भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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पञ्चमोऽङ्कः २४९

शकुन्तला—( सविषादम् । आत्मगतम् ) हिअअ संपदं दे आसंका । [ हृदय सांप्रतं त आशङ्का । ]
शाङ्गरवः—किं कृतकार्यद्वेषो धर्मं प्रति विमुखता कृतावज्ञा।


द्वाहा अस्ति किम् = किमु ? किमियं स्त्री मया पूर्वं परिणीता न मया तथा स्मर्यते इति भावः ।

शकुन्तला— सा सविषादमात्मगतं वदति—हे हृदय ! साम्प्रतं = आर्यपुत्रे एवं वदति सति ते = तव आशङ्का = युक्ता, यदाशङ्कितममङ्गलं मया तदिदमुपस्थितम् । अतो ते शङ्का सत्या जातेति भावः ।

शाङ्गरवः— किञ्चेति पूर्वोक्तं राज्ञो वचनेन शकुन्तला विषये वैमुख्यमाशङ्क्य शार्ङ्गरवः सामर्षमाह—किं कृतकार्येति पद्यार्द्धम्—

अन्वयः— कृतकार्यद्वेषः किम् ? धर्मं प्रति विमुखता किम् ? कृतावज्ञा किम् !

तव राज्ञः कृतं = विहितं यत् कार्यं शकुन्तलाया गान्धर्वपरिणयात्मकं तत्र = परिणीतायामस्यां द्वेषः अप्रीतिरिति कृतकार्यद्वेषः = स्वेच्छया निष्पादिते गान्धर्वविवाहे तवारुचि किम्, धर्मं = धर्माचरणं प्रति विमुखता वैमुख्यं पराङ्मुखता किम् ? पूर्वं धर्मसम्पादनार्थमिमां परिणीयेदानीं धर्मार्जनवैमुख्यं जात किमित्याशयः । कृतस्य = सम्पादितस्य कर्मणः अवज्ञा = अनादरः, एते आरण्यका दरिद्रा मुनयः न तु मया सह सम्बन्धयोग्या इत्यनादरः किम् ? एषु उक्तेषु निमित्तेषु अन्यतमं तवास्यां वैमुख्यस्य निमित्तं किमिति प्रश्नस्याशयः ।


शकुन्तला—( बड़े खेद के साथ मन ही मन ) हे हृदय ! मेरी अमङ्गल की आशङ्का आज सच्ची सिद्ध हो गई ।

शाङ्गरव— हे राजन् ! क्या आप स्वयं अपने मन से किये हुए इस गान्धर्व विवाह से द्वेष करते हैं या धर्म से विमुख होना चाहते हैं या अपने किये हुए कार्य का तिरस्कार करना चाहते हैं या हमारा तिरस्कार करना चाहते हैं ?

विशेष— भले ही अपना किया हुआ काम गलत हो, पर उसे स्वीकार कर लेना चाहिए धर्म से मुँह नहीं मोड़ना चाहिए। जान बूझकर अवज्ञा करना ठीक नहीं। दुष्यन्त ने जो शकुन्तला से गान्धर्व विवाह किया है उसे स्वीकार नहीं करते, अतः धर्म से पीछे हट रहे हैं, सारा वृत्तान्त जानते हुए भी इनकार करना उचित नहीं। शकुन्तला आश्रम में पली है वह झूठ नहीं बोल सकती, राजा भले ही झूठ बोल जाय यह समझाकर शाङ्गरव का भर्त्सनापूर्ण वचन है। वस्तुतः शाङ्गरव को यह ज्ञान नहीं है कि महर्षि दुर्वासा के शाप के कारण राजा दुष्यन्त को शकुन्तला के विवाह का स्मरण नहीं है ।

यहाँ दोनों पक्ष सही दिखाए गये हैं ! राजा दुष्यन्त को याद नहीं है । इसलिए इनकार कर रहे हैं शाङ्गरव का भी सोचना ठीक ही है । शाङ्गरव सोचता है कि यह धर्मतः राजा खासकर मेरा अपमान कर रहा है जो उचित नहीं ।

पर प्रसंग को देखने से प्रतीत होता है कि राजा दुष्यन्त का उज्ज्वल चरित्र धीरता, गम्भीरता सहिष्णुता तथा धार्मिकता के साथ उभर आया हैं ? इस प्रकार के कटु वाक्यों पर वह धैर्य नहीं छोड़ता उत्तेजित नहीं होता और धर्म छोड़ने का साहस नहीं करता । इस प्रकार यहाँ राजा का आदर्शमय चरित्र सामने आ गया है ।

महाभारत में जहाँ से यह कथा ली गई है वहाँ दुष्यन्त जानते हुए भी इनकार करते दिखाए