भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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पृष्ठ 252

१७० अभिज्ञानशाकुन्तलम्

( प्रविश्य )

प्रियंवदा--सहि पकिदिवक्को स कस्स अणुअणं पडिगेण्हृदि ? किं वा उणा साणुक्कोसो किदो [ सखि प्रकृतिवक्रः स कस्यानुनयं प्रतिगृह्णाति ? किमपि पुनः सानुक्रोशः कृतः ] ।

अनसूया--( सस्मितम् ) तस्सिं बहु एदं पि, कहेहि [ तस्मिन् बहुदेतदपि, कथय ] ।

प्रियंवदा--जदा णिवत्तिदुं ण इच्छदि तदा विण्णविदो मए भअवं पढम त्ति पेक्खिअ अविण्णादतवप्पहावस्स दुहिदुजणस्स भअवदा एक्को अवराहो मरिसिदव्वोत्ति [ यदा निवर्तितुं नेच्छति तदा विज्ञापितो मया भगवन् प्रथम इति प्रेक्ष्याविज्ञाततपःप्रभावस्य दुहितृजनस्य भगवतैकोऽपराधो मर्षितव्य इति ] ।


प्रियम्बदा—( प्रविश्य = अन्तः आगत्य ) सखि ! = आलि अनसूये ! प्रकृतिवक्रः = स्वभावकुटिलः सः = महर्षिः दुर्वासा कस्य अनुनयं = प्रार्थनां प्रतिगृह्णाति = स्वीकरोति । किमपि = ईषत् पुनः = तु सानुक्रोशः = सदयः कृतः = विहितः ।

अनसूया—( सस्मितं = स्मितेन-ईषद्वहास्येन सह सस्मितम् ) तस्मिन् = दुर्वाससि एतदपि = इदमपि ईषत् सानुक्रोशत्वम् । कथय = वद ।

प्रियम्बदा—यदा = यस्मिन् काले निवर्तितुं = प्रत्यावर्तितुं न इच्छति = न वाञ्छति तदा मया विज्ञापितः = निवेदितः दुर्वासा यत् भगवन् = श्रीमन् ! प्रथमः = आद्यः अपराधः = आगः इति = एवं प्रेक्ष्य = दृष्ट्वा विचार्य तपसः = तपस्याया प्रभावः = शक्ति।—तपःप्रभावः विज्ञसः तपःप्रभावो येन स विज्ञाततपःप्रभावः न विज्ञाततपःप्रभाव इति अविज्ञाततपःप्रभावः तस्य अविज्ञाततपःप्रभावस्य = अज्ञातवत्तपोवीर्यस्य दुहितृजनस्य = कन्यालोकस्य कन्याकल्पायाः शकुन्तलायाः पुत्र्याः एक अपराधः भगवता = श्रीमता दुर्वाससा एकः = केवलः अपराधः = आगः मर्षितव्यः = क्षन्तव्य इति ।


प्रियम्बदा—( प्रवेश कर ) हे सखि प्रियम्वदे ! दुर्वासा तो मानो साक्षात शरीर धारण किए ए क्रोध ही है अर्थात् वे तो क्रोध की मूर्ति हैं। भला वे किसको अनुनय-विनय सुनते हैं, किन्तु बड़ी कठिनाई से मैने उन्हें किसी प्रकार प्रसन्न कर ही लिया ।

अनसूया—( मुस्कराकर ) चलो, दुर्वासा के विषय में यही बहुत है ।

प्रियम्वदा—बहुत प्रार्थना करने पर भी अब वे आश्रम पर नहीं लौटने को राजी हुए, तब मैने उनके पैरों पर पड़ कर उनसे प्रार्थना की कि—हे भगवन् ! आपके तप के प्रभाव को न जानने वाली आपकी पुत्री के समान उस शकुन्तला का यह पहला ही अपराध है इसलिए कृपया आप इसे क्षमा करें ।

विशेष—ऋषियों में महर्षि दुर्वासा बड़े क्रोधी माने जाते हैं, उनको मनाना साधारण बात नहीं है, पर अनसूया ने अनुनय-विनय पूर्वक पैरों पर पड़कर उन्हें मना ही लिया। उसने सोचा कि जब तक इनके बराबर शक्ति का प्रयोग न होगा तब तक ये मानने वाले नहीं, उसने बताया कि महाराज ! आपके समान ही तपस्वी महर्षि कण्व भी हैं, जो इस शकुन्तला के धर्म पिता हैं। जैसे वह उनकी पुत्री है वैसे ही आपकी भी पुत्री है, फिर बालिका है, जिससे वह आपकी तपःशक्ति नहीं जानती है। ऐसी दशा में कम से कम प्रथम अपराध को तो कृपया क्षमा कर ही दीजिए । तदनुसार उन्होंने अँगूठी दर्शन तक शाप को सीमित कर दिया ।