भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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प्रथमोऽङ्कः (५५)

राजा—अस्ति। श्रूयते।

अनसूया—त णो पिअसहीए पहवं अवगच्छ। उज्झिआए सरीरसंबड्ढणादिहिं तादकस्सवो से पिदा। [तमावयोः प्रियसख्याः प्रभवमवगच्छ। उज्झितायाः शरीर-संवर्धनादिभिस्तातकाश्यपोऽस्याः पिता।]

राजा—उज्झितशब्देन जनितं मे¹ कौतूहलम्। ²आमूलाच्छ्रोतुमिच्छामि।


राजा—दुष्यन्तः आत्मनः श्रवणौत्सुक्यं द्योतयितुं तदुक्तमनुमोदमानः प्राह—अस्ति=आसीत् श्रूयते = आवर्णनमात्रेण तत्सत्तां जानामि।

अनसूया—श्रोतुमौत्सुक्यमवधायं सोत्साहं प्राह—तं = राजर्षि कौशिकं आवयोः प्रियसख्याः = शकुन्तलायाः प्रभवं = जनकं अवगच्छ = जानीहि। कथं तर्हि कण्वपुत्रीति व्यपदेश इत्यत आह—उज्झितायाः = प्रसवानन्तरं जनन्या परित्यक्तायाः शरीरपरिवर्द्धना-दिभिः = कलेवरपोषणादिभिः तातकाश्यपः = महर्षिः कण्वः अस्याः = शकुन्तलायाः पिता = पातीत्यन्वर्थनामा न तु जनकः यथोक्तं—

'कन्यादाताऽन्नदाता च जन्मदाताऽभयप्रदः।
जन्मदो मन्त्रदो ज्येष्ठभ्राता च पितरः स्मृताः ॥'

राजा—नृपो दुष्यन्तः सख्योक्त्या शकुन्तलाया राजर्षिबीजात् संभवं ज्ञात्वा तामा-त्मनः परिग्रहयोग्यां मन्यमानः अत एव प्रवर्द्धमानोऽनुरागस्तन्मातरं ज्ञातुं तदुत्पत्तिं विस्त-रेण श्रोतुकाम आह = उज्झित इति शब्देन मे = मम मनसि कौतूहलं = जिज्ञासा जनितं = उत्पन्नम् आमूलात् = आदित आरभ्य, आरम्भात् श्रोतुं = आकर्णयितुं, इच्छामि = कामये।


राजा— हाँ, उनका नाम तो मैंने खूब सुना है।

अनसूया— हमारी सखी शकुन्तला के वे ही विश्वामित्र जी पिता हैं, परन्तु इस शकुन्तला को इसकी माता ने यों ही छोड़ दिया था। अतः इसका पालन-पोषण कुलपति कण्व ने किया है। इसलिए इसके पालन-पोषण करने के कारण महर्षि कण्व भी इसके पिता के समान हैं, क्योंकि पालन-पोषण करने वालों को भी शास्त्रों में पिता कहा गया है।

विशेष— महाभारत के आदि पर्व में जो गर्भाधान के शरीर निर्माण करता है, जो अभय दान देकर प्राणों की रक्षा करता है और जिसका अन्न भोजन किया जाता है, ये तीनों पिता कहे गये हैं—

'शरीरकृत् प्राणदाता यस्य चान्नानि भुञ्जते। क्रमेणैव त्रयः प्रोक्ताः पितरौ धर्मसाधने ॥'

इन्द्र द्वारा भेजी गयी अलौकिक सौन्दर्य सम्पन्न मेनका अप्सरा ने अपने हावभावों के द्वारा अग्नि के समान तेजस्वी विश्वामित्र मुनि को तपोभ्रष्ट कर उनके साथ संभोग किया और शकुन्तला को जन्म देकर निर्जन वन में उसे छोड़ कर इन्द्र लोक चली गई। बाद महर्षि कण्व ने उस निर्जन वन में घेर कर शकुन्तों (पक्षियों) द्वारा रक्षित उसे लाकर रक्षा किया और उसका नाम शकुन्तला रख दिया। (अतः शकुन्तोंद्धार रहित होने के कारण इसका नाम शकुन्तला पड़ा)।

'निर्जने तु वने यस्माच्छकुन्तैः परिवारिता। शकुन्तलेति नामास्या कृतं चापि ततो मया ॥ ७२।१६

इस प्रकार अपने यहाँ लाकर प्राण दाता और अन्न दाता होने के कारण महर्षि कण्व शकुन्तला के पिता कहे जाते हैं। वह वस्तुतः मेनका में उत्पन्न विश्वामित्र की पुत्री थी।

राजा— उज्झित शब्द ने मुझ में उत्सुकता उत्पन्न कर दी है। यह क्यों छोड़ दी गई इस प्रसंग को मैं आरम्भ से सुनना चाहता हूँ।


पाठा०—१. नः। २. तदामूला ।