भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

पृष्ठ 198, कुल 540 में से

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पृष्ठ 198
१६९अभिज्ञानशाकुन्तलम्

राजा—इतस्तपस्विकार्यम्, इतो गुरुजनाज्ञा। द्वयमप्यनतिक्रमणीयम्। किमत्र प्रतिविधेयम्।

विदूषकः—तिसंकू विअ अंतराले चिट्ठ। [ त्रिशङ्कुरिवान्तराले तिष्ठ ]

आदिशति—आगामिनि चतुर्थदिवसे = अस्माद् दिनाच्चतुर्थदिवसे चतुर्थी तिथौ वा प्रवृत्तपारणः = प्रवृत्ता = आरब्धा पारणा उपवासाङ्गं व्रतान्तभोजनं यस्य स प्रवृत्तपारणः = उपवास अन्तग्रहणेन व्रतभङ्गः क्रियमाणोपवाससमाप्तिः भविष्यन्ति। तत्र = तस्मिन् अवसरे दीर्घायुषा = चिरञ्जीविना त्वया अवश्यं नूनं सम्भावनीया = उपस्थित्या समाजनीया, सन्तोषणीया इति। उपवासस्तु आरब्ध एव केवलं तस्य समाप्तिः चतुर्थेऽह्नि भविष्यतीति भावः।

राजा—तदाकर्ण्य नृपो दुष्यन्तश्चिन्तयति—इतः = एकतः अत्र तपोवने तपस्विकार्यं = तापसानां यज्ञस्य राक्षसेभ्यो रक्षणम् पुनः इतः = अन्यत्र नगरे वा द्वितीयतः गुरुजनाज्ञा गुरुजनस्य = मातुः आदेशः, प्रत्यावर्तनरूपः द्वयं = उभयमपि, अनतिक्रमणीयम् = अनुल्लङ्घनीयम् तपस्विकार्य-गुरुजनानुज्ञयोः समप्राधान्येन युगपत् कर्तुमशक्यत्वात् राजा प्रतिपत्तिमूढः सन्नाह—किमत्र प्रतिविधेयं = अस्मिन् विषये कतरत् कर्तव्यम् किमनुष्ठेयमित्यर्थः।

विदूषकः—राज्ञः प्रतिपत्तिमूढत्वं विदित्वा माढव्यः कथयति यत् त्रिशङ्कुरिव = त्रिशङ्कुसदृशः अन्तराले = द्वयोर्मध्ये तिष्ठ = भव।

त्रिशङ्कुकथा वाल्मीकिरामायणे बालकाण्डस्य ५७तः ६०सर्गपर्यन्तं प्रसिद्धाऽस्ति, तद्यथा—एकदा त्रिशङ्कुः विश्वामित्रेण स्वतपोबलबलादूर्ध्वं स्वर्गे लोके प्रेषितः तदसहमानेन


वा आज से चौथे दिन प्रवृत्तपारण नामक हमारा उपवास पूर्ण होगा, उस दिन आप अवश्य उपस्थित होकर हमारा उत्साह एवं हर्ष बढ़ावें।

**विशेष—**चतुर्थ दिवस में आगामिनि विशेषण से गत चतुर्थ दिन का निराकरण किया गया है, प्रवृत्तपारण कहकर उपवास शब्द के प्रयोग से माताओं के अनशन की आशङ्का का वारण किया गया है।

**राजा—**इधर तो मुझे ऋषियों का कार्य करना है। उधर गुरुजन=माताओं की आज्ञा का भी पालन करना आवश्यक है। ये दोनों ही अत्यावश्यक कार्य हैं, अब क्या करना चाहिए ? एक समय में एक ही हो सकता है क्योंकि दोनों कार्यों का स्थान दूर-दूर है।

**विदूषक—**मित्र ! अब तुम त्रिशंकु की तरह बीच में ही लटकते रहो।

**विशेष—**उपहासप्रिय विदूषक ने यहाँ अच्छा मजाक किया है कि तपस्वीजन तथा माताओं के मध्य में रहकर किसी का भी कार्य नहीं हो सकता है।

वाल्मीकीयरामायण के बालकाण्ड में ५७ से ६० सर्गों में राजा त्रिशंकु की कथा अङ्कित है—महाराजा हरिश्चन्द्र के पिता त्रिशंकु सूर्यवंश में उत्पन्न राजा थे। ये बड़े पराक्रमी और पुण्यात्मा राजा थे इन्होंने एक बार सदेह स्वर्ग में जाने की इच्छा से कुलगुरु वसिष्ठजी से यज्ञ कराने के निमित्त प्रार्थना की, पर उन्होंने यह कहकर इनकार कर दिया कि यह कार्य असंभव है। तब त्रिशंकु ने वसिष्ठजी के विरोधी विश्वामित्र मुनि के द्वारा यज्ञ कराया।

मन्त्रों के प्रभाव से त्रिशंकु इसी देह से स्वर्ग को चला, किन्तु गुरु वसिष्ठ की अनुमति के बिना यज्ञ करने से देवता असन्तुष्ट हो गये और उन्होंने उसे स्वर्ग जाने से रोककर नीचे धकेल दिया। इधर विश्वामित्र भी मन्त्रों से उसे स्वर्ग भेजने में जोर लगा रहे थे। इस प्रकार उधर स्वर्ग में

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