भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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षष्ठोऽङ्कः

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रक्षिणौ—( ताडयित्वा ) अले कुम्भीलआ । कहेहि कहिं तुए एशे मणिबंध-णुक्किण्णणामहेए लाअकीए अंगुलीअए शमाशादिए । [ अरे कुम्भीलक कथय कुत्र त्वयेतन्मणिबन्धोत्कीर्णनामधेयं राजकीयमङ्गुलीयकं समासादितम् ]

पुरुषः—( भीतिनाटितकेन ) पशीदंतु भावमिश्रे । हगे ण ईदिशकम्मकाली । [ प्रसीदन्तु भावमिश्राः । अहं नेदृशकर्मकारी । ]


रक्षिणौ—(रक्षाधिकृतपुरुषौ पुरुषं ताडयित्वा=आहत्य) अरे=रे कुम्भीलक ! चोर ! 'कुम्भरीको गण्डपदः तस्करश्च मलिम्लुचः' इति नाममाला। 'कुम्भिलः शालमीने च चौरश्लोकार्थचौरयोः' इति मेदिनीकोशश्च। कथय = वद कुत्र = क्व त्वया एतत् इदं पुरो निहितम, मणिबन्धनं = मणिजटितं च उत्कीर्णं = उल्लिखितं नामधेयं = अभिधानं नामाक्षराणि यस्मिन् तत् मणिबन्धनोत्कीर्णनामधेयम् = उट्टङ्कितराजनामाक्षरम् राजकीयं-राजसम्बन्धि अङ्गुलीयकं = मुद्रा समासादितं प्राप्तम्।

पुरुषः—(बद्धो जनः भीत्या = भयेन नाटकितेन = भयं नाटयित्वा अभिनयेन वदति) यत् प्रसीदन्तु सकृपाः भवन्तु भावमिश्राः = मान्यवराः अहं न ईदृशं कर्म कर्तुं शीलं


दोनों सिपाही—( पुरुष को मारते हुए ) अरे चोर, बता जड़ी हुई मणि पर खुदे हुए नाम से युक्त यह राजा की अंगूठी तुमने कहाँ पाई।

**विशेष—**नागरिक शब्द का वास्तविक अर्थ नगरनिवासी, चतुर, चालाक, प्रवीण, कुशल आदि होता है। प्राचीनकाल में नगर-रक्षा का भार राजा के साले पर होता था। साला राजा का निकटतम सम्बन्धी है, अतः उस पर पूर्ण विश्वास रहता था। सगे सम्बन्धियों से धोखे की संभावना कम रहती है। इसलिए नगररक्षक को संस्कृत भाषा में श्याल और राष्ट्रिय भी कहा जाता है—राजश्यालस्तु राष्ट्रियः। इस प्रकार प्राचीनकाल में बहुविवाह के अनुसार राजाओं की कई स्त्रियां हुआ करती थीं, उनके भाई आदि को भी प्रधान राजकीय पदों पर रखा जाता था। उनके भी साले आदि उनके अन्दर कार्य किया करते थे। ये सभी राजा के प्रधान अधिकारी को आवुत्त=जीजाजी कहा करते थे। आवुत्त शब्द का वास्तविक अर्थ जीजाजी = बहन के पति अर्थात् बहनोई होता है किन्तु प्राचीनकाल में कुछ लोग अपने बड़े अधिकारी को भी आवुत्त कहा करते थे।

वास्तविक स्थिति का पता लगाने के निमित्त पुलिस द्वारा पीटने की प्रथा अतिप्राचीन है। आजकल की तरह ही जिस व्यक्ति पर शक होता था उसे अपराधी समझकर पीटा जाता था, जिससे वह भयभीत होकर सच्ची बात बता देता था। आजकल भी पुलिस अधीक्षक, नगर कोतवाल या जिलाधीश के सामने सिपाही अपनी कारगुजारी बढ़चढ़कर दिखाते हुए अपराधी को अपमानित करने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार नगर की रक्षा करने में नियुक्त अधिकारी को कोष्ठपाल कोट्टपाल तथा श्याल भी कहा गया है।

कुम्भीरक शब्द निपात से निष्पन्न होता है—कु = पृथ्वी दीवार को भेदन = सेंध देने वाले को 'कुम्भीरक कहते हैं तथा मगर के समान चोरी से प्राणियों को पकड़ने के कारण ही समान आचरण करने वाले चोर को भी कुम्भीरक कहा जाता है।

पहले सोने की अंगूठी में बहुमूल्य मणि जड़ी रहती थी, जिसके ऊपर राजा के नाम खुदे रहते थे, जिससे समय समय पर अत्यावश्यक कागज पत्रों पर मुहर भी लगाई जाती थी। महाराज दुष्यन्त की अँगूठी भी इसी प्रकार की थी।

पुरुष— ( भय का अभिनय करता हुआ ) हे मालिक ! मुझ पर दया कीजिए। मैं ऐसा अनुचित कार्य-चोरी करने वाला नहीं हूँ।