अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽङ्कः २६९
शार्ङ्गरवः— विनिपातः। राजा— विनिपातः पौरवैः प्रार्थ्यत इति न श्रद्धेयम्। शारद्वतः— शार्ङ्गरव! किमुत्तरेण? अनुष्ठितो गुरोः सन्देशः। प्रतिनिवर्त्तामहे वयम्। (राजानं प्रति)—
तदेषा¹भवतः कान्ता त्यज वैनां गृहाण वा।
²उपपन्ना हि दारेषु प्रभुता सर्वतोमुखी ॥ २६ ॥
पगतं = स्वीकृतं तावत् = प्रथमम् अस्माभिः मया एवम् = इत्थं मयोक्तं प्रतारणम्। 'प्रयोजनमनुद्दिश्य मन्दोऽपि न प्रवर्तते' इति न्यायेन अतिसन्धाय = वञ्चयित्वा, प्रतार्यं किंपुनर्लभ्यते, किं प्राप्यते, न किमपीत्यर्थः।
शार्ङ्गरवः— कुपितः शार्ङ्गरव आह—विनिपातः = अधमः, नरके पतनं वा त्वया लभ्यते इति भावः।
राजा— पौरवैः = पुरुवंशोत्पन्नैः राजभिः (न केवलं मया) विनिपातः = नरके पतनं प्रार्थ्यते। इति इदम् न श्रद्धेयं श्रद्धास्पदं विश्वासानर्हम्, 'असत्यमप्यश्रद्धेयं न वदेदिति नीतिः।
शारद्वतः— नृपसहचरयोः वाक्कलहं निरोद्धुकामः शारद्वतः कथयति—शार्ङ्गरव! किमुत्तरेण = प्रतिवचनेन किम्! अनेन घमंध्वजिना नृपेण सह वादप्रतिवादेनालं कोऽपि लाभो नास्ति तद्विरम। गुरोः महर्षेः कण्वस्य सन्देशः = वाचिकम् अनुष्ठितः = संपादितः गुर्वाज्ञानुसारं शकुन्तला राजसकाशं प्रापिता, राज्ञा सह वादाय नादिष्टा वयम् प्रतिनिवर्त्तामहे = आश्रमं प्रतिगच्छामः (राजानं = नृपं दुष्यन्तं प्रति उद्देश्य) प्रसङ्गमपसंहरन् शारद्वतो ब्रूते = तदेषेति।
अन्वयः— तत् एषा भवतः कान्ता, एनां त्यज वा गृहाण वा हि दारेषु सर्वतोमुखी प्रभुता उपपन्ना।
वञ्चक ही है, किन्तु यह तो बताइये कि इस बेचारी भोली-भाली सीधी-साधी महिला को ठगने से हमें लाभ ही क्या होगा?
विशेष— यहाँ राजा का ऋषियों के लिए कहा गया सत्यवादिन् सम्बोधन उपहास गर्भित है।
शार्ङ्गरव— लाभ! तुम्हारा अधः पतन ही लाभ है।
विशेष— यहाँ शार्ङ्गरव के कहने का अभिप्राय है कि एक भोली-भाली मुनिकुमारी को धोखा देने का पाप आपको भोगना पड़ेगा। यदि महर्षि कण्व अपनी कन्या शकुन्तला के दुःख से दुःखी होकर अत्यन्त क्षुब्ध हो जायेंगे तो उनके शापाग्नि से तुम्हारा कुल भस्मसात हो जायेगा। इससे बढ़कर अधःपात क्या हो सकता है।
राजा— हम पुरुवंशी राजा अपना अधःपात अपने आप चाहेंगे—यह बात तो किसी के भी विश्वास में नहीं आ सकती है।
शारद्वत— शार्ङ्गरव! अब ज्यादा कहने सुनने से क्या लाभ है। हम लोगों ने गुरु जी की आज्ञा का पालन कर दिया, अब हम लोग आश्रम को चलें (राजा के प्रति)—
आपकी पत्नी को आपके पास पहुँचा दिया गया। आप इसे छोड़ दें या स्वीकार करें, क्योंकि विवाह करने वाले का अपनी पत्नी पर पूरा पूरा अधिकार होता है ॥ २६ ॥
पाठा०—भवतः पत्नी।
२. उपयन्तृर्हि।