१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
८ भूमिका उपनिषदों की महत्ता
स्वामी विवेकानन्द ने अपने एक प्रवचन में कहा था -‘‘मैं उपनिषदों को पढ़ता हूँ, तो मेरे आँसू बहने लगते हैं। यह कितना महान् ज्ञान है? हमारे लिए यह आवश्यक है कि उपनिषदों में सन्निहित तेजस्विता को अपने जीवन में विशेष रूप से धारण करें। हमें शक्ति चाहिए। शक्ति के बिना काम न चलेगा। यह शक्ति कहाँ से प्राप्त हो? उपनिषदें ही शक्ति की खानें हैं, उनमें ऐसी शक्ति भरी पड़ी है, जो सम्पूर्ण विश्व को बल, शौर्य एवं नवजीवन प्रदान कर सकें। उपनिषदें किसी भी देश, जाति, मत, सम्प्रदाय का भेद किये बिना हर दीन, दुर्बल, दुःखी और दलित प्राणी को पुकार-पुकार कर कहती हैं- उठो, अपने पैरों खड़े हो जाओ और बन्धनों को काट डालो। शारीरिक स्वाधीनता, मानसिक स्वाधीनता, आध्यात्मिक स्वाधीनता, यही उपनिषदों का मूल मन्त्र है।'' स्वामी विवेकानन्द जी ने उपनिषद्-ज्ञान की आवश्यकता को न केवल ब्रह्म प्राप्ति के लिए ही, अपितु दैनिक जीवन के लिए भी उपयोगी बतलाया है। उनका कथन है कि उपनिषदें वह शक्ति प्रदान करती हैं, जिसके द्वारा मनुष्य जीवन-संग्राम का धैर्य तथा साहस से मुकाबला करता है। जीवन का प्रत्येक क्षेत्र चाहे वह आध्यात्मिक हो या भौतिक दोनों में उपनिषदें अत्यन्त आवश्यक हैं। विश्व कवि रवीन्द्रनाथ जी ने कहा है- ‘चक्षु सम्पन्न व्यक्ति देखेंगे कि भारत का ब्रह्मज्ञान समस्त पृथिवी का धर्म बनने लगा है। प्रातः कालीन सूर्य की अरुणिम किरणों से पूर्व-दिशा आलोकित होने लगी है; परन्तु जब वह सूर्य मध्याह्न गगन में प्रकाशित होगा, तब उस समय उसकी दीप्ति से समग्र भूमण्डल दीप्तिमय हो उठेगा।' डॉ० सर्वपल्ली राधाकृष्णन का कथन है- 'उपनिषदों को जो भी मूल संस्कृत में पढ़ता है, वह
मानव-आत्मा और परम सत्य के गुह्य और पवित्र सम्बन्धों को उजागर करने वाले उनके बहुत से उद्गारों के उत्कर्ष काव्य और प्रबल सम्मोहन से मुग्ध हो जाता है और उसमें बहने लगता है'। अपनी 'उपनिषद् एक अध्ययन' पुस्तक की प्रस्तावना में सन्त विनोबा ने लिखा है- ‘‘उपनिषदों की महिमा अनेकों ने गायी है। कवि ने कहा है कि 'हिमालय जैसा पर्वत नहीं और उपनिषदों जैसी कोई पुस्तक नहीं।' परन्तु मेरी दृष्टि में उपनिषद् पुस्तक है ही नहीं, वह तो एक दर्शन है। उस दर्शन को यद्यपि शब्दों में अंकित करने का प्रयत्न किया गया है, फिर भी शब्दों के कदम लड़खड़ा गये हैं; सिर्फ निष्ठा के चिह्न उभरे हैं। उस निष्ठा को शब्दों की सहायता से हृदय में भरकर शब्दों को दूर हटाकर अनुभव किया जाए, तभी उपनिषदों का बोध हो सकता है। मेरे जीवन में गीता ने माँ का स्थान लिया है। वह स्थान तो उसी का है; लेकिन मैं जानता हूँ कि उपनिषद् मेरी माँ की माँ है। उसी श्रद्धा से मेरा उपनिषदों का मनन, निदिध्यासन पिछले बत्तीस वर्षों से चल रहा है।'' इन मन्त्रों में प्रयुक्त हुए कठिन शब्दों को देखकर ऐसा लगता है कि यह ज्ञान केवल एकान्त सेवी सन्त-महात्माओं के लिए ही व्यवहार में आने योग्य है। साधारण स्थिति के गृहस्थ अपनी विषम परिस्थितियों के कारण इसे जीवन में उतार न सकेंगे, पर वस्तुतः ऐसी बात नहीं है। जितना यह ज्ञान कठिन है, उतना ही सरल भी है। जिस प्रकार पानी में तैरना कठिन दिखाई पड़ता है, उसमें दुर्घटना की आशंका भी प्रतीत होती है; किन्तु जब सच्ची लगन होती है और प्रयत्न पूर्वक अभ्यास किया जाता है, तो वह कठिन कार्य सरल बन जाता है। इसी प्रकार उपनिषदों में जिस ब्रह्मविद्या का उल्लेख हुआ है, वह भी सरल है, कठिन तो वह उन्हें ही दीखती है,
जो उससे दूर रहते हैं, दूर से देखते हैं। भीतर प्रवेश करने का साहस करने पर वह सरल ही है। जितनी सरल है, उतनी ही कल्याणकारक भी है। आचार्य बलदेव उपाध्याय के शब्दों में - 'भारतीय तत्त्वज्ञान तथा धर्म-सिद्धान्तों के मूल स्रोत होने का गौरव इन्हीं उपनिषदों को प्राप्त है। उपनिषद् वस्तुतः वह आध्यात्मिक मानसरोवर है, जिससे ज्ञान की भिन्न-भिन्न सरितायें निकलकर इस पुण्य भूमि में मानव मात्र के ऐहिक कल्याण तथा आमुष्मिक मंगल के लिए प्रवाहित होती हैं। वैदिक धर्म की मूल-तत्त्व-प्रतिपादिका प्रस्थानत्रयी में मुख्य उपनिषद् ही हैं। अन्य प्रस्थान-गीता तथा ब्रह्मसूत्र- उसी के ऊपर आश्रित हैं।' भारतवर्ष में उदय होने वाले समस्त दर्शनों का - सांख्य तथा वेदान्त आदि का ही यह मूल ग्रन्थ नहीं है, अपितु जैन तथा बौद्ध दर्शनों के भी मौलिक तथ्यों की आधारशिला यही है। उपनिषद् का इसीलिए भारतीय संस्कृति से अविच्छेद्य सम्बन्ध है। इनके अध्ययन से इस संस्कृति के आध्यात्मिक रूप का सच्चा परिचय हमें उपलब्ध होता है। इसीलिए जब से किसी विदेशी विद्वान् को इसके पढ़ने तथा मनन करने का अवसर मिला है, तब से वह इनकी समुन्नत विचारधारा, उदात्त चिंतन, धार्मिक अनुभूति तथा आध्यात्मिक जगत् की रहस्यमयी अभिव्यक्तियों की शतमुख से प्रशंसा करता आया है।'
पाश्चात्य विद्वानों पर प्रभाव
वेदान्त दर्शन की महिमा पर मुग्ध होने वाले विदेशी विद्वानों में सबसे पहले अरबदेशीय विद्वान् अलबेरूनी थे। वे ११वीं (ग्यारहवीं) शताब्दी में भारत आये थे। यहाँ आकर उन्होंने संस्कृत भाषा का अध्ययन किया और उपनिषदों की सारस्वरूपा गीता पर वे लट्टू हो गये। यह ज्ञात नहीं है कि इन्होंने उपनिषदों का अध्ययन किया था या नहीं, लेकिन गीता की जो प्रशंसा उन्होंने की है, उसे उपनिषदों की ही प्रशंसा समझनी चाहिए। वैदिक साहित्य के साथ पाश्चात्य विद्वानों का प्रथम परिचय उपनिषदों के माध्यम से ही हुआ। सम्राट् शाहजहाँ के ज्येष्ठ पुत्र दाराशिकोह अपनी धर्म सम्बन्धी उदारता के लिए भारत के इतिहास में प्रसिद्ध हैं। सन् १६४० ईस्वी में जब दारा कश्मीर में थे, तब उन्हें सर्वप्रथम उपनिषदों की महिमा का पता लगा। उन्होंने काशी से पण्डितों को बुलाया और उनकी सहायता से पचास उपनिषदों का फारसी में अनुवाद किया। १६५७ ईस्वी में यह अनुवाद पूरा हुआ। इसके प्रायः तीन वर्ष के बाद सन् १६५९ ईस्वी में औरंगजेब के द्वारा दाराशिकोह मारे गये। अकबर के समय में भी (१५५६-१५८५) कुछ उपनिषदों का अनुवाद हुआ था; परन्तु अकबर अथवा दारा द्वारा सम्पादित इन अनुवादों के प्रति सन् १७७५ ईस्वी से पहले तक किन्हीं भी पाश्चात्य विद्वानों की दृष्टि आकर्षित नहीं हुई। अयोध्या के नवाब सुजाउद्दौला की राजसभा के फारसी रेजीडेंट श्री एम० गेंटिल ने सन् १७७५ में प्रसिद्ध यात्री एंक्रेतिल डुपेरंन (Anquetil Duperron) को दाराशिकोह के द्वारा सम्पादित उक्त फारसी अनुवाद की एक पाण्डुलिपि भेजी। एंकेतिल डुपेरंन ने कहीं से एक दूसरी पाण्डुलिपि प्राप्त की और दोनों को मिलाकर फ्रेंच तथा लैटिन भाषा में उस फारसी अनुवाद का पुनः अनुवाद किया। लैटिन अनुवाद सन् १८०१-१८०२ में 'औपनेखत' (OUPNE KHAT) नाम से प्रकाशित हुआ। फ्रेंच अनुवाद नहीं छपा। उक्त लैटिन अनुवाद के प्रकाशित होने पर पाश्चात्य पण्डितों की दृष्टि इधर कुछ आकर्षित तो हुई, किन्तु अनुवाद का अनुवाद होने के कारण वह इतना अस्पष्ट और दुर्बोध हो गया था कि उसका मर्म समझकर रसास्वादन करना सहज नहीं था। जर्मनी के सुप्रसिद्ध दार्शनिक श्री अर्थर शोपेन हॉवर ने (सन् १७८८-१८६०) बहुत कठिन परिश्रम करके
१० [भूमिका] उक्त अनुवाद का अध्ययन किया और मुक्त कण्ठ से यह घोषणा की, कि 'मेरा अपना दार्शनिक मत उपनिषद् के मूल तत्त्वों के द्वारा विशेष रूप से प्रभावित है।' इस प्रसंग में मनीषी शोपेन हॉवर ने उपनिषद् के महत्त्व और प्रभाव के सम्बन्ध में जो कुछ कहा है, वह विशेष ध्यान देने योग्य है- 'मैं समझता हूँ कि उपनिषद् के द्वारा वैदिक साहित्य के साथ परिचय लाभ होना वर्तमान शताब्दी (१८१८) का सबसे अधिक परम लाभ है, जो इसके पहले किन्हीं भी शताब्दियों को नहीं मिला। मुझे आशा है, १४ वीं शताब्दी में ग्रीक साहित्य के पुनरभ्युदय से यूरोपीय साहित्य की जो उन्नति हुई थी, संस्कृत साहित्य का प्रभाव उसकी अपेक्षा कम फल उत्पन्न करने वाला नहीं होगा। यदि पाठक प्राचीन भारतीय विद्या में दीक्षित हो सके और गम्भीर उदारता के साथ उसे ग्रहण कर सके, तो मैं जो कुछ कहना चाहता हूँ, उसे वे अच्छी तरह समझ सकेंगे। उपनिषद् में सर्वत्र कितनी सुन्दरता के साथ वेदों के भाव प्रकाशित हैं, जो कोई भी उक्त फारसी- लैटिन अनुवाद का, ध्यान देकर अध्ययन करके उपनिषद् की अनुपम भावधारा से परिचित होगा, उसी की आत्मा के गम्भीरतम प्रदेश तक में एक हलचल मच जाएगी। एक-एक पंक्ति कितना दृढ़, सुनिर्दिष्ट और सुसमञ्जस अर्थ प्रकट कर रही है। प्रत्येक वाक्य से कितना गम्भीरता पूर्ण विचार समूह प्रकट हो रहा है, सम्पूर्ण ग्रन्थ कैसे उच्च, पवित्र और ऐकान्तिक भावों से ओतप्रोत है। सारे पृथ्वी मण्डल में मूल उपनिषद् के समान इतना फलोत्पादक और उच्च भावोद्दीपक ग्रन्थ कहीं भी नहीं है। इसने मुझको जीवन में शान्ति प्रदान की है और मरण में भी यह शान्ति देगा।' शोपेन हॉवर ने अन्यत्र कहा था- ''भारत में हमारे धर्म की जड़ें कभी नहीं गड़ेंगी। मानव जाति की 'पुरानी प्रज्ञा' गैलीलियो की घटनाओं से कभी निराकृत नहीं होगी। वरन् भारतीय प्रज्ञा की धारा यूरोप में प्रवाहित होगी एवं हमारे ज्ञान और विचार में आमूल परिवर्तन ला देगी।'' उनकी यह भविष्यवाणी सफल हुई। स्वामी विवेकानन्द की अमेरिकन शिष्या "साराबुल" ने अपने एक पत्र में लिखा था कि "जर्मनी का दार्शनिक सम्प्रदाय, इंग्लैण्ड के प्राच्य पण्डित और हमारे अपने देश के एमरसन आदि साक्षी दे रहे हैं कि पाश्चात्य विचार आजकल सचमुच ही वेदान्त के द्वारा अनुप्राणित हैं।" कहते हैं कि शोपेन हॉवर की मेज पर उपनिषदों की एक लैटिन प्रति हमेशा रहती थी और वे सोने से पहले उसमें से ही अपनी प्रार्थनाएँ किया करते थे। शोपेन हॉवर ने उपनिषदों के सम्बन्ध में लिखा है - "उपनिषदों के प्रत्येक वाक्य में से गहन, मौलिक और उदात्त विचार फूटते हैं और सभी कुछ एक उच्च, पवित्र और एकाग्र भावना से व्याप्त हो जाता है। समस्त संसार में उपनिषदों जैसा कल्याणकारी और आत्मा को उन्नत करने वाला कोई और ग्रन्थ नहीं है। ये सर्वोच्च प्रतिभा के प्रसून हैं। देर-सबेर ये लोगों की आस्था का आधार बनकर रहेंगे।" सन् १८४४ में बर्लिन में श्री शेलिंग महोदय की उपनिषद् सम्बन्धी व्याख्यान माला को सुनकर प्रसिद्ध पाश्चात्य पण्डित मैक्समूलर का ध्यान सबसे पहले संस्कृत साहित्य की ओर आकृष्ट हुआ। उपनिषदों के सम्बन्ध में विचार आरम्भ करते ही उन्होंने अनुभव किया कि उपनिषदों का यथार्थ मर्म समझने के लिए पहले उनसे पूर्व रचित वेद-मन्त्र और ब्राह्मण भाग पर विचार करना आवश्यक है। इस प्रकार उपनिषदों से उन्होंने वेद चर्चा के लिए प्रेरणा प्राप्त की। शोपेन हॉवर के बाद अनेकों पाश्चात्य विद्वानों ने उपनिषद् पर विचार करके विभिन्न प्रकार से उसकी महिमा गायी है। किसी-किसी ने तो उपनिषद् को 'मानव चेतना का सर्वोच्च फल' बतलाया है। स्वनामधन्य वेदज्ञ मैक्समूलर ने एक स्थान पर लिखा है कि 'यदि शोपेन हॉवर के इन (उपनिषद् सम्बन्धी)
भूमिका ११ शब्दों के लिए किसी समर्थन की आवश्यकता हो, तो मैं अपने जीवन भर के अध्ययन के आधार पर प्रसन्नता पूर्वक अपना समर्थन दूंगा। उन्होंने अपनी पुस्तक "India what can it teach us" में लिखा है- "मृत्यु के भय से बचने, मृत्यु के लिए पूरी शक्ति से तैयारी करने और सत्य को जानने के इच्छुक जिज्ञासु के लिए उपनिषदों के अतिरिक्त और कोई श्रेष्ठ मार्ग मेरी दृष्टि में नहीं है। उपनिषदों के ज्ञान से मुझे अपने जीवन के उत्कर्ष में भारी सहायता मिली है। मैं उनका ऋणी हूँ। ये उपनिषदें आत्मिक उन्नति के लिए विश्व के धार्मिक साहित्य में अत्यन्त सम्मानास्पद रही हैं और आगे सदा रहेंगी। यह ज्ञान, महान् मनीषियों की महान् प्रज्ञा का परिणाम है। एक न एक दिन भारत की यह श्रेष्ठ विद्या यूरोप में प्रकाशित होगी और तब हमारे ज्ञान एवं विचारों में महान् परिवर्तन उपस्थित होगा।" "Dogmas of Budhism" नामक ग्रन्थ के लेखक श्रीह्याम ने लिखा है- सुकरात, अरस्तू, अफलातून आदि कितने दार्शनिकों के ग्रन्थ मैंने ध्यान पूर्वक पढ़े हैं, पर जैसी शान्तिमयी आत्मविद्या मैंने उपनिषदों में पायी, वैसी और कहीं देखने को नहीं मिली। "Is God knowoble" नामक ग्रन्थ में उसके रचयिता प्रो० जी० आर्क ने लिखा है- "मनुष्य की आत्मिक, मानसिक और सामाजिक गुत्थियाँ किस प्रकार सुलझ सकती हैं, इसका ज्ञान उपनिषदों से ही मिल सकता है। यह शिक्षा इतनी सत्य, शिव और सुन्दर है कि अन्तरात्मा की गहराई तक उसका प्रवेश होता है। जब मनुष्य सांसारिक दुःखों और चिन्ताओं से घिरा हो, तो उसे शान्ति और सहारा देने के अमोघ साधन के रूप में उपनिषद् ही सहायक हो सकती है।" दाराशिकोह ने अपने फारसी उपनिषद् अनुवाद की भूमिका में लिखा है-" आत्मविद्या के मैंने बहुत ग्रन्थ पढ़े, पर परमात्मा के खोज की प्यास कहीं न बुझी। हृदय में ऐसी अनेकों शंकाएँ और समस्याएँ उठती थीं, जिनका समाधान ईश्वरीय ज्ञान के अतिरिक्त और किसी प्रकार सम्भव न था। मैंने कुरान, तौरेत, इज्जील, जबूर आदि ग्रन्थ पढ़े, उनमें ईश्वर सम्बन्धी जो वर्णन है, उनसे मन की प्यास न बुझी। तब हिन्दुओं की ईश्वरीय पुस्तकें पढ़ीं। इनमें से उपनिषदों का ज्ञान ऐसा है, जिससे आत्मा को शाश्वत शान्ति तथा सच्चे आनन्द की प्राप्ति होती है। हजरत नवी ने भी एक आयत में इन्हीं प्राचीन रहस्यमय पुस्तकों के सम्बन्ध में संकेत किया है।" उपनिषद्-दर्शन अथवा मौलिक वेदान्त के विख्यात व्याख्याता पॉल डायसन के अनुसार 'वेदान्त (अर्थात् उपनिषद्-दर्शन) अपने अविकृत रूप में शुद्ध नैतिकता का सशक्ततम आधार है, जीवन और मृत्यु की पीड़ाओं में सबसे बड़ी सान्त्वना है। भारतियो! इसमें निष्ठा रखो।' ' भारतीय आचार, विचार और साहित्य संस्कृति के प्रति अगाध निष्ठा रखने वाली विदुषी महिला डॉ० एनीबेसेंट ने उपनिषद् विद्या की प्रशंसा करते हुए लिखा है कि 'भारत का ज्ञान मानव चेतना की सर्वोच्च देन है।' उपनिषद्-ज्ञान के प्रचार-प्रसार में संस्कृतज्ञ विद्वान् बेवर साहब का नाम उल्लेखनीय है। उन्होंने जर्मन भाषा में एक पुस्तक सत्रह भागों में लिखी है, जिसका नाम है 'इण्डिशे स्टूडियन'। उसका प्रथम भाग १८५० ईस्वी में बर्लिन से प्रकाशित हुआ था। इस भाग में बेवर महोदय ने 'सिर्र-ए- अकबर' (ले० दाराशिकोह) की चौदह उपनिषदों को शुद्धता से सम्पादित कर प्रकाशित किया है। इसका दूसरा भाग बर्लिन से ही १८५३ ई० में प्रकाशित हुआ। उसमें १४ से ३९ संख्या तक के उपनिषद् प्रकाशित किये गये हैं।
१२ [भूमिका] उपनिषदों के स्रोत एवं उनकी संख्या
उपनिषदों की प्राप्ति के स्रोत के बारे में कोई एक बात कही जा सकती है, तो वह यही है कि उनका उद्भव ऋषियों-द्रष्टाओं के अनुभूति जन्य ज्ञान से हुआ है। जैसा कि उल्लेख किया जा चुका है कि उपनिषदों को 'वेद' के ब्राह्मण आरण्यक प्रभाग के अन्तर्गत माना जाता है। कुछ उपनिषदें संहिता (मन्त्र भाग), ब्राह्मण एवं आरण्यक की अंगभूता-अंशभूता हैं, जबकि अधिकांश वैदिक एवं उत्तर वैदिक काल के ऋषियों के प्रातिभ चक्षु से दृष्ट हैं, जिनका स्वतन्त्र अस्तित्व है। 'ऐतरेयोपनिषद्' ऋग्वेद के ऐतरेय आरण्यक का भाग (२.४.६) है तथा 'तैत्तिरीय उपनिषद्' कृष्ण यजुर्वेद के तैत्तिरीय आरण्यक का भाग (प्रपाठक ७-८) है। इसी आरण्यक का अन्तिम प्रपाठक (क्र. १०) 'नारायणोपनिषद्' कहलाता है, जो अथर्ववेदीय 'महानारायणोपनिषद् से भिन्न है। शुक्ल यजुर्वेदीय शतपथ ब्राह्मण के अन्तिम (१४वें) काण्ड के अन्तिम छः अध्याय को 'बृहदा- रण्यकोपनिषद्' कहा गया है। ब्राह्मण ग्रन्थ का यह भाग आरण्यक भी है और उपनिषद् भी है। इसी प्रकार 'ईशावास्योपनिषद्' भी यजुर्वेद की माध्यन्दिन और काण्व संहिताओं का ४० वाँ अध्याय है। सामवेद की कौथुमी शाखा के तलवकार ब्राह्मण ग्रन्थ के अन्तिम भागों (३३ से ४० अध्यायों) को छान्दोग्योपनिषद् कहा गया है। ऋग्वेदीय 'कौषीतकि' या 'शाङ्खायन आरण्यक' के अध्याय ३-६ को 'कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद्' कहते हैं। मुक्तिकोपनिषद् (श्लोक क्र. ३० से ३९) में १०८ उपनिषदों की सूची प्राप्त है। इन १०८ में से ऋग्वेद की १०, शुक्ल यजुर्वेद की १९, कृष्ण यजुर्वेद की ३२, सामवेद की १६ तथा अथर्ववेद की ३१ उप- निषदें कही गयी हैं। मुक्तिकोपनिषद में चारों वेदों की शाखाओं की संख्या देते हुए प्रत्येक शाखा की एक-एक उपनिषद् होने की बात भी कही गयी है- ऋग्वेदादिविभागेन वेदाश्चत्वार ईरिताः। तेषां शाखा ह्यनेकाः स्युस्तासूपनिषदस्तथा ।। ऋग्वेदस्य तु शाखाः स्युरेकविंशति संख्यकाः। नवाधिकशतं शाखा यजुषो मारुतात्मज ।। सहस्त्रसंख्यया जाताः शाखाः साम्नः परन्तपं। अथर्वणस्य शाखाः स्युः पंचाशद्भेदतो हरे ।। एकैकस्यास्तु शाखाया एकैकोपनिषन्मता। -मुक्तिकोपनिषद् ११-१४ ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद भेद से वेद चार कहे गये हैं। उन चारों की अनेक शाखाएं हैं तथा उनकी उपनिषदें भी अनेक हैं। ऋग्वेद की इक्कीस शाखाएं, यजुर्वेद की एक सौ नौ शाखाएँ, सामवेद की एक हजार शाखाएं तथा अथर्ववेद की पचास शाखाएं मानी जाती हैं। एक-एक शाखा की एक-एक उपनिषद् मानी गयी है। इस उक्ति के अनुसार ११८० उपनिषदें होनी चाहिए; किन्तु आगे (श्लोक ३० से ३९ तक) जो नाम गिनाये गये हैं, वे केवल १०८ ही हैं। मुक्तिकोपनिषद् में जिन एक सौ आठ उपनिषदों के नाम आते हैं, वे सभी 'निर्णय सागर प्रेस' बम्बई से मूल गुटका के रूप में प्रकाशित हैं। इसके अतिरिक्त 'अड्यार लाइब्रेरी' मद्रास से भी उपनिषदों का संग्रह प्रकाशित हुआ है, जिसमें लगभग १७९ उपनिषदों का प्रकाशन है। 'गुजराती प्रिंटिंग प्रेस' बम्बई से मुद्रित उपनिषद् वाक्य महाकोश में २२३ उपनिषदों की नामावली दी गई है। इनमें दो उपनिषद्- (१) उपनिषत्स्तुति तथा (२) देव्युपनिषद् नं० २ की चर्चा शिव रहस्य नामक ग्रन्थ में की गई है। ये दोनों अभी तक उपलब्ध नहीं हो सकी हैं। शेष २२१ उपनिषदों के वाक्यांश इस महाकोश में संकलित हुए हैं। इनमें भी माण्डूक्यकारिका के चार प्रकरण चार जगह गिने गये हैं। इन सबकी
[भूमिका] १३ एक संख्या मानें, तो २१८ ही संख्या होती है। कई (२४) आयुर्वेदोपनिषद् उपनिषदें एक ही नाम की दो-तीन जगह आयी हैं; (२५) आरुणिकोपनिषद् (आरुणेय्युपनिषद्) पर वे स्वतन्त्र ग्रन्थ हैं। इस प्रकार सब पर दृष्टिपात (२६) आर्षेयोपनिषद् करने से यह निश्चित होता है कि अब तक लगभग (२७) आश्रमोपनिषद् २२० उपनिषदें प्रकाश में आ चुकी हैं। सम्भवतः (२८) इतिहासोपनिषद् (वाक्यात्मक एवं पद्यात्मक) कहीं और भी कुछ उपनिषदें प्रकाशित हुई हों ? (२९) ईशावास्योपनिषद् कितनी ही अब भी अप्रकाशित रूप में उपलब्ध हो उपनिषत्स्तुति (शिवरहस्यान्तर्गत, अभी तक सकती हैं। भारतवर्ष की अथाह ज्ञान सम्पदा के गर्भ अनुपलब्ध है) में और कितने रत्न छिपे पड़े हैं, यह कहा नहीं जा (३०) ऊर्ध्वपुण्ड्रोपनिषद् (वाक्यात्मक एवं पद्यात्मक) सकता। यहाँ उपर्युक्त २२० उपनिषदों की नामावली (३१) एकाक्षरोपनिषद् अकारादि क्रम से दी जा रही है- (३२) ऐतरेयोपनिषद् (अध्यायात्मक) (१) अक्षमालिकोपनिषद् (अक्षमालोपनिषद्) (३३) ऐतरेयोपनिषद् (खण्डात्मक) (२) अक्षि- उपनिषद् (३४) ऐतरेयोपनिषद् (अध्यायात्मक) (३) अथर्वशिखोपनिषद् (३५) कठरुद्रोपनिषद् (कण्ठरुद्रोपनिषद्) (४) अथर्वशिर उपनिषद् (३६) कठोपनिषद् (५) अद्वयतारकोपनिषद् (३७) कठश्रुत्युपनिषद् (६) अद्वैतभावनोपनिषद् (३८) कलिसंतरणोपनिषद् (हरिनामोपनिषद्) (७) अद्वैतोपनिषद् (३९) कात्यायनोपनिषद् (८) अध्यात्मोपनिषद् (४०) कामराजकीलितोद्धारोपनिषद् (९) अनुभवसारोपनिषद् (४१) कालाग्निरुद्रोपनिषद् (१०) अन्नपूर्णोपनिषद् (४२) कालिकोपनिषद् (११) अमनस्कोर्पनिषद् (४३) कालीमेधा दीक्षितोपनिषद् (१२) अमृतनादोपनिषद् (४४) कुण्डिकोपनिषद् (१३) अरुणोपनिषद् (४५) कृष्णोपनिषद् (१४) अल्लोपनिषद् (४६) केनोपनिषद् (१५) अवधूतोपनिषद् (वाक्यात्मक और पद्यात्मक) (४७) कैवल्योपनिषद् (१६) अवधूतोपनिषद् (पद्यात्मक) (४८) कौलोपनिषद् (१७) अव्यक्तोपनिषद् (४९) कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (१८) आचमनोपनिषद् (५०) क्षुरिकोपनिषद् (१९) आत्मपूजोपनिषद् (५१) गणपत्यथर्वशीर्षोपनिषद् (२०) आत्म प्रबोधोपनिषद् (आत्मबोधोपनिषद्) (५२) गणेशपूर्वतापिन्युपनिषद् (वरदपूर्वतापिन्युप०) (२१) आत्मोपनिषद् (वाक्यात्मक) (५३) गणेशोत्तरतापिन्युपनिषद् (वरदोत्तरतापिन्यु०) (२२) आत्मोपनिषद् (पद्यात्मक) (५४) गर्भोपनिषद् (२३) आथर्वण द्वितीयोपनिषद् (५५) गान्धर्वोपनिषद् (वाक्यात्मक एवं मन्त्रात्मक) (५६) गायत्र्युपनिषद् (गोपथ ब्राह्मणान्तर्गत)
१४ | भूमिका | (गायत्र्युपनिषद्-शतपथ ब्राह्मणांतर्गत) \hspace{1.5cm} २. देव्युपनिषद् (शिवरहस्यांतर्गत-अनुपलब्ध) (५७) गायत्री रहस्योपनिषद् \hspace{2cm} (९०) द्वयोपनिषद् (५८) गरुडोपनिषद् (वाक्यात्मक एवं मन्त्रात्मक) \hspace{0.5cm} (९१) ध्यानबिन्दूपनिषद् (५९) गुह्यकाल्युपनिषद् \hspace{2.5cm} (९२) नादबिन्दूपनिषद् (६०) गुह्यषोढान्यासोपनिषद् \hspace{1.8cm} (९३) नारदपरिव्राजकोपनिषद् (६१) गोपालपूर्वतापिन्युपनिषद् \hspace{1.7cm} (९४) नारदोपनिषद् (६२) गोपालोत्तरतापिन्युपनिषद् \hspace{1.5cm} (९५) नारायणपूर्वतापिन्युपनिषद् (६३) गोपीचन्दनापनिषद् \hspace{2.3cm} (९६) नारायणोत्तरतापिन्युपनिषद् (६४) चतुर्वेदोपनिषद् \hspace{2.7cm} (९७) नारायणोपनिषद् (नारायणाथर्वशीर्ष) (६५) चाक्षुषोपनिषद् (चक्षुरुपनिषद्, \hspace{1.5cm} (९८) निरालम्बोपनिषद् \hspace{0.8cm} चक्षूरोगोपनिषद्, नेत्रोपनिषद्) \hspace{1.2cm} (९९) निरुक्तोपनिषद् (६६) चित्यूपनिषद् \hspace{3cm} (१००) निर्वाणोपनिषद् (६७) छागलेयोपनिषद् \hspace{2.4cm} (१०१) नीलरुद्रोपनिषद् (६८) छान्दोग्योपनिषद् \hspace{2.4cm} (१०२) नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषद् (६९) जाबालदर्शनोपनिषद् \hspace{2cm} (१०३) नृसिंहषट्चक्रोपनिषद् (७०) जाबालोपनिषद् \hspace{2.6cm} (१०४) नृसिंहोत्तरतापिन्युपनिषद् (७१) जाबाल्युपनिषद् \hspace{2.7cm} (१०५) पञ्चब्रह्मोपनिषद् (७२) तारसारोपनिषद् \hspace{2.6cm} (१०६) परब्रह्मोपनिषद् (७३) तारोपनिषद् \hspace{3.2cm} (१०७) परमहंस परिव्राजकोपनिषद् (७४) तुरीयातीतोपनिषद्(तीतावधूतोपनिषद्) \hspace{0.5cm} (१०८) परमहंसोपनिषद् (७५) तुरीयोपनिषद् \hspace{3cm} (१०९) परमात्मिकोपनिषद् (७६) तुलस्युपनिषद् \hspace{3cm} (११०) पारायणोपनिषद् (७७) तेजोबिन्दूपनिषद् \hspace{2.6cm} (१११) पाशुपतब्रह्मोपनिषद् (७८) तैत्तिरीयोपनिषद् \hspace{2.7cm} (११२) पिण्डोपनिषद् (७९) त्रिपाद्विभूतिमहानारायणोपनिषद् \hspace{1.3cm} (११३) पीताम्बरोपनिषद् (८०) त्रिपुरातापिन्युपनिषद् \hspace{2.3cm} (११४) पुरुषसूक्तोपनिषद् (८१) त्रिपुरोपनिषद् \hspace{3cm} (११५) पैङ्गलोपनिषद् (८२) त्रिपुरामहोपनिषद् \hspace{2.4cm} (११६) प्रणवोपनिषद् (पद्यात्मक) (८३) त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद् \hspace{1.8cm} (११७) प्रणवोपनिषद् (वाक्यात्मक) (८४) त्रिसुपर्णोपनिषद् \hspace{2.6cm} (११८) प्रश्नोपनिषद् (८५) दक्षिणामूर्त्युपनिषद् \hspace{2.3cm} (११९) प्राणाग्निहोत्रोपनिषद् (८६) दत्तात्रेयोपनिषद् \hspace{2.7cm} (१२०) बटुकोपनिषद् (बटुकौपनिषद्) (८७) दत्तोपनिषद् \hspace{3.2cm} (१२१) बह्वृचोपनिषद् (८८) दुर्वासोपनिषद् \hspace{2.9cm} (१२२) बाष्कलमन्त्रोपनिषद् (८९) १. देव्युपनिषद् (पद्यात्मक एवं मंत्रात्मक) \hspace{0.5cm} (१२३) बिल्वोपनिषद् (पद्यात्मक)
[ भूमिका ] १५ (१२४) बिल्वोपनिषद् (वाक्यात्मक) (१५४) १. योगतत्त्वोपनिषद् (१२५) बृहज्जाबालोपनिषद् (१५५) २. योगतत्त्वोपनिषद् (१२६) बृहदारण्यकोपनिषद् (१५६) योगराजोपनिषद् (१२७) ब्रह्मविद्योपनिषद् (१५७) योगशिखोपनिषद् (१२८) ब्रह्मबिन्दूपनिषद् (अमृतबिन्दूपनिषद्) (१५८) योगोपनिषद् (१२९) ब्रह्मोपनिषद् (१५९) राजश्यामलारहस्योपनिषद् (१३०) भगवद्गीतोपनिषद् (१६०) राधिकोपनिषद् (वाक्यात्मक) (१३१) भवसंतरणोपनिषद् (१६१) राधेपनिषद् (प्रपाठात्मक) (१३२) भस्मजाबालोपनिषद् (१६२) रामपूर्वतापिन्युपनिषद् (१३३) भावनोपनिषद् (कापिलोपनिषद्) (१६३) रामरहस्योपनिषद् (१३४) भिक्षुकोपनिषद् (१६४) रामोत्तरतापिन्युपनिषद् (१३५) मठाम्नायोपनिषद् (१६५) रुद्रहृदयोपनिषद् (१३६) मण्डलब्राह्मणोपनिषद् (१६६) रुद्राक्षजाबालोपनिषद् (१३७) मन्त्रिकोपनिषद् (चूलिकोपनिषद्) (१६७) रुद्रोपनिषद् (१३८) महायुपनिषद् (१६८) लक्ष्म्युपनिषद् (१३९) महानारायणोपनिषद् (बृहन्नारायणोपनिषद्, (१६९) लाङ्गलोपनिषद् उत्तर नारायणोपनिषद्) (१७०) लिङ्गोपनिषद् (१४०) महावाक्योपनिषद् (१७१) वज्रपञ्जरोपनिषद् (१४१) महोपनिषद् (१७२) वज्रसूचिकोपनिषद् (१४२) माण्डूक्योपनिषद् (१७३) वनदुर्गोपनिषद् (१४३) माण्डूक्योपनिषत्कारिका (१७४) वराहोपनिषद् क. आगम (१७५) वासुदेवोपनिषद् ख. अलातशान्ति (१७६) विश्रामोपनिषद् ग. वैतथ्य (१७७) विष्णुहृदयोपनिषद् घ. अद्वैत (१७८) शरभोपनिषद् (१४४) मुक्तिकोपनिषद् (१७९) शाट्यायनीयोपनिषद् (१४५) मुण्डकोपनिषद् (१८०) शाण्डिल्योपनिषद् (१४६) मुद्गलोपनिषद् (१८१) शारीरकोपनिषद् (१४७) मृत्युलाङ्गलोपनिषद् (१८२) १. शिवसङ्कल्पोपनिषद् (१४८) मैत्रायण्युपनिषद् (१८३) २. शिवसङ्कल्पोपनिषद् (१४९) मैत्रेय्युपनिषद् (१८४) शिवोपनिषद् (१५०) यज्ञोपवीतोपनिषद् (१८५) शुकरहस्योपनिषद् (१५१) याज्ञवल्क्योपनिषद् (१८६) शौनकोपनिषद् (१५२) योगकुण्डल्युपनिषद् (१८७) श्यामोपनिषद् (१५३) योगचूडामण्युपनिषद् (१८८) श्रीकृष्णपुरुषोत्तमसिद्धान्तोपनिषद्
१६ [भूमिका] (१८९) श्रीचक्रोपनिषद् (२०५) सिद्धान्तविन्दूपनिषद् (१९०) श्रीविद्यातारकोपनिषद् (२०६) सिद्धान्तशिखोपनिषद् (१९१) श्री सूक्तम् (२०७) सिद्धान्तसारोपनिषद् (१९२) श्वेताश्वतरोपनिषद् (२०८) सीतोपनिषद् (१९३) षोढोपनिषद् (२०९) सुदर्शनोपनिषद् (१९४) सङ्कर्षणोपनिषद् (२१०) सुबालोपनिषद् (१९५) सदानन्दोपनिषद् (२११) सुमुख्युपनिषद् (१९६) सन्ध्योपनिषद् (२१२) सूर्यतापिन्युपनिषद् (१९७) संन्यासोपनिषद् (अध्यायात्मक) (२१३) सूर्योपनिषद् (१९८) संन्यासोपनिषद् (वाक्यात्मक) (२१४) सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषद् (१९९) सरस्वतीलहस्योपनिषद् (२१५) स्कन्दोपनिषद् (२००) सर्वसारोपनिषद् (सर्वोपनिषद्) (२१६) स्वसंवेद्योपनिषद् (२०१) सहवै उपनिषद् (२१७) हयग्रीवोपनिषद् (२०२) संहितोपनिषद् (२१८) हंसषोडोपनिषद् (२०३) सामरहस्योपनिषद् (२१९) हंसोपनिषद् (२०४) सावित्र्युपनिषद् (२२०) हेरम्बोपनिषद् भाष्य एवं अनुवाद आचार्य शंकर ने ईश, केन, कठ, प्रश्न, जी० ए० नटसेन, मद्रास, सीतानाथ तत्त्वभूषण मुण्डक, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य, (१९००), एस० सी० बसु (१९११), आर० हूम बृहदारण्यक एवं श्वेताश्वतर, इन ११ उपनिषदों के (१९२१), ई० बी० कोवेल, हिरियन्ना, द्विवेदी, भाष्य किये हैं। इसके पूर्व उपनिषदों के स्वतन्त्र गदाधर शास्त्री और श्री अरविन्द ने भी कुछ उपनि- भाष्य गिने-चुने ही किये गये हैं। षदों के अनुवाद प्रकाशित किये हैं। शाहजादा दाराशिकोह द्वारा किए गये मुख्य उपनिषदों पर शंकर के भाष्यों के फारसी अनुवाद संग्रह में लगभग ५० उपनिषदें अँग्रेजी अनुवाद भी उपलब्ध हैं। उनकी व्याख्याओं शामिल थीं। कोलब्रुक के संग्रह में उपनिषदों में अद्वैत का दृष्टिकोण है। रंगरामानुज ने उपनिषदों की संख्या ५२ थी। जर्मन विद्वान् मैक्समूलर ने के अपने भाष्यों में रामानुज का दृष्टिकोण अपनाया आचार्य शंकर द्वारा चुनी गयी ११ उपनिषदों के है। मध्व के भाष्यों में द्वैत दृष्टिकोण है। उनके साथ 'मैत्रायणीय' उपनिषद् सहित १२ उपनिषदों भाष्यों के उद्धरण पाणिनी आफिस इलाहाबाद से का अनुवाद किया था। प्रकाशित उपनिषदों के संस्करण में मिलते हैं। उपनिषदों के अँग्रेजी अनुवाद इस क्रम से उक्त उपनिषदों के अतिरिक्त अन्य उपनिषदों प्रकाशित हुए हैं- राजाराममोहनराय (१८३२), के भाष्य या भावार्थ छिट-पुट रूप से कहीं-कहीं रोअर (१८५३), मैक्समूलर (१८७९-१८८४- मिलते हैं। गीताप्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित सेक्रेट बुक्स ऑफ द ईस्ट), मीड और चट्टोपाध्याय 'कल्याण' के विशेषांक 'उपनिषद् अंक' (१९४९) (१८९६), लंदन थियोसोफिकल सोसाइटी, में एक ही स्थान पर ५४ उपनिषदों के भावार्थ प्राप्त सीताराम शास्त्री और गंगानाथ झा (१८९८-१९०१), होते हैं।
भूमिका १७ रचनाकाल उपनिषदों के रचना काल के सम्बन्ध में कोई एक मत स्वीकार नहीं किया जा सकता है। कुछ उपनिषदें वेद की मूल संहिताओं की अंश है, उन्हें सबसे प्राचीन माना जाता है। कुछ उपनिषदें ब्राह्मण, आरण्यक आदि के अंश हैं, उनका रचनाकाल निश्चित रूप से संहिता काल के बाद का ही सिद्ध होगा। कुछ उपनिषदें स्वतंत्र हैं, वे सब बाद में क्रमशः अस्तित्व में आयीं। काल निर्णय के सन्दर्भ में मंत्रों-श्लोकों में प्राप्त विभिन्न विवरणों का सहारा लिया जाता है। मंत्रों में जो संदर्भ मिलते हैं, उनमें (१) भौगोलिक परिस्थितियाँ (२) सूर्यवंशी-चन्द्रवंशी राजाओं राजाओं या ऋषियों के नाम (३) खगोलीय योगों के विवरण हैं। इनमें भौगोलिक परिस्थितियों के आधार पर गंगा, सरस्वती, सिन्धु आदि नदियों के नाम आदि के आधार पर केवल यही संकेत मिलते हैं कि इनका रचनाकाल संदर्भित नदी आदि के उद्भव के बाद का ही है। इसलिए कोई सुनिश्चित काल निर्धारण इस आधार पर नहीं हो पाता। राजाओं- ऋषियों के नामों को आधार बनाने में भी उक्त समस्या बनी रहती है। फिर एक ही नाम के अनेक राजा एवं ऋषि पाये जाते हैं जिनके बीच अनेक पीढ़ियों के अंतर होते हैं। ऐसी स्थिति में रचनाकाल का निर्णय भी ठीक प्रकार नहीं हो पाता। जहाँ खगोलीय योगों का वर्णन मिल जाता है, वहाँ ज्योतिष गणित के आधार पर बहुत कुछ सुनिश्चित गणना की जा सकती है। संहिताओं, ब्राह्मणों एवं स्वतंत्र उपनिषदों के काल निर्णय के संदर्भ में भी इसी विद्या का उपयोग अधिकांश विद्वानों ने किया है। इस विधि से किये गये काल निर्णयों को समझने में सहायक हो सकने वाली मोटी जानकारी यहाँ दी जा रही हैं।
अयनभोग सिद्धान्त मान्य तथ्य है कि पृथ्वी अपनी धुरी पर लगातार घूमते हुए सूर्य की परिक्रमा करती रहती है। पृथ्वीवासियों को सूर्य ही चलायमान प्रतीत होता है। आकाश में सूर्य के भासित पथ (एपैरन्ट पाथ) को क्रान्ति वृत्त कहते हैं। क्रान्ति वृत्त पर चलता हुआ सूर्य कभी पृथ्वी के उत्तरगोल में कभी दक्षिण गोल में पहुँचा हुआ अनुभव होता है। इस क्रम में सूर्य जिस बिन्दु पर विषुवत् रेखा के दक्षिण भाग में प्रवेश करता है, उसे शरत् संपात् बिन्दु कहते हैं। तथा इससे ठीक १८० अंश पर दूसरा बिन्दु बनता है, जहाँ से सूर्य उत्तरी गोलार्ध में प्रवेश करता है, उसे वसन्त सम्पात कहते हैं। ये सम्पात बिन्दु स्थिर नहीं हैं। वे प्रति वर्ष पूर्व से पश्चिम की ओर ५० विकला खिसकते रहते हैं। कोणीय माप में एक अंश (डिग्री) में ६० कला (मिनट) तथा एक कला में ६० विकला (सेकेन्ड) होते हैं। इस प्रकार एक अंश में ६०×६०=३६०० विकला होती है। संपात बिन्दु एक वर्ष में ५० विकला खिसकतें हैं, तो एक अंश खिसकने में ३६००/५०=७२ वर्ष लगते हैं। इन बिन्दुओं के खिसकने की गति को अयन गति कहते हैं। इस अयन गति के आधार पर काल निर्णय किया जाता है। आकाश में २७ नक्षत्रों, १२ राशियों की मान्यता प्रसिद्ध है। किसी काल में यह सम्पात बिन्दु किस नक्षत्र पर थे, यह पता लगने पर वर्तमान समय में उनकी स्थिति के आधार पर यह पता लगाया जा सकता है कि इस बीच वे कितने अंश, कला, विकला खिसके हैं। इतना चलने में उन्हें कितना समय लगा, यह अयनगति के आधार पर आसानी से निकल आता है। ज्योतिष के उक्त सूत्रों के आधार पर विद्वानों ने विभिन्न आर्ष ग्रन्थों के रचनाकाल निकालने के प्रयास किये हैं। श्री रजनी कान्त शास्त्री ने अपने
१८ [भूमिका]
शोध ग्रन्थ 'वैदिक साहित्य- परिशीलन' में इसी गणना के आधार पर संहिताओं का रचनाकाल लगभग ४५३३ वर्ष ईसापूर्व निकाला है। अनेक अन्य विद्वानों की गणनाएँ भी इसी के आस-पास हैं। इस आधार पर संहिताओं से निकाले गये उपनिषदों (ईशावास्य, शिवसंकल्प उपनिषद् आदि) तथा शतपथ ब्राह्मण से लिए गये उपनिषद् (बृहदारण्यक, गायत्री आदि) का रचनाकाल भी उक्तानुसार ही माना जा सकता है। मैत्रेय्युपनिषद् (६.१४) में प्राप्त ऋतु परिवर्तन काल का जो उल्लेख मिलता है, उसके आधार पर लोकमान्य तिलक ने उक्त उपनिषद् का रचनाकाल ई०पू० १८८०-१६८० के बीच माना है। अन्य विद्वानों के गणितीय निष्कर्ष भी इसी के आसपास हैं। लेकिन यहाँ एक बात और ध्यान देने योग्य है। सम्पात बिन्दुओं को आकाश में एक चक्र ३६० अंश (डिग्री) पार करने में ३६० x ७२ = २५९२० वर्ष अर्थात् लगभग २६००० वर्ष का समय लगता है। इस हिसाब से संहिताओं के रचनाकाल में जो अयन स्थिति थी, वह २६००० वर्ष पूर्व भी रही होगी; किन्तु यह सुनिश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि उस काल से अब तक २६००० वर्ष के कितने चक्र पूरे किये जा चुके हैं ? ईसाई मतावलम्बी लोग सृष्टि की उत्पत्ति का समय ईसा से मात्र ५००० या ७००० वर्ष पूर्व ही मानते रहे हैं। इस मान्यता के आधार पर उपनिषदों का रचनाकाल ४००० वर्ष ईसा पूर्व तक मैक्समूलर आदि पाश्चात्य विद्वानों ने माना है; किन्तु अब तो वैज्ञानिक ऐसे प्रमाण देने लगे हैं, जिनके आधार पर सृष्टि का उद्भव लाखों-करोड़ों वर्ष पूर्व हुआ माना जाने लगा है। भारतीय वैदिक धर्म वाले तो सृष्टि की उत्पत्ति करोड़ों वर्ष पूर्व की मानते हैं। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि संपात बिन्दुओं की किसी भी स्थिति के लिए निर्धारित समय के साथ २६००० वर्ष के कितने चक्र और जोड़े जाएँ ? इसलिए उपनिषदों के रचनाकाल के बारे में तमाम अनुमानों और गणितीय प्रयोगों के बाद भी कोई साधिकार निर्णय दिया जाना संभव नहीं दिखता।
उपनिषदों के वर्ण्य विषय
उपनिषदों का मूल विषय 'ब्रह्मविद्या' को माना गया है। 'ब्रह्मविद्या' का क्षेत्र बड़ा व्यापक है। विद्वानों ने विभिन्न उपनिषदों में वर्णित विषयों के आधार पर 'ब्रह्मविद्या' के अन्तर्गत ३२ विद्याओं को समाविष्ट माना है। जो इस प्रकार हैं - (१) सद्विद्या (छान्दो०), (२) आनन्दविद्या (तैत्ति०), (३) अन्तरादित्यविद्या (छान्दो०), (४) आकाश विद्या (छान्दो०), (५) प्राण विद्या (छान्दो०), (६) गायत्री- ज्योतिर्विद्या (छान्दो०), (७) इन्द्रप्राणविद्या (छान्दो०, कौ०ब्रा०), (८) शाण्डिल्यविद्या (छान्दो०), (९) नाचिकेतसविद्या (कठ०), (१०) उपकोसलविद्या (छान्दो०), (११) अन्तर्यामिविद्या (बृह०), (१२) अक्षरविद्या (मुण्ड०), (१३) वैश्वानरविद्या (छान्दो०), (१४) भूमाविद्या (छान्दो०), (१५) गार्ग्यक्षरविद्या (बृह०), (१६) प्रणवोपास्य परमपुरुष विद्या (प्रश्न०), (१७) दहर विद्या (छान्दो०, बृह०, तैत्ति०), (१८) अंगुष्ठ प्रमितविद्या (कठ०, श्वेता०), (१९) देवोपास्यज्योतिर्विद्या (बृह०), (२०) मधुविद्या (छान्दो०), (२१) संवर्गविद्या (छान्दो०), (२२) अजाशरीरकविद्या (श्वेता०, तैत्ति०), (२३) बालाकिविद्या (कौ०ब्रा०, बृह०), (२४) मैत्रेयी विद्या (बृह०), (२५) द्रुहिणरुद्रादिशरीरक विद्या, (२६) पञ्चाग्निविद्या (छान्दो०, बृह०), (२७) आदित्यस्थानार्थक विद्या (बृह०), (२८) अक्षिस्थान्नामक विद्या (बृह०), (२९) पुरुषविद्या (छान्दो०, तैत्ति०), (३०) ईशावास्यविद्या (ईश०), (३१) उपस्ति कहोल विद्या (बृह०) और (३२) व्याहृति-शरीरक विद्या।
भूमिका ११
ये विद्याएँ क्रमशः स्पष्ट करती हैं कि- (१) परब्रह्म अपने सङ्कल्पानुसार सबके कारण हैं, (२) वे कल्याणगुणाकर वैभवसम्पन्न आनन्दमय हैं, (३) उनका रूप दिव्य है, (४) उपाधि रहित होकर वे सबके प्रकाशक हैं, (५) वे चराचर के प्राण हैं, (६) वे प्रकाशमान हैं, (७) वे इन्द्र, प्राण आदि चेतनाचेतनों के आत्मा हैं, (८) प्रत्येक पदार्थ की सत्ता, स्थिति एवं यत्न उनके अधीन हैं, (९) समस्त संसार को लीन कर लेने की सामर्थ्य उनमें है, (१०) उनकी नित्य स्थिति नेत्र में है, (११) जगत् उनका शरीर है, (१२) उनके विराट् रूप की कल्पना में अग्नि आदि अङ्ग बनकर रहते हैं, (१३) स्वर्लोक, आदित्य आदि के अङ्गी बने हुए वे वैश्वानर हैं, (१४) वे अनन्त ऐश्वर्य सम्पन्न हैं, (१५) वे नियन्ता हैं, (१६) वे मुक्त पुरुषों के भोग्य हैं, (१७) वे सबके आधार हैं, (१८) वे अन्तर्यामी रूप से सबके हृदय में विराजमान हैं, (१९) वे सभी देवताओं के उपास्य हैं, (२०) वे वसु, रुद्र, आदित्य, मरुत् और साध्यों के आत्मा के रूप में उपास्य हैं, (२१) अधिकारानुसार वे सभी के उपासनीय हैं, (२२) वे प्रकृतितत्त्व के नियन्ता हैं, (२३) समस्त जगत् उनका कार्य है, (२४) उनका साक्षात्कार कर लेना मोक्ष का साधन है, (२५) ब्रह्मा, रुद्र आदि-आदि देवताओं के अन्तर्यामी होने के कारण उन-उन देवताओं की उपासना के द्वारा वे प्राप्त होते हैं, (२६) संसार के बन्धन से मुक्ति उनके अधीन है, (२७) वे आदित्यमण्डलस्थ हैं, (२८) वे पुण्डरीकाक्ष हैं, (२९) वे परम पुरुष (पुरुषोत्तम) हैं, (३०) वे कर्म सहित उपासनात्मक ज्ञान के द्वारा प्राप्त होने वाले हैं, (३१) उनके प्राप्त करने में अनिवार्य होते हैं, अन्य भोजनादि विषयक नियम भी और (३२) व्याहृतियों की आत्मा बनकर वे मन्त्रमय हैं। यह विषय विभाजन का एक क्रम है। विद्वानों ने और भी विभिन्न दृष्टियों से उपनिषदों के विषयों की विवेचनाएँ की हैं। जीवन की अगणित विविधताओं एवं उनके रहस्यों का वर्णन उपनिषदों में मिलता है। इनमें विशुद्ध ज्ञान भी है तथा उसके अनुरूप साधना विज्ञान- योगविद्या की विभिन्न धाराएँ भी हैं। लौकिक और अलौकिक विभूतियों की प्राप्ति के उपायों के साथ उनके सुनियोजन-सदुपयोग के सूत्र भी हैं। ब्रह्म से प्रकृति एवं जीव की उत्पत्ति, जीव से जीव के विकास का क्रम तथा जीव का काया छोड़कर विभिन्न मार्गों से होकर पुनः ब्राह्मी चेतना में विलीन हो जाना, यह सभी पक्ष उपनिषदों में मिल जाते हैं। उक्त तथ्यों को विषयानुसार वर्गीकृत करें, तो सूची बहुत लम्बी हो सकती है। फिर भी चूँकि यह सब विश्व वैचित्र्य ब्राह्मी संकल्प से ही उभरा है और उसी में पुनः समाहित हो जाता है, इसलिए उपनिषदों का मूल विषय ब्रह्म विद्या को ही कहा जाये, तो यह उचित ही है।
अनोखी शैली
उपनिषद् की अपनी शैली अद्भुत है। गूढ़ रहस्यों को समझने की तीव्र उत्कण्ठा, अनुभूति की गहन क्षमता तथा अभिव्यक्ति की सहजता का दर्शन जगह-जगह होता ही रहता है। कठोपनिषद् में नचिकेता अपनी जिज्ञासा को लेकर यम के सामने इतने अविचल भाव से डटे रहते हैं कि यम को द्रवित होना ही पड़ता है। छान्दोग्योपनिषद् में ऋषि आरुणि अपने पुत्र श्वेतकेतु सहित जिज्ञासु भाव से क्षत्रिय राजा प्रवाहण से उपदेश प्राप्त करने में कोई संकोच नहीं करते। ऐतरेय उपनिषद् में ऋषि वामदेव प्रजनन चक्र समझने के लिए स्वयं अपनी चेतना को उस चक्र में घुमाकर अनुभव प्राप्त करते हैं। इस प्रकार प्राप्त अनुभूतिजन्य ज्ञान को जनहितार्थ बड़ी सहजता से व्यक्त किया जाता है। गूढ़ ज्ञान प्रकट करने वालों में जहाँ अपने
२० [भूमिका]
बायाँ स्तम्भ (Left Column):
अनुभव के प्रति पूर्ण आत्मविश्वास मिलता है, वहीं ज्ञानी की निरहंकारिता भी स्पष्ट परिलक्षित होती है। बालक नचिकेता को यम के द्वार पर तीन दिन प्रतीक्षा करनी पड़ती है, तो यमदेव स्वयं उसके लिए पश्चात्ताप प्रकट करते हैं। जनक की सभा में याज्ञवल्क्य शिष्यों को गौएँ ले जाने की आज्ञा देते हैं, तो अन्य विद्वान् उनसे पूछते हैं कि क्या आप स्वयं को सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मवेत्ता मानते हैं? तब वे नम्रतापूर्वक कहते हैं - ‘‘ब्रह्मवेत्ताओं को मेरा नमस्कार है, मुझे तो गौओं की आवश्यकता थी, इसलिए उन्हें स्वीकार कर लिया’’। अपनी बात समझाने के लिए ऋषि विविध ढंग अपनाते हैं। केनोपनिषद् में पहले ब्रह्म के विषय में विवेचनात्मक शैली अपनायी गयी है। बाद में यक्ष प्रसंग द्वारा कथा शैली से उसे समझाया गया है। प्रकृति के गूढ़ रहस्यों को जन सामान्य के लिए सुलभ उपमाओं के माध्यम से व्यक्त करने का बड़ा सुन्दर प्रयास किया गया है। श्वेताश्वतर उपनिषद् के १.४ में विश्व व्यवस्था को एक विशिष्ट पहिये की उपमा से समझाने का प्रयास किया गया है, तो १.५ में विश्व के जीवन प्रवाह को एक नदी के प्रसंग से व्यक्त करने का कौशल दिखाया गया है। ब्राह्मी चेतना किस प्रकार विभिन्न चरणों को पूरा करती हुई ‘जीव’ रूप में व्यक्त होती है, यह तथ्य मात्र विवेचनात्मक ढंग से समझना-समझाना बड़ा दुष्कर है; किन्तु छान्दोग्योपनिषद् (५.४-८) में ऋषि उसे क्रमशः पाँच प्रकार की अग्नियों में पाँच आहुतियों के उदाहरण से बहुत सहज रूप से समझाते हैं। प्रत्येक अग्नि में एक हव्य की आहुति होती है, उससे नये चरण में पदार्थ की उत्पत्ति होती है। ऋषि समझाते हैं कि प्रथम चरण में द्युलोकरूपी अग्नि में श्रद्धा की आहुति से सोम, दूसरे में पर्जन्यरूपी अग्नि में सोम की आहुति से वर्षा, तीसरे चरण में पृथ्वीरूपी अग्नि में वर्षा की आहुति से अन्न, चतुर्थ चरण में पुरुष में अन्न की आहुति से शुक्राणु तथा पाँचवें चरण में नारीरूपी अग्नि में शुक्राणु की आहुति से व्यक्ति वाचक ‘जीव’
दायाँ स्तम्भ (Right Column):
का उद्भव होता है। आज का विज्ञान अपने समस्त संसाधनों के साथ भी चेतना और पदार्थ के इस सुसंगत संयोजन का अध्ययन नहीं कर पा रहा है। उपनिषद् में केवल बौद्धिक जानकारियों को अपर्याप्त माना है, ज्ञान की सभी धाराओं के मूल में स्थित आत्मतत्त्व का अनुभव करना अभीष्ट माना जाता है। छान्दोग्योपनिषद् में श्वेतकेतु स्वीकार करते हैं कि वे वेदादि का अध्ययन तो कर चुके हैं; लेकिन अभी उस अनुभूति को नहीं पा सके हैं, जिसके आधार पर अनसुना-अनजाना भी सुना और समझा जा सकता है। स्वयं देवर्षि नारद भी सनत्कुमार जी से कहते हैं कि उन्हें वेद विद्या से लेकर नागविद्या तक सभी तरह की विद्याएँ तो प्राप्त हैं; किन्तु अभी आत्मतत्त्व का ज्ञान नहीं हुआ है। उपनिषद् के ऋषि आत्मबोध को तो परमेश्वर के लिए भी आवश्यक मानते हैं। बृहदारण्यक उपनिषद् १.४.१० में कहा गया है कि ब्रह्म ने अपने को जाना तो वह ‘सर्व’ हो गया। देवता, ऋषि, मनुष्यों में से जिन्होंने भी उसे जाना, वे तद्रूप हो गये। महर्षि वामदेव उसी अनुभव के आधार पर कहते हैं, ‘मैं ही मनु और सूर्य हुआ हूँ....आदि। ईशोपनिषद् में भी ऋषि यही अनुभव करते हुए कहते हैं- ‘‘तेजो यत्ते रूपम् कल्याणतमं तत्ते पश्यामि, योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि।’’ सर्वत्र एक ही चेतना को सक्रिय देखने वाले ऋषि किसी जाति भेद, वर्गभेद में बँधना स्वीकार नहीं करते। सत्यकाम जाबाल अपने पिता का परिचय नहीं जानते; किन्तु उनकी प्रखर जिज्ञासा के आधार पर उन्हें अध्यात्म की उच्च कक्षा में प्रवेश दिया जाता है। बृहदारण्यकोपनिषद् १.४.११-१५ में ऋषि स्पष्ट करते हैं कि मनुष्य के चारों वर्ण ब्रह्म के ही रूप हैं। यह रूप उसके द्वारा विभिन्न विभूतियुक्त कर्म करने के लिए विकसित किये हैं। देवताओं में भी उनके कर्मविभाग के अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र संज्ञकदेवों का उल्लेख किया जाता है। वर्णभेद के बहाने जातिभेद के विषयों के लिए उपनिषदों में कोई स्थान नहीं है। वे तो आत्मा की सर्वव्यापकता
उपनिषदों में कर्मकाण्ड का तथा उनकी
[भूमिका] २१
[खण्ड १] के आधार पर मनुष्य मात्र के लिए विकास के समान अवसर उपलब्ध कराना चाहते हैं। उपनिषदों में कर्मकाण्ड का तथा उनकी फलश्रुतियों का उल्लेख भी जहाँ-तहाँ मिलता है; लेकिन वे वहीं तक सीमित नहीं रह जाते। कर्मकाण्ड के स्थूल स्वरूप को भेदकर उसके मर्म तक पहुँचते हैं, वे सामगान की व्याख्या करते हैं, तो उसे यज्ञीय कर्मकाण्ड में कुछ मन्त्रों के गायन तक ही सीमित नहीं रहने देते। छान्दोग्योपनिषद् प्रथम अध्याय के तेरहवें खण्ड में तथा अध्याय-२ के दूसरे खण्ड में प्रकृति चक्र में अनेक प्रकार के साम प्रवाह (सन्तुलित प्रवाहों) का स्वरूप समझाते हैं। उपनिषद् में पुरुषमेध-सर्वमेध आदि यज्ञ आत्म निग्रह के विधान बन जाते हैं। बृहदारण्यकोपनिषद् के अश्वमेध प्रकरण में अश्वमेध, व्यक्ति द्वारा सम्पूर्ण विश्व को समर्पित करने की समाधि जैसी प्रक्रिया के रूप में परिलक्षित होने लगता है।
भाव और भाषा
उपनिषद् में भाव और भाषा की सहजता का बड़ा सुन्दर तालमेल मिलता है। अनुभूति से उपजे सहज भावों को सहज भाषा में व्यक्त करने का प्रयास किया गया है। अपने भाषा ज्ञान को व्यक्त करने में आडम्बर पूर्ण, क्लिष्ट भाषा को थोपने का प्रयास नहीं किया गया है। इसके लिए तर्क, समीक्षा,कथोपकथन, उदाहरण, उपाख्यान आदि विभिन्न शैलियों का समयानुकूल उपयोग करते हुए भावों को सहज ग्राह्य बनाने का प्रयास किया गया है। यह सब होते हुए भी रहस्यात्मकता जगह- जगह परिलक्षित होती है। उसके कई कारण हैं। जैसे गूढ़ ज्ञान- विज्ञान को कितना भी सुगम बनाया जाये, उन्हें समझने के लिए अध्येता का अपना भी कुछ सार होना चाहिए। द्रष्टा ने जो देखा उसे पूरी तरह भाषा में बाँधना तो कभी सम्भव होता नहीं। भाषा में संकेतात्मक अभिव्यक्ति भर होती है। कोई संगीत विशेषज्ञ सुन्दर राग में मुधर भावों को गाकर व्यक्त करे, तो सुनने वाला उसके अन्दर के भाव प्रवाह की एक झलक भर ही पा सकता है। वह भी गायन स्वर संकेतों के साथ लिपिबद्ध किया जाए, तब तो उसके भावों को समझने के लिए और भी अधिक साधना चाहिए। आज पदार्थ विज्ञान को समझने के लिए केवल भाषा की समीक्षा करके तथ्य जानने की परिपाटी चल पड़ी है। पदार्थ विज्ञान के सन्दर्भ में यह पद्धति चल भी जाती है। लेकिन भाव विज्ञान के क्रम में तो केवल भाषा की समीक्षा से काम चल नहीं सकता। गूढ़ भावों को अनुभव करने के लिए सूक्ष्म संवेदनात्मक क्षमताएँ चाहिए। आज उनका बड़ा अभाव हो गया है। इसीलिए उपनिषदादि द्वारा सहज भाषा में प्रस्तुत भाव भी रहस्यात्मक प्रतीत होते हैं। ऋषि, देवता एवं छन्द को समझे बिना वेदमन्त्रों का भाव स्पष्ट नहीं होता। उसी प्रकार उपनिषदों के अध्ययन में भी द्रष्टा-उपदेष्टा के स्तर, उसके लक्ष्य और अभिव्यक्ति की शैली पर गहराई से ध्यान देने पर ही उनके भावों के कथन का ठीक-ठीक लाभ उठाया जा सकता है।
ऋषि का दृष्टिकोण
उपनिषद्कारों-ऋषियों ने जनकल्याण की दृष्टि से अपनी विशिष्ट अनुभूतियों को बड़े सहज ढंग से व्यक्त करने का कौशल दिखाया है। उनकी मेधा का कमाल कहें या संस्कृत भाषा की विशेषता। आश्चर्य होता है कि कैसे इतने गूढ़ एवं विविधतापूर्ण तथ्यों को थोड़े शब्दों में एवं सहज भाषा में समाहित करके 'गागर में सागर' भरने की उक्ति चरितार्थ की गयी है। औपनिषदीय सूत्रों का भावार्थ करने में जहाँ भाषा को सहज बोधगम्य बनाना आवश्यक लगता
२२ [भूमिका]
है, वहीं द्रष्टा के दृष्टिकोण तथा उसके गूढ़ संकेतों को भी उभारना उचित प्रतीत होता है। ऋषि चेतना के समर्थ संरक्षण एवं मार्गदर्शन में हुए इस भाषार्थ में उक्त दोनों पक्षों के निर्वाह का प्रयास किया गया है। इसके लिए सहज भाषार्थ के आगे-पीछे पूर्वापर टिप्पणियों का सहारा लेकर विशिष्ट भावों-संकेतों को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है। उसके लिए वर्तमान समय में जन-मानस में बैठे हुए ज्ञान- विज्ञान के उदाहरणों के माध्यम से बात समझाने का प्रयास किया गया है। इससे ऋषि मेधा एवं जन-जिज्ञासा का सुसंयोग बन सकेगा, ऐसा विश्वास है। ऋषि की दृष्टि का दिङ्निर्देश हो जाने से विज्ञजन उस दिशा में अपनी चिन्तन शक्ति का उपयोग करके समुचित लाभ प्राप्त कर सकते हैं। उदाहरणार्थ-सामान्यरूप से उद्गीथ का अर्थ 'ॐकार' या 'साम' मन्त्रों का गायन ही लिया जाता है; किन्तु छान्दोग्य उपनिषद् १.३.६ में ऋषि ने उसे त्रिविध प्राण-प्रवाहों के संयोग से साध्य बतलाया है। इस ओर ध्यान दिलाए बिना जन मान्यता का परिशोधन कैसे हो सकता है ? इसी प्रकार छान्दोग्य २.२.१ की टिप्पणी में स्थूल सामगान के पाँच विभागों या भक्तियों के माध्यम से प्रकृति के विभिन्न क्रिया-कलापों में चलने वाली प्राण-प्रक्रिया को ऋषि ने आलंकारिक ढंग से व्यक्त किया है। यह क्रम अध्याय २ के द्वितीय से ससम खण्ड तक चलता है। अस्तु, द्वितीय खण्ड के प्रारम्भ में ही टिप्पणी देकर पाठक को वह भाव समझने के लिए प्रेरित किया गया है। इसी उपनिषद् में पहले स्पष्ट किया जा चुका है कि 'उद्गीथ' ही साम है तथा साम का भाव 'साधु' श्रेष्ठ-सदाशयता पूर्ण होता है। उद्गीथ में प्राणों को उद्देश्य विशेष के लिए तरंगित-प्रेरित किया जाता है। श्रेष्ठ सन्दर्भों में प्राणों को तरंगित करने का क्रम स्थूल-सूक्ष्म प्रकृति में विभिन्न रूपों में चल रहा है। यज्ञीय गान में साम के पाँच विभाग या भक्ति कहे गये हैं। ऋषि ने विराट् प्रकृति यज्ञ में साम के विभिन्न रूपों और उसके विभागों का वर्णन ससम खण्ड तक किया है। कहा गया है कि प्रकृति की विभिन्न क्रियाओं में होने वाले प्राणों के साम प्रयोगों से जो साधक तादात्म्य बिठा लेता है, उस साधक में उस चक्र को नियन्त्रित करने की क्षमता आ जाती है। इसी प्रकार छान्दोग्य ३.५.२ के पूर्व पदार्थ कणों के अनुशासित प्रक्रिया के पीछे चेतन संकल्प की उपस्थिति का भाव समझाने की दृष्टि से टिप्पणी की गयी है- 'पदार्थ विज्ञान आदित्यादि की सक्रियता के पीछे पदार्थ कणों की सक्रियता को कारण मानता है। ऋषि कहते हैं कि आदित्यादि की जो दृश्य प्रक्रिया चल रही है, उसके पीछे चेतन का संकल्प या आदेश कार्य कर रहा है। कम्प्यूटर सारे कार्य करता दिखता है; किन्तु कम्प्यूटर वैज्ञानिक जानता है कि उस सारी प्रक्रिया के मूल में कम्प्यूटर को दिया गया निर्देश (कमाण्ड) ही उसकी सक्रियता का मुख्य कारण है। उसी प्रकार ऋषि इस विश्व ब्रह्माण्ड के पीछे कोई गुप्त निर्देश होना मानते हैं। उसे ही उन्होंने दृश्य रसों का भी रस कहा है।' ऐतरेय उपनिषद् में ऋषि ने एक उपाख्यान से यह समझाया है कि विराट् पुरुष परब्रह्म से उत्पन्न हुई देव शक्तियाँ मनुष्य शरीर के विभिन्न अंग-अवयवों में स्थापित हैं। उस क्रम में भूख- प्यास के लिए कोई स्थान विशेष नहीं बतलाया गया है। इस रहस्यात्मक उक्ति को आज के शरीर विज्ञान के क्रम में इस प्रकार स्पष्ट किया गया है- 'ऋषि स्पष्ट करते हैं कि भूख-प्यास का कोई स्वतंत्र स्थान नहीं है। वह विभिन्न अंग-अवयवों में संव्यास देवशक्तियों के साथ संयुक्त है। शरीर विज्ञान के वर्तमान शोध निष्कर्ष भी यही कहते हैं। भूख-प्यास शरीर के प्रत्येक कोश में होती है। जब तक पेट में अन्न-जल का भण्डार होता है; तब तक
भूमिका २३ भूख-प्यास की अनुभूति नहीं होती। रोगों की स्थिति में 'ड्रिप' द्वारा जल एवं पोषण पहुँचाने से भी भूख- प्यास सताती नहीं है। स्पष्ट है कि भूख-प्यास प्रत्येक जीवित कोष के साथ संयुक्त है।' इसी प्रकार पुरुष के गर्भ में पुरुष के परिपाक की बात भी जेनेटिक साइन्स के माध्यम से इस प्रकार स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है- 'वर्तमान प्रजनन विज्ञान (जेनेटिक साइन्स) भी वीर्य में गुण सूत्रों (क्रोमोजोमों) तथा जीन्स (जीवाणुओं) में व्यक्तित्व की सभी विशेषताओं का समावेश मानता है। पुरुष के गर्भ में पुरुष का परिपाक यह उपनिषद् की अपनी दृष्टि है। पदार्थ विज्ञान की अपनी सीमाएँ हैं, ऋषि उसमें चेतना का संकल्पयुक्त तंत्र देखते हैं।' कठोपनिषद् में नाचिकेताग्नि तथा उसकी 'इष्टिकाओं' की अवधारणा जिज्ञासुओं को दी जानी आवश्यक प्रतीत होती है, उसके लिए १.१.१५ एवं १.१.१६ की टिप्पणियाँ ध्यान देने योग्य हैं- वेद में 'इष्टका' शब्द स्थूल ईंटों के अतिरिक्त 'इष्ट' वस्तु के निर्माण में प्रयुक्त सूक्ष्म इकाइयों के लिए भी प्रयुक्त होता है। यहाँ स्थूल ईंटों के स्थान पर अग्नि की सूक्ष्म इकाइयों का भाव ही ग्राह्य है। लौकिक अग्नि में भी विभिन्न इकाइयाँ शामिल होती हैं। इनमें ताप (कैलोरी), प्रकाश (ल्यूमेन) तथा रंग (कलर स्पेक्ट्रम) आदि सबको पता है। स्थूल अग्नि के अनेक अन्य गुण भी उसके घटक (इकाई) कहे जा सकते हैं। यहाँ स्वर्ग प्रदायिनी दिव्य अग्नि की इकाइयों तथा उनके चयन की बात कही गयी है। गुहा-अन्तःकरण में स्थित ऊर्जा की इकाइयाँ बीज रूप में स्थित दिव्य प्रवृत्तियाँ कही जा सकती हैं। उन्हीं के जागरण एवं संयोजन से व्यक्ति विद्वान्, कलाकार, वैज्ञानिक आदि स्तरों तक पहुँच जाता है। यमदेव ने नचिकेता को स्वर्ग तक पहुँचाने वाली दिव्य अग्नि-ऊर्जा के लिए आवश्यक सूक्ष्म इकाइयों तथा उनके संयोजन का रहस्य बतलाया है।' इसी प्रकार विभिन्न प्रकरणों में जिज्ञासु अध्येताओं के चिन्तन को दिशा देने वाली टिप्पणियाँ स्थान-स्थान पर की गयी हैं। पूर्वाग्रह रहित शोध दृष्टि ऋषियों के कथन का सही भाव प्राप्त करने के लिए परम्परा या पूर्वाग्रह से हटकर शोध दृष्टि का उपयोग आवश्यक हो जाता है। ऋषि निर्देशों के अनुरूप चलते हुए प्रस्तुत प्रयास में अनेक विवादास्पद प्रसंगों के युक्ति संगत स्पष्टीकरण सम्भव हो सके हैं। उदाहरण के लिए ऊपर वर्णित कठ० १.१.१५ की व्याख्या को लें। यज्ञीय कर्मकाण्ड के अन्तर्गत ईंटों से वेदिकाओं के निर्माण की बात ध्यान में आ जाती है। उसी को ध्यान में रखकर पूर्व आचार्यों ने नाचिकेताग्नि के अन्तर्गत इष्टका चयन सम्बन्धी मन्त्रों के अर्थ ईंटों से वेदी का निर्माण प्रसंग के संदर्भ में ही करने का प्रयास किया है; किन्तु इस आधार पर मंत्रों के भावों और उनकी फलश्रुतियों की सिद्धि नहीं होती। वेद में भी जिन मन्त्रों के देवता 'इष्टका' हैं, उन प्रसंगों के अर्थ उन्हें प्रकृति की सूक्ष्म इकाइयों के रूप में स्वीकार करने से ही स्पष्ट होते हैं। इस छोटी-सी अवधारणा के साथ मन्त्रों के सहज स्वाभाविक अर्थ और महत्त्व स्पष्ट होने लगते हैं। ऐसा ही एक प्रसंग छान्दोग्य उपनिषद् ३.६.४ की टिप्पणी में स्पष्ट किया गया है, वहाँ ऋषि सूर्य के विभिन्न दिशाओं से उदय और अस्त होने के प्रभावों का वर्णन कर रहे हैं। सभी जानते हैं कि सूर्य का उदय सदैव पृथ्वी के पूर्व से तथा अस्त पश्चिम दिशा में होता है। मेरु पर्वत के आस-पास सूर्य के भ्रमण जैसी परिकल्पनाओं के आधार पर उस प्रसंग का विवेक मान्य समाधान नहीं निकलता। उक्त प्रकरण के समाधान हेतु उक्त टिप्पणी का भाव ध्यान देने योग्य है- छठवें से दसवें खण्ड तक सूर्य के उदय
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एवं अस्त की प्रक्रिया में विभिन्न दिशाओं का उल्लेख किया गया है, अधिकांश आचार्यों ने उन दिशाओं को पृथ्वी की दिशाएँ मानकर अर्थ करने के प्रयास किये हैं, जो विवेक को सन्तुष्ट नहीं कर पाते। ये दिशाएँ पृथ्वी की दिशाएँ नहीं हैं। जैसा कि इसी अध्याय के खण्ड २ से ५ में स्पष्ट लिखा है कि विशिष्ट दिव्य प्रवाहों की स्थापना सूर्य के विशिष्ट (पूर्वादि नामक) भागों में हुई है। यहाँ सूर्य के उन्हीं भागों से विशिष्ट अमृत प्रवाहों के प्रकट होने की बात कही गयी है। आदित्य के पूर्व से उदय का भाव यह लिया जाना चाहिए कि जब आदित्य का पूर्ववाला भाग दृश्य होता है उस समय तक वसुगणों का तथा उनसे सम्बद्ध अमृत का प्रवाह वातावरण एवं साधक पर रहता है। आगे के खण्डों में भी इसी प्रकार सूर्य के अन्य दक्षिण, पश्चिम आदि भागों के उदय-अस्त (दृश्यादृश्य) का भाव लिया जाना उचित है। इसी प्रकार ऐतरेय १.१.२ में पृथ्वी के नीचे पुनः आपः (अधस्तात् ता आपः) का भाव भी अधिकांश भाष्यों में खुल नहीं सका है। यहाँ आपः को सामान्य जल मानने से बात नहीं बनती। इस संदर्भ में ऐत० १.१.२ तथा १.१.४ की टिप्पणियों द्वारा अवधारणा को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है कि आपः प्रकृति का मूल क्रियाशील प्रवाह है, अवलोकन करें- यहाँ लोकों के नाम और उनकी स्थितियाँ विचारणीय हैं। पृथ्वी को 'मर' - मृत्युलोक कहा जाता है। अन्तरिक्ष-मरीचि अर्थात् प्रकाश किरणों वाला लोक माना जाता है। मरीचि का अर्थ शब्द कल्पद्रुम के अनुसार पापों, क्षुद्र जीवों या तमस् को मारने वाला कहा गया है। अन्तरिक्ष में ऐसे तेजस्वी मारक प्रवाह होने की पुष्टि वर्तमान विज्ञान भी करता है। अम्भ=अम् (प्राण) तथा भः ( भरणकर्त्ता) से बना है। द्युलोक से परे यह अव्यक्त रूप से सूक्ष्म प्राण का भरण करने वाला लोक है, जिसकी प्रत्यक्ष प्रतिष्ठा के रूप में द्युलोक है। पृथ्वी के नीचे आपः लोक का भाव अनेक आचार्यों ने माना है, जो समीचीन नहीं लगता। वेद के सन्दर्भ से यह भाव स्पष्ट होता है। ऋग्वेद ने आपः को सृष्टि के मूल क्रियाशील प्रवाह के रूप में व्यक्त किया है। आपः सृष्टि का आधारभूत द्रव्य है; इसलिए ऋषि ने उसे 'या अधस्तात् ता आपः' जो आधार रूप है, वह आपः है, ऐसा कहा है। वही हिरण्यगर्भ रूप है, जिसे वेद ने स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां (पृथ्वी और द्युलोक का आधार वही है) कहा है। आपः जल को भी कहते हैं; किन्तु वह अर्थ लेने से मन्त्र का भाव सिद्ध नहीं होता है। अस्तु, आपः को वेद की अवधारणा के आधार पर ही स्वीकार करना उचित है। इसे 'ताः' स्त्रीलिंग बहुवचन का सम्बोधन दिया गया है। इसी आपः तत्त्व के गर्भ में ब्रह्म का संकल्प बीज रूप में पककर विश्वरूप बनता है। यह गुण मातृसत्ता का होने से आपः को 'देवी आपः' या 'ता आपः' कहना उचित है। इस उपनिषद् में भी अगले मंत्रों में आपः का उत्पादक प्रयोग बार-बार परिलक्षित होता है। यहाँ वीर्य से पुनः 'आपः' की उत्पत्ति कही गयी है। यह बड़ा वैज्ञानिक-मार्मिक कथन है। आपः सृष्टिकर्त्ता आधारभूत प्रवाह है। वीर्य में ही पुनः सृष्टि करने में समर्थ बीज तैयार होता है, वीर्य उस सूक्ष्म आपः प्रवाह के चक्र को पुनः प्रयुक्त करने में सक्षम है, ऐसा ऋषि का अनुभव है। उसी आपः तत्त्व में चेतना पुनः रूप ग्रहण करने लगती है। ऋषियों ने सृष्टि के विकास के क्रम में प्रयुक्त हर विधा का उल्लेख एक आवश्यक श्रेष्ठ प्रक्रिया के रूप में किया है। अमैथुनी और मैथुनी सृष्टि दोनों के रहस्यों और उनसे सम्बंधित मर्यादाओं का वर्णन है। ऐतरेय ५.८.२ में उन्होंने प्रजनन प्रक्रिया को नारी रूपी अग्नि में सम्पन्न यज्ञ के रूप में किया है।
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ऐतरेय २.१३.१ में वे उस प्रक्रिया को 'वामदेव्य साम' के रूप में प्रतिपादित करते हैं। वहाँ ऋषि के अभिमत को टिप्पणी द्वारा इस प्रकार स्पष्ट किया गया है- 'ऋषि ने दाम्पत्य और उनके माध्यम से चलने वाले प्रजनन चक्र को वामदेव्य साम के अन्तर्गत कहा है। कुछ लोग इस प्रसंग पर अश्लीलता का आरोप लगाते हैं; किन्तु ध्यान देने योग्य तथ्य है कि ऋषि प्रकृति प्रवाह के अन्तर्गत चलने वाले प्राण प्रवाह के विभिन्न चक्रों की व्याख्या विभिन्न साम साधनाओं के रूप में कर रहे हैं। पुरुष-नारी द्वारा संचालित प्रजनन विज्ञान (जेनेटिक साइन्स) को छोड़ा कैसे जा सकता था। ये तो इसे एक विशिष्ट साम (प्राणों से प्राणी के विकास की श्रेष्ठ साधना) का स्वरूप देते हैं। अस्तु, इस ज्ञान-विज्ञान के प्रसंग में कहीं अश्लीलता की गंध लेने का प्रयास नहीं करना चाहिए।' इस प्रकार वेद के शीर्ष कहे जाने वाले उपनिषदों के मन्त्रों के भावों को ऋषियों की मूल अवधारणा पर ध्यान देते हुए समझा एवं समझाया जाना चाहिए। इस प्रस्तुति में अपनी सीमा-मर्यादा के बीच जो प्रयास किये गये हैं, उनके पीछे क्या मन्तव्य रहा है, वह विज्ञजनों के सामने सहज भाव से विनम्रता पूर्वक रख दिया गया है। आशा है कि इससे अध्येताओं को ज्ञानामृत के अवगाहन में समुचित सहयोग प्राप्त हो सकेगा।
[प्रकाशकीय]
इस प्रस्तुति के सन्दर्भ में जैसा कि पहले उल्लेख किया जा चुका है, उपनिषदों को आर्ष साहित्य के शीर्ष भाग की मान्यता प्राप्त है। नवयुग सृजन के पुष्ट आध्यात्मिक आधार को विकसित करने के लिए उपनिषदों के ज्ञानामृत को विचारशीलों तक पहुँचाने की आवश्यकता परम पूज्य, युगऋषि, वेदमूर्ति, तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने अनुभव की। तदनुसार सन् १९६१ में उन्होंने १०८ उपनिषदों के सुगम अनुवाद एवं जनसुलभ प्रकाशन का अनोखा पुरुषार्थ कर दिखाया। बाद में शान्ति- कुञ्ज में प्रज्ञा पुराण के अवतरण क्रम में ही उन्होंने गीता विश्वकोश तैयार करने तथा उपनिषदों के नये संस्करण से सम्बन्धित योजना प्रदान की। उस सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण सूत्र संकेत भी प्रदान किये। उनके निर्देशानुसार शक्ति स्वरूपा वन्दनीया माता भगवतीदेवी शर्मा के मार्गदर्शन में वेदों के साथ ही उपनिषदों पर भी शोध स्तर का कार्य प्रारम्भ किया गया। १०८ उपनिषदों का प्रस्तुत संस्करण उसी योजना के अन्तर्गत प्रस्तुत किया गया है। पूज्य आचार्य श्री द्वारा प्रारम्भ में १०८ उपनिषदें तीन (ज्ञान, ब्रह्मविद्या और साधना) खण्डों में प्रकाशित की गयी थीं। उस परिपाटी को यथावत् बनाये रखकर भी कतिपय परिवर्तन करने पड़े हैं। जैसे-पूर्व प्रकाशित उपनिषदों में बृहदारण्यक उपनिषद् को उसके बड़े कलेवर के कारण अलग से प्रकाशित किया गया था; किन्तु इस संग्रह में उसे साथ में ही रखना उचित समझा गया। पहले उपनिषदों के पौर्वापर्य का कोई विशेष क्रम नहीं था, इसमें उपनिषदों की अकारादि क्रम से रखा गया है। इससे उपनिषदों को ढूँढ़ने में सुविधा रहेगी। पूर्व प्रकाशन में प्रथम (ज्ञान खण्ड) में ३५ उपनिषदों का समावेश था। इस संग्रह में बृहदारण्यक० शामिल हो जाने के कारण इसमें कुल २४ उपनिषदों को ही लिया गया है। तीनों खण्डों के कलेवर लगभग समान रखने की दृष्टि को ध्यान में रखकर ऐसा करना आवश्यक समझा गया। अध्येताओं की सुविधा के लिए कुछ और प्रयास इस संग्रह में किये गये हैं-१. मन्त्रों का
२६ [भूमिका] प्रामाणिक पाठ प्रस्तुत करने के लिए प्राचीन पाठों को भी ढूँढ़ने का प्रयास किया गया है। इसके लिए अड़यार लाइब्रेरी-मद्रास' से प्रकाशित उपनिषदों के प्रथम संस्करण (१९२०-५०) प्राप्त किये गये हैं। साथ ही 'भाण्डारकर प्राच्य शोध प्रतिष्ठान, पूना'; सिन्धिया प्राच्य विद्या शोध संस्थान,उज्जैन'; एशियाटिक रिसर्च इंस्टीट्यूट, मुम्बई', 'अखिल भारतीय संस्कृत परिषद् लखनऊ' तथा 'सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी' से प्राप्त 'हस्त- लिखित' उपनिषदों का भी सहयोग लिया गया है। २. प्रत्येक खण्ड में 'मन्त्रानुक्रमणिका' देने का भी श्रमसाध्य प्रयास किया गया है। अभी तक गीताप्रेस द्वारा प्रकाशित कुछ गिनी-चुनी उपनिषदों की ही मन्त्रानुक्रमणिका उपलब्ध थी। अब इस संग्रह की सभी उपनिषदों की क्रमणी दी जा रही है। इससे मन्त्रों की ढूँढ़-खोज में सरलता रहेगी। ३. प्रत्येक खण्ड में एक परिशिष्ट जोड़ने का नूतन प्रयास किया गया है। उपनिषदों में प्रयुक्त पारिभाषिक शब्दों को व्याख्यायित करके अकारादि क्रम में प्रस्तुत किया गया है। इससे उपनिषद् विद्या में अभिरुचि रखने वाले अध्येताओं को बड़ी सहायता मिलेगी। ४. यथाशक्ति उपनिषदों के मूलस्रोतों का पता लगाकर उनके सन्दर्भ देने का प्रयास भी किया गया है। इससे यह जानना सुगम होगा कि कौन सी उपनिषद् संहिता का भाग है, कौन ब्राह्मण का, कौन आरण्यक का और कौन उनसे भिन्न है। ५. प्रत्येक उपनिषद् के प्रारम्भ में उसका संक्षिप्त सारांश दे दिया गया है, जिससे उपनिषद् की विषय- वस्तु पर एक विहंगम दृष्टि पड़ सके, जो पाठकों के लिए सुविधापूर्ण सिद्ध होगा। इस प्रकार परम पूज्य गुरुदेव एवं वन्दनीया माताजी की थाती को उन्हीं की प्रेरणा एवं शक्ति से आपके समक्ष प्रस्तुत करने में अतीव सन्तोष का अनुभव हो रहा है। इस ज्ञान यज्ञ में जिस समिधा और हव्य का उपयोग हुआ है,उसे जुटाने एवं प्रयुक्त करने में जिनके भी श्रम-साधन सार्थक हुए हैं, उन्हें निःसन्देह इस ज्ञानयज्ञ की दिव्य सुगन्ध आप्यायित करके धन्य बना देगी। उनके लिए शब्दों से आभार प्रदर्शन का कोई मूल्य नहीं। इस प्रयास को और अधिक उत्कृष्टता प्रदान करने में पाठकों के सुझाव सदैव प्रार्थनीय रहेंगे,क्योंकि वे ही इसके सच्चे पारखी हैं। उन्हीं के हाथों में इसे इस आशा के साथ सौंप रहे हैं कि वे इस ज्ञानामृत का रसास्वादन उसी भाव से करेंगे, जिस भाव से यह प्रस्तुत किया गया है। — प्रकाशक
॥ अमृतनादोपनिषद् ॥ यह उपनिषद् कृष्ण यजुर्वेद से सम्बद्ध है। इस उपनिषद् में प्रणवोपासना के साथ योग के छः अंगों- प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, प्राणायाम, तर्क (समीक्षा) एवं समाधि आदि का वर्णन किया गया है। प्राणायाम की विधि, ॐकार की मात्राओं का ध्यान, पाँचों प्राणों के स्थान एवं रंगों का उल्लेख भी किया गया है। योग साधक को भय, क्रोधादि मानसिक विकारों से मुक्त रहकर आहार-विहार, चेष्टा-कर्म, सोने-जागने आदि क्रमों को सन्तुलित बनाए रखने का निर्देश है। साधना के फलस्वरूप देवतुल्य जीवन की प्राप्ति से लेकर ब्रह्म निर्वाण तक की उपलब्धि का मार्गदर्शन दिया गया है। ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥ हे परमात्मन्! आप हम दोनों (गुरु-शिष्य) की साथ-साथ रक्षा करें। हम दोनों का साथ-साथ पालन करें। हम दोनों साथ-साथ शक्ति अर्जित करें। हम दोनों की पढ़ी हुई विद्या तेजस्वी (प्रखर) हो। हम दोनों एक-दूसरे के प्रति कभी ईर्ष्या-द्वेष न करें। हे शक्ति-सम्पन्न! (हमारे) त्रिविध (आधिभौतिक, आधिदैविक, आध्यात्मिक) तापों का शमन हो, अक्षय शान्ति की प्राप्ति हो। शास्त्राण्यधीत्य मेधावी अभ्यस्य च पुनः पुनः। परमं ब्रह्म विज्ञाय उल्कावत्तान्यथोत्सृजेत्॥ १॥ परम ज्ञानवान् मनुष्य का यह कर्त्तव्य है कि वह शास्त्रादि का अध्ययन करके बारम्बार उनका अभ्यास करते हुए ब्रह्म विद्या की प्राप्ति करे। विद्युत् की कान्ति के समान क्षण-भङ्गुर इस जीवन को (आलस्य-प्रमाद में) नष्ट न करे॥ १॥ ओंकाररथमारुह्य विष्णुं कृत्वाथ सारथिम्। ब्रह्मलोकपदान्वेषी रुद्राराधनतत्परः॥ २॥ ॐकार रूपी रथ में आरूढ़ होकर तथा भगवान् विष्णु को अपना सारथि बनाकर ब्रह्मलोक के परमपद का चिन्तन करता हुआ ज्ञानी पुरुष देवाधिदेव भगवान् रुद्र की उपासना में तल्लीन रहे॥ २॥ [प्राण यदि लौकिक सुखोपभोगों पर आरूढ़ हो जाता है, तो क्षीण होता है। जब रेडियो तरंगों पर ध्वनि को आरोपित (सुपर इम्पोज) करते हैं, तो रेडियो तरंगें कैरियर=रथ बनकर उस ध्वनि को विश्व भर में पहुँचा देती हैं। उसी प्रकार ॐकार पर आरोपित प्राण परब्रह्म तक पहुँच जाता है।] तावद्रथेन गन्तव्यं यावद्रथपथि स्थितः। स्थित्वा रथपतिस्थानं रथमुत्सृज्य गच्छति॥ ३॥