अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽङ्कः
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राजा—तूष्णीं भव। यावदाकर्णयामि। ( आकाशे गीयते )
अहिणवमहुलोलुवो भवं तह परिचुंबिअ चूअमंजरिं ।
कमलवसइमेत्तणिव्वुदो महुअर विम्हरिओ सि णं कहं ॥ १ ॥
[ अभिनवमधुलोलुपो भवांस्तथा परिचुम्ब्य चूतमञ्जरीम् ।
कमलवसतिमात्रनिर्वृत्तो मधुकर ! विस्मृतोऽस्येनां कथम् ॥ १ ॥ ]
राजा—गीताकर्णनेऽहमवहितोऽस्मि तावत्तूष्णीं भवेत्याह—तूष्णीम् = मौनी भव यावत् अहम् आकर्णयामि = शृणोमि ( आकाशे गीयते ) ।
अथ हंसपदिका राज्ञो दुष्यन्तस्य स्वमहादेव्या उपेक्षाया भ्रमरस्योपालम्भनव्याजेन गीतिकां गायति—अभिनवेति ।
अन्वयः—हे मधुकर ! अभिनवमधुलोलुपः भवान् तथा चूतमञ्जरीं परिचुम्ब्य कमल-वसतिमात्रनिर्वृत्तः ( सन् ) एनां कथं विस्मृतः असि ।
सङ्गीतशालाभ्यन्तरे राज्ञा दुष्यन्तेन कृतां महादेव्यो वसुमत्या उपेक्षामाधारीकृत्य मधुकरोपालम्भपूर्वकं हंसपदिकया गीयमानां गीतिकामाकर्णयति–अभिनवेति । हे मधुकर ! = मधुरसास्वादलम्पटत्यान्वर्थनामधेय, पक्षान्तरे नित्यनवाङ्गेनोपभोगकामुकां राजन् ! अभिनवे = नूतने मधुनि पुष्परसविशेषे लोलुपः = सतृष्णः इति अभिनवमधुलोलुपः तथा = तेन प्रकारेण यथानुभूतं चूतमञ्जरीं = अभिनवरसाम् आम्रमञ्जरीम् परि-चुम्ब्य = परितः समन्तात् चुम्बित्वा सर्वाङ्गीणं रसमास्वाद्येत्यर्थः । कमलं = पद्ममेव वसतिः = वासः सा एव कमलवसतिमात्रम् तेन निर्वृत्तः सुखितः इति कमलवसतिनिर्वृत्तः पक्षान्तरे कवलवसतिः = पद्मिनी, कामशास्त्रोक्तगुणविशिष्टा वराङ्गना तन्मात्रेण = तदां स्वादनमात्रेण निर्वृतः सुखामिमानी तथाभूतः सन् एनां = चूतमञ्जरीं कथं = केन प्रकारेण विस्मृतः असि = विस्मर्तुं न योग्यम् । विस्मरणे किञ्चित्कारणं न पश्यामीत्युपालम्भः ।
अयं भावः—प्रत्यहमभिनवनायिकोपभोगकामुक ! आम्रमञ्जर्याः रसमास्वाद्य मधु-
राजा—अच्छा, थोड़ा तुम चुप रहो, तो मैं भी जरा सुनूँ ( आकाश में = नेपथ्य से पृथक् किसी स्थान में गीत गाया जा रहा है ) ।
हे मधुकर = भंवर ! आप तो मधु = नये-नये पुष्पो के रस के ही लोभी हो, आपने आम की नई मञ्जरी का ( मेरा ) प्रेम से रस का उपभोग करके अब कमल को पाकर ( कमला नामक दूसरी नई नवेली नायिका को पाकर ) उसके आनन्द में विभोर होकर इस सुरस आम्र की मञ्जरी को ( मुझको ) अब कैसे भूल गये हो ? हे भ्रमर ! कभी तो इसकी भी ( मेरी भी ) कुछ सुध लिया करो ॥ १ ॥
विशेष—यहाँ हंसपदिका का तात्पर्य है—जिसका पैर या पद = शब्द हंस के समान हो । हंसपदिका एक नर्तकी है या दुष्यन्त की रानियों में से एक है, जिसे कभी प्यार करके दुष्यन्त अब उससे विरत हो गये हैं, उस व्यवहार से खिन्न होकर वह नवोढा इस पद्य में वह भाव व्यक्त कर रही है—जिस प्रकार भ्रमर नई आम्रमञ्जरी का उपभोग कर कमल पर जाकर मग्न हो जाता है उसी प्रकार आपने मेरी नई जवानी का उपभोग कर अन्य नारियों में विभोर हैं । वस्तुतः इस पद्य से शकुन्तला का स्मरण दिलाया गया है । यहाँ राजा दुष्यन्त भ्रमर कहे गये हैं, शकुन्तला आम्र की मञ्जरी कही गई है, अन्तःपुर की रानिया कमल के समान मानी गई है। राजा दुष्यन्त ने कण्व के आश्रम पर शकुन्तला से प्रेम कर राजधानी आकर उसे भूल गये थे । राजा को शकुन्तला का भूल जाना यह सूचित करता है कि महर्षि दुर्वासा जी का शाप राजा पर पूर्णरूप से प्रभावकारी है । उसी की स्मृति में यह पद्य निर्मित है ।