भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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प्रथमोऽङ्कः ४९

प्रियंवदा—(जनान्तिकम्) अणसूए को णु क्खु एसो चउरगम्भीराकिदो मधुरं पिअं आलवन्तो पहाववन्दो विअ लक्खीअदि। (जनान्तिकम्) [ अनसूये को नु खल्वेष चतुरगम्भीराकृतिमधुरं प्रियमालपन् प्रभाववानिव लक्ष्यते । ]

अनसूया— सहि मम वि अत्थि कोदूहलं पुच्छिस्सं दाव णं (प्रकाशम्) अज्जस्स महुरालावरञ्जिदो विसम्मों मं मन्तावेदि। कदमो अज्जेण राएसिणो वंसो अलंकरीअदि कदमो वा विरहपज्जुस्सुअजणो किदो देसो किंनिमित्तं वा


समवयोरूपरमणीयं = समेन = तुल्येन वयसा = अवस्थया, रूपेण = आकृत्या वा रमणीयं = सुन्दरं, मनोहरं भवतीनां = युष्माकं सौहार्दम् = मित्रता। अत्र रूपपदेन आकृतिः, सौन्दर्यं स्वभावश्चेति त्रितयं विवक्षितम् ।

प्रियंवदा— राज्ञो दुष्यन्तस्य रूपसौन्दर्यादिना प्रलोभिता तत्त्वजिज्ञासया (जनान्तिकं = त्रिपताकाकरेणान्यानपवार्य दुष्यन्तं श्रावयन्ती अनसूयां प्रति प्राह) अनसूये ! सखि ! नु शब्दो वितर्के खल्विति जिज्ञासायाम् । को नु खलु एषः = अयं निकटस्थः चतुरगम्भीरा आकृतिर्यस्य स चतुरगम्भोराकृतिः = दर्शनीयगभीरस्वरूपः यद्वा दुरवगाहगम्भीराकृतिः-दुरवगाहा अत एव गम्भीरा = गभीरा आकृतिः = मुखमुद्रा यस्यासौ प्रियं, मधुरं = सरसं आलपन् = वार्तालापं कुर्वन् प्रभाववान् इव = प्रतापशालीव लक्ष्यते = अनुमीयते । आकृत्या स्वभावेन वाचा च मन्ये नायं प्राकृतो जन इति भावः । यदि अस्य रूपाद्यनुरूपमभिजात्यमपि स्यात्तदा अस्मत्सख्याः शकुन्तलाया। वरत्वेनायं ग्रहीतुमुचित इति प्रियंवदाया गूढोऽभिसन्धिः ।

अनसूया— सखि ! = आलि ! प्रियम्बदे ! मम = मे अस्ति = वर्तते कौतूहलं = उत्सुकता


सम्बन्ध में अपना मत व्यक्त कर रहे हैं जिससे सखियाँ न समझ सकें कि ये कहीं छिपकर शकुन्तला के अपूर्व सौन्दर्य को देख रहे थे। इस प्रकार राजा को तीनों की अवस्था, आकृति एवं परस्पर सौहार्द से आश्चर्य हो रहा था। अतः उन्होंने तीनों की प्रशंसा की है।

प्रियम्बदा—(हाथ की आड़ कर केवल अनसूया से) सखि अनसूये ! यह कौन व्यक्ति है जो देखने में गम्भीर आकृति वाला मालूम पड़ता है। इसके मधुर भाषण से यह अत्यन्त प्रभाव शील प्रतीत हो रहा है।

विशेष— राजा दुष्यन्त के शिष्ट व्यवहार तथा प्रभावशाली व्यक्ति का इतना प्रभाव पड़ा कि प्रियम्वदा हाथ की आड़ में मुख छिपा कर अनसूया से बातचीत करती हुई उनकी प्रशंसा कर रही है। दशरूपक में धनञ्जय ने जनान्तिक का लक्षण लिखा है कि बातचीत के प्रसंग में हाथ की अंगुलियाँ खड़ीकर और अनामिका को कुछ तिरछा कर जो कहा जाय उसे जनान्तिक कहते हैं। इस ढंग में वही व्यक्ति नहीं सुन पाता है जिसकी तरफ अनामिका तिरछी की जाती है, शेष सुनते रहते हैं।

'त्रिपताकाकरेणान्यानपवार्यान्तरा कथाम्।
अन्योऽन्यामन्त्रणं यत् स्यात् जनान्ते तज्जनान्तिकम्॥'

अनसूया—हे सखि प्रियम्बदे ! मुझे भी इस बात का बड़ा कुतूहल हो रहा है। अतः मैं इनसे


पाठा०—१. चतुरे ।
४ शाकु०