अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५२ अभिज्ञानशाकुन्तलम्
( इति विचारयन् स्थितः । )
प्रतोहारो—अहो धम्मावेक्खिआ भट्टिणो । ईदिसं णाम सुहोवणदं रूपं देखिअ को अण्णो विआरेदि । [ अहो धर्मवेक्षिता भर्तुः । ईदृशं नाम सुखोपनतं रूपं दृष्ट्वा कोऽन्यो विचारयति । ]
शार्ङ्गरवः—भो राजन् किमिति जोषमास्यते ।
प्रभात भ्रमरः शिशिरत्वान्नाघ्रातुं शक्नोति न वा तत्सौरभेनाकृष्टः मुक्त्वा दूरं ब्रजति तथैवाहमपि स्वमुपस्थितां परमसुन्दरीमिमां ललनां धर्मभयेन न स्वीकर्तुं नापि लावण्याकृष्टः परित्यक्तुं शक्नोमीति तात्पर्यम् । अत्रोपमासन्देहकाव्यलिङ्गालङ्काराः मालिनी छन्दश्च ॥ १९ ॥
( इति = एवं पूर्वोक्तप्रकारं विचारयन् = चिन्तयन् राजा स्थितः )
प्रतिहारी—तथावस्थितं राजानमवलोक्य प्रतिहारी साश्चर्यं श्लाघते,—अहो ! = साधु धर्मवेक्षिता = धर्मस्य अवेक्षिता = दृष्टिः धर्मवेक्षिता यद्वा धर्मं = मर्यादामपेक्षते पालनीयत्वेनानुसरतीति धर्मवेक्षी तस्य भावः तत्ता धर्मवेक्षिता = धर्मत्वम् भर्तुः = स्वामिनः । ईदृशं = लोकोत्तरं सुखेन = अनायासेन उपनतं = प्राप्तमिति सुखोपनतं अनायासलब्धं = प्रयत्नमन्तरोपगतं रूपं = सोन्दर्यं दृष्ट्वा = विलोक्य अन्यः = एतदपेक्षयाऽपरः कः विचारयति = विमृशेत् । अन्यश्चेन्नैव विचारयेत्, अयमेव विचारयतीतीदमेवास्य धर्मवेक्षितत्वमिति भावः
शार्ङ्गरवः—राज्ञस्तथा तूष्णीं भावस्थितिमवलोक्य शार्ङ्गरवः पृच्छति—भो राजन् ! हे महाराज ! किम् इति कथमेवं जोषं = तूष्णीम् आस्यते = स्थीयते ?
छोड़कर अन्यत्र ही जा सकता है । वैसे ही धर्मभय के कारण राजा दुष्यन्त शकुन्तला को स्वीकार और उपभोग ही नहीं कर पाता है और न तो स्वयं उपस्थित वैसी सुन्दरी युवती नारी को छोड़ना ही चाहता है । इसका अभिप्राय यह है कि कुन्द का पुष्प माघ मास की कड़कती रात में विकसित होता है और उसमें ओस के कण भर जाते हैं । सुबह में उसकी मादक गन्ध से आकृष्ट होकर भ्रमर बैठना चाहता है, पर पास में पहुँचते ही उसका अंग सुकड़ने लगता है । अतः ऊपर उड़ जाता है तथा उसके सुगन्ध से आकृष्ट हो दूर भी नहीं जा पाता, पास में ही मड़राता रहता है । बर्फ की ठण्डक से भ्रमर कुन्द का रस नहीं ले पाता है । ठीक यही दशा राजा दुष्यन्त की भी है, कण्वदुहिता शकुन्तला गर्भवती है, यह गर्भ किसका है ? इसको स्वीकार करना धर्मविरुद्ध कार्य है । इसलिए राजा दुष्यन्त शकुन्तला को अङ्गीकार करने में असमर्थ है, किन्तु उसकी देह पर मनोमुग्धकारी छलकता हुआ अद्भुत लावण्य एवं सौन्दर्य को छोड़ना भी नहीं चाहता है । दुष्यन्त की मनोगति 'भई गति सांप छुछुन्दर केरो' सी हो गई है । यहाँ कुन्द पद से इसका संकेत मिलता है कि जिस प्रकार दिन में बर्फ गल जाने पर भ्रमरः पुनः पूर्ववत् कुन्द पुष्प का रसास्वाद भलीभाँति करता है उसी प्रकार धर्मबाधा शाप के प्रभाव को नष्ट हो जाने पर दुष्यन्त का शकुन्तला से पुनः मन चाहे मिलन हो सकता है और वह पुनः पूर्ववत् उसके सौन्दर्य का उपभोग कर सकता है ।
( ऐसा विचार करता हुआ राजा चुप-चाप बैठ जाता है )
प्रतिहारी—( मन ही मन ) धर्म पर हमारे महाराज की कैसी दृढ़ आस्था है ? नहीं तो इस प्रकार स्वयं उपस्थित ऐसे सुन्दर स्त्रीरत्न को देखकर भला कौन दूसरा पुरुष इस प्रकार धर्म-अधर्म का विचार कर सकता है ?
शार्ङ्गरव—हे राजन् ! आप चुपचाप क्यों रह गये हैं ।