भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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पञ्चमोऽङ्कः २५३

राजा— १भोस्तपोधनाः ! चिन्तयन्नपि न खलु स्वीकरणमत्रभवत्याः स्मरामि ।
तत्कथमिमामभिव्यक्तसत्त्वलक्षणां प्रत्यात्मानं २क्षेत्रिणमाशङ्कमानः प्रतिपत्स्ये ।
शकुन्तला— (अपवार्य) अज्जस्स परिणए एव्व संदेहो । कुदो दाणि मे दूराहि-
रोहिणी आसा ? [ आर्यस्य परिणय एव संदेहः । कुत इदानीं मे दूराधिरोहिण्याशा ? ]

राजा--शार्ङ्गरवेण पृष्टो राजा उत्तरयति-भोः तपोधनाः = हे तपस्विनः ! चिन्त-
यन् = विचारयन् अपि अत्रभवत्याः = श्रीमत्याः पुरः स्थिताया वनितायाः स्वीकरणम् =
गान्धर्वविधिना परिणयनम् न अङ्गीकारम् स्मरामि = स्मर्तुं न प्रभवामि । तत् तर्हि कथं =
केन प्रकारेण अभिव्यक्तं = स्फुटं प्रतीयमानं सत्त्वस्य गर्भस्य लक्षणं कपोलपाण्डिमजघन
गौरवादिरूपं चिन्हं यस्याः सा ताम् अभिव्यक्तसत्त्वलक्षणाम् = स्फुटगर्भचिन्हान्, इमां
प्रति = विषये आत्मानं स्वं क्षेत्रिणं क्षेत्रं = पत्नी यस्यासी क्षेत्री तं क्षेत्रिणं गर्भिण्या अस्या
अद्य स्वीकारेऽस्यामुत्पन्नः पुत्रो मे क्षेत्रजः स्यान्नत्वौरसः । यस्य पत्न्यामन्यो जनो गर्भं
धत्ते स क्षेत्रीत्युच्यते । आशङ्कमानः = विचारयन् कथमिलां प्रतिपत्स्ये-स्वीकरिष्ये ।
अङ्गीकरिष्यामि ।

शकुन्तला—राजोक्तिमाकर्ण्य शकुन्तला (अपवार्य) चिन्तयति--आर्यस्य = स्वा-
मिनः परिणये = विवाहविषये एव सन्देहः = शङ्का, अविश्वासः, कुतः = क्व इदानीम् =
अधुना दूरं = अत्यर्थं पतिगृहे गत्वा महिषोपढं प्राप्स्यामीत्यधिरोढुं शीलं यस्याः सा

राजा— हे तपस्वियों ? बहुत विचार करने पर भी इस श्रीमती के साथ गान्धर्व-विधि से
अपने विवाह करने की बात तो मुझे स्मरण नहीं आरही है। अतः मैं इस स्पष्ट गर्भवती स्त्री को
अपनी स्त्री कैसे बना सकता हूँ, क्योंकि इसके गर्भ से जो पुत्र उत्पन्न होगा-वह मेरा औरस पुत्र
न होकर क्षेत्रज (अपनी स्त्री में दूसरे पुरुष से उत्पादित) पुत्र ही होगा। अतः मैं ऐसी स्त्री को
कैसे ग्रहण कर सकता हूँ। और दूसरे की सन्तान को मैं अपनी सन्तान कैसे बना सकता हूँ ।

विशेष— कोश के अनुसार क्षेत्र शब्द, शरीर, खेत, तीर्थ तथा स्त्री का वाचक है-क्षेत्रे शरीरे
केदारे सिद्धस्थानकलत्रयोः (मेदिनीकोशः) क्षेत्रं पत्नीशरीरयोः (अमरकोशः) क्षेत्रवाला क्षेत्री
कहा जाता है। इस पारिभाषिक शब्द का अर्थ वह पति माना जाता है, जो नाम मात्र का पति है।
उसकी पत्नी की वह सन्तान दूसरे की है। इसे यों समझा जा सकता है यदि किसी के खेत में कोई
व्यक्ति बीज छोड़ दे तो, खेत वाला उससे उत्पन्न फसल का असली मालिक होता है। केवल बो
देने वाला व्यक्ति बीजवपन मात्र का अधिकारी है, न कि फसल का उसी प्रकार यदि किसी की स्त्री
में किसी दूसरे व्यक्ति ने दैवात् या बलात्कार से गर्भाधान कर दिया तो उससे उत्पन्न पुत्र क्षेत्रज
कहलाता है, उसे औरस पुत्र नहीं कह सकते हैं। अतः इस शकुन्तला में परपुरुष के द्वारा गर्भा-
धान से उत्पन्न पुत्र क्षेत्रज ही कहलायेगा, औरस नहीं। इसलिए दुष्यन्त का कहना है कि अन्य
पुरुष से गर्भिणी हुई इसे मैं अपनी अर्द्धाङ्गिनी नहीं बना सकता, इससे मुझे अधार्मिक हो जाना
पड़ेगा। शकुन्तला के गालों का पीलापन देखकर राजा ने उसे पूर्णतः गर्भवती होना समझ लिया ।
अभिराम ने बताया है कि गर्भवती स्त्रियों का कपोल पीला पड़ जाता है और स्तनों का अग्रभाग
काला हो जाता है—‘कपोलपाण्डिमस्तनचुचुकनीलिमादि’ ।

शकुन्तला—(मन ही मन) हा धिक् ! हा धिक् ! यहाँ तो विवाह ही में सन्देह है, तब
दूर बढ़ी हुई मेरी सब आशायें तो अब टूट ही गईं समझनी चाहिए ।

विशेष— शकुन्तला ने सोच रखा था कि मैं चक्रवर्ती राजा की दुलारी पटरानी बनूँगी तथा


पाठ०—१. भोस्तपस्विन । २. क्षेत्रियमिव मन्यमानः ।

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