अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६२ | अभिज्ञानशाकुन्तलम्
राजा—तापसवृद्धे।
स्त्रीणामशिक्षितपटुत्वममानुषीषु संदृश्यते किमुत याः प्रतिबोधवत्यः। प्रागन्तरिक्षगमनात् स्वमपत्यजात- 'मन्यैर्द्विजैः परभृताः खलु पोषयन्ति ॥ २२ ॥
राजा—गौतमी वचो निशम्य राजा दुष्यन्तः सोपहासमाह – तापसवृद्धे ! तापसी चासौ वृद्धा तापसवृद्धा तत्सम्बुद्धौ हे तापसवृद्धे ! हे वृद्धतापसि। स्त्रीस्वभावं विवृणोति—स्त्रीणामिति।
अन्वयः—स्त्रीणां ( मध्ये ) अमानुषीषु ( अपि ) अशिक्षितपटुत्वं संदृश्यते यः प्रतिबोधवत्यः किमुत परभृताः स्वमपत्यजातम् अन्तरिक्षगमनात् प्राक् अन्यैः द्विजैः परिपोषयन्ति खलु।
महर्षेः कण्वस्य पुनीते आश्रमे संवर्द्धिता न किमपि कैतवाचारं जानातीति गौतमीवचनं निशम्य राजा दुष्यन्तः सोपहासं स्त्रीस्वभावं विवृणोति—स्त्रीणामिति। स्त्रीणां = नारीणां स्त्रीजातिसमुत्पन्नानां अमानुषीषु = मनुष्यव्यतिरिक्तासु वागादिव्यवहाररहितास्वपि तासु अशिक्षितं च पटुत्वं चेति अशिक्षितपटुत्वम् उपदेशमन्तरापि नैसर्गिकवञ्चना-चातुर्यं संदृश्यते = विलोक्यते प्रतिबोधवत्यः प्रतिबोधोऽस्ति आसामिति प्रतिबोधवत्यः = हस्तपादवागादिव्यवहारकुशलाः शिक्षाशालिन्यश्च मनुष्यः किमुत = तासां कौसले तु पुनः किं वक्तव्यम्। परभृताः—परैः अन्यैः पक्षिभिः भ्रियन्ते इति परभृताः = कोकिलाः स्वं = स्वकीयम् अपत्यजातम् = सन्ततिसमूहम् अन्तरिक्षगमनात् = आकाशगमनात्, उड्डयन-शक्त्युत्पत्तेः पूर्वम् अन्यैः = अपरैः द्विजैः पक्षिभिः काकैः परिपोषयन्ति = परितः सर्व प्रकारेण पालयन्ति-खलु = प्रसिद्धिः। कोकिला हि समुत्पन्नानि स्वानि अपत्यानि कुलायेषु निक्षिपन्ति काकाश्च तानि स्वापत्यबुद्ध्या तानि परिपालयन्तीति कविप्रसिद्धिः।
राजा—हे वृद्ध तापसी बुद्धिमती स्त्रियों की तो बात ही क्या है, पशु-पक्षी जाति की अज्ञान स्त्रियाँ भी सिखाये बिना स्वभाव से ही चतुर एवं चालाक देखी जाती है। देखो कोकिलाएँ, जब तक उनका बच्चा आकाश में उड़ने लायक नहीं हो जाता तब तक उसका पालन-पोषण अन्य पक्षियों से ही कराती हैं ॥ २२ ॥
विशेष—यह बात प्रसिद्ध है कि कोयल का बच्चा जब अण्डे से बाहर निकलता है तब कोयल उस बच्चे को ले जाकर कौए के घोसले में रख आती है। मूर्ख कौवी उसे अपना बच्चा समझ कर पालती पोसती है, उड़ने की शक्ति हो जाने पर वह कोयल का बच्चा वहां से उड़कर चला जाता है और कोयल के झुण्ड में मिल जाता है कौवी कांव कांव करती ही रह जाती है। और सन्तान की लालसा से कोयल की सन्तान को अपनी सन्तान मान लेने वाली कौवी का भ्रम दूर हो जाता है। कौवी के द्वारा पालित-पोषित होने के कारण कोयल का दूसरा नाम परभृत परपृष्ट आदि है। इस उदाहरण को दृष्टि में रखकर राजा कहते हैं कि स्त्रियां बहुत चालाक होती है, उन्हें सिखाना नहीं पड़ता है और दूसरों को ठगने में भी चालाक होती हैं? यह भी प्रसिद्धि है कि कौबी एक बार ही जन्म देती है। इसलिए एक बार जन्म देने वाली माताएँ काकवन्ध्या कही जाती हैं।
पाठ०—१. मन्यैर्द्विजै परभृतः।