अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोऽङ्कः ११७
राजा—सत्यमाकुलीभूतोऽस्मि ।
कृत्ययोर्भिन्नदेशत्वाद् द्वैधीभवति मे मनः ।
पुरः प्रतिहतं शैले स्रोतः स्रोतोवहो यथा ॥ १७ ॥
देवेन्द्रेण चाधः पातितः । ततः स नोर्ध्वं न चाधः, किन्तुः अन्तराल एवातिष्ठत् । एतत्कथोद्देशेन विदूषको दुष्यन्तमुपहसति-यत्त्वमपि तथैव गुरुजन-मुनिजनाज्ञयोः किमपि अकृत्वा अत्रैवं विचारयन्नेव तिष्ठ । न खलु राजधान्यां गच्छ न च तपोवनमुपव्रजेति भावः ।
राजा--विदूषकस्य परिहासं जानन् राजा, मित्र ! नायं परिहासावसर इत्याह--
सत्यमित्याद्यङ्गीकारे-सत्यं = इदं तथ्यम् यत् आकुलीभूतः-न आकुलः अनाकुलः अनाकुलः आकुलः सम्पद्यमानः आकुलीभूतः = व्याकुलः अस्मि = भवामि । आकुलीभूतोऽस्मीति यत् तत् सत्यमित्यर्थः ।
अन्वयः—पुरः शैले ( सति ) प्रतिहतं स्रोतोवहः स्रोतो यथा कृत्ययोः भिन्नदेशत्वात् मे मनः द्वैधी भवति ।
अथात्मनो मनसो व्याकुलत्वं स्पष्टयति राजा दुष्यन्तः--कृत्ययोरिति । पुरः = अग्रे ( शिलाः सन्ति यस्मिन्नित्यन्वर्थनामवति प्रतिहननसमर्थे ) शैले = पर्वते सति प्रतिहतम् = अवरोधं प्राप्तम्, निरुद्धप्रवाहं, स्रोतोवहः = नद्या स्रोतः = प्रवाहः जलवेगः यथा = इव मे = मम मनः = चित्तम् कृत्ययोः = कर्तव्ययोः भिन्नः = पृथक् देशः = स्थानं ययोः तयोः भावः तत्त्वं तस्मात् भिन्नदेशत्वात्-नानादेशस्थत्वात् द्वैधीभवति = मार्गद्वयगमनशीलं संशयाकुलं भवति, मातृकार्यं राजधान्यां मुनिकार्यं च तपोवने इत्येकदा तयोर्द्वयोरनुष्ठाना-सम्भवादित्याशयः ।
अयं भावः--यथा वेगेन प्रवहन् नदीप्रवाहः मार्गे शिलाखण्डरुद्धः द्विधा भूत्वा उभयोः
में देवता लोगों ने उसे घुसने नहीं दिया, इधर विश्वामित्रजी ने उसे भूमि पर गिरने नहीं दिया । फलतः वह न ऊपर स्वर्ग में जा सका न नीचे जमीन पर ही आ सका। बेचारा आकाश के बीच में ही आजतक उलटा होकर लटका रह गया । उसके मुख से जो लार गिरी थी उसी से कर्मनाशा नदी निकली है जिसके जल के स्पर्शमात्र से धर्म कर्म नष्ट हो जाते हैं । अतः उस नदी का जल अस्पृश्य माना गया है ।
त्रिशंकु के नामकरण के सम्बन्ध में पुराणों में कहा गया है कि इनमें तीन शङ्कु = पाप होने के कारण इनका नाम त्रिशङ्कु पड़ा था । इनके तीन पाप ये थे-इन्होंने अपने पिता को असन्तुष्ट कर दिया, जिससे उन्होंने राज्य से बाहर निकाल दिया था तथा इन्होंने गुरुवसिष्ठ की दुधार गौ का वध कर दिया। इसी प्रकार इन्हें गोमांस भक्षण का भी दोषी बताया गया है। इन्हीं तीनों पापों के कारण त्रिशंकु नाम से प्रसिद्ध थे।
राजा—सच-मुच मैं व्याकुल हो गया हूँ क्योंकि दोनों ही कार्य अवश्य कर्तव्य है, किसे करूँ, और किसे छोड़ूँ ।
जैसे सामने पर्वत की चट्टान आजाने पर उसके दोनों ओर नदी का प्रवाह दो भागों में बँट जाता है, वैसे ही इन दोनों कार्यों के भिन्न-भिन्न दिशाओं में होने के कारण प्रतिहत हो मेरा मन भी द्विविधा में पड़ गया है, इसे करूँ या उसे करूँ, इसी संशय में पड़ गया हूँ ॥ १७ ॥
विशेष—इस समय मेरे सामने वस्तुतः दो कर्त्तव्य उपस्थित हैं-राक्षसों से ऋषियों के यज्ञ
पाठा०—१. कृतोऽस्मि ।