भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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पञ्चमोऽङ्कः २५५

**शारद्वतः—**शाङ्गंरव ! विरम त्वमिदानीम् । शकुन्तले वक्तव्यमुक्तमस्माभिः । सोऽयमत्रभवानेवमाह। दीयतामस्मै ^१प्रत्ययप्रतिवचनम् ।

शकुन्तला— (अपवार्यं ) इमं अवत्थंतरं गदे तारिसे अणुराए किं वा सुमरा-विदेण ? अत्ता दाणि मे सोअणीओ विववसिदं एदं। ( प्रकाशम् ) अज्जउत्त ( इत्यर्धोक्ते ) संसइदे दाणि परिणए ण एसो समुदाहारो। पोरव ! ण जुत्तं णाम दे तह पुरा अस्समपदे सहावुत्ताण हिअअं इमं जणं समअपुव्वं प्पतारिअ ईदिसेहिं अक्खरेहिं पच्चाचक्खिदुं । [ इदमवस्थान्तरं गते तादृशेऽनुरागे किं वा स्मारितेन ?


शारद्वतः—त्वमिदानीं विरम = इतः परं त्वया न वक्तव्यम् शकुन्तले वक्तव्यमुक्त-मस्माभिः = अस्माभिः यावद्वक्तुं शक्यं तावदुक्तम् । सोऽयं = स एव येन त्वं परिणीता अत्रभवान् श्रीमान् एवं इत्थं पूर्वोक्तमाह = वदति । अर्थात् अस्मदुक्तौ मान्यो राजा विप्रतिपन्नः सन् तव परिणयमेव अपलपतीति भावः अतः अस्मै = सन्दिग्धानाय राज्ञे प्रत्ययजनकं प्रतिवचनमिति प्रत्ययप्रतिवचनम् = विश्वासोत्पादकम्, प्रतिवचनम् । उत्तरं दीयतां = उपस्थाप्यतां त्वयेति शेषः ।

शकुन्तला—( अपवार्य ) शोच्यास्मीति स्वयं विचारयति शकुन्तला—तादृशे = तत्प्रकारके अतिशयिते तादृशीं पराकाष्ठागते **अनुरागे=**प्रेम्णि स्नेहं **इदं=**एतत् अवस्थान्तरं = अन्यामवस्थां अभिज्ञानगम्यमवस्थाविशेषम् **गते=**प्राप्ते सति **स्मारितेन=**स्मरणोत्पादना-यासेन किम्वा = किन्नु फलम् ? न किञ्चिदपि फलं पश्यामि । इदानीं = साम्प्रतं मे = मम आत्मा = स्वरूपं शोचनीयः = सचेतोभिः शोच्यतां गतः, अतः शोधनीयः कलङ्कान्मो-चनीय इति हेतोः एतद् व्यवसितं = मयैष उद्यम आरब्धः, प्रतिवचनप्रदाने मे प्रवृत्ति-


मत करो। महर्षिने उस महामानवके समान तुम पर महान् अनुग्रह किया है जो चोरोंको दण्ड देने के बजाय उसे चुराया धन सौंप दे। तुमने उनकी प्यारी धर्मपुत्री का स्पर्श भी किया, फिर उनका अपमान भी कर रहे हो, इसका फल अच्छा न होगा। इस प्रकार उस ऋषिकुमार का क्रोध चरम सीमा पर पहुँच गया है, वह खरी-खरी बातें सुना देता है, यह धर्मपालन का बल है कि वह राजा से स्पष्ट कह देने में नहीं डरता।

शारद्वत—शाङ्गंरव ? अब तुम चुप रहो। शकुन्तले ! हमने राजा से जो कुछ कहना था कह दिया, पर ये राजा ऐसी बात कह रहे हैं कि इन्होंने तुम्हारे साथ विवाह ही नहीं किया है। अतः अब तू ही इनको विश्वास दिलाने वाली कोई ऐसी बात कहो जिससे इनको तुम्हारे साथ विवाह का विश्वास हो सके।

**विशेष—**शारद्वत बड़ा ही गम्भीर है, उसे शीघ्र क्रोध नहीं आता। क्रोध से काम न देखकर वह अपने सखा शाङ्गंरव को शान्त करता हुआ शकुन्तला से कहता है कि तू ही कोई गुप्त विश्व-सनीय बात बता जिससे राजा को विश्वास हो जाय कि इन्होंने तुम्हारे साथ विवाह किया है। और इनके मन से परदा हट जाय । यहां शारद्वत किसी ऐसी घटना का याद दिलाना चाहता है जो प्रेमी और प्रेमिका के जीवन में किसी क्षण में घटती है और आजीवन याद रहती है।

शकुन्तला—( मन ही मन ) जब उस प्रकार का इनका अनुराग भी आज इस दशा में पहुँच गया है तब पिछली बातों का इन्हें स्मरण दिलाने से क्या लाभ है ? तो भी अपनी आत्मा की शुद्धि के लिए ही मैं कुछ कहती हूँ ( प्रगट में ) हे आर्यपुत्र ( इतना आधा ही वाक्य कह कर बीच में ही रुक कर ) अथवा यहां जब विवाह में हो सन्देह हो रहा है, तब इन्हें आर्यपुत्र यह


पाठा—१. प्रतिवचनम् ।