अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४० | अभिज्ञानशाकुन्तलम्
पत्राणि च पाण्डुपत्राणि तेषां पाण्डुपत्राणां—परिणामपाण्डुराणां पत्राणां मध्ये किसलय-मिव = कोमलपल्लवमिव तपोधनानां = तापसानां मध्ये अवगुण्ठनवती = आवरणयुक्तपट-प्रावृतसर्वावयवा शरीरं च लावण्यं च शरीरलावण्यं = देहकान्ती नातिस्फुटे = अपूर्णव्यक्ते अनतिप्रकटे शरीरलावण्ये यस्याः सा स्फुटशरीरलावण्या = अनतिविभाव्यमानाङ्गसौन्दर्य-विभवा अत्रभवती = एषा प्रशस्ता ललना का स्वित् = का वा भवेत् ?
अर्थात् यथा जीर्णपाण्डुरपर्णस्याभिनवपल्लवस्य शोभां स्पष्टमविभाव्य द्रष्टुं चित्तं न चमत्कृतं भवति तथैव लम्बकूर्चानां मुनीनां मध्ये माना केयमवगुण्ठनवतीति भावः । अत्रोपमा काव्यलिङ्गोऽलङ्कारो आर्यावृत्तं च ।। १३ ।।
उभड़ते हुए शरीर और यौवन वाली घूँघट, निकाले हुए ऋषियों के बीच में खड़ी हुई, पीले-पुराने पत्तों के बीच में कोमल अभिनव पल्लवों की भाँति शोभायमान यह सुन्दरी युवती कौन हैं ? ।।१३।।
**विशेष—**यहाँ अवगुण्ठन शब्द का प्रयोग ऐतिहासिक दृष्टि से बड़े महत्त्व का है। इससे प्रतीत होता है कि अतिप्राचीन काल में अवगुण्ठन प्रथा का प्रचलन था। राजपरिवार तथा बड़े घरानों की स्त्रियाँ प्राचीन काल में भी घूँघट किया करती थीं। घूँघट तथा पर्दा प्रथा में अन्तर है। साड़ी के अञ्चल भाग से मुख का ढँकना घूँघट है और साड़ी के अतिरिक्त दूसरे वस्त्र उत्तरीय आदि से शरीर का ढँकना पर्दा प्रथा है, जिसका विकास यवनकाल से विशेष माना जाता है।
घूँघट की प्रथा इस देश की पुरानी प्रथा है। आदिकवि महर्षि वाल्मीकि रामायण से लेकर कविवर कालिदास आदि की रचनाओं तक इसका स्पष्ट उल्लेख मिलता है। कुछ विशेष अवसरों को छोड़कर स्त्रियाँ अवगुण्ठन करती थीं। जैसे—अतिसङ्कट, युद्ध स्वयंवर, व्रत, यज्ञ एवं विवाद के अवसर पर अवगुण्ठन के अभाव में स्त्रियों का दूसरों की दृष्टि में आना दोष नहीं माना जाता।
व्यसनेषु च कृच्छ्रेषु न युद्धे न स्वयंवरे। न व्रतौ न विवाहे च दर्शनं दूष्यते स्त्रियः ।। वा० रा० ११४।२८
और यह सीता इस समय विपत्ति में है, मानसिक कष्ट से भी युक्त है, विशेषकर मेरे पास है। इसलिए इस समय अवगुण्ठन के बिना सबके सामने आना दोष की बात नहीं है।
सैषा विपद्गता चैव कृच्छ्रेण च समन्विता। दर्शने नास्ति दोषोऽस्या मत्समीपे विशेषतः ।। ११४।२९
महाभारत में शल्यपर्व में कहा गया है—
अदृष्टपूर्वा या नार्यो भास्करेणापि वेश्मसु। ददृशुस्ता महाराज ! जना याता पुरं प्रति ।।
प्रतिमानाटक में भास ने लिखा है कि 'निर्दोषदृश्या हि भवन्ति नार्यो यज्ञे, विवाहे, व्यसने च (१।२०)। इसी प्रकार महावैयाकरण महर्षि पाणिनि ने अपनी अष्टाध्यायी के 'असूर्य्यललाटयोः दृशितपोः (३।१।३६) सूत्र का उदाहरण दिया है कि सूर्य्यं न पश्यन्तीति असूर्यंपश्या। अर्थात् जिन पर सूर्य तक की नजर न गई हो वे राजदाराएँ राजमहलों से बाहर नहीं निकलती थीं। जिन्हें सूर्य तक न देख पाये उस असूर्यंपश्या शब्द से स्पष्ट है कि स्त्रियाँ केवल पुरुषों की दृष्टि से ही नहीं बचाई जाती थीं, किन्तु धूप से भी बचाई जाती थीं। इस प्रकार स्त्रियों के प्रति पुरुषों का आकर्षण तथा स्त्रियों को सुन्दरता का विषय बनाने के लक्ष्य से घूँघट प्रथा का प्रचलन था क्योंकि स्वच्छन्दता से धूप में बाहर घूमने पर शरीर का रंग साँवला पड़ जाता है, और शरीर का लावण्य निकल जाता है। अद्भुत सुन्दरता के लिए लावण्य शब्द का प्रयोग होता है। मोती के ऊपर जो चमक दिखाई पड़ती है उसे लावण्य कहते हैं—
मुक्ताफलेषु छायायास्तरत्वमिवान्तरा। प्रतिभाति यदङ्गेषु तल्लावण्यमुच्यते ।।