अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
पृष्ठ 132, कुल 540 में से
संदर्भ में पढ़ें५० अभिज्ञानशाकुन्तलम्
सुउमारदरो वि तवोवणगमणपरिस्ससस्स अत्ता पदं उवणीदो। [ सखि, समाश्वसिति कौतूहलम्। प्रक्ष्यामि तावदेनम्। ( प्रकाशम् ) आर्यस्य मधुरालापजनितो विश्रम्भो मां मन्त्रयते। कतम आर्येण राजर्षवंशोऽलंक्रीयते कतमो वा विरहपर्युत्सुकजनः कृतो देशः किंनिमित्तं वा सुकुमारतरोऽपि तपोवनगमनपरिश्रमस्यात्मा पदमुपनीतः। ]
शकुन्तला—( आत्मगतम् ) हिअअ मा उत्तम्म। एता तुए चिन्तिद अणसूआ मन्तेदि [ हृदय मोत्ताम्य। एषा त्वया चिन्तितं अनसूया मन्त्रयते। ]
प्रक्ष्यामि = पृच्छामि तावत् = प्रथमम् एनं = इमं राजानम्, ( प्रकाशं = व्यक्तम् ) आर्यस्य = श्रीमन्तः, भवतः मधुरालापजनितः—मधुरेण = कर्णसुखकरेण आलापेन = संभाषेणेन जनितः = उत्पन्नः विश्रम्भः = विश्वासः माम् = इमं जनम् अनसूयाम् मन्त्रयते = कथयितुं प्रेरयते, वचनेन नियोजयते, कतमः = कः आर्येण = श्रीमता, राजर्षेवंशः अलङ्क्रियते = कस्य राजर्षेः वंशे भवानुत्पन्नः कतमो वा देशः = स्थानम् विरहेण = वियोगेन पर्युत्सुकाः = उत्कण्ठिता जनाः यस्मिन् स विरहपर्युत्सुकजनः कृतः = विहितः कस्माद्देशादागतोऽसीति भावः। किंनिमित्तं = को हेतुः वा = च सुकुमारतरः = परिश्रमानर्हः अपि तपोवने यद्गमनं तस्य परिश्रमः क्लान्तेः इति तपोवनगमनपरिश्रमस्य आत्मा = देहः पदं = स्थानम् उपनीतः = प्रापितः, केन हेतुना भवानत्र आयात इति हि प्रश्नाशयः। अत्र क्रमशः वंशदेशौ आगमनहेतुश्च भङ्ग्या पृष्टः।
शकुन्तला--( आत्मगतं = स्वगतम् ) हृदयः = मनः मा उत्ताम्य = अलम् अधीरतया सन्तापं मा कृथाः। एषा = इयं निकटस्था अनसूया त्वया भवता = चिन्तितम् = इष्टम् मन्त्रयते = जिज्ञासाप्रकटनेन कथयति।
पूछती हूँ (प्रगट में) आर्य ! आपके इस मधुर भाषण से जो विश्वास उत्पन्न हो गया है, उसी से मैं आपसे यह पूछने की धृष्टता कर रही हूँ कि आपने किस राजर्षि वंश को अपने जन्म से अलंकृत किया है ? और आपने कौन देश को अपने विरह से उत्सुक=विरहाकुल किया है तथा किस लिए आपने अपने इस सुकुमार शरीर को इस तपोवन में आने के कष्ट में लगाया है अर्थात् क्या चन्द्र-सूर्यवंशों में किस राजवंश में आपका जन्म है? और आप किस देश के निवासी हैं तथा इस तपोवन में आपके आने का क्या कारण है ? कृपया बताने का कष्ट करें।
**विशेष—**विश्वास की परिभाषा शास्त्रों में इस प्रकार की गई है—
'यद् यत स्वचित्ते स्फुरति तत्तत् परिचितान् प्रति।
निःशेषं बोधयन् भावो विश्वास इति कथ्यते॥'
अनसूया तो पहले संकुचित-सी हो गई थी, किन्तु परिस्थिति के अनुकूल होते ही उसने भावुक प्रश्नों की चर्चा छोड़कर व्यावहारिक प्रश्न करना प्रारम्भ कर दिया, जिससे उस आगन्तुक अपरिचित अतिथि को विशेष जानकारी हो सके। उसने सभ्यभाषा में राजा से तीन बातें पूछीं- आप किस वंश के राजा हैं ? आपका कौन सा देश है ? यहाँ आश्रम में आने का क्या कारण है इस प्रकार काव्यात्मक भाषा में वंश देश और आगमन का कारण पूछकर अनसूया ने प्रगल्भ और व्यवहार-पटुता का पूर्ण कौशल उपस्थित कर दिया है जिससे मधुर आलाप से सौहार्द पूर्ण विश्वास का वातावरण प्रस्तुत हो गया है।
शकुन्तला—( मन ही मन ) हृदय अधीर मत हो। जो बात तुम जानना चाहती हो उस बात को तो वह अनसूया स्वयं ही पूछ रही है।
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