ही मृत्यु के पाशों को काटकर स्वर्ग लोक का आनन्द प्राप्त करते हैं ॥१८ ॥ एष तेऽग्निर्नाचिकेतः स्वर्ग्यो यमवृणीथा द्वितीयेन वरेण । एतमग्निं तवैव प्रवक्ष्यन्ति जनासस्तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्व ॥ १९ ॥ हे नचिकेता ! यह स्वर्ग प्रदान करने वाली अग्नि विद्या है, तुमने द्वितीय वर के द्वारा जिसका वरण किया है । मनुष्य (आज से ) इस अग्नि को तुम्हारे ही नाम से जानेंगे और प्रयोग करेंगे। हे नचिकेता ! (अब तुम स्वअभिलषित) तीसरे वर को माँग लो ॥ १९ ॥ येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके। एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहं वराणामेष वरस्तृतीयः ॥ २०॥ (नचिकेता ने कहा-) मनुष्य के मृत हो जाने पर आत्मा का अस्तित्व रहता है, ऐसा ज्ञानियों का कथन है और अन्य कुछ की मान्यता यह है कि मृत्यु के पश्चात् अस्तित्व नहीं रहता । आपके उपदेश से मैं इस संदेह से मुक्त होकर आत्म-रहस्य को भली प्रकार जान सकूँ। वरों में यही मेरा तीसरा वर है ॥ २० ॥ देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुरा न हि सुविज्ञेयमणुरेष धर्मः। अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व मा मोपरोत्सीरति मा सृजैनम् ॥ २१ ॥ (यम ने कहा-) हे नचिकेता ! पूर्व काल में देवताओं ने भी इस आत्मा के विषय में संशय किया था । निश्चित ही यह आत्मतत्त्व नामक धर्म (विषय) सरलतापूर्वक जानने योग्य नहीं है । हे नचिकेता ! तुम मुझसे कोई अन्य वर माँग लो, इस वर से हमें मुक्त कर दो ॥ २१ ॥ देवैरत्रापि विचिकित्सितं किल त्वं च मृत्यो यन्न सुविज्ञेयमात्थ । वक्ता चास्य त्वादृगन्यो न लभ्यो नान्यो वरस्तुल्य एतस्य कश्चित् ॥ २२ ॥ (नचिकेता ने कहा-) हे मृत्युदेव ! इस आत्मतत्त्व के विषय में देवताओं को भी संशय हुआ था। आपका भी यही कथन है कि यह विषय सहजता से जानने योग्य नहीं है । विद्वज्जनों के लिए भी अगम्य होने से इसे जाना नहीं जा सकता, अतः इस आत्मज्ञान का उपदेष्टा भी आपके समान दूसरा (मुझे) नहीं मिल सकता तथा न इसके समकक्ष दूसरा कोई वर ही है (जो मैं आप से माँग लूँ) ॥ २२ ॥ शतायुषः पुत्रपौत्रान्वृणीष्व बहून्पशून्हस्तिहिरण्यमश्वान् । भूमेर्महदायतनं वृणीष्व स्वयं च जीव शरदो यावदिच्छसि ॥ २३ ॥ (यमाचार्य उसे प्रलोभित करते हुए बोले-) हे नचिकेता ! तुम सौ वर्ष पर्यन्त जीवन धारण करने वाले पुत्र और पौत्रों को, बहुत से (गौ आदि) पशुओं को तथा हाथी, स्वर्ण और अश्वों को (हमसे) माँग लो । पृथ्वी के बड़े विस्तार वाले साम्राज्य की माँग कर लो । स्वयं भी जितने वर्षों तक जीवनयापन की आकांक्षा हो, जीवित बने रहो ॥ २३ ॥ एतत्तुल्यं यदि मन्यसे वरं वृणीष्व वित्तं चिरजीविकां च । महाभूमौ नचिकेतस्त्वमेधि कामानां त्वा कामभाजं करोमि ॥ २४ ॥ इस वर की तरह यदि कोई अन्य वर तुम्हारी दृष्टि में हो, तो उसे माँग लो । धन-सम्पदा तथा अनन्त काल के निमित्त उपयोगी सुख-साधनों (चिरस्थायी आजीविका) को माँग लो । हे नचिकेता ! तुम इस

अध्याय १ वल्ली १ मन्त्र २९ ५५

अध्याय १ वल्ली १ मन्त्र २९ ५५ विस्तृत भूमण्डल पर वृद्धि प्राप्त करो, हम तुमको कामनाओं (भोगों) का इच्छानुकूल उपभोग करने वाला बना देते हैं ॥ २४ ॥ ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके सर्वान्कामाँश्छन्दतः प्रार्थयस्व । इमा रामाः सरथाः सतूर्या न हीदृशा लम्भनीया मनुष्यैः । आभिर्मत्प्रत्ताभिः परिचारयस्व नचिकेतो मरणं मानुप्राक्षीः ॥ २५ ॥ हे नचिकेता ! मर्त्यलोक में जो-जो भोग्य पदार्थ दुर्लभ हैं, उन सभी को तुम स्वेच्छा पूर्वक माँग लो। रथ और (कर्ण प्रिय) वाद्य विशेषों से युक्त इन स्वर्ग की अप्सराओं को प्राप्त कर लो, मनुष्यों द्वारा इस प्रकार की स्त्रियाँ प्राप्त करना सम्भव नहीं है । हमारे द्वारा प्रदत्त इन रमणियों से आप अपनी सेवा-शुश्रूषा कराएँ; किन्तु हे नचिकेता ! मृत्यु के पश्चात् आत्मा का क्या होता है ? यह हमसे न पूछें ॥ २५ ॥ श्वोभावा मर्त्यस्य यदन्तकैतत्सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेजः । अपि सर्वं जीवितमल्पमेव तवैव वाहास्तव नृत्यगीते ॥ २६ ॥ (नचिकेता ने कहा) हे यमराज! जिन साधनों का आपने वर्णन किया है, वे 'कल रहेंगे भी या नहीं', इसमें पूरा संदेह है । साथ ही ये मनुष्य की इन्द्रिय-सामर्थ्य को भी क्षीण कर डालते हैं । जिसे आप दीर्घ जीवन के रूप में हमें देना चाहते हैं, वह सम्पूर्ण जीवन भी (भोगों के लिए) कम ही है। (अतः) रथादि वाहन एवं (अप्सराओं के) नाच-गान आपके ही पास रहें अर्थात् मुझे इनकी कोई कामना नहीं ॥ २६ ॥ न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो लप्स्यामहे वित्तमद्राक्ष्म चेत्त्वा। जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं वरस्तु मे वरणीयः स एव ॥ २७ ॥ मनुष्य को धन से संतुष्ट नहीं किया जा सकता । जहाँ हमें आपके दुर्लभ दर्शन-लाभ की प्राप्ति हो गई, वहाँ धन तो हम (अपने पुरुषार्थ से) उपलब्ध कर ही लेंगे। जब तक आप यमपुरी का शासन करते रहेंगे, तब तक हम जीवित ही रहेंगे, पर हमारा प्रार्थनीय वर तो वह आत्मज्ञान से सम्बन्धित ही है॥ २७ ॥ अजीर्यताममृतानामुपेत्य जीर्यन्मर्त्यःक्वधःस्थःप्रजानन्। अभिध्यायन्वर्णरतिप्रमोदानतिदीर्घे जीविते को रमेत ॥ २८ ॥ हे यमराज ! वृद्ध होकर मृत्यु को प्राप्त होने वाला ऐसा कौन विवेकशील मनुष्य होगा, जो आप जैसे जरा-मरण रहित देवताओं के दुर्लभ सान्निध्य को प्राप्त करके भी अप्सराओं के सौन्दर्य, प्रेम तथा आमोद- प्रमोदजन्य क्षणभंगुर सुखों की अभिलाषा करेगा ? ॥ २८ ॥ यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति मृत्यो यत्साम्पराये महति ब्रूहि नस्तत् । योऽयं वरो गूढमनुप्रविष्टो नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते ॥ २९ ॥ हे मृत्युदेव! जिस आत्मतत्त्व के विषय में देवता भी सन्देह करते हैं कि आत्मा का अस्तित्व है या नहीं है, उसके विषय में आपका जो भी सुनिश्चित मन्तव्य हो, उसे हमें बताएँ । यह जो अत्यन्त गूढ़ तथा मेरे हृदय पटल पर स्थित वर है, इसके अतिरिक्त अन्य किसी वर की नचिकेता को कामना नहीं ॥ २९ ॥ [ नचिकेता-अलिप्त व्यक्तित्व सम्पन्न व्यक्ति ही इस प्रकार के प्रलोभनों को नकार सकता है । इसी आत्म- निष्ठा के आधार पर वह आत्मतत्त्व की प्राप्ति का अधिकारी बनता है ।]

॥ द्वितीया वल्ली ॥

५६ कठोपनिषद् ॥ द्वितीया वल्ली ॥ अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतैव प्रेयस्ते उभे नानार्थे पुरुषँ सिनीतः। तयोः श्रेय आददानस्य साधु भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते ॥ १ ॥ यमराज ने नचिकेता से कहा- श्रेय (कल्याण) का मार्ग और प्रेय (सांसारिक भोग्य पदार्थों) का मार्ग दोनों पृथक्-पृथक् हैं। भिन्न-भिन्न परिणाम देने वाले दोनों श्रेय और प्रेय मार्ग मनुष्य को अपनी- अपनी ओर आकर्षित करते हैं। उन दोनों में से श्रेय (कल्याण) मार्ग को स्वीकार करने वाले साधकों को श्रेष्ठ फल प्राप्त होते हैं और जो सांसारिक भोगों से युक्त प्रेय मार्ग के पथिक हैं, वे मानव जीवन के महान् उद्देश्य से भटककर पतन-पराभव को प्राप्त करते हैं ॥ १ ॥ श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतस्तौ संपरीत्य विविनक्ति धीरः । श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद्वृणीते ॥ २ ॥ श्रेय और प्रेय दोनों ही मार्ग मनुष्य के समक्ष उपस्थित होते हैं। बुद्धिमान् मनुष्य उन दोनों को भली प्रकार विचार कर उन्हें पृथक्-पृथक् रूप से जान लेते हैं। विवेकशील साधक निश्चित रूप से प्रिय लगने वाले भोग-साधनों की अपेक्षा कल्याण पथ को श्रेयस्कर मानकर उसे ही वरण करते हैं। मन्दमति अविवेकीजन योग (अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति) और क्षेम (प्राप्त वस्तु के संरक्षण) की अभिलाषा से बाह्याकर्षणों के वशीभूत होकर प्रेय-पथ को ही स्वीकार करते हैं ॥ २ ॥ स त्वं प्रियान्प्रियरूपाँश्च कामानभिध्यायन्नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः । नैतां सृङ्कां वित्तमयीमवाप्तो यस्यां मज्जन्ति बहवो मनुष्याः ॥ ३ ॥ हे नचिकेता ! सांसारिक भोग-विलास के नश्वर साधनों को तुमने विचारपूर्वक त्याग दिया है। भौतिक जगत् के जिन मायावी प्रलोभनों में अज्ञानी पुरुष जकड़े रहते हैं, तुम उन बन्धनों में नहीं पड़े ॥ ३ ॥ दूरमेते विपरीते विषूची अविद्या या च विद्येति ज्ञाता। विद्याभीप्सिनं नचिकेतसं मन्ये न त्वा कामा बहवोऽलोलुपन्त ॥ ४ ॥ जो (श्रेय और प्रेय मार्ग) विद्या और अविद्या के रूप में जाने गये हैं, वे दोनों परस्पर बिल्कुल विपरीत और भिन्न-भिन्न फल देने वाले हैं। हे नचिकेता ! तुमको हम श्रेय (आध्यात्मिक) मार्ग का साधक मानते हैं, क्योंकि तुम्हें (चकाचौंध पैदा करने वाले) भोग-विलास के साधनों ने प्रलोभित नहीं किया ॥ ४ ॥ अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितं मन्यमानाः । दन्द्रम्यमाणाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥ ५ ॥ अविद्या-अज्ञानान्धकार के मध्य में स्थित होते हुए भी स्वयं को विद्वानों और विशेषज्ञों की श्रेणी का मानने वाले मूढ़जन, अनेक प्रकार के कुटिल मार्गों का सहारा लेते हुए (ठीक उसी प्रकार) ठोकरें खाते फिरते हैं, जैसे अन्धों के द्वारा ले जाये जाने वाले अन्धे ॥ ५ ॥ न सांपरायः प्रतिभाति बालं प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम् । अयं लोको नास्ति पर इति मानी पुनः पुनर्वशमापद्यते मे ॥ ६ ॥

अध्याय १ वल्ली २ मन्त्र १२ ५७

अध्याय १ वल्ली २ मन्त्र १२ ५७ धन के व्यामोह से जकड़े हुए विवेकहीन, प्रमादी मनुष्य के अन्तरंग में पारलौकिक विचारधारा का अभ्युदय नहीं होता; क्योंकि वह जीवन के अस्तित्व को प्रत्यक्षवाद पर ही आधारित मानता है । आध्यात्मिक जीवन के अस्तित्व को नकारने वाले शरीराभिमानी मनुष्य, बार-बार जन्म-मरण के बन्धन में घूमता हुआ हमारे (यमराज के) वशीभूत होकर रहता है ॥ ६ ॥ श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः शृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्युः। आश्चर्यो वक्ता कुशलोऽस्य लब्धाश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः ॥ ७ ॥ जन साधारण को आत्म-तत्त्वज्ञान के संबंध में जानने का सुअवसर तक नहीं मिलता, अगर संयोग से ऐसा अवसर मिला भी, तो अधिकांश ज्ञान-प्रकाश के अभाव में अपने जीवन को तदनुरूप ढालने में सक्षम नहीं होते । उस तत्त्वज्ञान का भली प्रकार प्रतिपादन करने वाले भी अतिदुर्लभ ही हैं । उस ज्ञान को ग्रहण करने वाला भी कोई कुशल जिज्ञासु ही सुपात्र होता है । विशेषज्ञ आचार्य द्वारा तत्त्वज्ञान से अनुप्राणित तत्त्ववेत्ता भी अति दुर्लभ ही होता है ॥ ७ ॥ न नरेणावरेण प्रोक्त एष सुविज्ञेयो बहुधा चिन्त्यमानः । अनन्यप्रोक्ते गतिरत्र नास्त्यणीयान्ह्यतर्क्यमणूप्रमाणात् ॥ ८ ॥ अनाधिकारी मनुष्य (जिसने इसका भली प्रकार साक्षात्कार नहीं किया) द्वारा कहा गया यह आत्मतत्त्व सहजता से जानने योग्य नहीं। किसी तत्त्ववेत्ता आचार्य द्वारा न समझाये जाने पर भी इस सम्बन्ध में कोई प्रगति नहीं हो पाती। यह विषय बड़ा गूढ़ है, अतएव वह तर्क-वितर्क के दायरे में सीमाबद्ध नहीं है ॥ ८ ॥ नैषा तर्केण मतिरापनेया प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ । यां त्वमापः सत्यधृतिर्बतासि त्वादृङ्नो भूयान्नचिकेतः प्रष्टा ॥ ९ ॥ हे प्रिय नचिकेता ! श्रेष्ठ आत्मज्ञान के निमित्त शुष्क तर्क-वितर्क की ऊहापोह से भिन्न आपकी बुद्धि प्रखर है, ऐसी मेधा शक्ति को तर्क द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता । हे नचिकेता ! आप सचमुच ही यथार्थ सत्य के अन्वेषक हैं, (हमारी अन्तरंग इच्छा यही है कि) आप जैसे जिज्ञासु शिष्य ही हमें प्राप्त हों ॥ ९ ॥ जानाम्यहं शेवधिरित्यनित्यं न ह्यध्रुवैः प्राप्यते हि ध्रुवं तत् । ततो मया नाचिकेतश्चितोऽग्निरनित्यैर्द्रव्यैः प्राप्तवानस्मि नित्यम् ॥ १० ॥ मैं जानता हूँ कि यह कर्मफलजन्य सम्पदा नाशवान् है, नश्वर साधनों के द्वारा उस नित्य (आत्मतत्त्व) को प्राप्त किया जाना शक्य नहीं । मेरे द्वारा नाचिकेत अग्नि का चयन किया गया है । उन्हीं अनित्य पदार्थों अथवा साधनों द्वारा मैंने अभिलषित नित्य आत्मतत्त्व (यम-पद) को प्राप्त किया है ॥ १० ॥ कामस्याप्तिं जगतः प्रतिष्ठां क्रतोरनन्त्यमभयस्य पारम् । स्तोममहदुरुगायं प्रतिष्ठां दृष्ट्वा धृत्या धीरो नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः ॥ ११ ॥ हे नचिकेता ! आपने भोग्य साधनों से भरपूर यज्ञ के चिरस्थायी फल से युक्त, असीम निर्भयता से युक्त, स्तुत्य और प्रशंसनीय प्रतिष्ठा से सम्पन्न स्वर्गलोक को धैर्यपूर्वक छोड़ दिया है। यह आपका अति बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय है ॥ ११ ॥ तं दुर्दर्शं गूढमनुप्रविष्टं गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम्। अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति ॥ १२ ॥

५८ कठोपनिषद् विशिष्ट तपः साधना द्वारा देखे जाने योग्य, सांसारिक विषय-वासनाओं से परे अत्यन्त गुप्त स्थान में स्थित, बुद्धिरूपी गुफा में निहित, गहन स्थल में विद्यमान अर्थात् अन्तःकरण में विराजमान सनातन उस दिव्य गुण सम्पन्न परमात्मा को अध्यात्मयोग के द्वारा जानकर बुद्धिमान् मनुष्य हर्ष और शोक से मुक्त हो जाता है ॥ १२ ॥ एतच्छ्रुत्वा संपरिगृह्य मर्त्यः प्रवृह्य धर्म्यमणुमेतमाप्य। स मोदते मोदनीयँ हि लब्ध्वा विवृतँ सद्म नचिकेतसं मन्ये ॥ १३॥ हे नचिकेता ! तुम्हारे जैसे साधक इस आत्मिक ज्ञान को सुनकर, इसे भली प्रकार ग्रहण कर तथा विवेकपूर्वक इस पर चिंतन करके धारण करने योग्य इस सूक्ष्म आत्मतत्त्व को समुचित रूप से जान लेते हैं। वे इस आनन्दस्वरूप आत्मा को पाकर चिरन्तन आनन्द में लीन हो जाते हैं। तुम्हारे निमित्त तो ब्रह्म प्राप्ति का द्वार सदैव खुला हुआ है, ऐसा मेरा मन्तव्य है ॥ १३॥ अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात्। अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद ॥ १४ ॥ (नचिकेता का कथन-) हे यमराज ! जिस आत्मतत्त्व को आप यज्ञादि धर्मकृत्यों तथा शास्त्र-निषिद्ध कर्मों से पृथक् मानते हैं, जो कार्य-कारणरूप जगत् एवं भूत, भविष्यत् (तथा वर्तमानकाल) से भी भिन्न है, उसी परम आत्मतत्त्व के सम्बन्ध में हमें बताएँ ॥ १४॥ सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपाँसि सर्वाणि च यद्वदन्ति। यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदँ संग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत् ॥ १५॥ (यम ने कहा-) सभी वेद जिस ब्राह्मी स्थिति (परमपद) का बार-बार उल्लेख करते हैं। सभी तपः साधनाएँ जिस स्थिति का अनुभव कराती हैं, जिसे प्राप्त करने की अभिलाषा से साधकगण ब्रह्मचर्यादि व्रतों का पालन करते हैं। हे नचिकेता ! मैं तुमसे उसी स्थिति का संक्षेप में वर्णन करता हूँ। "ॐ" ही वह परमपद है ॥ १५ ॥ एतद्धयेवाक्षरं ब्रह्म एतद्धयेवाक्षरं परम्। एतद्धयेवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥ १६ ॥ यह ॐ ही अक्षर ब्रह्म है। यही ॐ परब्रह्म अर्थात् सर्वोत्तम है। इसी अक्षर को भली प्रकार जानकर जो साधक जिस अभीष्ट की कामना करते हैं, उन्हें उसकी प्राप्ति होती है ॥ १६॥ एतदालम्बनँ श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम्। एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ॥ १७॥ यह प्रणव (ओङ्कार) ही आत्म साक्षात्कार का श्रेष्ठ अवलम्बन है। यही परमात्मा के ध्यान का आधार होने से सर्वश्रेष्ठ है। इस ब्रह्मप्राप्ति के आश्रय को जानकर साधकगण ब्रह्मलोक को प्राप्त करते हैं॥ न जायते म्रियते वा विपश्चिन्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित्। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ १८ ॥ यह नित्य ज्ञानस्वरूप आत्मा न तो उत्पन्न होता है और न मृत्यु को ही प्राप्त होता है। यह आत्मा न तो किसी अन्य से उत्पन्न हुआ है और न इससे ही कोई उत्पन्न हुआ है। यह आत्मा अजन्मा, नित्य, शाश्वत

अध्याय १ वल्ली २ मन्त्र २४ ५९

अध्याय १ वल्ली २ मन्त्र २४ ५९ और क्षय तथा वृद्धि से रहित है। शरीर के नष्ट होने पर भी यह आत्मा विनष्ट नहीं होता ॥ १८॥ हन्ता चेन्मन्यते हन्तुं हतश्चेन्मन्यते हतम् । उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥ १९ ॥ यदि हनन करने वाला व्यक्ति अपने को मारने में सक्षम मानता है और हनन किया हुआ व्यक्ति स्वयं को मारा हुआ मानता है, तो वे दोनों ही (आत्मतत्व के सम्बन्ध में) अनभिज्ञ हैं; क्योंकि यह आत्मा न तो किसी को विनष्ट ही करता है और न किसी के द्वारा इसे मारा जाना शक्य है ॥ १९॥ अणोरणीयान्महतो महीयानात्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम्। तमक्रतुः पश्यति वीतशोको धातुप्रसादान्महिमानमात्मनः ॥ २० ॥ परमात्म चेतना इस जीवात्मा की हृदयरूपी गुफा में अणु से भी अतिसूक्ष्म और महान् से भी अति महान् रूप में विराजमान है। निष्काम कर्म करने वाले तथा शोकरहित कोई विरले साधक ही, परमात्मा की अनुकम्पा से ही उसे देख पाते हैं॥ २० ॥ आसीनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वतः । कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति ॥ २१ ॥ एक स्थान पर विद्यमान होते हुए भी वह परम चेतना दूर चली जाती है और शयन करते हुए भी सभी जगह गमन करती है। हर्षयुक्त और हर्षरहित उस देव को मेरे अतिरिक्त अन्य कौन भली प्रकार जानने में सक्षम हो सकता है ॥ २१ ॥ अशरीरं शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम् । महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ २२ ॥ जो शरीरों में शरीररहित तथा स्थिर न रहने वालों (अनित्यों) के मध्य नित्यस्वरूप में स्थित है। उस महान् सर्वव्यापक आत्मतत्त्व को जानकर बुद्धिमान् मनुष्य शोकातुर नहीं होते ॥ २२ ॥ नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन। यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्॥ २३ ॥ परमात्म तत्त्व को मात्र धर्मोपदेश सुनकर, स्तुति-वन्दना के रूप में उसकी चर्चा करके तथा शास्त्रों का अध्ययन करके नहीं जाना जा सकता। जिस पर उसकी कृपा होती है, वही उसे जान पाता है। वह परमात्मतत्त्व अधिकारी साधक के समक्ष अपने वास्तविक स्वरूप को स्वयं ही अभिव्यक्त कर देता है॥ [ जड़ पदार्थपरक ज्ञान सुनकर या पुस्तक से पढ़कर प्राप्त किया जा सकता है। आत्म तत्त्व परक ज्ञान-चेतन होता है. वह सत्यात्र का स्वयं वरण करता है। वह कैसे साधक का वरण करता है, यह तथ्य अगले मंत्र में स्पष्ट किया गया है।] नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः । नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् ॥ २४॥ जो मनुष्य दुष्कर्मों के पाप से निवृत्त नहीं है, जिनकी इन्द्रियाँ स्वयं के नियन्त्रण में नहीं हैं तथा जिनके मन पूरी तरह से सांसारिकता से निवृत्त नहीं हैं, ऐसे व्यक्ति प्रकृष्ट ज्ञानवान् होते हुए भी परिष्कृत जीवन के अभाव में इस आत्मतत्त्व को जानने में समर्थ नहीं होते ॥ २४ ॥

६० कठोपनिषद् यस्य ब्रह्म च क्षत्रं चोभे भवत ओदनः। मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ॥ २५ ॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि सभी जिस परमात्मा का ओदन (अन्न-आहार) माने जाते हैं, स्वयं मृत्यु (काल) जिसका उपसेचन (शाकादि या जल की तरह आहार का सहयोगी) है, वह जहाँ भी है, जैसा है, उसे भला कौन जान सकता है ॥ २५ ॥ [ इस मन्त्र में 'ब्रह्म एवं क्षत्र' सम्बोधन उपलक्षण रूप में प्रयुक्त प्रतीत होते हैं। ब्रह्म से सहज धर्मानुशासन अथवा विचार शक्ति का तथा क्षत्र से रक्षण या पुरुषार्थ की शक्ति का बोध होता है। इस प्रकार ये सम्बोधन जीव मात्र की विशेषताओं के प्रतीक सिद्ध होते हैं। वह परमात्म तत्त्व समय आने पर जीव मात्र को मृत्यु के संयोग से अपने अन्दर समाहित कर लेता है।] ॥ तृतीया वल्ली ॥ ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे । छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः ॥ १ ॥ (यम ने कहा-) ब्रह्मवेत्ताओं का ऐसा कथन है कि श्रेष्ठ कर्मों के फलस्वरूप प्राप्त मनुष्य शरीर में सर्वश्रेष्ठ स्थल अन्तःकरण रूपी गुहा में स्थित कर्मफल को भोगने वाले दो परस्पर भिन्न तत्त्व छाया और धूप के सदृश विद्यमान हैं। जो तीन बार नाचिकेत अग्नि का चयन करने वाले और पञ्चाग्नि (गार्हपत्य, दक्षिण, आहवनीय, सभ्य और आवसथ्य) विद्या के साधक हैं, उनका भी ऐसा ही कथन है ॥ १ ॥ यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत्परम् । अभयं तितीर्षतां पारं नाचिकेत ँ शकेमहि ॥ जो श्रेष्ठ कर्मों के निष्पादक, साधकों को भवसागर से पार करने में समर्थ सेतु स्वरूप हैं, उस नाचिकेत अग्नि को हम भली प्रकार समझें। संसार रूप समुद्र से पार जाने के इच्छुक साधकों के लिए जो भयरहित सर्वश्रेष्ठ आश्रय (अवलम्बन) है, उस अक्षर ब्रह्म (नाशरहित परमात्मतत्त्व) को जानने में हम सक्षम हों ॥ २ ॥ आत्मानँ रथिनं विद्धि शरीर ँ रथमेव तु। बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥ ३ हे नचिकेता ! आप आत्मतत्त्व को रथी (शरीररूपी वाहन का स्वामी), शरीर को रथ (वाहन), बुद्धि को रथ संचालक सारथि तथा मन को (इन्द्रियों रूपी अश्वों को वश में करने वाली) लगाम जानें ॥ ३ ॥ इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयाँस्तेषु गोचरान् । आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ॥ मनीषियों ने इन्द्रियों को अश्व की संज्ञा दी है तथा (रूप-रस-गन्धादि) विषयों को गोचर (इन्द्रियों रूपी अश्वों के विचरण करने का मार्ग) बतलाया है। इस प्रकार शरीर, इन्द्रिय एवं मन से युक्त आत्मा को (सुख-दुःखादि का अनुभव करने वाला) भोक्ता बताया गया है ॥ ४ ॥ यस्त्वविज्ञानवान्भवत्ययुक्तेन मनसा सदा । तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः ॥ ५ ॥ जो सदा विवेकहीन बुद्धि वाला और अनियन्त्रित इन्द्रियों वाला होता है, उसकी इन्द्रियाँ उसी प्रकार उच्छृङ्खल हो जाती हैं, जिस प्रकार अविवेकी सारथि के दुष्ट अश्व ॥ ५ ॥

अध्याय १ वल्ली ३ मन्त्र १४ ६१

अध्याय १ वल्ली ३ मन्त्र १४ ६१ यस्तु विज्ञानवान्भवति युक्तेन मनसा सदा । तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः ॥ ६ ॥ परन्तु जो विवेकशील बुद्धि वाले तथा नियन्त्रित मन वाले हैं, उनकी इन्द्रियाँ उसी प्रकार नियन्त्रित रहती हैं, जिस प्रकार श्रेष्ठ सारथि के वश में अच्छे घोड़े ॥ ६ ॥ यस्त्वविज्ञानवान्भवत्यमनस्कः सदाऽशुचिः। न स तत्पदमाप्नोति संसारं चाधिगच्छति ॥ ७ ॥ जो अविवेकयुक्त बुद्धि वाला, निग्रहरहित मन वाला और सदैव अशुद्ध रहने वाला है, वह कभी परमपद को प्राप्त नहीं कर सकता, वरन् बारम्बार संसार के जन्म-मरण-चक्र में परिभ्रमण करता रहता है॥ यस्तु विज्ञानवान्भवति समनस्कः सदा शुचिः । स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद्भूयो न जायते ॥ ८ ॥ किन्तु जो विवेक बुद्धि वाला, नियन्त्रित मन वाला और सदैव पवित्र रहने वाला है, वह उस परमपद को प्राप्त कर लेता है, जहाँ से पुनरावर्तन नहीं होता ॥ ८ ॥ विज्ञानसारथिर्यस्तु मनःप्रग्रहवान्नरः । सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ ९ ॥ जो मनुष्य विवेकयुक्त बुद्धिरूप सारथि वाला और मन को संयत रखने वाला है, वह संसार सागर से पार होकर विष्णु भगवान् के परमपद को प्राप्त कर लेता है ॥ ९ ॥ इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः। मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान्परः ॥ इन्द्रियों की अपेक्षा उनके विषय अधिक श्रेष्ठ हैं, विषय से मन श्रेष्ठ है, मन से बुद्धि और बुद्धि से भी उत्कृष्ट यह महान् आत्मा है ॥ १० ॥ महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः । पुरुषान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परा गतिः ॥ जीवात्मा से (ईश्वर की) अव्यक्त शक्ति श्रेष्ठ है, अव्यक्त शक्ति से वह पुरुष (परमपुरुष परमेश्वर) श्रेष्ठ है, उस परम पुरुष से श्रेष्ठ अन्य कुछ भी नहीं है। वह सबकी पराकाष्ठा और परमगति है ॥ ११ ॥ एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते । दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ॥ १२ ॥ समस्त प्राणियों में छिपा हुआ यह आत्मतत्त्व प्रकाशित नहीं होता, वरन् सूक्ष्म दृष्टि रखने वाले तत्त्वदर्शियों को सूक्ष्म बुद्धि से ही दिखाई देता है ॥ १२ ॥ यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञान आत्मनि । ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि ॥ १३ ॥ बुद्धिमान् (प्रज्ञावान्) व्यक्ति के लिए उचित है कि वह सर्वप्रथम वाक् आदि इन्द्रियों को मन में लीन करे, मन को ज्ञान स्वरूप बुद्धि में निरुद्ध करे, बुद्धि को महान् तत्त्व (आत्मा) में विलीन करे और उस आत्मा को परमपुरुष परमात्मा में नियोजित करे ॥ १३ ॥ उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत । क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥ १४॥

६२ कठोपनिषद् (हे मनुष्यो!) जागो, उठकर खड़े होओ और श्रेष्ठ व ज्ञानी पुरुषों से ज्ञान प्राप्त करके परमात्म तत्त्व को जानो। विद्वज्जन कहते हैं कि यह मार्ग उतना ही दुरूह है, जितना कि क्षुरे की धार पर चलना ॥ १४॥ अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत् । अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तन्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते ॥ १५ ॥ वह परब्रह्म शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध से रहित है अर्थात् इन सबसे परे है। वह अविनाशी, अनादि और अनन्त है। वह आत्मा से भी उत्कृष्ट और ध्रुव (सत्यस्वरूप) है। उस परम तत्त्व को जानकर मनुष्य मृत्यु के मुख से छूट जाता है ॥ १५ ॥ नाचिकेतमुपाख्यानं मृत्युप्रोक्तँ सनातनम् । उक्त्वा श्रुत्वा च मेधावी ब्रह्मलोके महीयते ॥ १६ ॥ नचिकेता के प्रति यमराज द्वारा उपदिष्ट इस सनातन उपाख्यान को जो मेधावी पुरुष कहते और सुनते हैं, वे ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं ॥ १६ ॥ य इमं परमं गुह्यं श्रावयेद् ब्रह्मसंसदि । प्रयत: श्राद्धकाले वा तदानन्त्याय कल्पते तदानन्त्याय कल्पत इति ॥ १७ ॥ इस परम गूढ़ रहस्य को जो व्यक्ति शुद्ध भावना से ब्राह्मणों की सभा में अथवा श्राद्ध काल में सुनाता है, वह व्यक्ति (इस पुण्य कार्य के प्रभाव से) अनन्त (पुरुषार्थ या फल या परमात्मा) की प्राप्ति में समर्थ हो जाता है, निश्चित रूप से वह अनन्त को प्राप्त करता है ॥ १७॥ [यहाँ "ब्रह्म संसद" ब्रह्मोन्मुख होकर साधनारत व्यक्तियों अथवा वृत्तियों के समूह के लिए प्रयुक्त सम्बोधन माना जा सकता है। इसी प्रकार 'श्राद्ध काले' का भाव जब श्रद्धा का उभार होता है, ऐसे अवसर का संकेत करता है। ब्रह्मोन्मुखी तथा श्रद्धासिक्तों के बीच यह तथ्य प्रकट करना निश्चित रूप से अनन्त फलदायक हो सकता है। उक्त परिस्थितियाँ न हों, तो इस विद्या का उल्लेख केवल जानकारी बढ़ाने तक ही सीमित रह जाता है।] ॥ अथ द्वितीयोऽध्यायः ॥ ॥ प्रथमा वल्ली ॥ पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयंभूस्तस्मात्पराङ् पश्यति नान्तरात्मन् । कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ॥ १ ॥ स्वयंभू (परमात्मा) ने समस्त इन्द्रिय द्वार बहिर्मुख करके निर्मित किये हैं। इसलिए जीवात्मा बाह्य विषयों को ही देखता है- अन्तरात्मा को नहीं देखता। अमरत्व की आकांक्षा से जिसने अपनी चक्षु आदि इन्द्रियों पर संयम कर लिया है, ऐसा कोई धीर पुरुष ही अन्तरात्मा (प्रत्यगात्मा) को देख सकता है ॥ १ ॥ पराचः कामाननुयन्ति बालास्ते मृत्योर्यन्ति विततस्य पाशम् । अथ धीरा अमृतत्वं विदित्वा ध्रुवमध्रुवेष्विह न प्रार्थयन्ते ॥ २॥ बालबुद्धि व्यक्ति ही बाह्य भोगों का अनुगमन करते हैं। ऐसा करने वाले व्यक्ति मृत्यु के भयंकर पाश में फँसते हैं; किन्तु विवेकवान् पुरुष अमरता को अटल जानकर जगत् के अनित्य पदार्थों की कामना नहीं करते ॥ २ ॥

अध्याय २ वल्ली १ मन्त्र ९ ६३

अध्याय २ वल्ली १ मन्त्र ९ ६३ मंत्र क्र. ३ से १३ तक यमदेव ने 'एतद्वै तत्- यही है वह' कहा है। लगता है कि व्याख्या के साथ नचिकेता को उस तत्त्व की अनुभूति भी कराते जा रहे हैं तथा उस तथ्य को दिखाते हुए कहते हैं-यही है वह - रहस्य, विद्या, आत्मतत्त्व या परमात्म तत्त्व, जिसे तुम समझना चाहते हो- येन रूपं रसं गन्धं शब्दान्स्पर्शाँश्च मैथुनान्। एतेनैव विजानाति किमत्र परिशिष्यते, एतद्वै तत् ॥ ३ ॥ जिस अन्तश्चेतना के अनुग्रह से मनुष्य शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध आदि इन्द्रिय सुखों का अनुभव करता है, उसी के अनुग्रह से यह भी जानता है कि यहाँ क्या अवशिष्ट रहता है ? यही (जो रह जाता है अथवा जानता है) वह (आत्मतत्त्व अथवा परमात्म तत्त्व) है ॥ ३॥ स्वप्नान्तं जागरितान्तं चोभौ येनानुपश्यति । महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ ४॥ जिस चेतना के द्वारा मनुष्य जाग्रत् और स्वप्न दोनों स्थितियों में दृश्यमान पदार्थों को देखता है, उस सर्वव्यापी और महान् सर्वात्मा को जानकर धीर (बुद्धिमान्) पुरुष किसी भी स्थिति में शोक नहीं करते ॥ ४ ॥ य इमं मध्वदं वेद आत्मानं जीवमन्तिकात् । ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते, एतद्वै तत् ॥ ५ ॥ जो पुरुष जीवन प्रदान करने वाले, कर्मफल प्रदान करने वाले और भूत, भविष्यत् एवं वर्तमान काल में शासन करने वाले (आत्मतत्त्व) को अपने अत्यन्त समीप समझता है, वह उनके इस स्वरूप को कभी नहीं भूलता, न किसी की निन्दा करता है और न ही किसी से घृणा करता है। यही वह (परब्रह्म) है ॥ ५ ॥ यः पूर्वं तपसो जातमद्भ्यः पूर्वमजायत । गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तं यो भूतेभिर्व्यपश्यते, एतद्वै तत् ॥ ६ ॥ जो अपने तप से जल आदि पञ्चमहाभूतों से भी पूर्व उत्पन्न हुए तथा सबकी हृदय गुहा में निवास करने वाले ब्रह्म को इसी (उपर्युक्त) रूप में देखता है, वह यथार्थ जानता है। यही वह 'ब्रह्म' है ॥ ६ ॥ या प्राणेन संभवत्यदितिर्देवतामयी । गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तीं या भूतेभिर्व्यजायत, एतद्वै तत् ॥ ७ ॥ देव क्षमता सम्पन्न अदिति (देवमाता अदिति या अखण्ड चेतना) जो सर्वप्रथम प्राणों (जीवनी शक्ति) सहित उत्पन्न होती है, वह सभी की हृदय गुहा में प्रविष्ट होकर वहीं निवास करती है। यही वह ब्रह्म है ॥ अरण्योर्निहितो जातवेदा गर्भ इव सुभृतो गर्भिणीभिः । दिवे दिव ईड्यो जागृवद्भिर्हविष्मद्भिर्मनुष्येभिरग्निः, एतद्वै तत् ॥ ८ ॥ जिस प्रकार गर्भवती स्त्रियों द्वारा विधिवत् पोषित गर्भ धारण किया जाता है, उसी प्रकार जातवेदा अग्नि दो अरणियों के मध्य स्थित रहता है। वह प्रज्वलित होकर, हवन करने योग्य सामग्रियों से युक्त पुरुषों द्वारा प्रतिदिन स्तुत्य होता है। यही वह ब्रह्म है ॥८॥ यतश्चोदेति सूर्योऽस्तं यत्र च गच्छति । तं देवाः सर्वेऽर्पितास्तदु नात्येति कश्चन, एतद्वै तत् ॥ ९ ॥ जहाँ से सूर्यदेव उदित होते हैं और जहाँ तक जाते हैं अर्थात् अस्त होते हैं, वहाँ समस्त देव शक्तियाँ

६४ कठोपानषद विद्यमान हैं, उसे कोई भी लाँघने में समर्थ नहीं है। यही वह (परमेश्वर) है ॥ ९ ॥ यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह । मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥ १० ॥ जो सर्वप्रथम परमेश्वर को इहलोक और परलोक में अलग-अलग रूपों में देखता है, वह मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है अर्थात् उसे बारम्बार जन्म-मरण के चक्र में फँसना पड़ता है ॥ १० ॥ मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानास्ति किंचन । मृत्योः स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति ॥ ११ ॥ सत्य अथवा शुद्ध मन से ही परमात्मा का तत्त्व जाना जा सकता है। इस जगत् में ईश्वर के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है; किन्तु जो व्यक्ति इसमें भिन्नता देखता है, वह मृत्यु से मृत्यु का वरण करता है ॥ ११ ॥ अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति । ईशानो भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते, एतद्वै तत् ॥ १२ ॥ जो परम पुरुष अङ्गुष्ठ परिमाण में प्राणी की देह के मध्य भाग में स्थित है, वह भूत, भविष्यत् और वर्तमान का शासक है। उसे इस प्रकार जान लेने के बाद प्राणी न तो किसी की निन्दा करता है और न ही किसी से घृणा करता है। यही वह ब्रह्म है ॥ १२ ॥ अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः । ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः, एतद्वै तत् ॥ १३ ॥ वह अङ्गुष्ठ परिमाण वाला परमात्मा धुएँ से रहित प्रखर ज्योति के समान है, जो सब पर शासन करता है। वह (नित्य सनातन) ब्रह्म जैसा कल था, वैसा ही आज भी (अपरिवर्तनीय) है। यही वह परब्रह्म है ॥ १३ ॥ यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति । एवं धर्मान्पृथक् पश्यंस्तानेवानुविधावति ॥ १४ ॥ जिस प्रकार वर्षा का जल ऊँचे शिखरों पर बरस कर पहाड़ के नीचे विभिन्न स्थलों में चला जाता है, उसी प्रकार विभिन्न धर्म-सम्प्रदाय वालों (अथवा विभिन्न स्वभाव वाले मनुष्यों-असुरों और देवों) को जो परमेश्वर से भिन्न देखता है, वह उन्हीं का अनुगमन करता है (अर्थात् उस बिखरे जल की तरह विभिन्न देव-असुर आदि के लोकों व योनियों में भटकता रहता है) ॥ १४ ॥ यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति । एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम ॥ १५ ॥ हे गौतम (नचिकेता) ! जिस प्रकार शुद्ध जल सिंचित होने पर (जहाँ जाता है ) उसी रूप में बदल जाता है, इसी प्रकार ज्ञानी (इस तथ्य को समझ लेने वाले) की आत्मा भी उसी प्रकार हो जाती है ॥ १५ ॥ [ यमदेव शुद्ध जल के उदाहरण से आत्म तत्त्व को समझा रहे हैं। शुद्ध जल जिस किसी पात्र में जाता है, उसी रूप में ढल जाता है । पौधों में वह उनका रस, प्राणियों में उनका रक्त बन जाता है , उसे कोई विकार नहीं होता। ज्ञानी अपनी चेतना को पदार्थ आदि भोगों से अलिप्त रखता है, इसलिए वह शुद्ध जल की तरह किसी के भी साथ एकाकार हो सकता है। विभिन्न विषयों से लेकर देवशक्तियों तथा परमात्म तत्त्व के साथ वह एकरूप हो सकता है। नचिकेता उसी अलिप्त रहने की क्षमता से सम्पन्न साधक को कहा जाता है। उसको सत्पात्र समझ कर ही यमदेव यह विद्या उपलब्ध कराते हैं।]

अध्याय २ वल्ली २ मन्त्र ७ ६५

अध्याय २ वल्ली २ मन्त्र ७ ६५ ॥ द्वितीया वल्ली ॥ पुरमेकादशद्वारमजस्यावक्रचेतसः । अनुष्ठाय न शोचति विमुक्तश्च विमुच्यते, एतद्वै तत् ॥ १ ॥ चैतन्य और अज परब्रह्म का नगर ग्यारह द्वारों वाला है (दो नेत्र, दो कान, दो नाक के छिद्र, एक मुख, नाभि, गुदा, जननेन्द्रिय और ब्रह्मरन्ध्र शरीर के ये ग्यारह छिद्र ही ग्यारह द्वार हैं)। उस परमेश्वर का निष्ठापूर्वक ध्यान-अनुष्ठान करने वाला जीव कभी शोक नहीं करता और शरीर के स्थित रहते हुए ही कर्म बन्धन से मुक्त हो जाता है। यही है वह (परब्रह्म) ॥ १ ॥ हंसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत् । नृषद्वरसदृतसदव्योमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत् ॥ २ ॥ वह हंस (जीवात्मा या परब्रह्म) प्रकाशित है, वही अन्तरिक्ष में स्थित वसु है, घरों में होने वाला अतिथि भी वही है। यज्ञवेदिका पर स्थित अग्नि और आहुति प्रदान करने वाला होता भी वही है। मनुष्यों में श्रेष्ठ देव, पितृ आदि रूपों में भी वही प्रतिष्ठित है। वही सत्य और आकाश में भी निवास करने वाला है। जल, पर्वतों, पृथ्वी, और सत्कर्मों में प्रकट होने वाला वही परम सत्य है ॥ २ ॥ ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयत्यपानं प्रत्यगस्यति । मध्ये वामनमासीनं विश्वेदेवा उपासते ॥ ३ ॥ जो ब्रह्म प्राण तत्त्व को ऊर्ध्वगामी करता है और अपान वायु को अधोगामी करता है, हृदय के मध्य स्थित उस वामन (भजन करने योग्य) की सभी देवगण उपासना करते हैं ॥ ३ ॥ अस्य विस्रंसमानस्य शरीरस्थस्य देहिनः । देहाद्विमुच्यमानस्य किमत्र परिशिष्यते, एतद्वै तत् ॥ ४ ॥ शरीर में स्थित एक देह से दूसरे देह में गमन करने के स्वभाव वाला यह जीवात्मा जब एक शरीर को छोड़कर दूसरे में (मृत्यूपरान्त) चला जाता है, तब क्या शेष रहता है? यही वह ब्रह्म है ॥ ४ ॥ न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन । इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ ॥ ५ ॥ हे गौतम ! कोई भी मरणधर्मा प्राणी न प्राण की शक्ति से और न ही अपान की शक्ति से जीवित रहता है, वरन् उसे जीवन प्रदान करने वाला कोई अलग ही तत्त्व है। जिसके आश्रय में प्राण और अपान ये दोनों ही रहते हैं ॥ ५ ॥ हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं ब्रह्म सनातनम् । यथा च मरणं प्राप्य आत्मा भवति गौतम ॥ ६ ॥ (यमराज का कथन-) हे (गौतम वंशीय) नचिकेता ! अब मैं तुम्हें उस नित्य सनातन परब्रह्म का रहस्य बतलाऊँगा तथा यह भी वर्णन करूँगा कि मृत्यु के बाद आत्मा का क्या होता है अर्थात् वह कहाँ जाता है? ॥ ६ ॥ योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः । स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम् ॥ ७ ॥ अपने-अपने कर्म और शास्त्राध्ययन के अनुसार प्राप्त हुए भाव के कारण कुछ जीवात्मा तो शरीर धारण करने के लिए विभिन्न योनियों को प्राप्त करते हैं और अन्य (कितने ही अपने कर्मानुसार) स्थावरत्व को प्राप्त होते हैं (अर्थात् वृक्ष, लता, पर्वत आदि जड़ योनियों में जाते हैं) ॥ ७ ॥

६६ कठोपानिषद् य एष सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्मिमाणः। तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते। तस्मिँल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन, एतद्वै तत्॥ ८॥ समस्त जीवों के कर्मानुसार उनके निमित्त भोगों का निर्माण और व्यवस्था करने वाला परम पुरुष परमात्मा सबके सो जाने पर भी जाग्रत् रहता है। वही विशुद्ध तत्त्व, परब्रह्म अविनाशी कहलाता है, जिसे कोई लाँघ नहीं सकता और समस्त लोक जिसका आश्रय ग्रहण किये रहते हैं। वही यह ब्रह्म है॥ ८॥ अब यम यह समझाते हैं कि परमात्मा की तरह अग्नि आदि तत्त्व भी अलिप्त रहकर ही विश्वरूप बन पाते हैं- अग्निर्ग्रथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव। एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ ९ ॥ जिस प्रकार एक ही अग्नि तत्त्व सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में प्रविष्ट होकर प्रत्येक आधारभूत वस्तु के अनुरूप हो जाता है, उसी प्रकार समस्त प्राणियों में स्थित अन्तरात्मा (ब्रह्म) एक होने पर भी अनेक रूपों में प्रतिभासित होता है। वही उनके बाहर भी है ॥९॥ वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव। एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ १०॥ जिस प्रकार इस लोक में प्रविष्ट वायु एक होता हुआ भी प्रत्येक रूप के अनुसार (अर्थात् विभिन्न वस्तुओं के संयोग से) भिन्न-भिन्न शक्तियुक्त प्रतीत होता है, उसी प्रकार समस्त प्राणियों में विद्यमान परमात्मा एक होने पर भी विभिन्न रूप वाला प्रतीत होता है। वही उनके बाहर भी है॥ १०॥ सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुर्न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः । एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः ॥ ११ ॥ जिस प्रकार समस्त ब्रह्माण्ड का चक्षुरूप सूर्य प्राणियों के चक्षुओं से उत्पन्न होने वाले बाह्य दोषों से लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार सब भूतों (प्राणियों) में आत्मारूप से स्थित परमेश्वर-उन जीवों के दुःख - क्लेश आदि से लिप्त नहीं होता। सब भूतों के अन्तर में रहकर भी वह बाहर ही विराजमान है॥ ११ ॥ एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति। तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥ १२॥ समस्त शरीरधारियों में (अन्तरात्मा के रूप में) निवास करने वाला तथा सबको वश में रखने वाला परब्रह्म एक होते हुए भी अनेक रूप धारण कर लेता है। जो विद्वान् सदैव अपने अन्तःस्थल में स्थित उस परब्रह्म के दर्शन करते हैं, उन्हें ही शाश्वत सुख प्राप्त होता है, अन्यों को नहीं ॥ १२॥ नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान् । तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम् ॥ १३ ॥ जो समस्त चैतन्यों में चैतन्य और नित्यों में भी नित्य है, जो एकाकी होते हुए समस्त जीवों के कर्मानुसार उनका फल प्रदाता है, उस आत्मस्थ परमेश्वर का बुद्धिमान् जन निरन्तर दर्शन करते रहते हैं। ऐसे मेधावी पुरुष ही शाश्वत शान्ति प्राप्त करते हैं, दूसरे नहीं ॥१३॥ तदेतदिति मन्यन्तेऽनिर्देश्यं परमं सुखम् । कथं नु तद्विजानीयां किमु भाति विभाति वा ॥ १४॥

अध्याय २ वल्ली ३ मन्त्र ५ ६७

अध्याय २ वल्ली ३ मन्त्र ५ ६७ उस अनिर्वचनीय आनन्द को ही विद्वज्जन ब्रह्म मानते हैं। उस परब्रह्म को किस तरह जाना जाय ? क्या वह प्रत्यक्षतः प्रकट होता है अथवा अनुभव से जानने योग्य है ? ॥ १४ ॥ न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः । तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ १५ ॥ वहाँ (ब्रह्म के निकट) न सूर्य प्रकाशित होता है, न चन्द्रमा, न तारागण और न विद्युत् ही प्रकाशित होती है, फिर यह (लौकिक) अग्नि किस तरह प्रकाशित हो सकती है ? उसके (परब्रह्म के) प्रकाश से ही ये सब प्रकाशित होते हैं। सम्पूर्ण जगत् उसके ही प्रकाश से प्रकाशित है ॥ १५ ॥ ॥ तृतीया वल्ली ॥ ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः । तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते । तस्मिँल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन, एतद्वै तत् ॥ १ ॥ जिसकी जड़ें ऊपर और शाखाएँ नीचे की ओर हैं, वह अश्वत्थ वृक्ष सनातन है। वह विशुद्ध तत्त्व अविनाशी है, वही ब्रह्म है। समस्त लोक उसी का आश्रय ग्रहण करते हैं, उसका कोई भी अतिक्रमण नहीं कर सकता, यही वह ब्रह्म है ॥१ ॥ [ वृक्ष की जड़ों से एक जैसा ही रस संचरित होता है। पत्तियों, पुष्पों में वह वृक्ष के गुण के अनुसार रूपान्तरित हो जाता है। सृष्टि रूपी सनातन वृक्ष का मूल ऊपर अनन्ताकाश में है। वहाँ से संचरित रस सृष्टि के घटकों में पहुँच कर अनेक रूपों में प्रकट होता है। ] यदिदं किं च जगत्सर्वं प्राण एजति निःसृतम् । महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ २ ॥ यह सम्पूर्ण विश्व उस प्राणरूप ब्रह्म से ही निःसृत(प्रकट) होकर उसी में गतिशील है। जो उस महान् भयंकर प्रहारोद्यत वज्र की तरह ब्रह्म को जानते हैं, वे अमृतत्व को प्राप्त करते हैं ॥ २ ॥ भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यः । भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः ॥ ३ ॥ इन परब्रह्म के भय से अग्निदेव तपते हैं, इन्हीं के भय से सूर्यदेव तपते हैं, इन्हीं के भय से इन्द्र, वायु और पाँचवें मृत्यु देवता दौड़ते हैं। (अर्थात् परब्रह्म की आज्ञानुसार ही सभी देवता अपने-अपने नियत कार्य सम्पन्न करते हैं) ॥ ३ ॥ इह चेदशकद्बोद्धुं प्राक् शरीरस्य विस्रसः । ततः सर्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय कल्पते ॥ शरीरान्त होने से पूर्व ही यदि (व्यक्ति) ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त कर लेता है, तो (जीव) बन्धन से छूट जाता है। यदि नहीं प्राप्त कर पाया, तो (बारम्बार) विभिन्न योनियों में भ्रमण करता है ॥ ४ ॥ [ यहाँ ज्ञान का अर्थ स्थूल जानकारी मात्र नहीं है, उसे अनुभवगम्य बनाने की आवश्यकता है।] यथादर्शे तथात्मनि यथा स्वप्ने तथा पितृलोके । यथाप्सु परीव ददृशे तथा गन्धर्वलोके छायातापयोरिव ब्रह्मलोके ॥ ५ ॥ विशुद्ध अन्तःकरण दर्पण के समान है अर्थात् जिस प्रकार निर्मल दर्पण में वस्तु का स्वरूप स्पष्ट दिखाई पड़ता है, उसी प्रकार विशुद्ध अन्तःकरण में ब्रह्म का स्वरूप स्पष्ट दिखता है। पितृलोक में ब्रह्म का

६८ कठोपनिषद् रूप स्पष्ट नहीं दिखता है (क्योंकि प्राणियों को पूर्व जन्म की स्मृति रहने के कारण उनका सम्बन्ध पूर्व सम्बन्धियों से बना रहता है)। गन्धर्व लोक में भी ब्रह्म का स्वरूप जल (की लहरों) के समान अस्पष्ट दिखाई पड़ता है (क्योंकि वहाँ भोगों से लिप्त रहने के कारण ब्रह्म दर्शन ठीक से नहीं हो पाता); किन्तु ब्रह्मलोक में छाया और धूप की भाँति आत्मा और परमात्मा का स्वरूप स्पष्ट परिलक्षित होता है ॥ ५॥ इन्द्रियाणां पृथग्भावमुदयास्तमयौ च यत् । पृथगुत्पद्यमानानां मत्वा धीरो न शोचति ॥ उदय और लय होते रहने के स्वभाव से युक्त अलग-अलग स्थानों में स्थित अनेक रूपों वाली इन्द्रियों को जानने वाला ज्ञानी पुरुष कभी शोक नहीं करता ॥ ६ ॥ इन्द्रियेभ्यः परं मनो मनसः सत्त्वमुत्तमम् । सत्त्वादधि महानात्मा महतोऽव्यक्तमुत्तमम्। इन्द्रियों से मन उत्तम है, मन से बुद्धि श्रेष्ठ है, बुद्धि से जीवात्मा उत्कृष्ट है और जीवात्मा की अपेक्षा अव्यक्त शक्ति उत्तम है ॥ ७॥ अव्यक्तात्तु परः पुरुषो व्यापकोऽलिङ्ग एव च। यं ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरमृतत्वं च गच्छति ॥ ८॥ अव्यक्त शक्ति (प्रकृति) से व्यापक और आकार रहित परम पुरुष परमात्मा श्रेष्ठ है, जिसको जानकर जीवात्मा बन्धन से मुक्त हो जाता है और अमरत्व को प्राप्त होता है ॥ ८॥ न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम्। हृदा मनीषी मनसाऽभिक्लृप्तो य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ ९ ॥ इस ब्रह्म का यथार्थ रूप अपने समक्ष प्रकट नहीं होता। परमेश्वर के दिव्य स्वरूप को कोई इन चर्म- चक्षुओं से नहीं देख सकता। मन को वश में करने वाली विवेक बुद्धि तथा सद्भाव सम्पन्न हृदय द्वारा बारम्बार चिन्तन-मनन करने से ही उसका सम्यक् दर्शन हो सकता है। जो ब्रह्म को इस प्रकार जानते हैं, वे अमृतत्व को प्राप्त करते हैं ॥ ९ ॥ यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह । बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहुः परमां गतिम् ॥ जब मन के साथ पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ (आत्मतत्त्व में) स्थिर हो जाती हैं और बुद्धि भी चेष्टारहित हो जाती है, तब इस स्थिति को (जीवात्मा की) परमगति कहते हैं ॥ १० ॥ तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम् । अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ॥ ११ ॥ इस प्रकार इन्द्रियों की स्थिर धारणा का नाम ही योग माना जाता है। उस समय साधक प्रमाद रहित हो जाता है; किन्तु यह योग उदय और अस्त होने के स्वभाव से युक्त है (अतः परमात्मेच्छु को योग युक्त रहने का दृढ़ अभ्यासी होना चाहिए) ॥ ११ ॥ नैव वाचा न मनसा प्राप्तुं शक्यो न चक्षुषा । अस्तीति ब्रुवतोऽन्यत्र कथं तदुपलभ्यते ॥१२॥ उस परमात्मा को न वाणी के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है और न नेत्रों से। उसे मन के द्वारा भी नहीं प्राप्त किया जा सकता है। 'वह ब्रह्म अवश्य है' ऐसा कहने मात्र से भला उसे कौन प्राप्त कर सकता है ? ॥ १२ ॥ अस्तीत्येवोपलब्धव्यस्तत्त्वभावेन चोभयोः। अस्तीत्येवोपलब्धस्य तत्त्वभावः प्रसीदति ॥ १३ ॥

अध्याय २ वल्ली ३ मन्त्र १८ ६९

अध्याय २ वल्ली ३ मन्त्र १८ ६९ अस्ति (वह है) और नास्ति (वह नहीं है) इन दो मान्यताओं में तत्त्वभाव (समस्त इन्द्रियादि सहित मन-बुद्धि को एक करके अनुभव करने की क्षमता) द्वारा 'अस्ति' भाव ही प्राप्त करने योग्य है। इस प्रकार की उपलब्धि करने वाले से (अन्तःचेतन) प्रसन्न होता है। (वह आत्मदेव ही प्रसन्न होकर ब्रह्मानुभूति का मार्ग खोल देता है) ॥ १३ ॥ यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः। अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते। व्यक्ति के हृदय में अनेक प्रकार की सांसारिक कामनाएँ रहती हैं, जब इनका समूल विनाश हो जाता है, तब मनुष्य यहीं (इसी संसार में) ईश्वर का साक्षात्कार कर लेता है और अमर हो जाता है ॥१४॥ [ अन्य कामनाएँ रहते तत्त्वभाव बिखरा रहता है। उसके एक होने पर ही साक्षात्कार की स्थिति बनती है।] यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रन्थयः। अथ मर्त्योऽमृतो भवत्येतावद्ध्यनुशासनम्॥ १५॥ जब हृदय-ग्रन्थियाँ खुल जाती हैं, तब यह मरणधर्मा मनुष्य अमरत्व को प्राप्त करता है, यही वेदान्त का अनुशासन है ॥ १५॥ शतं चैका च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका । तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वङ्डन्या उत्क्रमणे भवन्ति ॥ १६ ॥ हृदय में एक सौ एक नाड़ियों का समूह है, उसमें से एक मूर्धा (कपाल) का भेदन करके बाहर निकलती है। उसके द्वारा ऊर्ध्वगमन करने वाला साधक अमृतत्व को प्राप्त करता है। अन्य अवशिष्ट नाड़ियाँ प्राणोत्सर्ग में सहायक होती हैं। (उनसे निकला प्राण कामनाओं के अनुरूप विभिन्न योनियों में जाता है) ॥ अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये संनिविष्टः। तं स्वाच्छरीरात् प्रवृहेन्मुञ्जादिवेषीकां धैर्येण। तं विद्याच्छुक्रममृतं तं विद्याच्छुक्रममृतमिति ॥ १७॥ सबका अन्तरात्मा अङ्गुष्ठ परिमाण वाला है, जो परम पुरुष (परब्रह्म) के रूप में सदैव सबके हृदय देश में प्रतिष्ठित है। जिस प्रकार मूँज से उसकी सींक अलग की जाती है, उसी प्रकार मनुष्य के लिए उचित है कि वह धैर्यपूर्वक अपनी आत्मा को शरीर से पृथक् करे (पृथक् करके देखे-अनुभव करे), उसे अमृत रूप और शुक्र (शुद्ध) समझे । वह अमृत स्वरूप ही है ॥ १७॥ मृत्युप्रोक्तां नचिकेतोऽथ लब्ध्वा विद्यामेतां योगविधिं च कृत्स्नम्। ब्रह्मप्राप्तो विरजोऽभूद्विमृत्युरन्योऽप्येवं यो विदध्यात्ममेव ॥ १८ ॥ मृत्यु (अर्थात् यमराज) द्वारा उपदिष्ट इस विद्या को पाकर नचिकेता समस्त विकारों से रहित और सर्वथा शुद्ध होकर जन्म-मृत्यु के बन्धन से मुक्त हो गया और ब्रह्मभाव (ब्रह्मत्व) को प्राप्त हो गया । अन्य कोई जो इस अध्यात्म तत्त्व को इस प्रकार समझेगा, वह भी ऐसी ही स्थिति प्राप्त करेगा अर्थात् वह भी ब्रह्मरूप होकर भवबन्धनों से मुक्त हो जायेगा ॥ १८॥ ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ सह नाववतु .......इति शान्तिः ॥ ॥ इति कठोपनिषत्समाप्ता ॥

॥ कनोपानषद् ॥ यह उपनिषद् सामवेदीय 'तलवकार ब्राह्मण' के नवें अध्याय के अन्तर्गत है। इसे तलवकार उपनिषद् तथा 'ब्राह्मणोपनिषद्' भी कहा जाता है। उपनिषद् का प्रारम्भ प्रश्न 'केनेषितं......' ( यह जीवन किसके द्वारा प्रेरित है ? ) से हुआ है। इसमें उस 'केन' ( किसके द्वारा ) का विवेचन होने से इसे 'केनोपनिषद्' कहा गया है। सर्वप्रेरक उस परब्रह्म की महिमा और उसके स्वरूप का बोध कराते हुए ऋषि ने स्पष्ट किया है कि कहने-सुनने में ब्रह्म तत्त्व जितना सुगम है, अनुभूति में वह उतना ही दुरूह है। प्रथम एवं द्वितीय खण्ड में गुरु-शिष्य संवाद के रूप में सुन्दर ढंग से उस प्रेरक सत्ता की विशेषताओं, उसकी अनुभूति तथा उसे जान लेने की अनिवार्य आवश्यकताओं का वर्णन किया गया है। तीसरे और चौथे खण्ड में देवताओं के अभिमान तथा मानमर्दन के लिए यक्ष रूप में ब्राह्मी चेतना के प्रकट होने का उपाख्यान है। बाद में उमादेवी द्वारा प्रकट होकर देवों के लिए ब्रह्म तत्त्व का वर्णन किया गया है। अन्त में परब्रह्म की उपासना के ढंग और फल का उल्लेख करते हुए ब्रह्मविद्या के संसाधनों के साथ उस रहस्य को जानने की महिमा का वर्णन है। ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक् प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ हे परमात्मन् ! हमारे सभी अङ्ग पुष्ट हों, हमारी वाणी, प्राण, नेत्र, श्रोत्र, बल और सम्पूर्ण इन्द्रियाँ पुष्ट हों । यह उपनिषद् ( प्रतिपादित ज्ञान ) ब्रह्म है, हम इसे अस्वीकार न करें । यह हमारा परित्याग न करे । हमारा इसके साथ अथवा इसका हमारे साथ अविच्छिन्न सम्बन्ध हो । उपनिषदों में जो ( धर्म, ज्ञान आदि ) वर्णित हैं, वे हममें प्रविष्ट हों, हममें समाविष्ट हों । त्रिविध तापों की शान्ति हो। ॥ प्रथमः खण्डः ॥ ॐ केनेषितं पतति प्रेषितं मनः केन प्राणः प्रथमः प्रैति युक्तः । केनेषितां वाचमिमां वदन्ति चक्षुः श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति ॥ १ ॥ किसके द्वारा प्रेरित किया हुआ यह मन अपने विषयों तक पहुँचता है ? किसके द्वारा नियोजित किया हुआ यह श्रेष्ठ प्राण चलता है ? किसके द्वारा प्रेरित की हुई वाणी को मनुष्य बोलते हैं ? कौन सा अव्यक्त देव हमारे नेत्रों और कानों को कार्य में नियुक्त करता है ? ॥ १॥ श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद्वाचो ह वाचः स उ प्राणस्य प्राणः । चक्षुषश्चक्षुरतिमुच्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥ २ ॥ जो ( परमात्मतत्त्व ) कर्णेन्द्रिय का श्रोत्र ( श्रवण शक्ति ) है, मन का मन ( मनन क्षमता ) है, वागिन्द्रिय की वाणी ( वाक् शक्ति ), प्राण का प्राण ( संचालक ) है, चक्षु का चक्षु ( दर्शन क्षमता ) है, अर्थात् जो इन सबका कारणभूत तत्त्व है, ( उसे जानने वाले ) धीर पुरुष ( जो चक्षु, श्रोत्र, मन आदि के आवेगों से उद्वेलित नहीं होते ) इस लोक से जाते हुए ( अथवा जीवन मुक्त होकर ) अमर हो जाते हैं ॥ २ ॥

न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनो न विद्मो न विजानीमो यथैतदनुशिष्या- दन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि। इति शुश्रुम पूर्वेषां ये नस्तद्व्याचचक्षिरे॥ ३ ॥ वहाँ (परब्रह्म परमात्मा तक) चक्षु आदि ज्ञानेन्द्रियों, वाक् आदि कर्मेन्द्रियों तथा मन की भी पहुँच नहीं है। उसे जानने की बुद्धि हममें नहीं है, न ही किसी अन्य की व्याख्या से यह संभव हो सकता है, क्योंकि वह ज्ञात और अज्ञात सभी तत्त्वों से सर्वथा परे है- ऐसा हमने अपने पूर्वाचार्यों के मुख से सुना है, जिन्होंने हमें उस ब्रह्म के विषय में भली-भाँति व्याख्या करके समझाया है ॥ ३ ॥ यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ४ ॥ जो वाणी के द्वारा वर्णित नहीं किया जा सकता; अपितु वाणी ही जिसकी महिमा से प्रकट होती है, उसे ही तुम ब्रह्म समझो। वाणी द्वारा निरूपित जिस तत्त्व की लोग उपासना करते हैं, वह ब्रह्म नहीं है ॥ यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम्। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ५ ॥ मन से जिसका मनन नहीं किया जा सकता; अपितु मन जिसकी महत्ता से मनन करता है, उसी को ब्रह्म समझो। मन द्वारा मनन किए हुए जिसकी लोग उपासना करते हैं, वह ब्रह्म नहीं है ॥ यच्चक्षुषा न पश्यति येन चक्षूंषि पश्यति। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ जिसे चक्षु के द्वारा नहीं देखा जा सकता; अपितु चक्षु जिसकी महिमा से देखने में सक्षम होता है, उसे ही तुम ब्रह्म जानो । चक्षु के द्वारा द्रष्टव्य जिस तत्त्व की लोग उपासना करते हैं, वह ब्रह्म नहीं है ॥ ६ ॥ यच्छ्रोत्रेण न शृणोति येन श्रोत्रमिदं श्रुतम्। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ श्रोत्र से जिसे नहीं सुना जा सकता; अपितु श्रोत्र जिसकी महत्ता से सुनने में सक्षम होता है, उसे ही तुम ब्रह्म जानो। श्रोत्रेन्द्रियगम्य जिस तत्त्व की लोग उपासना करते हैं, वह ब्रह्म नहीं है ॥ ७ ॥ यत्प्राणेन न प्राणिति येन प्राणः प्रणीयते। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ जो प्राण के द्वारा प्रेरित नहीं होता; किन्तु प्राण जिससे प्रेरित होते हैं, उसे ही तुम ब्रह्म जानो । प्राण शक्ति से क्रियाशील जिस तत्त्व की लोग उपासना करते हैं, वह ब्रह्म नहीं है ॥ ८ ॥ ॥ द्वितीयः खण्डः ॥ यदि मन्यसे सुवेदेति दभ्रमेवापि नूनं त्वं वेत्थ ब्रह्मणो रूपम्। यदस्य त्वं यदस्य च देवेष्वथ नु मीमांस्यमेव ते मन्ये विदितम्॥ १ ॥ (आचार्य का कथन) यदि तुम्हारी यह मान्यता हैं कि मैं ब्रह्म को भली-भाँति जान गया हूँ, तो निश्चय ही तुमने ब्रह्म का अत्यल्प अंश जाना है, क्योंकि उस परब्रह्म का जो अंश तुझमें है और जो अंश देवताओं में है, वह सब मिलकर भी ब्रह्म का पूर्ण स्वरूप नहीं है, अतः तुम्हारा जाना हुआ निश्चय ही विचारणीय है॥ १ ॥ नाहं मन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च। यो नस्तद्वेद तद्वेद नो न वेदेति वेद च ॥ २ ॥ (शिष्य का उत्तर) हमने ब्रह्म को भली-भाँति जान लिया है, ऐसा नहीं मानते और न ऐसा ही मानते हैं कि हम उसे पूर्णतया नहीं जानते; क्योंकि उसे जानते भी हैं। हम जानते हैं अथवा नहीं जानते-दोनों उत्तर अपूर्ण हैं। हमारे इस कथन को वही जानता है, जो उस ब्रह्म को जानता है ॥ २ ॥

७२ केनोपनिषद् यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः । अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम् ॥ जो यह मानता है कि ब्रह्म जानने में नहीं आता, वह ब्रह्म को जानता है एवं जो यह मानता है कि मैं ब्रह्म को जानता हूँ, वह उसे नहीं जानता; क्योंकि जानने का अभिमान करने वालों के लिए वह ब्रह्म जाना हुआ नहीं है और जानने के अभिमान से रहित पुरुष के लिए वह जाना हुआ है ॥ ३ ॥ प्रतिबोधविदितं मतममृतत्वं हि विन्दते । आत्मना विन्दते वीर्यं विद्यया विन्दतेऽमृतम् ॥ वह बोध जिसके द्वारा प्रत्येक वस्तु का ज्ञान प्राप्त हो जाता है , उसी से मनुष्य अमृत स्वरूप परब्रह्म को प्राप्त करता है । आत्मा ( अथवा आत्मज्ञान ) के द्वारा मनुष्य बल को प्राप्त करता है, उसी आत्मा के बल को जानने की विद्या से वह अमृतस्वरूप परमात्मा को प्राप्त कर लेता है ॥ ४ ॥ इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः । भूतेषु भूतेषु विचित्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥ ५ ॥ जिसने यदि इसी जन्म में उस परब्रह्म को प्राप्त कर लिया, तो उसने यथार्थ ( लक्ष्य ) पा लिया, जो इस जीवन में उसे नहीं जान पाया, तो उसने ( अमूल्य अवसर गँवाकर ) अपनी महती हानि की । अतः बुद्धिमान् पुरुष प्रत्येक प्राणी में और प्रत्येक तत्त्व में उस परमात्म सत्ता को व्याप्त जानकर इस लोक से प्रयाण कर अमर हो जाते हैं ॥ ५ ॥ ॥ तृतीयः खण्डः ॥ पिछले दो खण्डों में प्रत्येक दिव्य प्रवाह की शक्ति के मूल कारण रूप जिस परमात्म तत्त्व की विवेचना की गयी है, अगले दो खण्डों में उसी तथ्य को कथानक के माध्यम से स्पष्ट किया गया है- ब्रह्म ह देवेभ्यो विजिग्ये तस्य ह ब्रह्मणो विजये देवा अमहीयन्त । त ऐक्षन्तास्माकमेवायं विजयोऽ स्माकमेवायं महिमेति ॥ १ ॥ ( एक समय) उस ब्रह्म ने देवों को निमित्त बनाकर असुरों पर विजय प्राप्त की; परन्तु देवों को उस विजय का अभिमान हो गया और वे इस विजय को अपनी ही महिमा का प्रभाव समझने लगे ॥ १ ॥ तद्धैषां विजज्ञौ तेभ्यो ह प्रादुर्बभूव तन्न व्यजानत किमिदं यक्षमिति ॥ २ ॥ उस ब्रह्म ने देवों के उस अहं भाव को जान लिया और तब उनके सामने वह यक्ष रूप में प्रकट हुआ, परन्तु देवगण उसे नहीं पहचान सके और कहने लगे -'यह दिव्य यक्ष कौन है' ॥ २ ॥ तेऽ ग्रिमब्रुवञ्जातवेद एतद्विजानीहि किमेतद्यक्षमिति तथेति ॥ ३ ॥ देवों ने अग्नि से कहा- हे देव ! आप पता लगाएँ कि यह कौन है ? इस पर उन्होंने कहा- बहुत अच्छा। तदभ्यद्रवत्तमभ्यवदत्कोऽ सीत्यग्निर्वा अहमस्मीत्यब्रवीज्जातवेदा वा अहमस्मीति ॥ अग्निदेव तेजी से दौड़कर यक्षरूप ब्रह्म के पास पहुँचे । यक्ष ने पूछा- आप कौन हैं ? इस पर अग्निदेव ने कहा- मैं अग्नि हूँ, मुझे ही लोग जातवेदा कहते हैं ॥ ४ ॥ तस्मिंस्त्वयि किं वीर्यमित्यपीदं सर्वं दहेयं यदिदं पृथिव्यामिति ॥ ५ ॥ यक्ष ने अग्निदेव मे पूछा- आप में क्या शक्ति है ? ऐसा पूछे जाने पर अग्निदेव ने कहा- मैं चाहूँ तो इस पृथ्वी पर जो कुछ भी है, उसे भस्म कर सकता हूँ ॥ ५ ॥

खण्ड ४ मन्त्र १ ७३ तस्मै तृणं निदधावेतद्दहेति। तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाक दग्धुं स तत एव निववृते नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति ॥ ६ ॥ तब यक्ष ने अग्निदेव के समक्ष एक तिनका रखकर उसे भस्म करने के लिए कहा; परन्तु अपनी पूरी शक्ति लगाने पर भी वे उसे जलाने में समर्थ नहीं हुए। तब वे वहाँ से लौटकर देवों से कहने लगे- मैं इस दिव्य यक्ष को जानने में असमर्थ रहा ॥ ६ ॥ अथ वायुमब्रुवन्वायवेतद्विजानीहि किमेतद्यक्षमिति तथेति ॥ ७ ॥ तदनन्तर देवों ने वायुदेव से कहा- हे वायुदेव ! इस रहस्य का आप ही पता लगाएँ। उस दिव्य यक्ष के विषय में पता लगाना उन्होंने स्वीकार किया ॥ ७ ॥ तदभ्यद्रवत्तमभ्यवदत्कोऽसीति वायुर्वा अहमस्मीत्यब्रवीन्मातरिश्वा वा अहमस्मीति ॥ वायुदेव द्रुतगति से दौड़कर उस यक्ष के पास पहुँचे। यक्ष द्वारा परिचय पूछा गया- आप कौन हैं ? वायुदेव ने कहा- मैं प्रसिद्ध वायुदेव हूँ। मुझे ही मातरिश्वा कहते हैं ॥ ८ ॥ तस्मिंस्त्वयि किं वीर्यमित्यपीदं सर्वमाददीय यदिदं पृथिव्यामिति ॥ ९ ॥ यक्ष ने पूछा- आपमें क्या सामर्थ्य है ? वायुदेव बोले- इस पृथ्वी पर जो कुछ भी है, मैं उसे उड़ा ले जा सकता हूँ ॥ ९ ॥ तस्मै तृणं निदधावेतदादत्स्वेति । तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाकादातुं स तत एव निववृते नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति ॥ १० ॥ तब उस यक्ष ने उनके सामने तिनका रखकर उसे उड़ाने के लिए कहा; परन्तु अपनी सारी शक्ति लगाकर भी वायुदेव उसे उड़ा सकने में समर्थ नहीं हुए। तब वहाँ से लौटकर उन्होंने देवों के सामने उस यक्ष को समझ पाने में अपनी असमर्थता व्यक्त की ॥ १० ॥ अथेन्द्रमब्रुवन्मघवन्नेतद्विजानीहि किमेतद्यक्षमिति। तथेति तदभ्यद्रवत्तस्मात्तिरोदधे ॥ तब देवों ने इन्द्रदेव से कहा- हे मघवन् ! आप ही इस बात का पता लगाएँ कि यह यक्ष कौन है ? इन्द्रदेव ने यक्ष के विषय में पता लगाना स्वीकार किया और यक्ष की ओर दौड़े; परन्तु इन्द्रदेव के वहाँ पहुँचते ही यक्ष अन्तर्धान हो गया ॥ ११ ॥ स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहुशोभमानामुमाꣳ हैमवतीं ताꣳ होवाच किमेतद्यक्षमिति ॥ १२ ॥ तब इन्द्रदेव उसी आकाश में स्थित अतिशय शोभामयी भगवती हैमवती (हिमाचल पुत्री) उमादेवी के पास (आ) गये और उनसे पूछने लगे-यह यक्ष कौन था ? ॥ १२ ॥ ॥ चतुर्थः खण्डः ॥ सा ब्रह्मेति होवाच ब्रह्मणो वा एतद्विजये महीयध्वमिति ततो हैव विदांचकार ब्रह्मेति ॥ उमादेवी बोलीं- वे ब्रह्म हैं, उनकी विजय को तुम लोगों ने अपने अहम्भाव से अपनी विजय मान लिया था। देवी उमा के इस उत्तर से इन्द्रदेव ने स्पष्ट समझ लिया कि वह दिव्य यक्ष निश्चय ही ब्रह्म थे ॥ १ ॥