भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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पृष्ठ 187

द्वितीयोऽङ्कः १०५

विदूषकः—को अवरो अवदेसो तुम राआणं। णीवारछट्ठभाअं अम्हाणं उप- हरंतु त्ति [ कोऽपरोऽपदेशस्तव राज्ञः। नीवारषष्ठभागमस्माकमुपहरन्त्विति ]

राजा—मूर्ख, अन्यद्भागधेयमेतेषां रक्षणे निपतति यद्रत्नराशीनपि विहायाभि- नन्द्यम्। पश्य—

यदुत्तिष्ठति वर्णेभ्यो नृपाणां क्षयि ¹तत्फलम्। तपः षड्भागमक्षय्यं ददत्यारण्यका हि नः॥ १३॥

विदूषकः—चिन्तयन्नाह विदूषकः भवतः = राज्ञः कृते कः अपरः = कोऽन्यः अपदेशः = व्याजः नीवारस्य षष्ठोभाग इति नीवारषष्ठभागः तं नीवारषष्ठभागं = कररूपकम् अस्माकं = नः उपहरन्तु = आनयन्तु, इति मुनिधान्यस्य षष्ठांशं कररूपं राजग्राह्यं भागमुपाहरत इति तापसान् नियुञ्जानः अत्र निवसेति भावः।

राजा—नायमुपायः समुचित इति विचारयन् राजा विदूषकमाह—मूर्ख ! = विशेषा- नभिज्ञ! अज्ञ माढव्य ! अन्यत् = नीवारषष्ठभागातिरिक्तं भागधेयं = राजग्राह्यं भागं एतेषां = तापसानां रक्षणे = पालने कृते सति तन्निमित्तत्वेन निपतति = स्वयमेवाविर्भवति, तेषां रक्षणेन प्राप्यते, यत् = भागधेयं = करं रत्नराशीन् = हीरकादिरत्नपूगान् विहाय = परित्यज्य अभिनन्द्यं = श्लाघ्यं रत्नराश्यपेक्षयाऽपि विशेषतः प्रशस्यमित्यर्थः। एते हि तापसा नीवारषष्ठांशापेक्षयाऽभिनन्दनीयं स्वं पुण्यभागं मह्यं स्वयमेव वितरन्ति। अतो रत्नदानात् काचयाचनमिव तेभ्यो नीवारषष्ठभागयाचनमिति भावः। पश्य = विलोकय।

अन्वयः—वर्णेभ्यः नृपाणां यत् फलम् उत्तिष्ठति तत् क्षयि, हि आरण्यकाः न अक्षय्यं तपः षट्भागं ददति।

विदूषकेण नीवारषष्ठभागाहरणव्याजेन कण्वाश्रमगमनोपाये सूचिते तस्यानुचितत्वं

विदूषक—क्या, यहीं कम है कि आप यहाँ के राजा हैं। भला, आपके लिए अतिरिक्त बहाने के ढूँढ़ने की क्या जरूरत है कि नीवार (मुनि-अन्न) का छठा हिस्सा लाइये।

विशेष—यहाँ विदूषक का परिहास है। वह यहाँ ऐसा बहाना बताता है कि राजा उसे सुनकर हँस पड़े। महाराज मनु ने ऐसा नियम बताया है कि राजा पशु और सोने का पचासवाँ भाग तथा धान्य का छठा भाग आठवाँ भाग या बारहवाँ भाग कर के रूप में ले सकता है—

‘पञ्चाशद्भाग आदेयो राज्ञा पशुहिरण्ययोः। धान्यानामष्टमो भागः षष्ठो द्वादश एव वा॥’ ७।१३०

इसके अनुसार ऋषि-मुनि लोग बिना जोते-बोये होने वाले नीवार नामक धान्य को किसी तालाब के तट पर राजकर के रूप में रख देते थे। यहाँ राजा की ओर से पशु, पक्षी आदि के निमित्त दान हो जाता था।

राजा—अरे मूर्ख ! ये तपस्वी तो मुझे सर्वश्रेष्ठ पुण्य का सर्वोत्तम भाग कर के रूप में देते ही हैं, जिसे राजा लोग रत्नों की राशि से भी अधिक पसन्द करते हैं। देखो—

जो अन्य वर्णों से कर के रूप में हमें प्राप्त होता है, वह तो नश्वर=नष्ट होने वाला है, पर ये वनवासी तपस्वी तो हमें अपनी तपस्या के छठे हिस्से के रूप में देते हैं, जो कभी नष्ट नहीं हो सकता। अतः वह साधारण कर से बहुमूल्य वस्तु है॥ १३॥

विशेष—यहाँ राजा के द्वारा विदूषक को मूर्ख कहने का तात्पर्य है कि इन तपस्वी ऋषियों से

पाठा०—१. तद्धनम्।