अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६ अभिज्ञानशाकुन्तलम्
अनसूया—सुणादु अज्जो पुरा किल तस्स राएसिणो उग्गे तवसि वट्टमाणस्स किवि जातसङ्केहि देवेहि मेणआ-णाम अच्छरा पेसिदा णिअमविग्धकारिणी।
[ शृणोत्वार्यः । पुरा किल तस्य राजर्षेरुग्रे तपसि वर्तमानस्य किमपि जातशङ्कैर्देवैर्मेनका नामाप्सराः प्रेषिता नियमविघ्नकारिणी । ]
राजा—अस्त्येतदन्यसमाधिभीरुत्वं देवानाम् ।
अनसूया—शृणोतु = आकर्णयतु आर्यः = श्रीमान्, पुरा = प्राचीनकाले किल = ऐतिह्यम्, तस्य = उक्तस्य राजर्षेः = नृपमुनेः उग्रे = उत्कटे तपसि = तपस्यायां वर्तमानस्य = विद्यमानस्य देवैः = अमरैः विघ्नकारिणी नियमे तपसि विघ्नं = बाधां करोति तच्छीला विघ्नकारिणी = तपोभङ्गकारी मेनका नाम = मेनकाख्या नाम अप्सराः = स्वर्गबामा प्रेषिता = प्रहिता ।
**राजा—**अनसूयोक्तं समर्थयन् राजा प्राह—अस्ति = भवति एतत् = इदं पूर्वोक्तम्,
**अनसूया—**महाराज, सुनिए, वे कौशिक विश्वामित्र नामक ऋषि, जिस समय गोदावरी नदी के तट पर उग्र तपस्या कर रहे थे, तो उनकी तपस्या से शङ्कित देवताओं ने उनकी तपस्या में विघ्न डालने के लिए मेनका अप्सरा को उनके पास भेजा ।
**राजा—**ठीक है, देवता लोग तो दूसरे की समाधि एवं तपस्या से हमेशा डरते ही रहते हैं हाँ, तो फिर आगे क्या हुआ ?
विशेष—'अप्सु सरतीति अप्सराः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार जल में चलने वाली या जल से उत्पन्न होने वाली को अप्सरा कहा जाता है ।
अप्सराएँ स्वर्ग में इन्द्र-सभा की नर्तकी का काम करती हैं । ये नाच और गान में अत्यन्त निपुण है । कई तरह से इनकी उत्पत्ति बताई गई है । किसी उग्र तपस्वी के तप से डर कर देवता लोग इन्हें तपोभङ्ग करने के लिए भेजते रहते हैं । भिन्न-भिन्न तपस्वियों के तप को नष्ट करने के निमित्त भिन्न-भिन्न अप्सरायें जाती हैं । ये हमेशा युवती बनी रहती हैं ।
वाल्मीकि रामायण के अनुसार जल-मन्थन से उत्पन्न रस से अप्सरायें उत्पन्न हुई हैं ।
'अप्सु निर्मथनादेव रसात्तस्माद्वरस्त्रियः।
उत्पेतुर्मनुश्रेष्ठ ! तस्मादप्सरसोऽभवन् ॥' ४५।३३
महाभारत में उर्वशी, पूर्वचित्ति, सहजन्या, मेनका, विश्वाची और घृताची छह अप्सरायें ब्रह्मा से उत्पन्न कही गई हैं । इनमें मेनका सर्वश्रेष्ठ कही गई है—
'उर्वशी विप्रचित्तिश्च सहजन्या च मेनका।
विश्वाची च घृताची च षडेवाप्सरसां वराः ॥
दिवः सम्प्राप्य जगती विश्वामित्रादजीजनत् ॥'
अप्सराओं के लुभाने पर बड़े-बड़े ऋषि, महर्षि, देवर्षि, राजर्षि, तपस्वी आदि की तपस्यायें भंग हो जाती हैं । ये इन्द्र के दरबार की अमोघ अस्त्र हैं ।
विश्वामित्र जी की उग्र तपस्या को भंग करने के निमित्त जब इन्द्र ने मेनका से कहा तब उसने काम और पवन को सहायता के लिए इन्द्र से मांगा, बाद पवन ने मालिनी नदी के तीर पर तप में संलग्न ऋषि के सामने मेनका के इच्छानुसार मेनका को विवस्त्र कर दिया और काम ने उत्तेजना पैदा कर दी । ऋषि का मन विकृत हो उठा। बाद उन्होंने मेनका को बुलाकर उसके साथ संभोग किया, परिणाम स्वरूप वही नवजात शकुन्तला को छोड़कर मेनका तत्काल पुनः इन्द्रलोक चली गई । ऋषि पुनः तप करने के लिए अन्यत्र चले गये । अप्सरायें भारत भूमि पर उत्पन्न शिशुओं को अपने साथ नहीं ले जाती हैं । इस प्रकार मेनका तथा विश्वामित्र से शकुन्तला की उत्पत्ति है । अप्सरा पुत्री होने के नाते शकुन्तला का रूप-सौन्दर्य भी उसी के समान अपूर्व था ।