भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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प्रथमोऽङ्कः २७

अपि च—

¹कुल्याम्भोभिः पवनचपलैः शाखिनो धौतमूला भिन्नो रागः किसलयरुचामाज्यधूमोद्गमेन । एते चार्वागुपवनभुविच्छिन्नदर्भाङ्कुरायां नष्टाशङ्का हरिणशिशवो मन्दमन्दं चरन्ति ॥ १५ ॥

वृक्षत्वग्वस्त्राणां शिखाभ्यः = अग्रेभ्यः यः निष्यन्दः = जलस्रावः तस्य या रेखा पङ्क्तिः तया अङ्किताः चिह्निता इति वल्कलशिखा निष्यन्दरेखाङ्किताः = वल्कलाग्रपरिश्रुतजला-धाररेखाविभूषिताः दृश्यन्ते । वैखानसानां तापसानां च वस्त्रनिष्पीडननिषेधात् सद्यः स्नानेन त्वग्वस्त्रस्रुत्तवारिकणैः सैकतभूभागाः चिह्निता भवन्ति । तस्मादेभिलक्षणैरयमा-श्रमस्यैवाभोग एवानुमीयते भावः । अत्र काव्यलिङ्गम्, अनुमानं-स्वभावोक्तिश्चालङ्काराः शार्दूलविक्रीडितं च वृत्तम्, इति ॥ १४ ॥

अन्वयः—पवनचपलैः कुल्याम्भोभिः शाखिनः धौतमूलाः किसलयरुचां रागः आज्य-धूमोद्गमेन भिन्नः अर्वाक् च एते नष्टशङ्काः हरिणशिशवः छिन्नदर्भाङ्कुरायां उपवनभुवि मन्दं मन्दं चरन्ति ।

कुल्याम्भोभिः इति । पवनचपलैः = पवनेन = वायुना चपलैः = वाताहतैः चञ्चलैः = कुल्याम्भोभिः = कुल्यायाः = कृत्रिमायाः खाताया अम्भोभिः = जलैः आलवालवारिभिः = धौतानि = प्रक्षालितानि मूलानि = अधोभागा येषां ते धौतमूलाः = क्षालितमूलाः किसलयरुचां = किसलयानां = पल्लवानां रुचां = प्रभायाम् = पल्लवद्युतीनां रागः = लौहित्यं, आज्यधूमोद्गमेन = आज्यस्य = घृतस्य यो धूमः तस्य उद्गमेन = उद्भवेन = हविर्धूम-

हरिणों के बच्चों को बड़ा प्यार करते हैं। आश्रम के वृक्षों पर लटका कर सुखाने के लिए गीला-वल्कल वस्त्र ले जाते समय जलाशयों से पर्णकुटी तक जाने का मार्ग चिह्नित हो जाता है। तोते अपने बच्चों को चुगाने के निमित्त नीवार की बालें खेतों से लाते हैं, चुगाते समय उनके मुख से दाने गिर जाते हैं तथा मुनियों के अतिरिक्त कोई नीवार खाता नहीं। ये सब पूर्वोक्त बातें मुनियों के आश्रम में ही संभव होने के कारण राजा दुष्यन्त ने आश्रम पर पहुँच जाने का अन्दाजा कर लिया।

और भी देखो—

वायु से चञ्चल कृत्रिम क्यारियों में जल से भरे हुए वृक्षों की जड़ें धुल गयी हैं। अग्निहोत्र के आज्यधूम से वृक्षों के कोमल पल्लवों का रंग भी धूमिल हो गये हैं और छोटे-छोटे हरिणों के बच्चे निर्भय होकर कुशाओं के उखाड़ लेने से निष्कण्टक हुए उपवन के भूभाग में घूम-फिर रहे हैं। इससे स्पष्ट ही ज्ञात होता है कि यह आश्रम का ही प्रदेश है ॥ १५ ॥

विशेष—पूर्वश्लोक में वृक्षों के नीचे गिरे हुए नीवार, हिंगोट के तेल से सने पत्थर के टुकड़े मृगों के मन्द गमन और जलाशयों से आश्रम तक पानी की बूँदों से सिञ्चित भूमि से राजा ने आश्रमभूमि का अन्दाजा किया था, किन्तु अब इस श्लोक में वर्णित वायु से चंचल आलवालों के जल से वृक्षों की जड़ों के धुलने से, अग्निहोत्र के धुयें से पल्लवों के रंगपरिवर्तन से तथा कटे हुए कुशवाली समीपवर्ती भूमिपर मन्द गति से निर्भय चलने वाले हरिण शावकों से राजा को निश्चय हो गया कि यह आश्रम की पवित्रतम भूमि है।


पाठा०—१. अयं श्लोको हि क्वचिन्न्न वर्तते ।