भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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पृष्ठ 289

चतुर्थोऽङ्कः २०७

शाङ्गंरवः—गृहीतः सन्देशः। कण्वः—वत्से त्वमिदानीमनुशासनीयासि। वनौकसोऽपि सन्तो लौकिकज्ञा वयम्। शाङ्गंरवः—न खलु धीमतां कश्चिदविषयो नाम।

दारसामान्यप्रतिपत्त्या नूनं परिपालनं कार्यं, नो चेत् अस्माकं प्रतिकूलेषु शाप एवा- स्त्रम् । अस्मच्छापास्त्रं न केवलं त्वामेव दण्डयेत्, अपितु सर्वमेव त्वत्कुलं प्रदहेत् । अतः सम्यग् विचार्य कार्यमिति भावः । अत्र सामान्यनिबन्धनाऽप्रस्तुतप्रशंसा काव्यलिङ्गं चालङ्कारः, शार्दूलविक्रीडितं च छन्दः ॥ १६ ॥

शाङ्ङ्गरवः—गृहीतः = अवधृतः, सन्देशः = वक्तव्योऽर्थः । इत्थं भवदुक्तमर्थं राज्ञे बोधयिष्यामीति भावः ।

कण्वः—महर्षिः कण्वो हि दुष्यन्ताय सन्देष्टव्यमर्थं शाङ्ङ्गरवाय निर्दिश्य शकुन्तलायै अपि पतिगृहे प्रवर्त्तनप्रकारमुपदेष्टुमारभते—वत्से ! त्वं भवती इदानीं = साम्प्रतम् अनुशासनीया = शिक्षणीया असि = वर्त्तसे वनमोकः वनम् = अरण्यं ओकः = गृहं येषां ते वनौकसः = वनवासिनोऽपि अपरिचितनागरिकलोका अपि सन्तः = वर्त्तमानाः वयं लौकिकज्ञाः = लोकव्यवहाराभिज्ञाः । गृहस्थलोकवृत्तज्ञाः लोकाचारपाटवा स्मः । अतो लोकाचारं त्वां शिक्षयामः ।

शाङ्ङ्गरवः—संबहुमानं गुरुक्तं सामान्यमुखेनानुवदन् शाङ्ङ्गरवः कथयति धीमतां = प्रशस्तबुद्धिशालिनां न खलु कश्चिद विषयः, न किञ्चिदपि अज्ञातमस्ति । धीमन्तो हि सर्वं विषयं करतलामलकवत् पश्यन्तीति भावः । तदुक्तं—'सतां प्रज्ञोन्मेषः पुनरयमसीमो विजयते ।'


के निमित्त इसमें सन्देश दिये गये हैं। राजाओं को अपने उच्चकुल की प्रतिष्ठा और तपस्वियों के प्रति सम्मान की बात कहकर उत्तम कर्त्तव्य का पालन आवश्यक बतलाया गया है और अनेक पत्नी वाले पुरुषों को पक्षपातहीन होकर सबमें समान व्यवहार करने का उपदेश देकर सामाजिक कलह को शान्त करने का प्रयास है। इसमें यह विशेषकर बताया गया है कि शकुन्तला ने अपने बन्धु-बान्धवों की अनुमति के बिना ही राजा दुष्यन्त में स्वाभाविक प्रेम के कारण उनको आत्मसमर्पण कर दिया है। इसलिए उनका कभी अनादर नहीं करना चाहिए, सर्वदा स्नेह भाव से इसमें अनुराग रखना उचित है। जो लोग अपने अभिभावकों की अनुमति से विवाह करते हैं उसमें वधू का वैसा उत्तम अनुराग नहीं रहता, पर शकुन्तला ने अपने स्वाभाविक अनुरागसे ब्याह किया। अतः इसका अनादर नहीं होना चाहिए। इससे अधिक पति का विशेष अनुराग, या महारानी आदि पद की प्राप्ति तो कन्याओं के भाग्य पर ही निर्भर है। कन्यापक्ष वालों का इससे अधिक कहना उचित नहीं।

शाङ्ङ्गरव—पिता जी, मैंने सन्देश भलीभाँति समझ लिया। जाकर उन्हें इसी प्रकार कहूँगा।

कण्व—वत्से ! अब तुम्हें कुछ शिक्षा देनी है। यद्यपि हम लोग वनवासी तापस हैं, फिर भी हम लौकिक व्यवहार को जानते हैं।

शाङ्ङ्गरव—भगवन् ! बुद्धिमानों की दृष्टि से कोई भी विषय ओझल नहीं है, आप तो सर्वज्ञ हैं। भला, आपसे कौन सी बात अज्ञात है ?