भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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११० | अभिज्ञानशाकुन्तलम्

शकुन्तला—ताद इदो एव्व किं पिअंवदामिस्साओ सहीओ णियत्तिस्सति ।
[ तात इत एव किं प्रियंवदामिश्राः सख्यौ निवर्तिष्यन्ते । ]
कण्वः—वत्से इमे अपि प्रदेये । न युक्तमनयोस्तत्र गन्तुम् । त्वया सह गौतमी १यास्यति ।
शकुन्तला—२( पितरसाश्लिष्य ) कहं दाणि तादस्स अंकादो परिब्भट्ठामलय-वडून्मूलिजा चंदणलदा विअ देसंतरे जीविअं धारइस्सं । [ कथमिदानीं तातस्या-ङ्कात्परिभ्रष्टा मलयतटरून्मूलिता चन्दनलतेव देशान्तरे जीवितं धारयिष्ये । ]


शकुन्तला—सखीजनं परिष्वजस्वेति कण्वोक्तौ शकुन्तला कण्वं पृच्छति—तात ! = पितः ! किं = कथम् इत एव = अस्मात् प्रदेशादेव प्रियंवदामिश्राः = प्रियम्वदादयः सख्यः = आल्यः = निवर्तिष्यन्ते = मां विहाय पुनः तपोवनं गमिष्यन्ति ?

कण्वः—शकुन्तलायाः प्रश्ने पुनर्मुनिराह—वत्से=जाते शकुन्तले इमे =एते प्रियम्वदा-ऽनुसूये अपि त्वमिव प्रदेये = विवाहकाले Yogyaay वराय दातव्ये । अतः अनयोः = एतयोः अत्र = तव पतिगृहे दुष्यन्तप्रासादे गन्तुं = गमनं न युक्तम् = न समुचितम् । त्वया सह = भवत्या साकम् गौतमी व्यवहारकुशला मम विश्वस्ता धर्मभगिनी यास्यति = गमिष्यति ।

शकुन्तला—( पितरं = तातं कण्वम् आलिष्य = आलिङ्ग्य ) आसन्नपितृवियोगेन शकुन्तला वदति—कथं = केन प्रकारेण तातस्य = पितुः अङ्कात्=क्रोडात् परिभ्रष्टा=च्युता मलयात् = मलयाचलोत्पन्नात् तरोः=वृक्षात् यद्वा मलयस्य=मलयाचलस्य तरोः=वृक्षात् उन्मूलिता = उत्पादिता चन्दनलतेव = चन्दनवल्लरीव अन्यो देशो देशान्तरस्तस्मिन् देशान्तरे = अन्यस्मिन् स्थाने जीवितं = प्राणान् धारयिष्ये = दधे ।


शकुन्तला—पिता जी, क्या, यहीं से दोनों मेरी सखियाँ मुझे छोड़कर लौट जायेंगी ?

कण्व—बेटी, इन दोनों का भी विवाह करना है । अतः इन दोनों का तो तेरे साथ वहां जाना ठीक नहीं है, तेरे साथ यह गौतमी जायेगी ।

विशेष—अविवाहिता वयस्क कन्याओं को अपने पिता के ही घर रहना चाहिए, इन्हें अपनी सखी या बहन के पति के घर जाना उचित नहीं । अतः उन्हें सखी या बहन के साथ न भेजने की प्रथा पुरानी है । हाँ, छोटी कन्या या वृद्ध नाइन, नौकरानी आदि को भेजने का चलन सम्भ्रान्त परिवारों में अवश्य है । इसी के अनुसार अनसूया और प्रियम्वदा को शकुन्तला के साथ उसके पतिगृह में महर्षि ने नहीं भेजा, किन्तु वृद्धा तपस्विनी गौतमी को भेजा है ।

शकुन्तला—( महर्षि कण्व के गले में लगकर ) अब मैं अपने पिताजी की गोद से हटाई जाकर=दूर होकर मलय पर्वत से उखाड़ी हुई चन्दन की लता की तरह दूसरी जगह कैसे जीवित रहूँगी ।

विशेष—यहाँ पर तात से तरु और शकुन्तला से चन्दनलता की उपमा उचित है । चन्दन की उत्पत्ति मलयाचल पर ही होती है और वहीं वह हरा-भरा और सुगन्धित रहता है । चन्दन का पौधा मलयागिरि से उखाड़ कर अन्यत्र ले जाकर लगाये जाने पर सूख जाता है । इसी भाव को व्यक्त करती हुई शकुन्तला ने कहा है कि पिताजी की गोद से दूर होकर मैं कैसे जीवित रह सकूँगी ?


पाठा०—१. गमिष्यति ।
२. ( पितुरङ्कमाश्लिष्य ) ।