भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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पृष्ठ 323

पञ्चमोऽङ्कः | २४१

प्रतीहारी—देव कुदूहलगब्भोपहिदो ण मे तक्को पसरदि। णं दंसणीआ उण से आकिदी लक्खीअदि। [ देव कुतूहलगर्भोपहितो न मे तर्कः प्रसरति। ननु दर्शनीया पुनरस्या आकृतिर्लक्ष्यते। ]

राजा—भवतु अनिर्वर्णनीयं परकलत्रम्।

शकुन्तला—( हस्तमुरसि कृत्वा आत्मगतम् ) हिअअ किं एव्वं वेवसि ! अज्जउत्तस्स भावं ओहारिअ धीरं दाव होहि। [ हृदय किमेवं वेपसे। आर्यपुत्रस्य भावमवधार्य धीरं तावद्भव। ]


प्रतिहारीदेव ! = महाराज ! कुतूहलेन = कौतुकेन औत्सुक्येन गर्भे = मध्ये उपहितः युक्त इति कुतूहलगर्भोपहितः आश्चर्यभराक्रान्तः तर्कः = ऊहः मे = मम अनुमानं न प्रसरति = न विकसितो भवति, केयमिति निश्चेतुमसमर्थोऽहमित्यर्थः। ननु दर्शनीया = द्रष्टुं योग्या अस्या आकृतिः = शरीरावयवस्थानम् लक्ष्यते = अनुमीयते। भव्याकृतिरियम्-वश्यं भवता दृश्यतामिति भावः।

राजा—प्रतिहार्युक्तं तद्दर्शनं निषेधति—भवतु = अस्तु तावन् या वा, काधेयं भवतु, परकलत्रं = अन्यस्य दाराः अनिवर्णनोयम्=निवर्णनं=निपुणं विलोकनं तत् कर्तुमनुचितम्। अद्रष्टव्यमित्यर्थः। अनालोचनीयः खलु परपरिग्रहो भवतीति भावः।

शकुन्तला—दुर्निमित्तैर्दूयमानं मानसं शकुन्तला प्रत्याह (हस्तं = करम् उरसि =


प्रतिहारी—प्रभो, इसके विषय में मुझे भी कौतूहल हो रहा है आधार के बिना मेरा तर्क यहाँ काम नहीं दे रहा है। हाँ, इसकी आकृति तो अवश्य सुन्दर, दर्शनीय तथा आकर्षक मालूम होती है।

राजा—अच्छा, जाने दो, दूसरे की स्त्री को इस प्रकार ध्यान से देखना भी ठीक नहीं है।

विशेष—पराई स्त्री को घूर-घूर कर देखना भारतीय सदाचार के विरुद्ध है। दूसरे की स्त्री पर बुरी दृष्टि न देने की परम्परा भारत का प्राचीन आदर्श है और राष्ट्र की पवित्रता का द्योतक है। प्रसन्नराघव में भाद्रो मास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि को चन्द्रमा के दर्शन की तरह पराई स्त्री को देखने का निषेध करते हुए कहा गया है कि—भाद्रपदचतुर्थी चन्द्रदर्शनमिव।

उदर्कभूतिमिच्छद्भिः सद्भिः खलु न दृश्यते।
चतुर्थी चन्द्रलेखेव परस्त्रीभालपट्टिका ॥

इसी का अनुवाद गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपने रामचरितमानस में यों किया है—

जो पर नारि ललाट गोसाँई। तजहु चौथ चन्दा की नाईं।

मृच्छकटिक नाटक में भी पराई स्त्री का दर्शन निषेध किया गया है—

न युक्तं परकलत्रदर्शनम्।

अविवाहिता कन्याओं के देखने का वैसा निषेध नहीं है जैसा कि विवाहित स्त्रियों का। इसलिए भास कवि ने अपने प्रतिज्ञायौगन्धरायण में कुमारी कन्याओं को देखना दोषरहित बताया है—‘कन्यादर्शनं हि निर्दोषम्’ यही भाव नागानन्द में भी निर्दिष्ट है—‘कन्यका हि निर्दोषदर्शना भवन्ति’।

शकुन्तला—( छाती पर हाथ रखकर, मन ही मन ) हृदय ! क्यों इस प्रकार धड़क रहे हो। पतिदेव के पूर्व प्रदर्शित प्रेम को समझकर जरा धैर्य तो धारण करो।

विशेष—शकुनशास्त्र के अनुसार हृदय का धड़कना भावी अमङ्गल का सूचक है।

6 १६ शाकु०