अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयोऽङ्कः १२३
[ इति विष्कम्भकः । ]
अभिमन्त्रितं रक्षाजलम् अस्यै=शकुन्तलायै गौतमीहस्ते=गौतम्याः करे विसर्जंयिष्यामि = प्रेषयिष्यामि ( इति = एवं कथयित्वा निष्क्रान्तः = निर्गतः ) । ( इति = समाप्तः विष्कम्भकः )
तृतीयाङ्कादारभ्य एतत्पर्यन्तो भूत-भविष्यदंशसूचकः कथ्यमानो विष्कम्भकः अयं चार्थापक्षेपको भवति । तदुक्तं साहित्यदर्पणे—
'अर्थोपक्षेपकाः पञ्च विष्कम्भकप्रवेशकौ । चूलिकाङ्कावतारोऽथ स्यादाङ्कमुखमित्यपि ॥'
तत्र विष्कम्भकलक्षणं यथा—
वृत्तवर्तिष्यमाणानां कथांशानां निदर्शकः । संक्षिप्तार्थस्तु विष्कम्भ आदावङ्कस्य दर्शितः ॥'
प्रकृते च अनेन राज्ञो दुष्यन्तस्याश्रमोपस्थितिः, ऋषीणां यज्ञकार्यनिर्वहणञ्च भूतोऽर्थः, शकुन्तलाविरहावस्थावर्णनं शीतलोपचारादिकं गौतमीसमागमश्च भविष्यदर्थः सूचितः । स चायं विष्कम्भको मध्यमपात्रप्रयोजितवाच्छुद्धविष्कम्भकः । तदुक्तं—
'मध्यमेन मध्यमाभ्यां वा पात्राभ्यां संप्रयोजितः । शुद्धः स्यात् स तु संकीर्णो नीचमध्यमकल्पितः ॥'
संस्कृतभाषिपात्रप्रयोजितः शुद्धो विष्कम्भकः, संस्कृतप्राकृतभाषिपात्रप्रयोजितस्तु सङ्कीर्णो विष्कम्भकः ।
अपि चान्यत्र तल्लक्षणमेवमुक्तमस्ति—
'तत्र विष्कम्भको भूतमाविवस्त्वंशसूचकः । अमुख्यपात्ररचितः संक्षेपैकप्रयोजनः ॥' 'द्विधा स शुद्धो मिश्रश्च मिथः स्यान्नीचमध्यमैः । शुद्धः केवलमद्योऽयमनेकानेककृतो द्विधा ॥' विष्कम्भकोऽयमेकमध्यमपात्रप्रयुक्तत्वात् शुद्ध एवास्ति ।
[ विष्कम्भक समाप्त । ]
विशेष—अङ्कों में रङ्गमञ्च पर साक्षात् नहीं देखने में योग्य किन्तु आवश्यक भूत, भविष्य की बातों की संक्षिप्त सूचना देने को विष्कम्भक कहते हैं। जैसे—
'वृत्त-वर्तिष्यमाणानां कथांशानां निदर्शकः । संक्षिप्तार्थस्तु विष्कम्भ आदावङ्कस्य दर्शितः ॥'
इस विष्कम्भक के द्वारा भूत-भविष्य दोनों कथाओं का संकेत किया गया है जैसे तृतीय अङ्क के आरम्भ में राजा दुष्यन्त के द्वारा राक्षसों से मुनियज्ञ की रक्षा तथा तदनन्तर शकुन्तला का विरहावस्था का वर्णन है।
यहाँ सार्वभौम सत्ता सम्पन्न नरेश राजा दुष्यन्त का गौरव गाथा है कि उनका प्रताप इतना गौरवशाली है कि यहां उनके आते ही सब विघ्न दूर हो गये, धनुष पर बाण रखने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी ।
यज्ञ करने के निमित्त साफ-सुथरा की गई जमीन को वेदी कहते हैं, उसकी सुरक्षा के निमित्त उसके चारों तरफ कुछ बिछा कर जो यज्ञीय कर्म करते हैं उसे कुशकण्डिका कहते हैं। कुश-कण्डिका भी यह रक्षा का एक शास्त्रीय उपाय है।
नाटकों में किसी पात्र के न होने पर भी 'क्या करते हो', यह कहकर बिना सुने हुए भी सुनने का अभिनय कर उसे उद्धृत करना धनञ्जयकृत दशरूपक ग्रन्थ में आकाशभाषित कहा गया है—
'किं ब्रवीष्येवमित्यादि बिना पात्रं ब्रवीति तत् । श्रुत्वेवानुक्तमप्येकस्तत् स्यादाकाशभाषितम् ॥'
किसी नायक के विरह से सन्तप्त विरहिणी नायिका के सन्ताप को शान्त करने के लिए खश तथा नालसहित कमल के पत्तों का उपयोग किया जाता है। खश का लेप प्रायः स्तनों पर किया