अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
पृष्ठ 355, कुल 540 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽङ्कः । २७३
कुमुदान्येव शशाङ्कः सविता बोधयति पङ्कजान्येव ।
वशिनां हि परपरिग्रहसंश्लेषपराङ्मुखी वृत्तिः ॥ २८ ॥
अन्वयः—शशाङ्कः कुमुदानि एव, सविता पङ्कजानि एव बोधयति । हि वशिनां वृत्तिः परपरिग्रहसंश्लेषपराङ्मुखी (भवति) ।
शकुन्तलामुपदिश्य तां पतिगृहे एव बलान्निवासयितुमुद्यतं शार्ङ्गरवं ब्रूते नृपतिर्दुष्यन्तः कुमुदानीति । शशाङ्कः चन्द्रः कुमुदान्येव=कैरवकुलान्येव बोधयति = विकासयति न पुनः पंकजानि सविता = सूर्यस्तु पङ्कजान्येव बोधयति, न कुमुदानि । हि=यतः, निश्चितं वशिनां = इन्द्रियसंयमिनाम् वृत्तिः = चित्तवृत्तिः व्यापारो वा परेषां परिग्रहाणां संश्लेषे पराङ्मुखीति परपरिग्रहसंश्लेषपराङ्मुखी = अन्यकलत्रसम्पर्ककलङ्कविमुखी परकलत्र-स्वीकृतिर्निवर्तनशीला भवति, जितेन्द्रिया हि परकलत्रं मनसापि न स्वीकुर्वन्ति । ‘परिग्रहः परिजने पत्न्यामिति विश्वः ।
अर्थ भावः—अयि तापस ! कथमेनां कण्वकन्यां प्रतारयसि मम गेहे निवासेऽपि नाहमेनामङ्गीकरिष्यामि । पश्य, यथा चन्द्रमाः कुवल्यान्येव विकासयति, न कमलानि, सूर्यश्च पङ्कजान्येव विकासयति, न कुमुदानि । तथैव जितेन्द्रियाः पुरुषपुङ्गवाः परकल-त्राणि मनसाऽपि न कामयन्ते । तस्मादेनामत्र निवासयितुं भवतामुद्यमो व्यर्थ एव भविष्यति । अतो नैनां परस्त्रियमहं स्वान्तःपुरे स्थापयिष्यामीति भावः । अत्राप्रस्तुत-प्रशंसादृष्टान्तान्तरन्यासा अलङ्कारा आर्या छन्दश्च ॥ २८ ॥
चन्द्रमा कुमुद को ही विकसित करता है, कमलों को नहीं और सूर्य कमलों को ही खिलाता है कुमुदों को नहीं । हमारे जैसे इन्द्रियनिग्रही धर्मभीरु लोगों की वृत्तियाँ हमेशा ही परिग्रह से पराङ्मुखी हो रहती है ॥ २८ ॥
इस प्रकार कुमुद चन्द्रमा का ही परिग्रह है तथा कमल सूर्य का परिग्रह है । इसलिए चन्द्रमा कमल से और सूर्य कुमुद से प्रेम नहीं करता । इसी प्रकार मैं भी पराई स्त्री से पराङ्मुख ही हूँ । राजा जोर देकर कह रहे हैं कि ऋषियों ! यह न समझना कि इसे यहाँ छोड़ जाओगे तो मैं दया या कामुकता के कारण इसे स्वीकार कर लूँगा । परस्त्री मेरे लिए उसी प्रकार हेय है जिस प्रकार चन्द्रमा के लिए कमल तथा सूर्य के लिए कुमुद । राजा के कहने का अभिप्राय यही है कि आप समझते हो कि आप लोगों के यहाँ छोड़कर चले जाने के बाद मैं इस परम सुन्दरी ललना पर मुग्ध होकर आसक्त हो जाऊँगा और इसे अपने पास रख लूँगा । यह तो आप लोगों का भ्रममात्र ही है । मैं हमेशा दूसरे की स्त्री से दूर रहने वाला व्यक्ति हूँ । इसलिए इस बेचारी को यहाँ छोड़कर आप लोग इसे धोखा न दें ।
विशेष—इस पद्य में शकुन्तला एवं दुष्यन्त के स्थान पर कुमुद एवं शशाङ्क तथा सूर्य एवं कमल का उल्लेख होने का तात्पर्य है जिससे जिसका सम्बन्ध होता है वही उसको प्रसन्न करता है दूसरों को नहीं । चन्द्रमा की चाँदनी छिटकने पर ही कुमुदिनी विकसित होती है तथा सूर्य की प्रभा फैलने पर केवल कमलिनी विकसित होती है, कुमुदिनी नहीं । यहाँ तो राजा दुष्यन्त सुलभ कोप महर्षि दुर्वासा जी के शाप से शकुन्तला से अपना सम्बन्ध ही नहीं समझ रहें हैं तो उससे प्रसन्न होने की बात ही क्या है ?
१८ शाकु०