अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २७६ | अभिज्ञानशाकुन्तलम् |
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राजा— यथा गुरुभ्यो रोचते।
पुरोहितः— ( उत्थाय ) वत्से, अनुगच्छ माम् ।
शकुन्तला— भअवदि वसुहे, देहि मे विवरं [ भगवति वसुधे देहि मे विवरम् ]
( इति रुदती प्रस्थिता निष्क्रान्ता सह पुरोधसा तपस्विभिश्च )
( राजा शापव्यवहितस्मृतिः शकुन्तलागतमेव चिन्तयति । )
शुद्धान्तं = अन्तःपुरम् एनां = इमां मुनिदुहितरम् प्रवेशयिष्यसि । विपर्यये तु = अन्यथा पुनः यदेषा पुत्रं न जनयिष्यति जनितमपि चक्रवर्तिलक्षणहीनं स्यात् तदा अस्याः पितुः मुनेः कण्वस्य समीपनयनं = निकटप्रापणम् अवस्थितमेव = निर्धारितमेव निश्चितमेव ।
राजा— पुरोहितोक्तिमनुमन्यमानः प्राह—यथा गुरुभ्यः = आदरणीयाय उपाध्यायाय भवते रोचते— तथा भवतु ।
पुरोहितः— पुरोधाः शकुन्तलामाह—वत्से = पुत्रि ! माम् अनुगच्छ = अनुसर ।
शकुन्तला— अथ पुरोहितमनुप्रस्थिता उभयलोकभ्रंशमसहमाना शकुन्तला संनिर्वेदं शरीरत्यागाय भगवतीं जानकीव वसुधामाशंकते—भगवति वसुधे = वसुन्धरे ! मे = मह्यं शकुन्तलायै विवरं स्वोदरे अवकाशं देहि वितर ( इति = एवमुक्त्वा रुदती = विलपन्ती पुरोधसा = पुरोहितेन तपस्विभिः = कण्वाश्रमवासिभिः तापसैश्च सह = साकं निष्क्रान्ता प्रस्थिता = चलिता, रङ्गभूमितो निर्गता )
( राजा = नृपो दुष्यन्तः शापेन = दुर्वाससः शापेन व्यवहितां स्मृतिः यस्य स शापव्यवहितस्मृतिः = शापमूढमतिः शकुन्तलागतं = शकुन्तला विषयं वृत्तान्तमेव निमित्तीकृत्य चिन्तयति = शोचति )
उस समस्या का समाधान ईमानदारी से करना चाहते हैं यदि उनके माध्यम से सिद्ध हो गया कि शकुन्तला दुष्यन्त की परिणीता पत्नी है तो पुरोहित जी की प्रतिष्ठा अमिट रहेगी ।
प्राचीन काल में दैवज्ञों की भविष्यवाणी पर धार्मिक जनता का पूर्ण विश्वास था । दुष्यन्त की जन्मकुण्डली एवं हस्तरेखाओं को देखकर ज्योतिष के विद्वानों ने पहले ही बता दिया था कि इनका प्रथम पुत्र चक्रवर्ती होगा । हस्तरेखा के अनुसार चक्रवर्ती के पैर और हाथों में शंख, चक्र, कमल, अंकुश, वज्र आदि के चिह्न होते हैं । मुनि दौहित्र पद से व्यक्त होता है कि राजकुमार होना अभी विवादास्पद है । शकुन्तला की बात झूठी होने पर वह अपने पिता के पास भेज दी जायेगी ।
राजा— जैसा आपको अभीष्ट हो वैसा करें ।
पुरोहित— ( उठकर ) बेटी ! मेरे पीछे-पीछे आओ ।
शकुन्तला— भगवति वसुन्धरे ! मुझे अपने अन्दर स्थान दो, फट जाओ मैं समा जाऊँ ।
( यह कह कर शकुन्तला रोती हुई पुरोहित तपस्वियों तथा गौतमी के साथ-साथ रंगमंच से बाहर जाती है )
विशेष— तपोवन निवासिनी मुनिकन्या शकुन्तला इतनी सौम्य थी कि वह इस तरह अपमानित होने पर भी रोती हुई पुरोहित जी के पीछे चली जाती है, न तो हठ करती है, न झूठे पति को कुवाच्य कहकर अपमानित करती है । धन्य है यह भारतीय नारियों का आदर्श ।
( इधर राजा, जिनकी स्मृति महर्षि दुर्वासां के शाप से ढक गई है शकुन्तला के विषय में ही सोचते हैं )