भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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पृष्ठ 369

षष्ठोऽङ्कः२८७

**पुरुषः—**ण अलुहदि भावे अकालणमालणं भाविदुं। [ नार्हति भावोऽकारण-मारणं भावयितुम् ]

द्वितीयः— ( विलोक्य ) एशे अम्हाणं शामी पत्तहत्थे लाअशाशणं पडिच्छिअ इदोमुहे देक्खीअदि। गिद्धबली भविश्शशि शुणो मुहं वा देखिश्शशि। [ एष नौ स्वामी पत्रहस्तो राजशासनं प्रतीक्ष्येतोमुखो दृश्यते। गृध्रबलिर्भविष्यसि शुनो मुखं वा द्रक्ष्यसि। ]

( प्रविश्य )

**श्यालः—**सुअअ मुं चेदु एसो जालोअजीवी । उववण्णो खु अंगुलीअस्स आआमो । [ सूचक मुच्यतामेष जालोपजीवी । उपपन्नः खल्वङ्गुलीयकस्यागमः । ]


पुरुषः—भावः = श्रीमान् अकारणमारणं कारणं विनैव वधं भावयितुं = प्रापयितुं विचारयितुं वा न अर्हति यतोऽहं निरपराध इति भावः ।

द्वितीयः—एषः = अयं नौ आवयोः स्वामी = नगरपालः ।

श्यालः—पत्रं हस्ते यस्य स पत्रहस्तः = हस्ते गृहीतपत्रः राजशासनं = राजाज्ञां प्रतीक्ष्य गृहीत्वा इतो मुखः- इतः एनां दिशं मुखमाननं यस्य स इतोमुखः = अस्यां दिशि मुखं कृत्वा दृश्यते = अवलोक्यते मन्ये त्वं गृध्रबलिः = गृध्रस्योपहारः भविष्यसि = गृध्रास्ते मांसं भक्षयिष्यन्तीति भावः अथवा शुनः = कुक्कुरस्य मुखं = दर्शनाथं व्यात्तमाननं द्रक्ष्यसि = राजाज्ञया शूलस्थं मृतं त्वां गृध्राः, आकण्ठं भुविनिखातं जीवितं वा कुक्कुराः = खादिष्यन्तीति भावः ।

श्यालः—ततः श्यालः प्रविश्य वदति-सूचक ! एषः = अयं जालोपजीवी = जालेन उपजीवति = जीविकां वर्तयति तथाविधो धीवरः = कैवर्तः मुच्यताम् = बन्धनमुक्तः क्रियताम् उपपन्नः = प्रमाणितः खलु = निश्चयेन अङ्गुलीयकस्य आगमः = आगमनम् । मुद्राप्राप्तिवृत्तान्तोऽवगत इति भावः । अतो नायं चौरः ।


**धीवर—**सरकार, बिना अपराध हो मुझे मारने की बात आपको नहीं करनी चाहिए।

दूसरा सिपाही—( सामने देखकर ) यह देखो, हमारे मालिक ( कोतवाल साहब ) हाथ में सरकारी हुक्म लेकर इधर ही आ रहे हैं। मालूम होता है या तो इसे बूटी-बूटी काटकर गीध कौआ और चीलों को खिलाने का हुक्म हुआ हो या कुत्तों से नोचवाकर मारने का आदेश हुआ हो।

**विशेष—**प्राचीनं काल में यह प्रथा थी कि नगर के बाहर बध्यस्थान बनाए जाते थे जहाँ अपराधियों को फांसी दी जाती थी तथा मरने के अनन्तर उसे फेंक दिया जाता था, उसे गीध, चील कौवे आदि नोचकर खा जाते थे। या कभी कभी अपराधी को जमीन में गड्ढा खोदकर खड़ा गाढ़ दिया जाता था। उसकी गर्दन मात्र दिखाई पड़ती थी। शिर पर दही आदि रख कर कुत्तों को ललकार दिया जाता था, वे उसे तत्काल नोच नोचकर मार देते थे। मल्लाह लोग जाल से मछलियों को पकड़कर स्वयं खाते थे और बाजार में बेचकर पैसों से अपने परिवार का खर्च चलाते थे। जिसके पास जाल न होती थी उसका परिवार दुःख भोगता रहता था।

श्याल—( प्रवेश कर ) सूचक ! इस मछुए को छोड़ दो, अँगूठी के आने का कारण निश्चित रूप से मिल गया।

**विशेष—**महर्षि दुर्वासा ने शकुन्तला को शाप दिया था जिसके चिन्तन में निमग्न होकर तुम भिक्षा न देकर मेरा अपमान कर रही हो, वह तुझे प्रमादी के समान भूल जायेगा, किन्तु प्रियम्वदा की प्रार्थना पर उन्होंने कुछ अनुग्रह कर पुनः कहा था निशानी के निमित्त दिये गये