भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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पञ्चमोऽङ्कः २४५

तदिदानीमापन्नसत्त्वा प्रतिगृह्यतां सहधर्मचरणायेति ।

अग्रसरः पुरोगामी मुख्यः स्मृतोऽसि = मतोऽसि, वयं त्वां सत्क्रियार्हाणाम् अग्रणी मन्यामहे । शकुन्तला च मूर्तिमती शरीरधारिणी, धृतशरीरा सत्क्रिया = शोभना क्रियेव, सत्कारस्य साक्षान्मूर्तिरिव, सकलजनाभिनन्दनीयास्तीति यावत् । तुल्याः = समानाः गुणाः यस्य तत् तुल्यगुणं = समानगुणम्, वधूश्च वरश्चानयो समाहारः वधूवरं = वधूं च वरं च इमां च त्वां च वरवध्वौ समानयन् = संयोजयन् प्रजापतिः विधाता चिरस्य = बहोः कालात् वाच्यम् = असमानवधूवरयोजनरूपम् अपवादम् ।

वाच्यं वक्तव्यमित्येतौ प्रवर्तेते प्रपादने ।
वचो हे कुत्सिते हीने दूषणेऽभिधयोदिते ॥ इति धरणी

न गतः = न प्राप्तः । अर्थात् राजन् ! परस्परानुरागेण त्वमिमां गान्धर्वविवाहविधिना परिणीतवान् । तत्रानन्दमेवानुभवामि, यतो हि त्वं कुलीनानामग्रणी इयं च शकुन्तला साक्षात् शरीरधारिणी सत्क्रियैवास्ति । अतस्त्वमस्या अनुरूपः, इयं च त्वदनुरूपा, युवयोः परस्परं प्रेम महता सौभाग्येन सम्पन्नम् । बहोः कालात् लोके प्रवृत्तम् असमानदम्पति संयोजनात्मकम् अपवादमसहमानो विधाता शकुन्तलामिमां त्वां दुष्मन्तं च समानगुणौ निर्मायात्मनःकलङ्कं मार्जितवानिति मन्ये ।

अत्रोत्प्रेक्षानुप्रासकाव्यलिङ्गालङ्कारा सन्ति, छन्दश्चास्ति वंशस्थम् ॥ १५ ॥

तत् = तस्मात् कारणात् त्वया शकुन्तलापरिणयस्य कृतत्वात् मया तदनुमतत्वाच्च इदानीं = अधुना एषा सत्त्वमापन्ना = आपन्नसत्वा यद्वा आपन्नं = प्राप्तं सत्त्वं = जीवं यामिति आपन्नसत्त्वा = गर्भिणीति सहधर्मचरणाय सह = सहैव धर्मस्य = यज्ञादेः चरणाय


साक्षात् शरीरधारिणी सत्क्रिया ही है। अतः अधिक समय के बाद ऐसे तुल्य गुण वधू वर का जोड़ा मिलाने से ब्रह्मा जी संसार की प्रशंसा के पात्र हुए हैं ॥ १५ ॥

**विशेष—**विधाता वधू-वर के जोड़े को कम मिलाते हैं, यदि कहीं कन्या सुन्दर होती है तो वर उसके अनुरूप नहीं रहता, यदि कहीं वर गुणी युवा एवं सुन्दर है तो कन्या कुरूपा एवं निर्गुणी होती है। इसलिए लोग ब्रह्माजी की निन्दा किया करते हैं, परन्तु तुम दोनों समान गुण एवं रूप वालों का यह जोड़ा बड़े सौभाग्य से विधाता ने बनाकर सदा की तरह निन्दा के पात्र न होकर प्रशंसा के ही पात्र हुए हैं। अर्थात् तुम दोनों का किया हुआ यह विवाह मुझे स्वीकार है।

अष्ट दिक्पालों के अंश से उत्पन्न धार्मिक प्रवृत्ति वाला राजा संसार के समस्त आदरणीय व्यक्तियों में श्रेष्ठतम माना जाता है। श्रेष्ठ व्यक्तियों का सत्कार श्रेष्ठ वस्तुओं से ही करना समुचित है। आप सत्कार्य हैं तो शकुन्तला सत्कारस्वरूप है। अतः इससे आपका सम्मान समुचित ही है। पतिपत्नी का मेल विधाता गलत करते हैं। इसलिए कहा गया है—'या सुन्दरी सा पतिना विहीना' बेमेल व्यक्तियों का विवाह करने की जो ब्रह्मा जी के मस्तक पर कलङ्क की टीका लगी हुई थी उसको तुम दोनों शकुन्तला दुष्यन्त की जोड़ी बनाकर उन्होंने अब धो दिया है। ऐसी सुन्दर जोड़ी विधाता ने इससे पहले नहीं बनाई थी, जिससे वह निन्दा का पात्र था, अब बना दी, जिससे अब वैसा नहीं रहा क्योंकि शकुन्तला तथा दुष्यन्त अपने समय के बेजोड़ स्त्री पुरुष हैं।

और अब आपकी धर्मपत्नी शकुन्तला गर्भिणी हैं। अतः इसको धर्माचरण के लिए अपने पास रखिए।

**विशेष—**आपन्नसत्त्वा का अर्थ गर्भवती हैं। विवाहित व्यक्ति जो धर्म का आचरण अकेला करता है तो वह निष्फल हो जाता है। इसलिए विवाहित को अपनी पत्नी अपने पास रखकर