भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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२२८ | अभिज्ञानशाकुन्तलम्

कञ्चुकी—यदाज्ञापयति देवः। (इति निष्क्रान्तः)।
राजा—(उत्थाय) वेत्रवति ! अग्निशरणमार्गमादेशय।
प्रतिहारी—इदो इदो देवो। [इत इतो देवः।]
राजा—(परिक्रामति। अधिकारखेदं निरूप्य) सर्वः प्रार्थितमर्थमधिगम्य सुखी संपद्यते जन्तुः। राज्ञां तु चरितार्थता दुःखान्तरैव।


चीने प्रदेशे = स्थाने, यज्ञशालायां स्थितः = वर्तमानः सन् प्रतिपालयामि = प्रतीक्षे। तथा चोक्तम्।

'अग्न्यागारगतः कार्यं पश्येद्वैद्यतपस्विनाम्।
पुरोहिताचार्यसखः प्रत्युद्गम्याभिवाद्य च॥'

कञ्चुकी—यत् = यथा आज्ञापयति = आदिशति देवः = महाराजः ( इति = एवमुक्त्वा = कथयित्वा निष्क्रान्तः = रङ्गभूमितो बहिर्गतः)
राजा—(उत्थाय) वेत्रवति = यष्टिधारिणि ! प्रतिहारि ! अग्निशरणमार्गं = अग्न्यागारमार्गं यज्ञशालापन्थानम् आदेशय = प्रदर्शय।
प्रतिहारी—इत इतो देवः = अनेन पथा श्रीमान् आगच्छतु। प्रतिहारी लक्षणं यथा—

'सन्धिविग्रहसंबद्धं नानाकार्यसमुत्थितम्।
निवेदयन्ति याः कार्यं प्रतिहार्यस्तु ताः स्मृताः॥'

**राजा—(दुष्यन्तः परिक्रामति—**मण्डलाकारं गच्छति, अधिकारस्य = नियोगस्य


वैदिक रीति से करके स्वयं अन्दर लायें। मैं भी तपस्वियों से मुलाकात करने योग्य इस स्थान में रह कर प्रतीक्षा करता हूँ।

**विशेष—**यहाँ कण्वाश्रमवासी तपस्वियों के वैदिक-रीति से सत्कार करने के निमित्त उपाध्याय सोमरात को कहने का तात्पर्य है कि जो जिस स्थिति का हो, उसे उसी स्थिति वालों के द्वारा सत्कार होना उचित है। मनुस्मृति के अनुसार जो वेद का एक भाग या वेद के अङ्ग को जीविका के लिए पढ़ाता है, उसे उपाध्याय कहते हैं—

एकदेशं तु वेदस्य वेदाङ्गान्यपि वा पुनः।
योऽध्यापयति वृत्त्यर्थमुपाध्यायः स उच्यते ॥ २।१४१

हिन्दू-धर्म के अनुसार वैदिक ब्राह्मण एक यज्ञशाला बनाकर यज्ञशाला का विधिवत् संस्कार करके गार्हपत्य, दाक्षिणात्य और आहवनीय इन तीन अग्नियों की स्थापना कर उनमें प्रतिदिन हवन-कर्म किया करते हैं। इसी प्रकार राजा भी राज्यकार्य की व्यग्रता से समय न पाकर इसके निमित्त पुरोहित की नियुक्ति कर देता है। समय-समय पर तपस्वी आदि पवित्र चरित्रवाले व्यक्तियों से राजा अपने पुरोहित या आचार्य के साथ-साथ अग्निशाला में ही मिलता है, जैसा कि शास्त्रों में निर्देश है—

अग्न्यागारगतः कार्यं पश्येद् वैद्यतपस्विनाम्।
पुरोहिताचार्यसखः प्रत्युद्गम्याभिवाद्य च॥

**कञ्चुकी—**महाराज की जैसी आज्ञा (चला जाता है)।
राजा—(उठकर) द्वारपालिके ! यज्ञशाला का रास्ता दिखलाना।
**प्रतिहारी—**महाराज ! इधर से चलें, इधर से चलें।
राजा—(घूमता है, कर्त्तव्य की खिन्नता का अभिनय कर) सभी प्राणी अपनी