अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
पृष्ठ 313, कुल 540 में से
संदर्भ में पढ़ें| पञ्चमोऽङ्कः | २३१ |
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द्वितीयः--नियमयसि ^[१]कुमार्गप्रस्थितानात्तदण्डः प्रशमयसि विवादं कल्पसे रक्षणाय ।
सुखदुःखानिरपेक्षः केवलमात्मसुखसम्पादनायैव विद्यते, प्रत्युत भवांस्तु स्वसुखमनपेक्षमाणः सर्वदा प्रजाजनकल्याणार्थमेव परिश्राम्यसीति भावः । अथवा यद्वा त्वमिच्छापूर्वमेवं करोषीति न ते = तव राज्ञः वृत्तिः = वर्तनं, व्यापारः एवंविधा = ईदृशी परोपकारार्थमेव स्वधर्मानुष्ठाने का प्रशंसेति भावः । तत्र दृष्टान्तमाह--हि = यतः पादपः = पादपैः चरणैः पिबतीति पादपः = वृक्षः यद्वा । पक्षान्तरे-पादान् = चरणशरणगतान् पाति रक्षतीति पादपो भवान् मूर्ध्ना = मस्तकेन, अग्रभागेन तीव्रं = प्रचण्डं उष्णं = मध्याह्नसंभवमातपं घर्मं अनुभवन्ति सहते संश्रितानां = शरणागतानां तापं = आतपादिसमुत्थं क्लेशं छायया- अनातपेन शमयति = हरति लंघयति, दूरीकरोति वा ।
अर्थात्--पादपस्य पान्थानां छायादानेनातपसन्तापदूरीकरणमिव स्वसुखनिरपेक्ष-परसुखसम्पादकस्य निरन्तरप्रजापरिपालनक्लेशमनुभवतो भवतोऽपि स्वराज्ये निवसितां प्रजाजनानां सर्वाङ्गीणसुखसम्पादनमेव धर्म इति भावः ।
अत्र समासोक्ति-स्वभावोक्ति-काव्यलिङ्ग-दृष्टान्ताक्षेपेपानुुप्रासा अलंकाराः मालिनी-वृत्तं च ॥ ७ ॥
**द्वितीयः--**द्वितीयो वैतालिकः राज्ञो लोकोत्तरं कर्तव्यं तत्फलं वर्णयन्नाह--नियमयसीति ।
**अन्वयः--**आत्तदण्डः (सन् ) कुमार्गप्रस्थितान् नियमयसि, विवादं प्रशमयसि,
पर सूर्य के प्रखर प्रताप=सन्ताप को सहन कर के भी अपने आश्रितों का सदा अपनी छाया से सन्ताप दूर करता रहता है ॥ ७ ॥
**विशेष--**उचित समय की सूचना देने के साथ-साथ वैतालिक, राजाओं की स्तुति करने वाले बन्दी, चारण या भाट को कहते हैं । वैतालिक का लक्षण भावप्रकाश में इस प्रकार किया गया हैं--
तत्तत्प्रहरकयोग्यै रागैस्तत्कालवाचिभिश्श्लोकैः । सरसममेव वितालं गायन् वैतालिको भवति ॥
वैतालिक शब्द की व्युत्पत्ति दो तरह से की जाती है--'विविधः तालः वितालः वितालः प्रयोजनं यस्य स वैतालिकः या, वितालं=वितालगांनं शिल्पमस्येति वैतालिकः ।
वैतालिक राजा की मनःस्थिति भाँपकर उससे मेल खाने वाली ही बात इस पद्य में बताते हुए कहता हैं कि जैसे वृक्ष की उत्पत्ति ही परोपकार के लिए है वैसे ही राजा=आपका भी जन्म प्रजा-पालन रूपी परोपकार के लिए ही है । अतः इस कार्य में खेद नहीं करना चाहिए, क्योंकि ईश्वर ने राजाओं की यही स्वाभाविक वृत्ति बनाई है । यहाँ वृक्ष की तुलना उस राजा से की गई है, जो हमेशा अपने आश्रित व्यक्तियों को अपनी सन्तान के समान पोष्य समझ कर उसकी रक्षा में तत्पर रहता है । जैसे छाते के डण्डे को पकड़े रहने में परिश्रम अधिक होता है, उसकी अपेक्षा मनुष्य को सुख कम ही मिलता है वैसे राज्य की प्राप्ति से जितना उससे सुख नहीं मिलता उससे अधिक चिन्ता मिलती है—
दूसरा वैतालिक— महाराज ! आप अपने हाथ में राजदण्ड धारण कर कु-मार्ग पर चलने वाले दुष्टों का नियमन =
पाठ०--१, विमार्गप्रस्थितानात्तदण्डः ।