अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थोऽङ्कः १९१
उवट्ठिदो। आआरं दाव पडिवज्जस्स। [ जाते एष त आनन्दपरिवाहिणा चक्षुषा परिष्वजमान इव गुरुरुपस्थितः। आचारं तावत्प्रतिपद्यस्व ]।
शकुन्तला--( सव्रीडम् ) ताद वंदामि [ तात वन्दे ]।
कण्वः--वत्से !
ययातेरिव शर्मिष्ठा भर्तुर्बहुमता भव ।
सुतं त्वमपि सम्राजं सेव पूरुमवाप्नुहि ॥ ६ ॥
आनन्दं = हर्षं परितो वाहयति = प्रेरयति इति आनन्दपरिवाहितेन आनन्दपरिवाहिणा = आनन्दातिशये प्रकाशयता हर्षनिर्भरेण हर्षाश्रुविमुञ्चता चक्षुषा = लोचनेन दृष्ट्या उप-लक्षितः परिष्वज्यमानः आलिङ्गन् इव त्वाम् उपस्थितः = सन्निहितः । तावत् आचारम् = अभ्युत्थानवन्दनादिकम् प्रतिपद्यस्व = विधेहि ।
शकुन्तला--( सव्रीडं = सलज्जाम् ) तात ! = पितः वन्दे = त्वां प्रणमामि ।
कण्वः--अथ महर्षिः कण्वः स्नेहातिशयव्यञ्जकं वत्से ! इति सम्बोधनं प्रयुज्य = तदनुरूपामाशिषं प्रयुङ्क्ते--ययातेरिवेति।
अन्वयः--( हे वत्से ) ययातेः शर्मिष्ठेव भर्तुः बहुमता भव । सा पुरुम् इव त्वमपि सम्राजं सुतम् अवाप्नुहि ।
ह्रियावनतां वन्दमानां शकुन्तलामवलोक्य महर्षिः कण्वः तदनुरूपां स्नेहातिशयव्यञ्जिका प्रयुङ्क्ते--ययातेरिवेति। वत्से ! = धर्मकन्यके शकुन्तले ! ययातेः = ययातिनाम्ना प्रसिद्धस्य सोमवंशीयस्य नृपतिनहुषपुत्रस्य शर्मिष्ठेव = तदभिधाना वृषपर्वणः पुत्री तन्महिषीव भर्तुः = पत्युर्दुष्यन्तस्य बहुमता = सम्मानिता प्रिया भव । सा शर्मिष्ठा पुरुं-तन्नामकं चन्द्रवंशस्य कर्तारं समाजं पुत्रमिव त्वमपि सम्राजं = चक्रवर्तिनं सुतम् = आत्मजम् अवाप्नुहि = लभस्व ।
अर्थ भावः--लज्जयावनतमुखीं वन्दमानां शकुन्तलां समवेक्ष्य सस्नेहमाशिषं ददत्
प्रवाहित वात्सल्य दृष्टि से तुम्हें देख रहे हैं । अतः तू समुचित अभ्युत्थान प्रणाम आदि आचार का पालन कर इनका सम्मान करो अर्थात् इनको प्रणाम करो ।
शकुन्तला ( लज्जा के साथ ) पिता जी को प्रणाम है ।
कण्व--वत्से ! जिस प्रकार पूर्वकाल में शर्मिष्ठा राजा ययाति की प्रिय थी वैसे ही तुम भी अपने पति दुष्यन्त की अत्यन्त प्यारी हो और जैसे शर्मिष्ठा ने राजा ययाति सम्राट् पुरु को जन्म दिया था, वैसे ही तू भी राजा दुष्यन्त से चक्रवर्ती पुत्र को प्राप्त करो ॥ ६ ॥
विशेष--चन्द्रवंशी नहुषपुत्र राजा ययाति की दो रानियाँ थीं, एक असुरगुरु शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी तथा दूसरी असुरों के राजा वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा । इन दोनों में देवयानी की अपेक्षा शर्मिष्ठा राजा ययाति को अधिक प्यारी थी । इन दोनों की कथा महाभारत के आदि पर्व में बड़े विस्तार के साथ लिखी हुई है । देवगुरु बृहस्पति के पुत्र कच के शाप से ब्राह्मण कन्या देवयानी का पाणिग्रहण हुआ था, किन्तु शर्मिष्ठा उसकी दासी बनकर ययाति के पास गई थी, जिससे उन्होंने गान्धर्व विवाह कर लिया था ।
कवि ने यहाँ उपमा सटीक दी है । शर्मिष्ठा से शकुन्तला का कई बातों में साम्य है । दोनों का माता पिता की आज्ञा के बिना गान्धर्व विवाह हुआ था, दोनों को माता पिता ने त्याग दिया था,
पाठ०--१. पत्युर्बहुमता ।