भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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४८अभिज्ञानशाकुन्तलम्

शकुन्तला—( आत्मगतम् । ) किं णु क्खु इमं पेक्खिअ तवोवण विरोहिण विआरस्स गमणीअम्हि संवुत्ता। [ किं नु खल्विमं प्रेक्ष्य तपोवनविरोधिनो विकारस्य गमनीयास्मि संवृत्ता । ]

राजा—( सर्वा विलोक्य ) अहो समवयोरूपरमणीयं भवतीनां सौहार्दम्।

शकुन्तला—किं नु = इति वितर्के, खलु निश्चयेन इमं = जनम् अमुं दुष्यन्तं प्रेक्ष्य = दृष्ट्वा तपोवनस्य = आश्रमस्य विरोधिनः = प्रतिकूलस्य तपोवनविरोधिनः = तपस्विजनप्रतिकूलस्य विकारस्य = विकृतेः--विषयानुभवोन्मुख्यरूपस्य मनोविकारविशेषस्य गमनीया = लक्ष्यभूता प्राप्या संवृत्ता जाता । अनेन शकुन्तलायाः प्रथमः चित्तविकारारम्भरूपोऽङ्गजो भावः स्फुटं दर्शितः । उक्तं च--निर्विकारात्मके चित्ते भावः प्रथमविक्रिया ।

राजा—राजा = नृपो दुष्यन्तः ( सर्वाः = तिस्रः शकुन्तलाप्रियंवदाऽनसूयाः विलोक्य = दृष्ट्वा ) तासां परस्परं सौहार्दमालोक्य प्रसन्नो राजा दुष्यन्तः ताः समावर्जयितुं चाटुभाषणमारभते अहो, आश्चर्यं समानि वयांसि रूपाणि चेति समवयोरूपाणि तैः रमणीयमिति

प्रौढमति और गंभीर होने के साथ-साथ परिस्थिति संभालती रहती है । अनसूया ने शकुन्तला को भौंरे से परेशान बताया, जिससे राजा दुष्यन्त सहानुभूति में उसकी ओर मुखकर पूछते हैं, तबतक भौंरा भाग गया । तपोवन में सभी तपस्या करते हैं । अतः वहाँ तपस्वियों के लिए तप की वृद्धि सबसे बड़ी कुशल है। इसलिए राजा ने कुशल-प्रश्न के रूप में तपस्या की वृद्धि ही पूछी । गृहस्थ से स्वस्थता आदि पूछा जाता है, क्योंकि गृहस्थाश्रम में वही प्रमुख विषय हैं । शकुन्तला को ही अतिथि सत्कार करना है, पर वह वचन से भी सत्कार नहीं कर पाती, क्योंकि पहले तो भौंरे से परेशान थी अब विशेष अतिथि राजा से घबड़ा गई है कि इनका उचित आतिथ्य मुझ से हो पायेगा या नहीं। सूनृत वाणी का अर्थ है मीठी वाणी। राजा ने कहा-आपलोगों की मीठी वाणी से ही मेरा अतिथि-सत्कार हो गया, अब पाद्य, अर्घ लाने की कोई जरूरत नहीं। अभी तक विनोदी प्रियम्वदा चुप थी, अवसर देख रही थी। राजा की बात सुनकर उनके साथ बातचीत करना अपना सौभाग्य समझ कर मधुरवाणी का परिचय देती हुई कहना आरम्भ किया—अच्छा तो महाराज ! इस छितौन वृक्ष की सघन शीतल छाया में क्षणभर बैठकर विश्राम कर लें। जब प्रियम्वदा ने राजा को बैठाने का अनुरोध किया तब राजा ने भी उनसे वहाँ बैठकर कुछ देर तक विश्राम कर लेने को कहा। यह परस्पर का अनुरोध भारतीय शिष्टाचार की एक परम्परा है। पर्युपासन का तात्पर्य है कि अतिथि के आस-पास बैठना। अतः वे तीनों राजा के पास बैठ गई।

शकुन्तला—( मन ही मन ) क्या बात है कि इन्हें देखकर मेरे मन में आश्रम विरोधी = प्रतिकूल भाव = कामविकार उत्पन्न हो रहा है ?

**विशेष—**शकुन्तला अपने मन में ही सोचती है, जिससे प्रतीत होता है कि प्रेम से वशीभूत हो गयी है। नाटकों में स्वगत एवं आत्मगत समानार्थ माने गये हैं। धनञ्जय ने अपने दशरूपक में कहा है कि दर्शकों के सुनने योग्य बात को प्रकाश कहते हैं और जिसको दर्शक सुन रहे हों, पर पात्र नहीं, इसको स्वगत कहा जाता है—'सर्वश्राव्यं प्रकाशं स्यादश्राव्यं स्वगतं मतम्।'

राजा—( सबकी ओर देखकर ) अहा, परस्पर समान अवस्था और समान रूप वाली इन मुनिकन्याओं का प्रेम तथा इनका अनुराग भी आपस में कैसा सुन्दर है।

**विशेष—**यद्यपि राजा का शकुन्तला के प्रति विशेष अनुराग हो गया है फिर भी उसे छिपा कर समूह से पृथक् कर एक की प्रशंसा अशिष्टता समझ कर सबके रूप, आकृति एवं स्वभाव के