अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७२ अभिज्ञानशाकुन्तलम्
तिष्ठ साधयामो वयम् ।
राजा—भोस्तपस्विन् किमत्रभवतीं विप्रलभसे ।
पश्चात्प्रस्थितां तां शकुन्तलामवलोक्य शार्ङ्गरवः सकोपमाह—यदीति । क्षितिपः भू-पालो राजा दुष्यन्तो यथा वदति = यादृशं भाषते न ममेयं परिणीतेति कथयति चेत् = यदि त्वं भवती तादृशी असि यदि त्वं तत्त्वत एवानूढा सगर्भा चासि तदा उत् = उत्क्रान्ता कुलात् = कुलमर्यादाया इत्युत्कुला तया उत्कुलया कुलमुत्क्रान्तया, अतिक्रान्तकुलमर्यादया तथाभूतया त्वया पितुः = कण्वस्य किम् ? न किमपि प्रयोजनमित्यर्थः । अथ तु=पक्षान्तरे एतद्विपरीतं = स्वस्य आत्मनः व्रतपातिव्रत्यरूपशुचिपवित्रं वेत्सि = अयमेव दुष्यन्तो मे भर्तेति मनसा जानासि तदा पतिकुले = भर्तृगेहे दास्यमपि पत्युः सविधे नावस्थानं दासीभावोऽपि तव क्षमं योग्यम्, समीचीनमुचितम् । अतः आश्रमे तव पुनर्गमनं सर्वथा प्रतिकूलम् इहैव ते वास उचितः । अर्थात् शकुन्तले ! यदि त्वं वस्तुतः दुष्यन्तेनानूढैव सगर्भा जाता तर्हि अतिक्रान्तकुलमर्यादायाः तव कुलगुरुः त्वन्मुखं द्रक्ष्यसि यदि त्वं स्वपातिव्रत्यं युक्तं मन्यसे तर्हि ते पतिगृहे सेवाकर्म समुचितम् । अतोऽस्माकमनुगमनं न कार्यम् । अत्र हेतुकाव्यलिङ्गालङ्कारौ द्रुतविलम्बितं छन्दश्च ॥ २७ ॥
एवं पक्षद्वयेऽपि प्रतिप्रमाणेऽभ्युक्ते सति अत्रैव तिष्ठ = विरम, साधयामः = त्वां विहाय वयं गच्छामः ।
राजा—भो तपस्विन् = हे तापस ! अत्र भवतीं = मान्यां शकुन्तलां किं विप्रलभसे = वाक्चातुर्येण कथं वञ्चयसि । एनां प्रतार्य इहैव कुतः परित्यजसि । इत्थं भवदुपाय-प्रयोगेण अत्रासीनापि एनां न स्वीकरिष्यामीति सदृष्टान्तमाह—कुमुदान्येवेति ।
कण्व का क्या प्रयोजन ? और यदि आचरण को तुम पवित्र समझती हो तो पतिगृह में ही तुम्हारी दासता भी उचित है । अतः यहीं रुको ॥ २७ ॥
**विशेष—**दोनों स्थितियों में शकुन्तला के लिए पिता का संरक्षण सम्भव नहीं था यदि विवाहिता लड़की ससुराल में अपने को नहीं निभा सकती है तो पतिगृह में उसका स्थान नहीं । यदि वह अपने को चरित्रवती समझती है तो अत्याचार होने पर भी पति के साथ रहकर उसकी सेविका को रहना उचित है । यदि व्यभिचारिणी है तो उसे पिता के घर में जाना कथमपि उचित नहीं, क्योंकि कोई भी पिता व्यभिचारिणी पुत्री को अपने घर में बनाये रखना नहीं चाहता ।
राजा का कहना कि मैंने इससे विवाह ही नहीं किया है, न यह मेरी स्त्री ही है, न यह गर्भ ही मेरा है, यदि वैसी ही कुलकलङ्किनी भ्रष्टा है तो कुलमर्यादा को भंग करने वाली तुम स्वैरिणी से अब हमारा सम्बन्ध ही क्या है ? यदि अपने पातिव्रत्य धर्म को परिशुद्ध समझती हैं और तेरा यही पति है तो फिर जाती कहाँ हो, पति के घर में दासी बनकर रहना भी तेरे लिए उचित है । अर्थात् यदि तू इस राजा की स्त्री नहीं है, तैने और ही किसी दूसरे पुरुष से सम्बन्ध कर यह गर्भ धारण किया है, तो तेरी ऐसी कुलटा को हम साथ ले जाकर अब कर भी क्या सकते हैं ? यदि तू सच्ची सती साध्वी है तेरा पति यही है तो फिर उनके यहाँ रहकर किसी प्रकार तुम्हें अपना समय बिताना चाहिए ।
अतः तू यहीं रह हमलोग जाते हैं ।
**राजा—**हे तपस्विन् ! इस बेचारी को आप क्यों धोखा दे रहे हैं और यहाँ इसे छोड़कर जा रहे हैं क्योंकि—