भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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पृष्ठ 307

पञ्चमोऽङ्कः १२५

प्रजापालनमात्मनो धर्ममनुतिष्ठतां नृपतीनां क्षणमपि विश्रामस्यावकाशो न जायते इति वास्तविकीं स्थितिम् उदाहरणद्वारा समर्थयति कञ्चुकीः— भानुरिति। भानुः = सूर्य्यः सकृत् = एकवारं युक्ताः = योजिताः बद्धाः तुरङ्गाः = वाजिनो येन स सकृद्युक्त-तुरङ्गः एव। एकवारमेव स्वरथे तुरङ्गमानां योजनं कृत्वा भानुः सर्वदा प्रतिदिनं पर्यट-त्येव, तस्य पुनस्तुरङ्गमयोजनयापि अवकाशो न भवति। गन्धवहः = आवहप्रवहात्मको-वायुः रात्रिं दिवं = अहोरात्रम् प्रयाति = गच्छति प्रचलति। शेषः = शेषनागः, अनन्तः सदैवाहितभूमिभागः— सदैव सर्वदा आहितः = धृतः भूमेः = वसुन्धरायाः भारो गुरुत्वं येन स सदैवाहितभूमिभारः षष्ठांशवृत्तेः— षष्ठांशः = न्यायेन प्रजाः परिपालयता नृपेण प्रजाभ्यः ग्राह्यः षष्ठो भागः एष एव राज्ञामाजीवनं वृत्तिः = वर्तनं यस्य स तस्य षष्ठांशवृत्तेः, एषः = पूर्ववाक्यत्रयोपेतः अविश्रान्तिलक्षणः धर्मः प्रजापरिपालनात्मक अस्ति = विद्यते।

अर्थात्— लोकरक्षायै भगवान् भास्करः युगादावेकवारमेव स्वरथे नियुक्ततुरङ्गमोऽद्य यावत् भ्रमत्येव। न तदश्वाः कदापि रथाद् वियुज्यन्ते, न कदापि विश्राम्यन्तीति भावः। विश्वप्राणधारको वायुः अहोरात्रं प्रवहत्येव, न कदापि विश्राम्यति, एवं शेषनागोऽपि सर्वदैव शिरो धृतधरित्रीमण्डलः तिष्ठति न कदापि स्वाधिकारात् क्षणमपि विरमति। प्रजोपार्जितधनादितः षष्ठभागाधिकारिणो राज्ञोऽपि प्रजापालनेऽविश्रामः आवश्यक-कर्त्तव्यो विद्यते। राजा हि प्रजाभ्यस्तदुपार्जितधनादेः षष्ठं भागं कररूपेण गृह्णाति। एवं च राज्ञां प्रजापालनात्मकं स्वीयं कर्त्तव्यमनुतिष्ठतां क्षणमात्रमपि विश्रामस्यावसरोऽपि न भवतीति युक्तमेव। महाराजो दुष्यन्तः, धर्मासनादुत्थिताय विश्रामं करोति। अतः तस्मै इदानीमेव महर्षिकण्वशिष्यस्यागमनं नूनं निवेदयितुमुत्सहे इत्यर्थः। अत्र मालाम्रति-वस्तूपमा-अप्रस्तुतप्रशंसा-श्रुत्यनुप्रासपरिसंख्यालङ्कारा इन्द्रवज्राछन्दश्च॥ ४ ॥


नहीं लेता और शेषनाग भी हमेशा भूमि के भार को अपने शिर पर धारण किये ही रहते हैं, वे भी उससे कभी विश्राम नहीं पाते। इसी प्रकार प्रजा से छठे भाग के लेने के अधिकारी राजा को भी प्रजापालन में सदा उद्यत रहना ही धर्म है॥ ४॥

विशेषअनतिपात्यम्—शब्द के द्वारा कञ्चुकी यह कहना चाहता है कि धार्मिक कार्यों के सम्पादन में राजा को विलम्ब नहीं करना चाहिए। तपस्वी, ऋषि, मुनि और विद्वानों का समादर एवं सत्कार भी धार्मिक कार्य है। अतः महर्षि कण्व के शिष्यों की बात सुनना अत्यावश्यक धर्म-कार्य है। उनसे न मिलना धर्म की हानि है। राजा को विश्राम करना भी आवश्यक है। फिर भी कर्त्तव्य भावना से ऊँचा है। इसलिए कञ्चुकी निर्णय करता है कि राजा के विश्राम में बाधा डालना ही उचित है। क्योंकि लोकप्रधान शासन में विश्राम कहाँ? धर्म शब्द न्याय के लिए आया है। धर्मासन का अर्थ है न्याय करने का आसन। अतः धर्मासन या न्यायासन एक ही चीज है।

सृष्टि के आरम्भ में भगवान् सूर्य के सात रंग के सात घोड़े उनके रथ में एक बार जोते गये, जो निरन्तर लगे हुये हैं। अब तक न तो सूर्य को ही विश्राम करने का एक क्षण भी मिला, न उनके घोड़े ही खोले गये। राजा को षष्ठांशवृत्ति इसलिए कहा जाता है कि वह प्रजा को रक्षा करने के बदले उसके अनाज का छठा भाग कर के रूप में लेता है।

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१५ शाकु०